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प्रभास खण्ड · अध्याय 106

ब्राह्मणप्रशंसावर्णनम्

अध्याय 105अध्याय-सूचीअध्याय 107

श्लोक 1 (skanda.7.106.1)

देव्युवाच। एवमद्वैतभावेन यद्ब्रह्म परिकीर्तितम्। तस्य पूजाविधानं मे कथयस्व यथार्थतः॥

devyuvāca| evamadvaitabhāvena yadbrahma parikīrtitam| tasya pūjāvidhānaṁ me kathayasva yathārthataḥ||

देवी ने कहा—इस प्रकार अद्वैत भाव से जो ब्रह्म कहा गया है, उसकी पूजा-विधि मुझे यथार्थ रूप से बताइये।

श्लोक 2 (skanda.7.106.2)

क्षेत्रे प्राभासिके देव बालरूपी पितामहः। स कथं पूज्यते लोकैः परब्रह्मस्वरूपवान्॥

kṣetre prābhāsike deva bālarūpī pitāmahaḥ| sa kathaṁ pūjyate lokaiḥ parabrahmasvarūpavān||

हे देव, प्राभासिक क्षेत्र में जो बालरूपधारी पितामह हैं, परब्रह्म-स्वरूप वे लोगों द्वारा कैसे पूजित होते हैं?

श्लोक 3 (skanda.7.106.3)

के मन्त्राः किं विधानं तद्ब्राह्मणास्तत्र कीदृशाः। तत्र स्थितानां विप्राणां कथं क्षेत्रफलं भवेत्॥

ke mantrāḥ kiṁ vidhānaṁ tadbrāhmaṇāstatra kīdṛśāḥ| tatra sthitānāṁ viprāṇāṁ kathaṁ kṣetraphalaṁ bhavet||

वहाँ कौन-से मन्त्र और क्या विधान हैं? वहाँ के ब्राह्मण कैसे हैं? वहाँ रहने वाले विप्रों को क्षेत्र का फल कैसे प्राप्त होता है?

श्लोक 4 (skanda.7.106.4)

कतिप्रकारास्ते विप्रास्तत्र क्षेत्रनिवासिनः। किमाचारा महादेव किंशीलाः किंपरायणाः॥

katiprakārāste viprāstatra kṣetranivāsinaḥ| kimācārā mahādeva kiṁśīlāḥ kiṁparāyaṇāḥ||

हे महादेव, वहाँ क्षेत्र में निवास करने वाले वे विप्र कितने प्रकार के हैं? उनका आचार क्या है, उनका शील क्या है, वे किसमें तत्पर रहते हैं?

श्लोक 5 (skanda.7.106.5)

एतद्विस्तरतो ब्रूहि ब्राह्मणानां महोदयम्॥

etadvistarato brūhi brāhmaṇānāṁ mahodayam||

यह ब्राह्मणों की महिमा मुझे विस्तारपूर्वक बताइये।

श्लोक 6 (skanda.7.106.6)

ईश्वर उवाच। साधुसाधु महादेवि सम्यक्प्रश्नविशारदे। शृणुष्वैकमना भूत्वा माहात्म्यं विप्रदैवतम्॥

īśvara uvāca| sādhusādhu mahādevi samyakpraśnaviśārade| śṛṇuṣvaikamanā bhūtvā māhātmyaṁ vipradaivatam||

ईश्वर ने कहा—साधु, साधु, हे महादेवि, तुम सम्यक् प्रश्न पूछने में निपुण हो। एकाग्रचित्त होकर विप्रों की देवता-रूप महिमा सुनो।

श्लोक 7 (skanda.7.106.7)

यच्छ्रुत्वा मानवो देवि मुच्यते सर्वपातकैः। ये केचित्सागरांतायां पृथिव्यां कीर्तिता द्विजाः॥

yacchrutvā mānavo devi mucyate sarvapātakaiḥ| ye kecitsāgarāṁtāyāṁ pṛthivyāṁ kīrtitā dvijāḥ||

हे देवि, जिसे सुनकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। समुद्रपर्यन्त इस पृथ्वी पर जो भी द्विज कहे गये हैं—

श्लोक 8 (skanda.7.106.8)

तद्रूपं मम देवेशि प्रत्यक्षं धरणीतले। प्रत्यक्षं ब्राह्मणा देवाः परोक्षं दिवि देवताः॥

tadrūpaṁ mama deveśi pratyakṣaṁ dharaṇītale| pratyakṣaṁ brāhmaṇā devāḥ parokṣaṁ divi devatāḥ||

हे देवेशि, वे पृथ्वी पर मेरा ही प्रत्यक्ष रूप हैं। ब्राह्मण प्रत्यक्ष देवता हैं, जबकि स्वर्ग में देवता परोक्ष हैं।

श्लोक 9 (skanda.7.106.9)

ब्राह्मणा मत्प्रिया नित्यं ब्राह्मणा मामकी तनुः। यस्तानर्चयते भक्त्या स मामर्चयते सदा॥

brāhmaṇā matpriyā nityaṁ brāhmaṇā māmakī tanuḥ| yastānarcayate bhaktyā sa māmarcayate sadā||

ब्राह्मण मुझे सदा प्रिय हैं, ब्राह्मण मेरा ही शरीर हैं। जो भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह सदा मेरी ही पूजा करता है।

श्लोक 10 (skanda.7.106.10)

यस्तांस्तोषयते भक्त्या स च मां परितोषयेत्॥

yastāṁstoṣayate bhaktyā sa ca māṁ paritoṣayet||

जो भक्तिपूर्वक उन्हें सन्तुष्ट करता है, वह मुझे ही सन्तुष्ट करता है।

श्लोक 11 (skanda.7.106.11)

