प्रभास खण्ड · अध्याय 105
ब्रह्ममाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.105.1)
ईश्वर उवाच। अथान्यत्संप्रवक्ष्यामि रहस्यं स्थानमुत्तमम्। सर्वपापहरं नृणां विस्तरात्कथयामि ते॥
īśvara uvāca| athānyatsaṁpravakṣyāmi rahasyaṁ sthānamuttamam| sarvapāpaharaṁ nṛṇāṁ vistarātkathayāmi te||
ईश्वर ने कहा—अब मैं तुम्हें एक अन्य रहस्यमय उत्तम स्थान के विषय में बताता हूँ, जो मनुष्यों के सभी पापों का नाश करने वाला है; मैं तुम्हें विस्तारपूर्वक कहता हूँ।
श्लोक 2 (skanda.7.105.2)
प्रधानदेवमाहात्म्यं माहात्म्यं कल्पवासिनाम्। सोमेशो दैत्यहंता च बालरूपी पितामहः॥
pradhānadevamāhātmyaṁ māhātmyaṁ kalpavāsinām| someśo daityahaṁtā ca bālarūpī pitāmahaḥ||
यह प्रधान देवताओं का माहात्म्य है, कल्पभर वहाँ निवास करने वालों का माहात्म्य है—सोमेश, दैत्यहन्ता विष्णु, तथा बालरूपधारी पितामह ब्रह्मा।
श्लोक 3 (skanda.7.105.3)
अर्कस्थलस्तथादित्यः प्रभासः शशिभूषणः। एते षट्प्रवरा देवाः क्षेत्रे प्राभासिके स्थिताः॥
arkasthalastathādityaḥ prabhāsaḥ śaśibhūṣaṇaḥ| ete ṣaṭpravarā devāḥ kṣetre prābhāsike sthitāḥ||
अर्कस्थल, आदित्य, प्रभास और शशिभूषण शिव—ये छः श्रेष्ठ देवता प्राभासिक क्षेत्र में स्थित हैं।
श्लोक 4 (skanda.7.105.4)
तेषां दर्शनमात्रेण कृतकृत्यः प्रजायते। मुच्यते पातकैर्घोरैराजन्मजनितैर्ध्रुवम्॥
teṣāṁ darśanamātreṇa kṛtakṛtyaḥ prajāyate| mucyate pātakairghorairājanmajanitairdhruvam||
उनके दर्शनमात्र से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है, और निश्चित रूप से जन्म से लेकर उत्पन्न हुए भयंकर पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 5 (skanda.7.105.5)
देव्युवाच। पूर्वेषामुक्तदेवानां माहात्म्यं कथितं त्वया। प्रभासे बालरूपीति यत्प्रोक्तं तत्कथं वचः॥
devyuvāca| pūrveṣāmuktadevānāṁ māhātmyaṁ kathitaṁ tvayā| prabhāse bālarūpīti yatproktaṁ tatkathaṁ vacaḥ||
देवी ने कहा—आपने पहले कहे गये देवताओं का माहात्म्य बता दिया। किन्तु आपने जो प्रभास में बालरूपी ब्रह्मा कहा, वह वचन कैसा है?
श्लोक 6 (skanda.7.105.6)
अन्येषु सर्व स्थानेषु वृद्धरूपी पितामहः। कथं च समनुप्राप्तो माहात्म्यं तस्य किं स्मृतम्॥
anyeṣu sarva sthāneṣu vṛddharūpī pitāmahaḥ| kathaṁ ca samanuprāpto māhātmyaṁ tasya kiṁ smṛtam||
अन्य सभी स्थानों में पितामह वृद्ध रूप में हैं। यहाँ वे कैसे प्राप्त हुए, और उनका क्या माहात्म्य कहा गया है?
श्लोक 7 (skanda.7.105.7)
कथं स पूज्यो देवेश यात्रा कार्या कथं नृभिः। एतद्विस्तरतो ब्रूहि प्रसन्नो यदि मे प्रभो॥
kathaṁ sa pūjyo deveśa yātrā kāryā kathaṁ nṛbhiḥ| etadvistarato brūhi prasanno yadi me prabho||
हे देवेश, वे कैसे पूजनीय हैं, और मनुष्यों द्वारा उनकी यात्रा कैसे की जानी चाहिए? हे प्रभो, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो यह विस्तारपूर्वक कहिये।
श्लोक 8 (skanda.7.105.8)
ईश्वर उवाच। शृणु देवि प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं ब्रह्मसम्भवम्। यस्य श्रवणमात्रेण मुच्यते सर्वपातकैः॥
īśvara uvāca| śṛṇu devi pravakṣyāmi māhātmyaṁ brahmasambhavam| yasya śravaṇamātreṇa mucyate sarvapātakaiḥ||
ईश्वर ने कहा—हे देवि, सुनो, मैं ब्रह्मा से सम्बन्धित माहात्म्य कहता हूँ, जिसे सुनने मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 9 (skanda.7.105.9)
नास्ति ब्रह्मसमो देवो नास्ति ब्रह्मसमो गुरुः। नास्ति ब्रह्मसमं ज्ञानं नास्ति ब्रह्मसमं तपः॥
nāsti brahmasamo devo nāsti brahmasamo guruḥ| nāsti brahmasamaṁ jñānaṁ nāsti brahmasamaṁ tapaḥ||
ब्रह्मा के समान कोई देवता नहीं है, ब्रह्मा के समान कोई गुरु नहीं है; ब्रह्मा के समान कोई ज्ञान नहीं है, ब्रह्मा के समान कोई तप नहीं है।
श्लोक 10 (skanda.7.105.10)
तावद्धमंति संसारे दुःखशोकभयप्लुताः। न भवंति सुरज्येष्ठे यावद्भक्ताः पितामहे॥
tāvaddhamaṁti saṁsāre duḥkhaśokabhayaplutāḥ| na bhavaṁti surajyeṣṭhe yāvadbhaktāḥ pitāmahe||
जब तक जीव देवताओं में श्रेष्ठ पितामह के भक्त नहीं बनते, तब तक वे संसार में दुःख, शोक और भय में डूबे हुए भटकते रहते हैं।
श्लोक 11 (skanda.7.105.11)
समासक्तं यथा चित्तं जन्तोर्विषयगोचरे। यद्येवं ब्रह्मणि न्यस्तं को न मुच्येत बंधनात्॥
samāsaktaṁ yathā cittaṁ jantorviṣayagocare| yadyevaṁ brahmaṇi nyastaṁ ko na mucyeta baṁdhanāt||
जिस प्रकार प्राणी का चित्त विषयों में आसक्त रहता है, यदि उसी प्रकार वह ब्रह्मा में स्थिर कर दिया जाए, तो कौन बन्धन से मुक्त न हो?
