नागर खण्ड · अध्याय 5
त्रिशंकु के स्वर्गारोहण हेतु द्वादशवार्षिक यज्ञ
श्लोक 1 (skanda.6.5.1)
सूत उवाच। तच्छ्रुत्वा ब्रह्मणो वाक्यं विश्वामित्रो रुषान्वितः। पितामहमुवाचेदं पश्य मे तपसो बलम्
sūta uvāca| tacchrutvā brahmaṇo vākyaṁ viśvāmitro ruṣānvitaḥ| pitāmahamuvācedaṁ paśya me tapaso balam
सूत जी ने कहा — ब्रह्मा जी का यह वचन सुनकर क्रोधित विश्वामित्र ने पितामह से कहा — मेरी तपस्या का बल देखिए।
श्लोक 2 (skanda.6.5.2)
याजयित्वा त्रिशंकुं तं विधिवद्दक्षिणावता। यज्ञेनात्र नयिष्यामि पश्यतस्ते पितामह
yājayitvā triśaṁkuṁ taṁ vidhivaddakṣiṇāvatā| yajñenātra nayiṣyāmi paśyataste pitāmaha
उस त्रिशंकु से विधिपूर्वक दक्षिणा सहित यज्ञ कराकर, हे पितामह! आपके देखते-देखते ही मैं उस यज्ञ से इसे स्वर्ग ले जाऊँगा।
श्लोक 3 (skanda.6.5.3)
एवमुक्त्वा द्रुतं गत्वा विश्वामित्रो धरातलम्। चकार याजने यत्नं त्रिशंकोः सुमहात्मनः
evamuktvā drutaṁ gatvā viśvāmitro dharātalam| cakāra yājane yatnaṁ triśaṁkoḥ sumahātmanaḥ
ऐसा कहकर विश्वामित्र शीघ्र ही पृथ्वी पर जाकर महात्मा त्रिशंकु के यजन में प्रयत्नशील हुए।
श्लोक 4 (skanda.6.5.4)
ददौ दीक्षां समाहूय ब्राह्मणान्वेदपारगान्। यत्रकर्मोचिते काले तस्मिन्नेव वने शुभे
dadau dīkṣāṁ samāhūya brāhmaṇānvedapāragān| yatrakarmocite kāle tasminneva vane śubhe
वेदपारंगत ब्राह्मणों को बुलाकर, उस कर्म के उचित काल में, उसी शुभ वन में उन्होंने राजा को दीक्षा दी।
श्लोक 5 (skanda.6.5.5)
बभूव स स्वयं धीमानध्वर्युर्यज्ञकर्मणि। तस्मिन्होता च शांडिल्यो ब्रह्मा गौतम एव च
babhūva sa svayaṁ dhīmānadhvaryuryajñakarmaṇi| tasminhotā ca śāṁḍilyo brahmā gautama eva ca
वे स्वयं ही उस यज्ञकर्म में बुद्धिमान अध्वर्यु बने; उसमें शांडिल्य होता तथा गौतम ब्रह्मा बने।
श्लोक 6 (skanda.6.5.6)
आग्नीध्रश्च्यवनो नाम मैत्रावरुणः कार्मिकः। उद्गाता याज्ञवल्क्यश्च प्रतिहर्ता च जैमिनिः
āgnīdhraścyavano nāma maitrāvaruṇaḥ kārmikaḥ| udgātā yājñavalkyaśca pratihartā ca jaiminiḥ
च्यवन नामक ऋषि आग्नीध्र बने, कुशल मैत्रावरुण बने; याज्ञवल्क्य उद्गाता तथा जैमिनि प्रतिहर्ता बने।
श्लोक 7 (skanda.6.5.7)
प्रस्तोता शंकुवर्णश्च तथोन्नेता च गालवः। पुलस्त्यो ब्राह्मणाच्छंसी होता गर्गो मुनीश्वरः
prastotā śaṁkuvarṇaśca tathonnetā ca gālavaḥ| pulastyo brāhmaṇācchaṁsī hotā gargo munīśvaraḥ
