प्रभास खण्ड · अध्याय 107
बालरूपिब्रह्ममाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.107.1)
ईश्वर उवाच। अथ पूजाविधानं ते कथयामि समासतः। भक्तिभेदान्पृथक्तस्य ब्रह्मणो बालरूपिणः॥
īśvara uvāca| atha pūjāvidhānaṁ te kathayāmi samāsataḥ| bhaktibhedānpṛthaktasya brahmaṇo bālarūpiṇaḥ||
ईश्वर ने कहा—अब मैं तुम्हें संक्षेप में पूजा-विधान तथा उस बालरूपधारी ब्रह्मा की भक्ति के अलग-अलग भेदों को बताता हूँ।
श्लोक 2 (skanda.7.107.2)
रथयात्राविधानं तु स्तोत्रमंत्रविधिक्रमम्। विविधा भक्तिरुद्दिष्टा मनोवाक्कायसंभवा॥
rathayātrāvidhānaṁ tu stotramaṁtravidhikramam| vividhā bhaktiruddiṣṭā manovākkāyasaṁbhavā||
रथयात्रा की विधि तथा स्तोत्र-मन्त्रों का क्रम भी बताऊँगा। भक्ति मन, वाणी और शरीर से उत्पन्न होने के कारण नाना प्रकार की बतायी गयी है।
श्लोक 3 (skanda.7.107.3)
लौकिकी वैदिकी चापि भवेदाध्यात्मिकी तथा। ध्यानधारणया या तु वेदानां स्मरणेन च। ब्रह्मप्रीतिकरी चैषा मानसी भक्तिरुच्यते॥
laukikī vaidikī cāpi bhavedādhyātmikī tathā| dhyānadhāraṇayā yā tu vedānāṁ smaraṇena ca| brahmaprītikarī caiṣā mānasī bhaktirucyate||
यह लौकिक, वैदिक और आध्यात्मिक भी होती है। ध्यान और धारणा के द्वारा तथा वेदों के स्मरण से जो ब्रह्मा को प्रसन्न करने वाली है, वह मानसी भक्ति कही जाती है।
श्लोक 4 (skanda.7.107.4)
मंत्रवेदनमस्कारैरग्निश्राद्धविधानकैः। जाप्यैश्चारण्यकैश्चैव वाचिकी भक्तिरुच्यते॥
maṁtravedanamaskārairagniśrāddhavidhānakaiḥ| jāpyaiścāraṇyakaiścaiva vācikī bhaktirucyate||
मन्त्र, वेद, नमस्कार, अग्निहोत्र और श्राद्ध के विधानों से, तथा जप और आरण्यकों के पाठ से जो भक्ति होती है, वह वाचिक भक्ति कही जाती है।
श्लोक 5 (skanda.7.107.5)
व्रतोपवासनियमैश्चितेंद्रियनिरोधिभिः। कृच्छ्रसांतपनैश्चान्यैस्तथा चांद्रायणादिभिः॥
vratopavāsaniyamaiścitendriyanirodhibhiḥ| kṛcchrasāṁtapanaiścānyaistathā cāṁdrāyaṇādibhiḥ||
व्रत, उपवास और नियमों के द्वारा, इन्द्रियों के निग्रह से युक्त कृच्छ्र, सान्तपन तथा अन्य चान्द्रायण आदि व्रतों के द्वारा—
श्लोक 6 (skanda.7.107.6)
ब्रह्मोक्तैश्चोपवासैश्च तथान्यैश्च शुभव्रतैः। कायिकी भक्तिराख्याता त्रिविधा तु द्विजन्मनाम्॥
brahmoktaiścopavāsaiśca tathānyaiśca śubhavrataiḥ| kāyikī bhaktirākhyātā trividhā tu dvijanmanām||