ये ब्राह्मणाः सोऽहमसंशयं प्रिये तेष्वर्चितेष्वर्चितोऽहं भवेयम्। तेष्वेव तुष्टेष्वहमेव तुष्टो वैरं च तैर्यस्य ममापि वैरम्॥

ye brāhmaṇāḥ so'hamasaṁśayaṁ priye teṣvarciteṣvarcito'haṁ bhaveyam| teṣveva tuṣṭeṣvahameva tuṣṭo vairaṁ ca tairyasya mamāpi vairam||

हे प्रिये, जो ब्राह्मण हैं, वे निःसन्देह मैं ही हूँ; उनके पूजित होने पर मैं ही पूजित होता हूँ। उनके सन्तुष्ट होने पर मैं ही सन्तुष्ट होता हूँ, और जो उनसे वैर रखता है, वह मुझसे ही वैर रखता है।

श्लोक 12 (skanda.7.106.12)

यश्चन्दनैः सागरुगन्धमाल्यैरभ्यर्चयेच्छैलमयीं ममार्चाम्। असौ न मामर्चयतेर्चयन्वै विप्रार्चनादर्चित एव चाहम्॥

yaścandanaiḥ sāgarugandhamālyairabhyarcayecchailamayīṁ mamārcām| asau na māmarcayaterjayanvai viprārcanādarcita eva cāham||

जो चन्दन, अगरु, सुगन्ध और मालाओं से पत्थर की मेरी मूर्ति का पूजन करता है, वह पूजा करते हुए भी वास्तव में मेरा पूजन नहीं करता; ब्राह्मण की पूजा से ही मैं वास्तव में पूजित होता हूँ।

श्लोक 13 (skanda.7.106.13)

यावंतः पृथिवीमध्ये चीर्णवेदव्रता द्विजाः। अचीर्णव्रतवेदा वा तेऽपि पूज्या द्विजाः प्रिये॥

yāvaṁtaḥ pṛthivīmadhye cīrṇavedavratā dvijāḥ| acīrṇavratavedā vā te'pi pūjyā dvijāḥ priye||

हे प्रिये, पृथ्वी पर जितने भी द्विज वेद-व्रतों का पालन करने वाले हैं, तथा जो वेद-व्रतों का पालन न भी करते हों, वे भी पूज्य द्विज ही हैं।

श्लोक 14 (skanda.7.106.14)

न ब्राह्मणान्परीक्षेत श्राद्धे क्षेत्रनिवासिनः। सुमहान्परिवादोऽस्य ब्राह्मणानां परीक्षणे॥

na brāhmaṇānparīkṣeta śrāddhe kṣetranivāsinaḥ| sumahānparivādo'sya brāhmaṇānāṁ parīkṣaṇe||

क्षेत्र में निवास करने वाले को श्राद्ध में ब्राह्मणों की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए; ब्राह्मणों की परीक्षा करने में उसे बड़ा दोष लगता है।

श्लोक 15 (skanda.7.106.15)

काणाः खञ्जाश्च कृष्णाश्च दरिद्रा व्याधितास्तथा। सर्वे श्राद्धे नियोक्तव्या मिश्रिता वेदपारगैः॥

kāṇāḥ khañjāśca kṛṣṇāśca daridrā vyādhitāstathā| sarve śrāddhe niyoktavyā miśritā vedapāragaiḥ||

काने, लंगड़े, काले वर्ण के, दरिद्र और रोगी—इन सभी को वेदपारंगत ब्राह्मणों के साथ मिलाकर श्राद्ध में नियुक्त करना चाहिए।

श्लोक 16 (skanda.7.106.16)

ब्राह्मणा जातितः पूज्या वेदाभ्यासात्ततः परम्। ततोर्थं हव्यकव्येषु न निन्द्या ब्राह्मणाः क्वचित्॥

brāhmaṇā jātitaḥ pūjyā vedābhyāsāttataḥ param| tato'rthaṁ havyakavyeṣu na nindyā brāhmaṇāḥ kvacit||

ब्राह्मण जन्म से ही पूज्य हैं, वेदाभ्यास से वे और अधिक पूज्य हो जाते हैं; इसलिए हव्य-कव्य कर्मों में ब्राह्मणों की कभी निन्दा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 17 (skanda.7.106.17)

काणान्कुण्टांश्च कुब्जाश्च दरिद्रान्व्याधितानपि। नावमन्येद्द्विजान्प्राज्ञो मम रूपं यतः स्मृतम्॥

kāṇānkuṇṭāṁśca kubjāśca daridrānvyādhitānapi| nāvamanyeddvijānprājño mama rūpaṁ yataḥ smṛtam||

काने, अपाहिज, कुबड़े, दरिद्र तथा रोगी—इन द्विजों का भी विद्वान् पुरुष अनादर न करे, क्योंकि वे मेरा ही स्वरूप माने गये हैं।

श्लोक 18 (skanda.7.106.18)

बहवो हि न जानंति नरा ज्ञानबहिष्कृताः। यथाहं द्विजरूपेण चरामि पृथिवीमिमाम्॥

bahavo hi na jānaṁti narā jñānabahiṣkṛtāḥ| yathāhaṁ dvijarūpeṇa carāmi pṛthivīmimām||

बहुत-से ज्ञानहीन मनुष्य यह नहीं जानते कि मैं किस प्रकार द्विज-रूप धारण करके इस पृथ्वी पर विचरण करता हूँ।

श्लोक 19 (skanda.7.106.19)

मद्रूपान्घ्नन्ति ये विप्रान्विकर्म कारयंति च। अप्रेषणे प्रेषयंति दासत्वं कारयन्ति च॥

madrūpānghnanti ye viprānvikarma kārayaṁti ca| apreṣaṇe preṣayaṁti dāsatvaṁ kārayanti ca||