शंकुवर्ण प्रस्तोता बने, गालव उन्नेता बने; पुलस्त्य ब्राह्मणाच्छंसी बने, तथा मुनीश्वर गर्ग होता बने।
श्लोक 8 (skanda.6.5.8)
नेष्टा चैव तथात्रिस्तु अच्छावाको भृगुः स्वयम्। तान्सर्वानृत्विजश्चक्रे त्रिशंकुः श्रद्धयान्वितः
neṣṭā caiva tathātristu acchāvāko bhṛguḥ svayam| tānsarvānṛtvijaścakre triśaṁkuḥ śraddhayānvitaḥ
अत्रि नेष्टा बने, तथा भृगु स्वयं अच्छावाक बने। श्रद्धायुक्त त्रिशंकु ने उन सबको ऋत्विक् बनाया।
श्लोक 9 (skanda.6.5.9)
वासोभिर्मुकुटैश्चैव केयूरैः समलंकृतान्। कृत्वा केशपरित्यागं दधत्कृष्णाजिनं तथा
vāsobhirmukuṭaiścaiva keyūraiḥ samalaṁkṛtān| kṛtvā keśaparityāgaṁ dadhatkṛṣṇājinaṁ tathā
उन्हें वस्त्र, मुकुट और केयूरों से अलंकृत करके, तथा अपने केशों का त्याग कर, राजा ने कृष्ण मृगचर्म धारण किया।
श्लोक 10 (skanda.6.5.10)
ऐणशृङ्गसमायुक्तः पयोव्रतपरायणः। दीर्घसत्राय तान्सर्वान्योजयामास वै ततः
aiṇaśṛṅgasamāyuktaḥ payovrataparāyaṇaḥ| dīrghasatrāya tānsarvānyojayāmāsa vai tataḥ
काले मृग के सींग से युक्त, दुग्धव्रतपरायण होकर, उन्होंने उन सबको दीर्घसत्र में नियुक्त किया।
श्लोक 11 (skanda.6.5.11)
एवं तस्मिन्प्रवृत्ते च दीर्घसत्रे यथोचिते। आजग्मुर्ब्राह्मणा दिव्या वेदवेदांगपारगाः
evaṁ tasminpravṛtte ca dīrghasatre yathocite| ājagmurbrāhmaṇā divyā vedavedāṁgapāragāḥ
इस प्रकार वह दीर्घसत्र यथोचित रूप से चलने पर, वेद-वेदांगपारंगत दिव्य ब्राह्मण वहाँ आने लगे।
श्लोक 12 (skanda.6.5.12)
तथान्ये तार्किकाश्चैव गृहस्थाः कौतुकान्विताः। दीनांधकृपणाश्चैव ये चान्ये नटनर्तकाः
tathānye tārkikāścaiva gṛhasthāḥ kautukānvitāḥ| dīnāṁdhakṛpaṇāścaiva ye cānye naṭanartakāḥ
उसी प्रकार तार्किक, कौतूहलयुक्त गृहस्थ, दीन-अंधे-कृपण, तथा नट और नर्तक भी वहाँ पहुँचे।
श्लोक 13 (skanda.6.5.13)
दीयतां दीयतामाशु एतेषामेतदेव हि। भुज्यतांभुज्यतां लोकाः प्रसादः क्रियतामिति
dīyatāṁ dīyatāmāśu eteṣāmetadeva hi| bhujyatāṁbhujyatāṁ lokāḥ prasādaḥ kriyatāmiti
"शीघ्र दो, शीघ्र दो, इन्हें यही चाहिए! खाओ, खाओ, हे लोगो! कृपा करो" — ऐसी ध्वनि सर्वत्र सुनाई पड़ती थी।
श्लोक 14 (skanda.6.5.14)
इत्येष निनदस्तत्र श्रूयते सततं महान्। यज्ञवाटे सदा तस्मिन्नान्यश्चैव कदाचन
ityeṣa ninadastatra śrūyate satataṁ mahān| yajñavāṭe sadā tasminnānyaścaiva kadācana
उस यज्ञवाट में सदा यही महान घोष निरंतर सुनाई देता था, अन्य कोई ध्वनि कभी नहीं।