श्लोक 12 (skanda.7.105.12)
देव्युवाच। एवं माहात्म्यसंयुक्तो यदि ब्रह्मा जगद्गुरुः। प्राभासिके महातीर्थे कस्मिन्स्थाने तु संस्थितः॥
devyuvāca| evaṁ māhātmyasaṁyukto yadi brahmā jagadguruḥ| prābhāsike mahātīrthe kasminsthāne tu saṁsthitaḥ||
देवी ने कहा—यदि जगद्गुरु ब्रह्मा इस प्रकार माहात्म्य से युक्त हैं, तो वे प्राभासिक महातीर्थ में किस स्थान में स्थित हैं?
श्लोक 13 (skanda.7.105.13)
किमर्थमागतस्तत्र कस्मिन्काले सुरोत्तमः। कथं स पूज्यो विप्रेंद्रैस्तिथौ कस्यां क्रमाद्वद॥
kimarthamāgatastatra kasminkāle surottamaḥ| kathaṁ sa pūjyo vipreṁdraistithau kasyāṁ kramādvada||
वह श्रेष्ठ देव वहाँ किस उद्देश्य से और किस समय आये? श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा वे कैसे और किस तिथि को पूजनीय हैं, यह क्रमशः बताइये।
श्लोक 14 (skanda.7.105.14)
ईश्वर उवाच। सोमनाथस्य ऐशान्यां सांबादित्याग्निगोचरे। ब्रह्मणः परमं स्थानं ब्रह्मलोक इवापरः॥
īśvara uvāca| somanāthasya aiśānyāṁ sāṁbādityāgnigocare| brahmaṇaḥ paramaṁ sthānaṁ brahmaloka ivāparaḥ||
ईश्वर ने कहा—सोमनाथ की ईशान दिशा में, साम्बादित्य और अग्नि के समीप, ब्रह्मा का परम स्थान है, मानो एक दूसरा ब्रह्मलोक ही हो।
श्लोक 15 (skanda.7.105.15)
तिष्ठते कल्पसंस्था वै तत्र कल्पांतवासिनः। तत्र स्थाने स्थितो देवि बालरूपी पितामहः॥
tiṣṭhate kalpasaṁsthā vai tatra kalpāṁtavāsinaḥ| tatra sthāne sthito devi bālarūpī pitāmahaḥ||
वहाँ कल्प-पर्यन्त निवास करने वाले देवता कल्प तक स्थित रहते हैं। हे देवि, उसी स्थान में बालरूपधारी पितामह स्थित हैं।
श्लोक 16 (skanda.7.105.16)
जगत्प्रभुर्लोककर्ता सत्त्वमूर्तिर्महाप्रभः। आगतश्चाष्टवर्षस्तु क्षेत्रे प्राभासिके शुभे॥
jagatprabhurlokakartā sattvamūrtirmahāprabhaḥ| āgataścāṣṭavarṣastu kṣetre prābhāsike śubhe||
जगत् के स्वामी, लोकों के रचयिता, सत्त्वमूर्ति, महान् तेजस्वी ब्रह्मा आठ वर्ष की आयु में इस शुभ प्राभासिक क्षेत्र में आये।
श्लोक 17 (skanda.7.105.17)
तत्राऽकरोत्तपो घोरं दिव्याब्दानां सहस्रकम्। संस्थाप्य तु महालिंगं सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः॥
tatrā'karottapo ghoraṁ divyābdānāṁ sahasrakam| saṁsthāpya tu mahāliṁgaṁ sisṛkṣurvividhāḥ prajāḥ||
वहाँ उन्होंने एक सहस्र दिव्य वर्षों तक घोर तपस्या की, और नाना प्रकार की प्रजाओं की सृष्टि करने की इच्छा से एक महालिंग की स्थापना की।
श्लोक 18 (skanda.7.105.18)
ततः कालांतरेतीते सोमेन प्रार्थितो विभुः। क्षयरोगविमुक्तेन सम्यक्छ्रद्धान्वितेन वै॥
tataḥ kālāṁtaretīte somena prārthito vibhuḥ| kṣayarogavimuktena samyakchraddhānvitena vai||
तत्पश्चात् कुछ समय बीत जाने पर, क्षयरोग से मुक्त हुए और सम्यक् श्रद्धा से युक्त सोम चन्द्रमा ने उन प्रभु से प्रार्थना की।
श्लोक 19 (skanda.7.105.19)
लिंगप्रतिष्ठाहेतोर्वै क्षेत्रे प्राभासिके शुभे। कोटिब्रह्मर्षिभिः सार्द्धं सहितो विश्वकर्मणा। कारयामास विधिवत्प्रतिष्ठां लिंगमुत्तमम्॥
liṁgapratiṣṭhāhetorvai kṣetre prābhāsike śubhe| koṭibrahmarṣibhiḥ sārddhaṁ sahito viśvakarmaṇā| kārayāmāsa vidhivatpratiṣṭhāṁ liṁgamuttamam||
शुभ प्राभासिक क्षेत्र में लिंग की प्रतिष्ठा हेतु, करोड़ों ब्रह्मर्षियों के साथ तथा विश्वकर्मा के सहयोग से, उन्होंने विधिपूर्वक उस उत्तम लिंग की प्रतिष्ठा करवाई।
श्लोक 20 (skanda.7.105.20)
प्रतिष्ठाप्य ततो लिंगं सोमनाथं वरानने। दापयामास विप्रेभ्यो भूरिशो यज्ञदक्षिणाम्॥