जो विप्रों को, जो मेरे ही रूप हैं, मारते हैं, उनसे निषिद्ध कर्म कराते हैं, अनुचित कार्यों में भेजते हैं और उन्हें दासता में लगाते हैं—

श्लोक 20 (skanda.7.106.20)

मृतांस्तान्करपत्रेण यमदूता महाबलाः। निकृंतंति यथा काष्ठं सूत्रमार्गेण शिल्पिनः॥

mṛtāṁstānkarapatreṇa yamadūtā mahābalāḥ| nikṛṁtaṁti yathā kāṣṭhaṁ sūtramārgeṇa śilpinaḥ||

उनके मरने पर महाबली यमदूत उन्हें आरी से उसी प्रकार काटते हैं, जैसे शिल्पी सूत की रेखा के अनुसार लकड़ी को काटते हैं।

श्लोक 21 (skanda.7.106.21)

ये चैवाश्लक्ष्णया वाचा तर्जयन्ति नराधमाः। वदंति परुषं क्रोधात्पादेन निहनंति च॥

ye caivāślakṣṇayā vācā tarjayanti narādhamāḥ| vadaṁti paruṣaṁ krodhātpādena nihanaṁti ca||

जो नराधम कठोर वाणी से ब्राह्मणों को डराते-धमकाते हैं, क्रोधवश कठोर बोलते हैं और पैर से प्रहार करते हैं—

श्लोक 22 (skanda.7.106.22)

मृतांस्तान्यमलोका हि निहत्य धरणीतले। क्रूरपादेन चाक्रम्य क्रोधसंरक्तलोचनाः॥

mṛtāṁstānyamalokā hi nihatya dharaṇītale| krūrapādena cākramya krodhasaṁraktalocanāḥ||

यमलोक के दूत, क्रोध से रक्त-नेत्र हुए, उनके मरने पर उन्हें पृथ्वी पर पटककर क्रूर पैरों से रौंदते हैं।

श्लोक 23 (skanda.7.106.23)

अग्निवर्णैश्च संदंशैर्जिह्वामुद्धरते यमः। ये नु विप्रान्निरीक्षन्ते पापाः पापेन चक्षुषा॥

agnivarṇaiśca saṁdaṁśairjihvāmuddharate yamaḥ| ye nu viprānnirīkṣante pāpāḥ pāpena cakṣuṣā||

यम अग्नि के समान तप्त सँड़सी से उनकी जिह्वा उखाड़ लेते हैं। जो पापी लोग पाप-दृष्टि से ब्राह्मणों को देखते हैं—

श्लोक 24 (skanda.7.106.24)

अब्रह्मण्यास्तु ते बाह्या नित्यं ब्रह्मद्विषो नराः। तेषां घोरा महाकाया वज्रतुंडा भयानकाः। उद्धरंति मुहूर्तेन चक्षुः काका यमाज्ञया॥

abrahmaṇyāstu te bāhyā nityaṁ brahmadviṣo narāḥ| teṣāṁ ghorā mahākāyā vajratuṁḍā bhayānakāḥ| uddharaṁti muhūrtena cakṣuḥ kākā yamājñayā||

वे ब्रह्म-विरोधी, बहिष्कृत, सदा ब्रह्म-द्वेषी मनुष्य हैं। उनकी आँखों को यम की आज्ञा से वज्र जैसी चोंच वाले, भयंकर, विशालकाय कौवे एक ही क्षण में नोंच लेते हैं।

श्लोक 25 (skanda.7.106.25)

यस्ताडयति विप्रं वै क्षते कुर्याद्धि शोणितम्। अस्थिभंगं च वा कुर्यात्प्राणैर्वापि वियोजयेत्॥

yastāḍayati vipraṁ vai kṣate kuryāddhi śoṇitam| asthibhaṁgaṁ ca vā kuryātprāṇairvāpi viyojayet||

जो कोई ब्राह्मण को पीटता है, घाव करके रक्त बहाता है, हड्डी तोड़ता है, अथवा उसके प्राण हर लेता है—

श्लोक 26 (skanda.7.106.26)

ब्रह्मघ्नः स तु विज्ञेयो न तस्मै निष्कृतिः स्मृता। पञ्चाशत्कोटिसंख्येषु नरकेष्वनुपूर्वशः॥

brahmaghnaḥ sa tu vijñeyo na tasmai niṣkṛtiḥ smṛtā| pañcāśatkoṭisaṁkhyeṣu narakeṣvanupūrvaśaḥ||

वह ब्रह्महत्यारा जानना चाहिए; उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं बताया गया है। वह पचास करोड़ नरकों में क्रमशः भोगता है।

श्लोक 27 (skanda.7.106.27)

स बहूनि सहस्राणि वर्षाणि पच्यते भृशम्॥ तस्माद्विप्रो वरारोहे नमस्कार्यो नृभिः सदा॥

sa bahūni sahasrāṇi varṣāṇi pacyate bhṛśam| tasmādvipro varārohe namaskāryo nṛbhiḥ sadā||

वह अनेक सहस्र वर्षों तक अत्यन्त कष्ट भोगता है। इसलिए हे वरारोहे, मनुष्यों को सदा विप्र को नमस्कार करना चाहिए।

श्लोक 28 (skanda.7.106.28)

अन्नपानप्रदानैस्तु पूज्या हि सततं द्विजाः। सर्वेषां चैव दानानां विप्राः सर्वेऽधिकारिणः॥

annapānapradānaistu pūjyā hi satataṁ dvijāḥ| sarveṣāṁ caiva dānānāṁ viprāḥ sarve'dhikāriṇaḥ||