श्लोक 15 (skanda.6.5.15)
तत्र सस्यमयाः शैला दृश्यंते परिकल्पिताः। सुवर्णस्य च रूप्यस्य रत्नानां च विशेषतः
tatra sasyamayāḥ śailā dṛśyaṁte parikalpitāḥ| suvarṇasya ca rūpyasya ratnānāṁ ca viśeṣataḥ
वहाँ धान्य के, स्वर्ण के, रजत के तथा विशेष रूप से रत्नों के बनाए गए पर्वत के समान ढेर दिखाई देते थे।
श्लोक 16 (skanda.6.5.16)
दानार्थं ब्राह्मणेंद्राणामसंख्याश्चापि धेनवः। तथैव वाजिनो दांता मदोन्मत्ता महागजाः
dānārthaṁ brāhmaṇeṁdrāṇāmasaṁkhyāścāpi dhenavaḥ| tathaiva vājino dāṁtā madonmattā mahāgajāḥ
श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दान देने के लिए असंख्य गौएँ, सुशिक्षित अश्व तथा मदोन्मत्त महागज भी थे।
श्लोक 17 (skanda.6.5.17)
समंतात्कल्पितास्तत्र दृश्यंते पर्वतोपमाः। वर्तमाने महायज्ञे तस्मिन्नेव सुविस्तरे
samaṁtātkalpitāstatra dṛśyaṁte parvatopamāḥ| vartamāne mahāyajñe tasminneva suvistare
उस विशाल महायज्ञ के चलते समय, वे सब चारों ओर पर्वत के समान सजाकर रखे हुए दिखाई देते थे।
श्लोक 18 (skanda.6.5.18)
आहूता यज्ञभागाय नाभिगच्छंति देवताः। केवलं वह्निवक्त्रेण तस्य गृह्णंति तद्धविः
āhūtā yajñabhāgāya nābhigacchaṁti devatāḥ| kevalaṁ vahnivaktreṇa tasya gṛhṇaṁti taddhaviḥ
यज्ञभाग के लिए बुलाए जाने पर भी देवता प्रत्यक्ष नहीं आते थे; वे केवल अग्निमुख से ही उसकी हवि ग्रहण करते थे।
श्लोक 19 (skanda.6.5.19)
एवं द्वादशवर्षाणि यजतस्तस्य भूपतेः। व्यतीतानि न संप्राप्तमभीष्टं मनसः फलम्
evaṁ dvādaśavarṣāṇi yajatastasya bhūpateḥ| vyatītāni na saṁprāptamabhīṣṭaṁ manasaḥ phalam
इस प्रकार यजन करते हुए उस राजा के बारह वर्ष बीत गए, फिर भी मन का अभीष्ट फल प्राप्त नहीं हुआ।
श्लोक 20 (skanda.6.5.20)
ततश्चावभृथस्नानं कृत्वा सत्रसमाप्तिजम्। ऋत्विजस्तर्पयित्वा तान्दक्षिणाभिर्यथार्हतः
tataścāvabhṛthasnānaṁ kṛtvā satrasamāptijam| ṛtvijastarpayitvā tāndakṣiṇābhiryathārhataḥ
तब सत्र की समाप्ति पर अवभृथ-स्नान करके, उसने उन ऋत्विजों को यथोचित दक्षिणा से तृप्त किया।
श्लोक 21 (skanda.6.5.21)
विससर्ज समस्तांश्च तथान्यानपि संगतान्। संबंधिनो वयस्यांश्च त्रिशंकुर्मुनिसत्तमाः
visasarja samastāṁśca tathānyānapi saṁgatān| saṁbaṁdhino vayasyāṁśca triśaṁkurmunisattamāḥ
हे मुनिसत्तमो! त्रिशंकु ने उन सबको, तथा अन्य आए हुए संबंधियों और मित्रों को भी विदा किया।
श्लोक 22 (skanda.6.5.22)