pratiṣṭhāpya tato liṁgaṁ somanāthaṁ varānane| dāpayāmāsa viprebhyo bhūriśo yajñadakṣiṇām||
हे वरानने, उस सोमनाथ लिंग की प्रतिष्ठा कराकर, उन्होंने ब्राह्मणों को प्रचुर मात्रा में यज्ञ-दक्षिणा दिलवाई।
श्लोक 21 (skanda.7.105.21)
एवं प्रतिष्ठितं लिंगं ब्रह्मणा लोककर्तृणा। वर्षाणि चात्र जातानि प्रभासे बालरूपिणः॥
evaṁ pratiṣṭhitaṁ liṁgaṁ brahmaṇā lokakartṛṇā| varṣāṇi cātra jātāni prabhāse bālarūpiṇaḥ||
इस प्रकार लोकों के रचयिता ब्रह्मा के द्वारा वह लिंग प्रतिष्ठित हुआ; और तब से प्रभास में बालरूपधारी ब्रह्मा के अनेक वर्ष बीत गये हैं।
श्लोक 22 (skanda.7.105.22)
चत्वारिंशद्वयं चैव क्षेत्रमध्यनिवासिनः। एवं परार्द्धमगमत्प्रभासक्षेत्रवासिनः॥
catvāriṁśadvayaṁ caiva kṣetramadhyanivāsinaḥ| evaṁ parārddhamagamatprabhāsakṣetravāsinaḥ||
उस क्षेत्र के मध्य में निवास करते हुए उनके बयालीस वर्ष बीत गये; इस प्रकार प्रभासक्षेत्र-निवासी ब्रह्मा का एक परार्ध काल व्यतीत हो गया।
श्लोक 23 (skanda.7.105.23)
देव्युवाच। ब्रह्मणो दिनमानं तु मासवर्षसहस्रकम्। तत्सर्वं विस्तराद्ब्रूहि यथायुर्ब्रह्मणः स्मृतम्॥
devyuvāca| brahmaṇo dinamānaṁ tu māsavarṣasahasrakam| tatsarvaṁ vistarādbrūhi yathāyurbrahmaṇaḥ smṛtam||
देवी ने कहा—ब्रह्मा के एक दिन का मान महीनों, वर्षों और सहस्रों में क्या है? वह सब मुझे विस्तार से बताइये, जैसा कि ब्रह्मा की आयु के विषय में स्मृत है।
श्लोक 24 (skanda.7.105.24)
ईश्वर उवाच। परमायुः स्मृतो ब्रह्मा परार्द्धं तस्य वै गतम्॥ प्रभासक्षेत्रसंस्थस्य द्वितीयं भवतेऽधुना॥
īśvara uvāca| paramāyuḥ smṛto brahmā parārddhaṁ tasya vai gatam| prabhāsakṣetrasaṁsthasya dvitīyaṁ bhavate'dhunā||
ईश्वर ने कहा—ब्रह्मा की परम आयु मानी गयी है; उनका एक परार्ध बीत चुका है। प्रभासक्षेत्र में स्थित उनका अब दूसरा परार्ध चल रहा है।
श्लोक 25 (skanda.7.105.25)
यदा प्राभासिके क्षेत्रे ब्रह्मा लोकपितामहः। आगतश्चाष्टवर्षस्तु बालरूपी तदोच्यते॥
yadā prābhāsike kṣetre brahmā lokapitāmahaḥ| āgataścāṣṭavarṣastu bālarūpī tadocyate||
जब लोकपितामह ब्रह्मा प्राभासिक क्षेत्र में आठ वर्ष की आयु में आये, तभी से वे बालरूपी कहलाते हैं।
श्लोक 26 (skanda.7.105.26)
अन्येषु सर्वतीर्थेषु वृद्धरूपी पितामहः। मुक्त्वा प्राभासिकं क्षेत्रं सदैव विबुधप्रिये॥
anyeṣu sarvatīrtheṣu vṛddharūpī pitāmahaḥ| muktvā prābhāsikaṁ kṣetraṁ sadaiva vibudhapriye||
हे देवप्रिये, प्राभासिक क्षेत्र को छोड़कर अन्य सभी तीर्थों में पितामह सदैव वृद्ध रूप में ही रहते हैं।
श्लोक 27 (skanda.7.105.27)
ब्रह्मांडे यानि तीर्थानि ब्रह्माणस्तेषु ये स्मृताः। तेषामाद्यो महातेजाः प्रभासे यो व्यवस्थितः॥
brahmāṁḍe yāni tīrthāni brahmāṇasteṣu ye smṛtāḥ| teṣāmādyo mahātejāḥ prabhāse yo vyavasthitaḥ||
ब्रह्माण्ड में जितने भी तीर्थ हैं और उनमें जो ब्रह्मा स्मृत हैं, उन सबमें सबसे प्रथम वे महातेजस्वी ब्रह्मा हैं, जो प्रभास में स्थित हैं।
श्लोक 28 (skanda.7.105.28)
कल्पेकल्पे तु नामानि शृणु त्वं तानि वै प्रिये। स्वयंभूः प्रथमे कल्पे द्वितीये पद्मभूः स्थितः॥
kalpekalpe tu nāmāni śṛṇu tvaṁ tāni vai priye| svayaṁbhūḥ prathame kalpe dvitīye padmabhūḥ sthitaḥ||
हे प्रिये, प्रत्येक कल्प में उनके जो नाम हैं, उन्हें सुनो—प्रथम कल्प में स्वयंभू और द्वितीय कल्प में पद्मभू के नाम से वे स्थित हैं।
श्लोक 29 (skanda.7.105.29)
तृतीये विश्वकर्तेति बालरूपी चतुर्थके। एतानि मुख्यनामानि कथितानि स्वयंभुवः॥