अन्न और जल के दान से द्विजों की सदा पूजा करनी चाहिए; सभी प्रकार के दानों के सभी विप्र ही अधिकारी हैं।

श्लोक 29 (skanda.7.106.29)

नान्यः समर्थो देवेशि गृह्णन्यात्यधमां गतिम्। तपसा पावितो देवि ब्राह्मणो धृतकिल्विषः॥

nānyaḥ samartho deveśi gṛhṇanyātyadhamāṁ gatim| tapasā pāvito devi brāhmaṇo dhṛtakilviṣaḥ||

हे देवेशि, दान ग्रहण करने वाला अन्य कोई उसे धारण करने में समर्थ नहीं है, वह अधम गति को प्राप्त होता है। किन्तु हे देवि, तपस्या से पवित्र हुआ ब्राह्मण पाप को भी धारण कर सकता है।

श्लोक 30 (skanda.7.106.30)

न सीदेत्प्रतिगृह्णानः पृथिवीमनुसागराम्॥ नास्ति किंचिन्महादेवि दुष्कृतं ब्राह्मणस्य तु॥

na sīdetpratigṛhṇānaḥ pṛthivīmanusāgarām| nāsti kiṁcinmahādevi duṣkṛtaṁ brāhmaṇasya tu||

वह सागरपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी को भी दान में ग्रहण करके दुःखी नहीं होता। हे महादेवि, ब्राह्मण के लिए कुछ भी दुष्कृत नहीं है।

श्लोक 31 (skanda.7.106.31)

यस्तु स्थितः सदाऽध्यात्मे नित्यं सद्भावभावितः। ब्राह्मणो हि महद्भूतं जन्मना सह जायते॥

yastu sthitaḥ sadā'dhyātme nityaṁ sadbhāvabhāvitaḥ| brāhmaṇo hi mahadbhūtaṁ janmanā saha jāyate||

जो सदा अध्यात्म में स्थित और नित्य सद्भाव से युक्त है, वह श्रेष्ठ ब्राह्मण है। ब्राह्मण तो जन्म के साथ ही एक महान् भूत के रूप में उत्पन्न होता है।

श्लोक 32 (skanda.7.106.32)

लोके लोकेश्वराश्चापि सर्वे ब्राह्मणपूजकाः। ततस्तान्नावमन्येत यदीच्छेज्जीवितं चिरम्॥

loke lokeśvarāścāpi sarve brāhmaṇapūjakāḥ| tatastānnāvamanyeta yadīcchejjīvitaṁ ciram||

संसार में लोकेश्वर भी सभी ब्राह्मणों की पूजा करने वाले होते हैं; इसलिए यदि कोई दीर्घ जीवन चाहता है, तो उनका अनादर न करे।

श्लोक 33 (skanda.7.106.33)

ब्राह्मणाः कुपिता हन्युर्भस्मीकुर्युः स्वतेजसा। लोकानन्यान्सृजेयुश्च लोकपालांस्तथाऽपरान्॥

brāhmaṇāḥ kupitā hanyurbhasmīkuryuḥ svatejasā| lokānanyānsṛjeyuśca lokapālāṁstathā'parān||

क्रुद्ध होने पर ब्राह्मण शत्रुओं का वध कर सकते हैं, अपने ही तेज से उन्हें भस्म कर सकते हैं; और वे अन्य लोकों तथा अन्य लोकपालों की भी सृष्टि कर सकते हैं।

श्लोक 34 (skanda.7.106.34)

अपेयः सागरो यैश्च कृतः कोपान्महात्मभिः। येषां कोपाग्निरद्यापि दंडके नोपशाम्यति॥

apeyaḥ sāgaro yaiśca kṛtaḥ kopānmahātmabhiḥ| yeṣāṁ kopāgniradyāpi daṁḍake nopaśāmyati||

जिन महात्माओं ने क्रोधवश समुद्र को अपेय बना दिया था, जिनकी क्रोधाग्नि दण्डक वन में आज भी शान्त नहीं हुई है—

श्लोक 35 (skanda.7.106.35)

एते स्वर्गस्य नेतारो देवदेवाः सनातनाः॥ एभिश्चापि कृतः पंथा देवयानः स उच्यते॥

ete svargasya netāro devadevāḥ sanātanāḥ| ebhiścāpi kṛtaḥ paṁthā devayānaḥ sa ucyate||

वे ही स्वर्ग के अग्रणी, सनातन देवों के भी देव हैं। इन्हीं के द्वारा वह मार्ग बनाया गया है, जिसे देवयान कहा जाता है।

श्लोक 36 (skanda.7.106.36)

ते पूज्यास्ते नमस्कार्यास्तेषु सर्वं प्रतिष्ठितम्। ते वै लोकानिमान्सर्वान्पारयंति परस्परम्॥

te pūjyāste namaskāryāsteṣu sarvaṁ pratiṣṭhitam| te vai lokānimānsarvānpārayaṁti parasparam||

वे ही पूज्य हैं, वे ही नमस्कार के योग्य हैं, उन्हीं में सब कुछ प्रतिष्ठित है। वे ही परस्पर एक-दूसरे की सहायता से इन सभी लोकों को पार कराते हैं।

श्लोक 37 (skanda.7.106.37)

गूढस्वाध्यायतपसो ब्राह्मणाः शंसितव्रताः। विद्यास्नाता व्रतस्नाता अनपाश्रित्य जीविनः॥

gūḍhasvādhyāyatapaso brāhmaṇāḥ śaṁsitavratāḥ| vidyāsnātā vratasnātā anapāśritya jīvinaḥ||