ततः प्रोवाच विनतो विश्वामित्रं मुनीश्वरम्। स भूपो व्रीडया युक्तः प्रणिपातपुरः सरम्
tataḥ provāca vinato viśvāmitraṁ munīśvaram| sa bhūpo vrīḍayā yuktaḥ praṇipātapuraḥ saram
फिर लज्जा से युक्त उस राजा ने पहले प्रणाम करके, विनम्र होकर मुनीश्वर विश्वामित्र से कहा।
श्लोक 23 (skanda.6.5.23)
त्वत्प्रसादान्मया प्राप्तं दीर्घसत्रसमुद्भवम्। परिपूर्णफलं ब्रह्मन्दुर्लभं सर्वमानवैः
tvatprasādānmayā prāptaṁ dīrghasatrasamudbhavam| paripūrṇaphalaṁ brahmandurlabhaṁ sarvamānavaiḥ
हे ब्रह्मन्! आपकी कृपा से मैंने इस दीर्घसत्र से उत्पन्न, सब मनुष्यों के लिए दुर्लभ, परिपूर्ण फल प्राप्त किया है।
श्लोक 24 (skanda.6.5.24)
तथा जातिः पुनर्लब्धा भूयो नष्टापि सन्मुने। त्वत्प्रसादेन विप्रर्षे चंडालत्वं प्रणाशितम्
tathā jātiḥ punarlabdhā bhūyo naṣṭāpi sanmune| tvatprasādena viprarṣe caṁḍālatvaṁ praṇāśitam
हे सन्मुने! सर्वथा नष्ट हुई मेरी जाति भी पुनः प्राप्त हुई है; हे विप्रर्षे! आपकी कृपा से मेरा चंडालत्व सर्वथा नष्ट हो गया है।
श्लोक 25 (skanda.6.5.25)
परं मे दुःखमेवैकं हृदि शल्यमिवार्पितम्। अनेनैव शरीरेण यन्न प्राप्तं त्रिविष्टपम्
paraṁ me duḥkhamevaikaṁ hṛdi śalyamivārpitam| anenaiva śarīreṇa yanna prāptaṁ triviṣṭapam
किंतु मुझे एक ही दुःख है, जो हृदय में शल्य के समान चुभा हुआ है — कि मैं इसी शरीर से स्वर्ग नहीं प्राप्त कर सका।
श्लोक 26 (skanda.6.5.26)
उपहासं करिष्यंति वसिष्ठस्य सुता मुने। अद्य व्यर्थ श्रमं श्रुत्वा मामप्राप्तं त्रिविष्टपम्
upahāsaṁ kariṣyaṁti vasiṣṭhasya sutā mune| adya vyartha śramaṁ śrutvā māmaprāptaṁ triviṣṭapam
हे मुने! वसिष्ठ के पुत्र आज मेरा व्यर्थ श्रम और स्वर्ग को न पाना सुनकर मेरा उपहास करेंगे।
श्लोक 27 (skanda.6.5.27)
तथा तद्वचनं सत्यं वसिष्ठस्य व्यवस्थितम्। यत्तेनोक्तं न यज्ञेन सदेहैर्गम्यते दिवि
tathā tadvacanaṁ satyaṁ vasiṣṭhasya vyavasthitam| yattenoktaṁ na yajñena sadehairgamyate divi
और वसिष्ठ जी का वह वचन भी सत्य सिद्ध हो गया, जो उन्होंने कहा था कि यज्ञ से देहसहित स्वर्ग नहीं जाया जा सकता।
श्लोक 28 (skanda.6.5.28)
सोऽहं तपः करिष्यामि सांप्रतं वनमाश्रितः। न करिष्यामि भूयोऽपि राज्यं पुत्रनिवेदितम्
so'haṁ tapaḥ kariṣyāmi sāṁprataṁ vanamāśritaḥ| na kariṣyāmi bhūyo'pi rājyaṁ putraniveditam
अतः अब मैं वन का आश्रय लेकर तपस्या करूँगा; अपने पुत्र को सौंपा हुआ राज्य पुनः कभी नहीं लूँगा।