tṛtīye viśvakarteti bālarūpī caturthake| etāni mukhyanāmāni kathitāni svayaṁbhuvaḥ||
तृतीय कल्प में विश्वकर्ता और चतुर्थ में बालरूपी—स्वयंभू के ये मुख्य नाम बताये गये हैं।
श्लोक 30 (skanda.7.105.30)
नित्यं संस्मरते यस्तु स दीर्घायुर्नरो भवेत्॥
nityaṁ saṁsmarate yastu sa dīrghāyurnaro bhavet||
जो मनुष्य इन नामों का नित्य स्मरण करता है, वह दीर्घायु होता है।
श्लोक 31 (skanda.7.105.31)
चन्द्रसूर्यग्रहाः सर्वे सदेवासुरमानुषाः। त्रैलोक्यं नश्यते सर्वं ब्रह्मरात्रिसमागमे॥
candrasūryagrahāḥ sarve sadevāsuramānuṣāḥ| trailokyaṁ naśyate sarvaṁ brahmarātrisamāgame||
ब्रह्मा की रात्रि के आगमन पर चन्द्र, सूर्य, समस्त ग्रह, देवता, असुर, मनुष्य सहित सम्पूर्ण त्रैलोक्य नष्ट हो जाता है।
श्लोक 32 (skanda.7.105.32)
पुनर्दिने तु संजाते प्रबुद्धः सन्पितामहः। तथा सृष्टिं प्रकुरुते यथापूर्वमभूत्प्रिये॥
punardine tu saṁjāte prabuddhaḥ sanpitāmahaḥ| tathā sṛṣṭiṁ prakurute yathāpūrvamabhūtpriye||
हे प्रिये, पुनः दिन होने पर जागृत हुए पितामह पूर्व के समान ही पुनः सृष्टि करते हैं।
श्लोक 33 (skanda.7.105.33)
दिनमानं प्रवक्ष्यामि ब्रह्मणो लोककर्तृणः। नेत्रभागाच्चतुर्भागस्त्रुटिः कालो निगद्यते॥
dinamānaṁ pravakṣyāmi brahmaṇo lokakartṛṇaḥ| netrabhāgāccaturbhāgastruṭiḥ kālo nigadyate||
अब मैं लोकों के रचयिता ब्रह्मा के दिन का मान कहता हूँ—पलक झपकने के भाग के चौथे भाग को त्रुटि नामक काल कहा जाता है।
श्लोक 34 (skanda.7.105.34)
तस्माच्च द्विगुणं ज्ञेयं निमिषांतं वरानने। निमिषैः पञ्चदशभिः काष्ठा इत्युच्यते बुधैः। त्रिंशद्भिश्चैव काष्ठाभिः कला प्रोक्ता मनीषिभिः॥
tasmācca dviguṇaṁ jñeyaṁ nimiṣāṁtaṁ varānane| nimiṣaiḥ pañcadaśabhiḥ kāṣṭhā ityucyate budhaiḥ| triṁśadbhiścaiva kāṣṭhābhiḥ kalā proktā manīṣibhiḥ||
हे वरानने, उससे दुगुना मान निमेष कहलाता है। पन्द्रह निमेषों को विद्वानों ने काष्ठा कहा है, और तीस काष्ठाओं को मनीषियों ने कला कहा है।
श्लोक 35 (skanda.7.105.35)
त्रिंशत्कलो मुहूर्तः स्याद्दिनं पंचदशैस्तु तैः। दिनमाना निशा ज्ञेया अहोरात्रं तयोर्भवेत्॥
triṁśatkalo muhūrtaḥ syāddinaṁ paṁcadaśaistu taiḥ| dinamānā niśā jñeyā ahorātraṁ tayorbhavet||
तीस कलाओं का एक मुहूर्त होता है, और पन्द्रह मुहूर्तों का एक दिन होता है; दिन के बराबर ही रात्रि जाननी चाहिए, और दोनों मिलकर अहोरात्र होता है।
श्लोक 36 (skanda.7.105.36)
तैः पंचदशभिः पक्षः पक्षाभ्यां मास उच्यते। मासैश्चैवायनं षङ्भिरब्दं स्यादयनद्वयात्॥
taiḥ paṁcadaśabhiḥ pakṣaḥ pakṣābhyāṁ māsa ucyate| māsaiścaivāyanaṁ ṣaḍbhirabdaṁ syādayanadvayāt||
उन पन्द्रह अहोरात्रों का एक पक्ष होता है, दो पक्षों का एक मास कहा जाता है; छः महीनों का एक अयन होता है, और दो अयनों से एक वर्ष बनता है।
श्लोक 37 (skanda.7.105.37)
चत्वारिंशद्धि लक्षाणि लक्षाणां त्रितयं पुनः। विंशतिश्च सहस्राणि ज्ञेयं सौरं चतुर्युगम्॥
catvāriṁśaddhi lakṣāṇi lakṣāṇāṁ tritayaṁ punaḥ| viṁśatiśca sahasrāṇi jñeyaṁ sauraṁ caturyugam||
चालीस लाख, पुनः तीन लाख, तथा बीस हजार वर्ष—इतना सौर चतुर्युग जानना चाहिए।
श्लोक 38 (skanda.7.105.38)
चतुर्युगैकसप्तत्या मन्वंतरमुदाहृतम्। ऐन्द्रमेतद्भवेदायुः समासात्तव कीर्तितम्॥
caturyugaikasaptatyā manvaṁtaramudāhṛtam| aindrametadbhavedāyuḥ samāsāttava kīrtitam||
इकहत्तर चतुर्युगों का एक मन्वन्तर कहा गया है; यह इन्द्र की आयु के काल-मान के रूप में संक्षेप में तुम्हें बताया गया।
श्लोक 39 (skanda.7.105.39)