ब्राह्मण अपने स्वाध्याय और तप को गुप्त रखते हैं, उत्कृष्ट व्रतों वाले होते हैं, विद्या से स्नात और व्रत से स्नात होते हुए बिना किसी का आश्रय लिये जीवन-निर्वाह करते हैं।

श्लोक 38 (skanda.7.106.38)

आशीविषा इव क्रुद्धा उपचर्या हि ब्राह्मणाः॥ तपसा दीप्यमानास्ते दहेयुः सागरानपि॥

āśīviṣā iva kruddhā upacaryā hi brāhmaṇāḥ| tapasā dīpyamānāste daheyuḥ sāgarānapi||

क्रुद्ध होने पर ब्राह्मण विषैले सर्प के समान हैं, इसलिए उनकी सेवा ही करनी चाहिए। तप से प्रज्वलित हुए वे सागरों तक को भी जला सकते हैं।

श्लोक 39 (skanda.7.106.39)

ब्राह्मणेषु च तुष्टुषु तुष्यंते सर्वदेवताः॥ ते गतिः सर्वभूतानामध्यात्मगतिचिन्तकाः॥

brāhmaṇeṣu ca tuṣṭuṣu tuṣyaṁte sarvadevatāḥ| te gatiḥ sarvabhūtānāmadhyātmagaticintakāḥ||

ब्राह्मणों के सन्तुष्ट होने पर सभी देवता सन्तुष्ट होते हैं। अध्यात्म-गति का चिन्तन करने वाले वे ही समस्त प्राणियों की गति हैं।

श्लोक 40 (skanda.7.106.40)

आदिमध्यावसानानां ज्ञानानां छिन्नसंशयाः॥ परापरविशेषज्ञा नेतारः परमां गतिम्। अवध्या ब्राह्मणास्तस्मात्पापेष्वपि रताः सदा॥

ādimadhyāvasānānāṁ jñānānāṁ chinnasaṁśayāḥ| parāparaviśeṣajñā netāraḥ paramāṁ gatim| avadhyā brāhmaṇāstasmātpāpeṣvapi ratāḥ sadā||

वे आदि, मध्य और अन्त के ज्ञानों के सन्देह से रहित हैं, पर और अपर के भेद को जानने वाले हैं, और परम गति के अगुआ हैं। इसलिए ब्राह्मण अवध्य हैं, चाहे वे पापों में भी सदा लगे हुए क्यों न हों।

श्लोक 41 (skanda.7.106.41)

यश्च सर्वमिदं हन्याद्ब्राह्मणं चापि तत्समम्। सोऽग्निः सोऽर्को महातेजा विषं भवति कोपितः॥

yaśca sarvamidaṁ hanyādbrāhmaṇaṁ cāpi tatsamam| so'gniḥ so'rko mahātejā viṣaṁ bhavati kopitaḥ||

जो इस समस्त संसार का संहार कर दे, ब्राह्मण उसके समान ही है; क्रुद्ध होने पर वह महातेजस्वी ब्राह्मण अग्नि, सूर्य और विष के समान हो जाता है।

श्लोक 42 (skanda.7.106.42)

भूतानामग्रभुग्विप्रो वर्णश्रेष्ठः पिता गुरुः। न स्कन्दते न व्यथते न विनश्यति कर्हिचित्॥

bhūtānāmagrabhugvipro varṇaśreṣṭhaḥ pitā guruḥ| na skandate na vyathate na vinaśyati karhicit||

विप्र प्राणियों में सबसे पहले भोग करने वाला है, वर्णों में श्रेष्ठ है, पिता और गुरु है; वह न कभी स्खलित होता है, न व्यथित होता है, न कभी नष्ट होता है।

श्लोक 43 (skanda.7.106.43)

वरिष्ठमग्निहोत्राद्धि ब्राह्मणस्य मुखे हुतम्। विप्राणां वपुराश्रित्य सर्वास्तिष्ठंति देवताः॥

variṣṭhamagnihotrāddhi brāhmaṇasya mukhe hutam| viprāṇāṁ vapurāśritya sarvāstiṣṭhaṁti devatāḥ||

ब्राह्मण के मुख में की गयी आहुति अग्निहोत्र से भी श्रेष्ठ है। सभी देवता विप्रों के शरीर का आश्रय लेकर स्थित रहते हैं।

श्लोक 44 (skanda.7.106.44)

अतः पूज्यास्तु ते विप्रा अलाभे प्रतिमादयः॥

ataḥ pūjyāstu te viprā alābhe pratimādayaḥ||

इसलिए वे विप्र ही पूज्य हैं; उनके अलाभ में ही प्रतिमा आदि पूज्य होती हैं।

श्लोक 45 (skanda.7.106.45)

अविद्यो वा सविद्यो वा ब्राह्मणो मम दैवतम्। प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत्॥

avidyo vā savidyo vā brāhmaṇo mama daivatam| praṇītaścāpraṇītaśca yathāgnirdaivataṁ mahat||

अविद्वान् हो या विद्वान्, ब्राह्मण मेरे लिए देवता है; ठीक जैसे प्रज्वलित हो या अप्रज्वलित, अग्नि सदा महान् देवता ही है।

श्लोक 46 (skanda.7.106.46)

स्मशानेष्वपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति। हव्यकव्यव्यपेतोऽपि ब्राह्मणो नैव दुष्यति॥

smaśāneṣvapi tejasvī pāvako naiva duṣyati| havyakavyavyapeto'pi brāhmaṇo naiva duṣyati||

श्मशानों में भी तेजस्वी अग्नि दूषित नहीं होती; इसी प्रकार हव्य-कव्य कर्म से रहित होने पर भी ब्राह्मण दूषित नहीं होता।

श्लोक 47 (skanda.7.106.47)

महापातकवर्ज्यं हि पूज्यो विप्रो वरानने। सर्वथा ब्राह्मणाः पूज्याः सर्वथा दैवतं महत्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रक्षेदापद्गतं द्विजम्॥

mahāpātakavarjyaṁ hi pūjyo vipro varānane| sarvathā brāhmaṇāḥ pūjyāḥ sarvathā daivataṁ mahat| tasmātsarvaprayatnena rakṣedāpadgataṁ dvijam||

हे वरानने, महापातक से रहित विप्र पूज्य है; ब्राह्मण सर्वथा पूज्य हैं, वे सर्वथा महान् देवता हैं। इसलिए संकट में पड़े द्विज की सम्पूर्ण प्रयत्न से रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 48 (skanda.7.106.48)

एवं विप्रा महादेवि पूज्याः सर्वत्र मानवैः। किं पुनः संजितात्मानो विशेषात्क्षेत्रवासिनः॥

evaṁ viprā mahādevi pūjyāḥ sarvatra mānavaiḥ| kiṁ punaḥ saṁjitātmāno viśeṣātkṣetravāsinaḥ||

हे महादेवि, इस प्रकार विप्र सर्वत्र मनुष्यों द्वारा पूज्य हैं; फिर विशेष रूप से जितात्मा क्षेत्रवासी विप्रों की तो बात ही क्या!

श्लोक 49 (skanda.7.106.49)

अथ क्षेत्रस्थितानां च चतुराश्रमवासिनाम्। विप्राणां वृत्तितो भेदं प्रवक्ष्याम्यानुपूर्व्यशः॥

atha kṣetrasthitānāṁ ca caturāśramavāsinām| viprāṇāṁ vṛttito bhedaṁ pravakṣyāmyānupūrvyaśaḥ||

अब मैं क्षेत्र में स्थित तथा चारों आश्रमों में निवास करने वाले विप्रों के वृत्ति के अनुसार भेदों को क्रमशः बताता हूँ।

श्लोक 50 (skanda.7.106.50)

क्षेत्रस्य संन्यासविधिं ये जानंति द्विजातयः। वृत्तिभेदं क्रमाच्चैव ते क्षेत्रफलभागिनः॥

kṣetrasya saṁnyāsavidhiṁ ye jānaṁti dvijātayaḥ| vṛttibhedaṁ kramāccaiva te kṣetraphalabhāginaḥ||

जो द्विज इस क्षेत्र की संन्यास-विधि तथा क्रमशः वृत्ति के भेद को जानते हैं, वे ही क्षेत्र के फल के भागी होते हैं।

श्लोक 51 (skanda.7.106.51)

यथा क्षेत्रे निवसता वर्तितव्यं द्विजातिना। प्राजापत्यादिभेदेन तच्छृणु त्वं वरानने॥

yathā kṣetre nivasatā vartitavyaṁ dvijātinā| prājāpatyādibhedena tacchṛṇu tvaṁ varānane||

हे वरानने, क्षेत्र में निवास करने वाले द्विज को किस प्रकार रहना चाहिए, यह प्राजापत्य आदि भेदों के अनुसार सुनो।

श्लोक 52 (skanda.7.106.52)

प्राजापत्या महीपालाः कपोता ग्रंथिकास्तथा। कुटिकाश्चाथ वैतालाः पद्महंसा वरानने॥

prājāpatyā mahīpālāḥ kapotā graṁthikāstathā| kuṭikāścātha vaitālāḥ padmahaṁsā varānane||

हे वरानने—प्राजापत्य, महीपाल, कपोत, ग्रन्थिक, कुटिक, वैताल, पद्म और हंस—

श्लोक 53 (skanda.7.106.53)

धृतराष्ट्रा बकाः कंका गोपालाश्चैव भामिनि। त्रुटिका मठराश्चैव गुटिका दंडिकाः परे॥

dhṛtarāṣṭrā bakāḥ kaṁkā gopālāścaiva bhāmini| truṭikā maṭharāścaiva guṭikā daṁḍikāḥ pare||

हे भामिनि—धृतराष्ट्र, बक, कंक, गोपाल, त्रुटिक, मठर, गुटिक और अन्य दण्डिक—

श्लोक 54 (skanda.7.106.54)

क्षेत्रस्थानामिमे भेदा वृत्तिं तेषां शृणुष्व च॥

kṣetrasthānāmime bhedā vṛttiṁ teṣāṁ śṛṇuṣva ca||

क्षेत्र में रहने वालों के ये भेद हैं; अब उनकी वृत्ति सुनो।

श्लोक 55 (skanda.7.106.55)

अहिंसा गुरुशुश्रूषा स्वाध्यायः शौचसंयमः। सत्यमस्तेयमेतद्धि प्राजापत्यं व्रतं स्मृतम्॥

ahiṁsā guruśuśrūṣā svādhyāyaḥ śaucasaṁyamaḥ| satyamasteyametaddhi prājāpatyaṁ vrataṁ smṛtam||

अहिंसा, गुरु-सेवा, स्वाध्याय, शौच, संयम, सत्य और अस्तेय—यही प्राजापत्य व्रत माना गया है।

श्लोक 56 (skanda.7.106.56)

क्षयपुष्ट्यर्थविद्वेषकर्मभिः शांतिकादिभिः। पालयंति महीं यस्मान्महीपालास्ततः स्मृताः॥

kṣayapuṣṭyarthavidveṣakarmabhiḥ śāṁtikādibhiḥ| pālayaṁti mahīṁ yasmānmahīpālāstataḥ smṛtāḥ||

क्षय, पुष्टि, धन, वैर-नाश जैसे कर्मों तथा शान्तिकर्म आदि के द्वारा जो पृथ्वी की रक्षा करते हैं, इसीलिए वे महीपाल कहलाते हैं।