स्वायंभुवो मनुः पूर्वं मनुः स्वारोचिषस्ततः। औत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्ततः॥
svāyaṁbhuvo manuḥ pūrvaṁ manuḥ svārociṣastataḥ| auttamastāmasaścaiva raivataścākṣuṣastataḥ||
प्रथम मनु स्वायम्भुव, तत्पश्चात् स्वारोचिष मनु, फिर औत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष मनु हुए।
श्लोक 40 (skanda.7.105.40)
वैवस्वतोऽर्कसावर्णिर्ब्रह्मसावर्णिरेव च। धर्मसावर्णिनामा च रौच्यो भूत्यस्तथैव च॥
vaivasvato'rkasāvarṇirbrahmasāvarṇireva ca| dharmasāvarṇināmā ca raucyo bhūtyastathaiva ca||
वैवस्वत, अर्कसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि नामक, रौच्य और भौत्य मनु भी हुए।
श्लोक 41 (skanda.7.105.41)
चतुर्दशैते मनवः सँख्यातास्ते यथाक्रमम्। भूतान्भविष्यानिंद्रांश्च सर्वान्वक्ष्ये तव क्रमात्॥
caturdaśaite manavaḥ saṁkhyātāste yathākramam| bhūtānbhaviṣyāniṁdrāṁśca sarvānvakṣye tava kramāt||
इस प्रकार ये चौदह मनु क्रमशः गिनाये गये। अब मैं तुम्हें भूत और भविष्य के सभी इन्द्रों को क्रमशः बताता हूँ।
श्लोक 42 (skanda.7.105.42)
विश्वभुक्च विपश्चिच्च सुकीर्तिः शिबिरेव च। विभुर्मनोभुवश्चैव तथौजस्वी बलिर्बली॥
viśvabhukca vipaścicca sukīrtiḥ śibireva ca| vibhurmanobhuvaścaiva tathaujasvī balirbalī||
विश्वभुक्, विपश्चित्, सुकीर्ति, शिबि, विभु, मनोभू, ओजस्वी और बली बलि—
श्लोक 43 (skanda.7.105.43)
अद्भुतश्च तथा शांती रम्यो देववरो वृषा। ऋतधामा दिवःस्वामी शुचिः शक्राश्चतुर्दश॥
adbhutaśca tathā śāṁtī ramyo devavaro vṛṣā| ṛtadhāmā divaḥsvāmī śuciḥ śakrāścaturdaśa||
अद्भुत, शान्ति, रम्य, देववर, वृष, ऋतधामा, दिवःस्वामी और शुचि—ये चौदह इन्द्र (शक्र) हैं।
श्लोक 44 (skanda.7.105.44)
एते सर्वे विनश्यंति ब्रह्मणो दिवसे प्रिये। रात्रिस्तु तावती ज्ञेया कल्पमानमिदं स्मृतम्॥
ete sarve vinaśyaṁti brahmaṇo divase priye| rātristu tāvatī jñeyā kalpamānamidaṁ smṛtam||
हे प्रिये, ये सभी ब्रह्मा के एक दिन के अन्त में नष्ट हो जाते हैं; रात्रि भी उतनी ही जाननी चाहिए—यही कल्प का मान माना गया है।
श्लोक 45 (skanda.7.105.45)
प्रथमं श्वेतकल्पस्तु द्वितीयो नीललोहितः। वामदेवस्तृतीयस्तु ततो राथंतरोऽपरः॥
prathamaṁ śvetakalpastu dvitīyo nīlalohitaḥ| vāmadevastṛtīyastu tato rāthaṁtaro'paraḥ||
प्रथम श्वेत कल्प है, द्वितीय नीललोहित; तृतीय वामदेव और उसके बाद अगला राथन्तर कल्प है।
श्लोक 46 (skanda.7.105.46)
रौरवः पंचमः प्रोक्तः षष्ठः प्राण इति स्मृतः। सप्तमोऽथ बृहत्कल्पः कन्दर्पोऽष्टम उच्यते॥
rauravaḥ paṁcamaḥ proktaḥ ṣaṣṭhaḥ prāṇa iti smṛtaḥ| saptamo'tha bṛhatkalpaḥ kandarpo'ṣṭama ucyate||
पाँचवाँ रौरव कहा गया है, छठा प्राण नाम से स्मृत है; सातवाँ बृहत्कल्प और आठवाँ कन्दर्प कहा जाता है।
श्लोक 47 (skanda.7.105.47)
सद्योऽथ नवमः प्रोक्तः ईशानो दशमः स्मृतः। ध्यान एकादशः प्रोक्तस्तथा सारस्वतोऽपरः॥
sadyo'tha navamaḥ proktaḥ īśāno daśamaḥ smṛtaḥ| dhyāna ekādaśaḥ proktastathā sārasvato'paraḥ||
नवाँ सद्य कहा गया, दसवाँ ईशान नाम से स्मृत है; ग्यारहवाँ ध्यान कहा गया है, और उसके बाद सारस्वत कल्प है।
श्लोक 48 (skanda.7.105.48)
त्रयोदश उदानस्तु गरुडोऽथ चतुर्दशः। कौर्मः पंचदशो ज्ञेयः पौर्णमासी प्रजापतेः॥
trayodaśa udānastu garuḍo'tha caturdaśaḥ| kaurmaḥ paṁcadaśo jñeyaḥ paurṇamāsī prajāpateḥ||
तेरहवाँ उदान है, चौदहवाँ गरुड़ कहा गया; पन्द्रहवाँ कौर्म जानना चाहिए, जो प्रजापति की पूर्णमासी के समय हुआ है।
श्लोक 49 (skanda.7.105.49)
षोडशो नारसिंहस्तु समाधिस्तु ततः परः। आग्नेयोऽष्टादशः प्रोक्तः सोमकल्पस्ततोऽपरः॥
ṣoḍaśo nārasiṁhastu samādhistu tataḥ paraḥ| āgneyo'ṣṭādaśaḥ proktaḥ somakalpastato'paraḥ||
सोलहवाँ नारसिंह है, उसके बाद समाधि कल्प है; अठारहवाँ आग्नेय कहा गया, और उसके बाद सोम कल्प है।
श्लोक 50 (skanda.7.105.50)
भावनो विंशतिः प्रोक्तः सुप्तमालीति चापरः। वैकुण्ठश्चार्चिषो रुद्रो लक्ष्मीकल्पस्तथापरेः॥
bhāvano viṁśatiḥ proktaḥ suptamālīti cāparaḥ| vaikuṇṭhaścārciṣo rudro lakṣmīkalpastathāpareḥ||
बीसवाँ भावन कहा गया, और उसके बाद सुप्तमाली है; वैकुण्ठ, अर्चिष्, रुद्र, तथा उसके बाद लक्ष्मी कल्प है।
श्लोक 51 (skanda.7.105.51)
सप्तविंशोऽथ वैराजो गौरीकल्पस्तथाऽन्धकः। माहेश्वरस्तथा प्रोक्तस्त्रिपुरो यत्र घातितः॥
saptaviṁśo'tha vairājo gaurīkalpastathā'ndhakaḥ| māheśvarastathā proktastripuro yatra ghātitaḥ||
सत्ताईसवाँ वैराज कल्प है, फिर गौरी कल्प तथा अन्धक कल्प है; उसके बाद माहेश्वर कल्प कहा गया है, जिसमें त्रिपुर का वध हुआ था।
श्लोक 52 (skanda.7.105.52)
पितृकल्पस्तथांते च या कुहूर्ब्रह्मणः स्मृता। त्रिंशत्कल्पाः समाख्याता ब्रह्मणो मासि वै प्रिये॥
pitṛkalpastathāṁte ca yā kuhūrbrahmaṇaḥ smṛtā| triṁśatkalpāḥ samākhyātā brahmaṇo māsi vai priye||
अन्त में पितृकल्प है, और जो ब्रह्मा की अमावस्या (कुहू) स्मृत है। हे प्रिये, इस प्रकार ब्रह्मा के एक मास में तीस कल्प बताये गये हैं।
श्लोक 53 (skanda.7.105.53)
अतीताः कथिताः सर्वे वाराहो वर्त्ततेऽधुना। प्रतिपद्ब्रह्मणो यत्र वाराहेणोद्धृता मही॥
atītāḥ kathitāḥ sarve vārāho varttate'dhunā| pratipadbrahmaṇo yatra vārāheṇoddhṛtā mahī||
ये सभी बीते हुए कल्प बताये गये; अब वाराह कल्प चल रहा है, जो ब्रह्मा की प्रतिपदा है, जिसमें वाराह भगवान् द्वारा पृथ्वी का उद्धार किया गया।
श्लोक 54 (skanda.7.105.54)
त्रिंशत्कल्पैः स्मृतो मासो वर्षं द्वादशभिस्तु तैः। अनेन वर्षमानेन तदा ब्रह्माऽष्टवार्षिकः। आनीतः सोमराजेन सोमनाथः प्रतिष्ठितः॥
triṁśatkalpaiḥ smṛto māso varṣaṁ dvādaśabhistu taiḥ| anena varṣamānena tadā brahmā'ṣṭavārṣikaḥ| ānītaḥ somarājena somanāthaḥ pratiṣṭhitaḥ||
तीस कल्पों का एक मास माना गया है, और उन बारह मासों का एक वर्ष होता है। इसी वर्ष-मान के अनुसार, आठ वर्ष के ब्रह्मा को सोमराज चन्द्रमा द्वारा लाया गया, और सोमनाथ की प्रतिष्ठा हुई।
श्लोक 55 (skanda.7.105.55)
एवं क्षेत्रे निवसतः प्रभासे बालरूपिणः। परार्द्धमेकमगमद्द्वितीयं वर्ततेऽधुना॥
evaṁ kṣetre nivasataḥ prabhāse bālarūpiṇaḥ| parārddhamekamagamaddvitīyaṁ vartate'dhunā||
इस प्रकार प्रभास क्षेत्र में निवास करते हुए बालरूपधारी ब्रह्मा का एक परार्ध व्यतीत हो चुका है; अब दूसरा परार्ध चल रहा है।
श्लोक 56 (skanda.7.105.56)
एवं महाप्रभावोऽसौ प्रभासक्षेत्रमध्यगः। ब्रह्मा स्वयंभूर्भगवान्बालत्वात्क्षेत्रमाश्रितः॥
evaṁ mahāprabhāvo'sau prabhāsakṣetramadhyagaḥ| brahmā svayaṁbhūrbhagavānbālatvātkṣetramāśritaḥ||
इस प्रकार वह महाप्रभावशाली, स्वयंभू भगवान् ब्रह्मा प्रभासक्षेत्र के मध्य में स्थित हैं, और बालरूप होने के कारण ही उन्होंने इस क्षेत्र का आश्रय लिया है।
श्लोक 57 (skanda.7.105.57)
स वै पूज्यो नमस्कार्यो वंदनीयो मनीषिभिः। आदौ स एव पूज्यः स्यात्सम्यग्यात्राफलेप्सुभिः॥
sa vai pūjyo namaskāryo vaṁdanīyo manīṣibhiḥ| ādau sa eva pūjyaḥ syātsamyagyātrāphalepsubhiḥ||