श्लोक 57 (skanda.7.106.57)

पतिता ये कणा भूमौ संहरंति कपोतवत्। उद्धृत्याजीवनं येषां कपोतास्ते तु साधकाः॥

patitā ye kaṇā bhūmau saṁharaṁti kapotavat| uddhṛtyājīvanaṁ yeṣāṁ kapotāste tu sādhakāḥ||

जो भूमि पर गिरे हुए अन्न-कणों को कबूतर के समान बीनकर एकत्र करते हैं, और उन्हीं को उठाकर जीवन-निर्वाह करते हैं, वे साधक कपोत कहलाते हैं।

श्लोक 58 (skanda.7.106.58)

गृहं कृत्वा तु सद्ग्रंथाः सहसैव त्यजंति ये। कुटिका साधकास्ते वै शिवाराधनतत्पराः॥

gṛhaṁ kṛtvā tu sadgraṁthāḥ sahasaiva tyajaṁti ye| kuṭikā sādhakāste vai śivārādhanatatparāḥ||

जो घर बनाकर, अच्छी गाँठ रखकर भी उसे सहसा त्याग देते हैं, और शिव की आराधना में तत्पर रहते हैं, वे साधक कुटिक कहलाते हैं।

श्लोक 59 (skanda.7.106.59)

तीर्थासक्ताः सपत्नीका यथालब्धोपजीविनः। महासाहसयुक्तास्ते वैतालाख्यास्तु साधकाः॥

tīrthāsaktāḥ sapatnīkā yathālabdhopajīvinaḥ| mahāsāhasayuktāste vaitālākhyāstu sādhakāḥ||

जो तीर्थों में आसक्त रहते हैं, पत्नी सहित रहते हैं, जो कुछ मिल जाए उसी से जीविका चलाते हैं, और महान् साहस से युक्त होते हैं, वे साधक वैताल कहलाते हैं।

श्लोक 60 (skanda.7.106.60)

संयताः कामनासक्ता राज्यकामार्थसाधकाः। पद्मास्ते साधकाः ख्याता भिक्षाचर्यारताः सदा॥

saṁyatāḥ kāmanāsaktā rājyakāmārthasādhakāḥ| padmāste sādhakāḥ khyātā bhikṣācaryāratāḥ sadā||

जो संयमी हैं, किन्तु राज्य, काम और अर्थ की कामना से युक्त होकर उनकी सिद्धि चाहते हैं, तथा सदा भिक्षाचर्या में रत रहते हैं, वे साधक पद्म के नाम से प्रसिद्ध हैं।

श्लोक 61 (skanda.7.106.61)

ज्ञानयोगसमायुक्ता द्वैताचाररताश्च ये। हंसास्ते साधकाः ख्याताः स्वयमुत्पन्नसंविदः॥

jñānayogasamāyuktā dvaitācāraratāśca ye| haṁsāste sādhakāḥ khyātāḥ svayamutpannasaṁvidaḥ||

जो ज्ञानयोग से युक्त हैं, और द्वैत आचार में रत रहते हुए भी स्वयं ही बोध को प्राप्त हो चुके हैं, वे साधक हंस के नाम से प्रसिद्ध हैं।

श्लोक 62 (skanda.7.106.62)

ब्रह्मचर्येण सत्त्वेन तथाऽलुब्धतयापि वा। जितं जगद्धारयन्तो धृतराष्ट्रा मतास्तु ये॥

brahmacaryeṇa sattvena tathā'lubdhatayāpi vā| jitaṁ jagaddhārayanto dhṛtarāṣṭrā matāstu ye||

जो ब्रह्मचर्य से, सत्त्व से, तथा अलोभ से जगत् को जीतकर उसे धारण करते हैं, वे धृतराष्ट्र माने गये हैं।

श्लोक 63 (skanda.7.106.63)

गूढाश्चरंति ये ज्ञानं व्रतं धर्ममथापि वा। स्वार्थैकागतनिष्ठास्तु बकास्ते साधका मताः॥

gūḍhāścaraṁti ye jñānaṁ vrataṁ dharmamathāpi vā| svārthaikāgataniṣṭhāstu bakāste sādhakā matāḥ||

जो ज्ञान, व्रत अथवा धर्म का गुप्त रूप से आचरण करते हैं, और केवल अपने ही प्रयोजन में एकाग्र निष्ठा रखते हैं, वे साधक बक माने गये हैं।

श्लोक 64 (skanda.7.106.64)

जलाश्रयं समाश्रित्य स्थिता उत्कृष्टसिद्धये। बिसशृंगाटकाहारास्ते कंकाः साधकाः स्मृताः॥

jalāśrayaṁ samāśritya sthitā utkṛṣṭasiddhaye| bisaśṛṁgāṭakāhārāste kaṁkāḥ sādhakāḥ smṛtāḥ||

जो जल के आश्रय में रहकर उत्कृष्ट सिद्धि के लिए स्थित रहते हैं, और कमल-नाल तथा सिंघाड़े का ही आहार करते हैं, वे साधक कंक स्मृत हैं।

श्लोक 65 (skanda.7.106.65)

गोभिः सार्द्धं व्रजंत्यत्र गोष्ठे च निवसंति ये। पंचगव्यरसा ये वै गोपालास्ते तु साधकाः॥

gobhiḥ sārddhaṁ vrajaṁtyatra goṣṭhe ca nivasaṁti ye| paṁcagavyarasā ye vai gopālāste tu sādhakāḥ||

जो गौओं के साथ विचरण करते हैं, गोशाला में निवास करते हैं, तथा पंचगव्य के रस पर निर्वाह करते हैं, वे साधक गोपाल कहलाते हैं।

श्लोक 66 (skanda.7.106.66)

कृच्छ्रचांद्रायणैश्चैव क्षपयंति स्वकं वपुः। त्रुटिमात्राशनास्ते तु त्रुटिकाः साधका मताः॥

kṛcchracāṁdrāyaṇaiścaiva kṣapayaṁti svakaṁ vapuḥ| truṭimātrāśanāste tu truṭikāḥ sādhakā matāḥ||

जो कृच्छ्र और चान्द्रायण व्रतों से अपने शरीर को कृश करते हैं, और अत्यन्त अल्प मात्रा में ही भोजन करते हैं, वे साधक त्रुटिक माने गये हैं।

श्लोक 67 (skanda.7.106.67)

कृत्वा कुशमयीं पत्नीं मठे ये गृहमेधिनः। भैक्षवृत्तिरताः शुद्धा मठरास्ते तु साधकाः॥

kṛtvā kuśamayīṁ patnīṁ maṭhe ye gṛhamedhinaḥ| bhaikṣavṛttiratāḥ śuddhā maṭharāste tu sādhakāḥ||

जो कुशा की पत्नी बनाकर मठ में गृहस्थ-धर्म का पालन करते हैं, और शुद्ध भिक्षा-वृत्ति में रत रहते हैं, वे साधक मठर कहलाते हैं।

श्लोक 68 (skanda.7.106.68)

ग्रासमात्रसमानाभिर्गुटिकाभिरथाष्टभिः। कन्दमूलफलोत्थाभिर्गुटिकास्ते द्विजातयः॥

grāsamātrasamānābhirguṭikābhirathāṣṭabhiḥ| kandamūlaphalotthābhirguṭikāste dvijātayaḥ||

जो कन्द, मूल और फल से बनी आठ ग्रास-मात्र गुटिकाओं पर ही निर्वाह करते हैं, वे द्विज गुटिक कहलाते हैं।

श्लोक 69 (skanda.7.106.69)

स्वदेहदण्डनैर्युक्ता रात्रौ वीरासने स्थिताः। दंडिनस्ते समाख्याताः सर्वमेतत्तवोदितम्॥

svadehadaṇḍanairyuktā rātrau vīrāsane sthitāḥ| daṁḍinaste samākhyātāḥ sarvametattavoditam||

जो अपने शरीर को दण्डित करने में लगे रहते हैं, और रात्रि में वीरासन में स्थित रहते हैं, वे दण्डी कहलाते हैं। यह सब तुम्हें बता दिया गया।

श्लोक 70 (skanda.7.106.70)

सामान्योऽपि विशेषश्च वृत्तिनो गृहिणोऽपि वा। तेषां भेदो मया ख्याताः सम्यक्क्षेत्रनिवासिनाम्॥

sāmānyo'pi viśeṣaśca vṛttino gṛhiṇo'pi vā| teṣāṁ bhedo mayā khyātāḥ samyakkṣetranivāsinām||

सामान्य और विशेष दोनों प्रकार के, चाहे वृत्तिधारी हों या गृहस्थ हों—उन क्षेत्रवासियों के भेद मेरे द्वारा भलीभाँति बताये गये।

श्लोक 71 (skanda.7.106.71)

एवमादिधर्मयुक्ताः प्रभासक्षेत्रवासिनः। तैः पूज्यो भगवान्देवो बालरूपी पितामहः॥

evamādidharmayuktāḥ prabhāsakṣetravāsinaḥ| taiḥ pūjyo bhagavāndevo bālarūpī pitāmahaḥ||

इस प्रकार के धर्मों से युक्त, प्रभासक्षेत्र में निवास करने वाले ये विप्र ही बालरूपधारी भगवान् पितामह की पूजा करने के अधिकारी हैं।

श्लोक 72 (skanda.7.106.72)

महापातकिनो ये तु ये तु विप्रैर्बहिष्कृताः। न च ते संस्पृशेयुर्वै ब्रह्माणं बालरूपिणम्॥

mahāpātakino ye tu ye tu viprairbahiṣkṛtāḥ| na ca te saṁspṛśeyurvai brahmāṇaṁ bālarūpiṇam||

किन्तु जो महापातकी हैं, तथा जिन्हें विप्रों ने बहिष्कृत कर दिया है, वे बालरूपधारी ब्रह्मा का स्पर्श तक न करें।

श्लोक 73 (skanda.7.106.73)

ब्रह्मचारी सदा दांतो जितक्रोधो जितेंद्रियः। एवं ते ब्राह्मणाः ख्याताः क्षेत्रमध्यनिवासिनः॥

brahmacārī sadā dāṁto jitakrodho jitendriyaḥ| evaṁ te brāhmaṇāḥ khyātāḥ kṣetramadhyanivāsinaḥ||

ब्रह्मचारी, सदा संयमी, क्रोध पर विजयी तथा इन्द्रियों पर विजयी—ऐसे ही ब्राह्मण क्षेत्र के मध्य में निवास करने वाले प्रसिद्ध हैं।

श्लोक 74 (skanda.7.106.74)

तैः पूज्यो भगवान्देवो बालरूपी पितामहः। ये वेदाध्ययने युक्तास्तैः प्रपूज्यः पितामहः॥

taiḥ pūjyo bhagavāndevo bālarūpī pitāmahaḥ| ye vedādhyayane yuktāstaiḥ prapūjyaḥ pitāmahaḥ||

उन्हीं के द्वारा भगवान् देव, बालरूपधारी पितामह पूजित होते हैं। जो वेदाध्ययन में लगे रहते हैं, उन्हीं के द्वारा पितामह भलीभाँति पूजे जाते हैं।

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