वे ही पूज्य हैं, नमस्कार के योग्य हैं, विद्वानों द्वारा वन्दनीय हैं; यात्रा का सम्पूर्ण फल चाहने वालों को सबसे पहले उन्हीं की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 58 (skanda.7.105.58)
यस्तं पूजयते भक्त्या स मां पूजयते ध्रुवम्। यस्तं द्वेष्टि स मां द्वेष्टि योऽस्य पूज्यो ममैव सः॥
yastaṁ pūjayate bhaktyā sa māṁ pūjayate dhruvam| yastaṁ dveṣṭi sa māṁ dveṣṭi yo'sya pūjyo mamaiva saḥ||
जो उनकी भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह निश्चय ही मेरी पूजा करता है। जो उनसे द्वेष करता है, वह मुझसे द्वेष करता है; जो उनका पूज्य है, वह मेरा ही पूज्य है।
श्लोक 59 (skanda.7.105.59)
ब्रह्मणा पूज्यमानेन अहं विष्णुश्च पूजितः। विष्णुना पूज्यमानेन अहं ब्रह्मा च पूजितः॥
brahmaṇā pūjyamānena ahaṁ viṣṇuśca pūjitaḥ| viṣṇunā pūjyamānena ahaṁ brahmā ca pūjitaḥ||
ब्रह्मा की पूजा किये जाने पर मैं और विष्णु भी पूजित हो जाते हैं; विष्णु की पूजा किये जाने पर मैं और ब्रह्मा भी पूजित हो जाते हैं।
श्लोक 60 (skanda.7.105.60)
मया पूजितमात्रेण ब्रह्मविष्णू च पूजितौ। सत्त्वं ब्रह्मा रजो विष्णुस्तमोऽहं संप्रकीर्तितः॥
mayā pūjitamātreṇa brahmaviṣṇū ca pūjitau| sattvaṁ brahmā rajo viṣṇustamo'haṁ saṁprakīrtitaḥ||
मेरी पूजा किये जाने मात्र से ही ब्रह्मा और विष्णु दोनों पूजित हो जाते हैं। सत्त्वगुण ब्रह्मा हैं, रजोगुण विष्णु हैं, और तमोगुण मैं कहा गया हूँ।
श्लोक 61 (skanda.7.105.61)
वायुर्ब्रह्माऽनलो रुद्रो विष्णुरापः प्रकीर्तितः। रात्रिर्विष्णुरहो रुद्रो या संध्या स पितामहः॥
vāyurbrahmā'nalo rudro viṣṇurāpaḥ prakīrtitaḥ| rātrirviṣṇuraho rudro yā saṁdhyā sa pitāmahaḥ||
वायु ब्रह्मा है, अग्नि रुद्र है, और विष्णु जल कहा गया है। रात्रि विष्णु है, दिन रुद्र है, और जो सन्ध्या है वह पितामह हैं।
श्लोक 62 (skanda.7.105.62)
सामवेदो ह्यहं देवि ब्रह्मा ऋग्वेद उच्यते। यजुर्वेदो भवेद्विष्णुः कुलाधारो ह्यथर्वणः॥
sāmavedo hyahaṁ devi brahmā ṛgveda ucyate| yajurvedo bhavedviṣṇuḥ kulādhāro hyatharvaṇaḥ||
हे देवि, सामवेद मैं ही हूँ, ब्रह्मा ऋग्वेद कहे जाते हैं; यजुर्वेद विष्णु हैं, और अथर्ववेद कुल का आधार है।
श्लोक 63 (skanda.7.105.63)
उष्णकालो ह्यहं देवि वर्षाकालः पितामहः। शीतकालो भवेद्विष्णुरेवं कालत्रयं हि सः॥
uṣṇakālo hyahaṁ devi varṣākālaḥ pitāmahaḥ| śītakālo bhavedviṣṇurevaṁ kālatrayaṁ hi saḥ||
हे देवि, ग्रीष्मकाल मैं ही हूँ, वर्षाकाल पितामह हैं; शीतकाल विष्णु हैं—इस प्रकार वे तीनों ही तीनों ऋतुएँ हैं।
श्लोक 64 (skanda.7.105.64)
दक्षिणाग्निरहं ज्ञेयो गार्हपत्यो हरिः स्मृतः। ब्रह्मा चाहवनीयस्तु एवं सर्वं त्रिदैवतम्॥
dakṣiṇāgnirahaṁ jñeyo gārhapatyo hariḥ smṛtaḥ| brahmā cāhavanīyastu evaṁ sarvaṁ tridaivatam||
मुझे दक्षिणाग्नि जानना चाहिए, हरि विष्णु गार्हपत्य अग्नि स्मृत हैं, और ब्रह्मा आहवनीय अग्नि हैं—इस प्रकार सब कुछ इन तीन देवताओं से युक्त है।
श्लोक 65 (skanda.7.105.65)
अहं लिंगस्वरूपस्थो भगो विष्णुः प्रकीर्तितः। बीजसंस्थो भवेद्ब्रह्मा विष्णुरापः प्रकीर्तितः॥
ahaṁ liṁgasvarūpastho bhago viṣṇuḥ prakīrtitaḥ| bījasaṁstho bhavedbrahmā viṣṇurāpaḥ prakīrtitaḥ||
मैं लिंग-स्वरूप में स्थित हूँ, विष्णु भग-रूप कहे गये हैं; ब्रह्मा बीज-रूप में स्थित हैं, और विष्णु जल कहे गये हैं।
श्लोक 66 (skanda.7.105.66)
अहमाकाशरूपस्थ एवं तत्त्वमयं प्रभुः। आकाशात्स्रवते यच्च तद्बीजं ब्रह्मसंस्थितम्। स्वरूपं ब्राह्ममाश्रित्य ब्रह्मा बीजप्ररोहकः॥
ahamākāśarūpastha evaṁ tattvamayaṁ prabhuḥ| ākāśātsravate yacca tadbījaṁ brahmasaṁsthitam| svarūpaṁ brāhmamāśritya brahmā bījaprarohakaḥ||
मैं आकाश-रूप में स्थित हूँ—इस प्रकार वह प्रभु तत्त्वमय है। आकाश से जो झरता है, वह बीज ब्रह्मा में स्थित है; अपने ब्राह्म स्वरूप का आश्रय लेकर ब्रह्मा ही उस बीज को अंकुरित करने वाले हैं।
श्लोक 67 (skanda.7.105.67)
नाभिमध्ये स्थितो ब्रह्मा विष्णुश्च हृदयांतरे। वक्त्रमध्ये अहं देवि आधारः सर्वदेहिनाम्॥
nābhimadhye sthito brahmā viṣṇuśca hṛdayāṁtare| vaktramadhye ahaṁ devi ādhāraḥ sarvadehinām||
ब्रह्मा नाभि के मध्य में स्थित हैं, और विष्णु हृदय के भीतर स्थित हैं; हे देवि, मैं मुख के मध्य में स्थित हूँ—इस प्रकार हम सभी देहधारियों के आधार हैं।
श्लोक 68 (skanda.7.105.68)
यश्चाहं स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा स हुताशनः। या देवी स स्वयं विष्णुर्यो विष्णुः स च चन्द्रमाः॥
yaścāhaṁ sa svayaṁ brahmā yo brahmā sa hutāśanaḥ| yā devī sa svayaṁ viṣṇuryo viṣṇuḥ sa ca candramāḥ||
जो मैं हूँ, वही स्वयं ब्रह्मा है; जो ब्रह्मा है, वही अग्नि है। जो देवी है, वही स्वयं विष्णु है; जो विष्णु है, वही चन्द्रमा है।
श्लोक 69 (skanda.7.105.69)
यः कालः स स्वयं ब्रह्मा यो रुद्रः स च भास्करः। एवं शक्तिविशेषेण परं ब्रह्म स्थितं प्रिये॥
yaḥ kālaḥ sa svayaṁ brahmā yo rudraḥ sa ca bhāskaraḥ| evaṁ śaktiviśeṣeṇa paraṁ brahma sthitaṁ priye||
जो काल है, वही स्वयं ब्रह्मा है; जो रुद्र है, वही सूर्य है। हे प्रिये, इस प्रकार विशेष शक्ति के द्वारा परब्रह्म ही इन सब रूपों में स्थित है।
श्लोक 70 (skanda.7.105.70)
ॐकारस्तत्परं ब्रह्म गायत्री प्रकृतिः परा। उभावेतौ नरो ज्ञात्वा न विच्यवति मुच्यते॥
oṁkārastatparaṁ brahma gāyatrī prakṛtiḥ parā| ubhāvetau naro jñātvā na vicyavati mucyate||
ॐकार वही परब्रह्म है, और गायत्री परा प्रकृति है। इन दोनों को जानकर मनुष्य मार्ग से च्युत नहीं होता और मुक्त हो जाता है।
श्लोक 71 (skanda.7.105.71)
एवं यो वेद देवेशि अद्वैतं परमाक्षरम्। स सर्वं वेद नैवान्यो भेदकर्त्ता नराधमः॥
evaṁ yo veda deveśi advaitaṁ paramākṣaram| sa sarvaṁ veda naivānyo bhedakarttā narādhamaḥ||
हे देवेशि, जो इस प्रकार इस अद्वैत परम अक्षर को जानता है, वही सब कुछ जानता है; इसके अतिरिक्त जो भेद उत्पन्न करने वाला है, वह नराधम है।
श्लोक 72 (skanda.7.105.72)
एकरूपं परं ब्रह्म कार्यभावात्पृथक्स्थितः। यस्तं द्वेष्टि वरारोहे ब्रह्मद्वेष्टा स उच्यते॥
ekarūpaṁ paraṁ brahma kāryabhāvātpṛthakasthitaḥ| yastaṁ dveṣṭi varārohe brahmadveṣṭā sa ucyate||
परब्रह्म एकरूप ही है, किन्तु कार्य की दृष्टि से पृथक्-पृथक् प्रतीत होता है। हे वरारोहे, जो उससे द्वेष करता है, वह ब्रह्म-द्वेषी कहा जाता है।
श्लोक 73 (skanda.7.105.73)
दक्षिणांगे स्थितो ब्रह्मा वामांगे मम केशवः। यस्तयोर्द्वेषमाधत्ते स द्वेष्टा मम भामिनि॥
dakṣiṇāṁge sthito brahmā vāmāṁge mama keśavaḥ| yastayordveṣamādhatte sa dveṣṭā mama bhāmini||
ब्रह्मा मेरे दाहिने अंग में स्थित हैं, और मेरे बायें अंग में केशव विष्णु स्थित हैं। हे भामिनि, जो इन दोनों से द्वेष करता है, वह मुझसे ही द्वेष करने वाला है।
श्लोक 74 (skanda.7.105.74)
एवं ज्ञात्वा वरारोहे ह्यभिन्नेनान्तरात्मना। ब्रह्माणं केशवं रुद्रमेकरूपेण पूजयेत्॥
evaṁ jñātvā varārohe hyabhinnenāntarātmanā| brahmāṇaṁ keśavaṁ rudramekarūpeṇa pūjayet||
हे वरारोहे, इस प्रकार जानकर, अभिन्न अन्तरात्मा से, ब्रह्मा, केशव और रुद्र की एक ही रूप में पूजा करनी चाहिए।