तथा ब्रह्मा द्वारा कहे गये उपवासों और अन्य शुभ व्रतों के द्वारा जो भक्ति होती है, वह कायिक भक्ति कही गयी है। इस प्रकार द्विजों की भक्ति तीन प्रकार की होती है।
श्लोक 7 (skanda.7.107.7)
गोघृतक्षीरदधिभिर्मध्विक्षुसुकुशोदकैः। गंधमाल्यैश्च विविधैर्वस्तुभिश्चोपपादिभिः॥
goghṛtakṣīradadhibhirmadhvikṣusukuśodakaiḥ| gaṁdhamālyaiśca vividhairvastubhiścopapādibhiḥ||
गोघृत, दूध, दही, मधु, ईख के रस और शुद्ध कुशोदक से, तथा गन्ध, मालाओं और अन्य नाना प्रकार की सहायक वस्तुओं से—
श्लोक 8 (skanda.7.107.8)
घृतगुग्गुलधूपैश्च कृष्णागुरुसुगंधिभिः। भूषणैर्हैमरत्नाद्यैश्चित्राभिः स्रग्भिरेव च॥
ghṛtagugguladhūpaiśca kṛṣṇāgurusugaṁdhibhiḥ| bhūṣaṇairhaimaratnādyaiścitrābhiḥ sragbhireva ca||
घी और गुग्गुल के धूप से, सुगन्धित कृष्ण अगर से, स्वर्ण-रत्नादि आभूषणों से, तथा नाना प्रकार की मालाओं से—
श्लोक 9 (skanda.7.107.9)
न्यासैः परिसरैः स्तोत्रैः पताकाभिस्तथोत्सवैः। नृत्यवादित्रगीतैश्च सर्ववस्तूपहारकैः॥
nyāsaiḥ parisaraiḥ stotraiḥ patākābhistathotsavaiḥ| nṛtyavāditragītaiśca sarvavastūpahārakaiḥ||
न्यास, परिक्रमा-स्थलों, स्तोत्रों, पताकाओं तथा उत्सवों से, नृत्य, वाद्य और गीतों से, और सभी प्रकार की भेंट की वस्तुओं से—
श्लोक 10 (skanda.7.107.10)
भक्ष्यभोज्यान्नपानैश्च या पूजा क्रियते नरैः। पितामहं समुद्दिश्य सा भक्तिर्लौकिकी मता॥
bhakṣyabhojyānnapānaiśca yā pūjā kriyate naraiḥ| pitāmahaṁ samuddiśya sā bhaktirlaukikī matā||
तथा खाने-पीने योग्य भक्ष्य, भोज्य, अन्न और पेय पदार्थों से मनुष्यों द्वारा पितामह को लक्ष्य करके जो पूजा की जाती है, वह लौकिकी भक्ति मानी गयी है।
श्लोक 11 (skanda.7.107.11)
वेदमंत्रहविर्भागैः क्रिया या वैदिकी स्मृता॥
vedamaṁtrahavirbhāgaiḥ kriyā yā vaidikī smṛtā||
वेद-मन्त्रों और हवि के भागों के द्वारा जो क्रिया की जाती है, वह वैदिकी भक्ति स्मृत है।
श्लोक 12 (skanda.7.107.12)
दर्शे च पौर्णमास्यां च कर्त्तव्यं चाग्निहोत्रजम्। प्राशनं दक्षिणादानं पुरोडाश इति क्रिया॥
darśe ca paurṇamāsyāṁ ca karttavyaṁ cāgnihotrajam| prāśanaṁ dakṣiṇādānaṁ puroḍāśa iti kriyā||
अमावस्या और पूर्णिमा को किया जाने वाला अग्निहोत्र-सम्बन्धी कर्म, प्राशन, दक्षिणा-दान तथा पुरोडाश—यह भी उसकी क्रिया है।
श्लोक 13 (skanda.7.107.13)
इष्टिर्धृतिः सोमपानं याज्ञियं कर्म सर्वशः। ऋग्यजुःसामजाप्यानि संहिताध्ययनानि च। क्रियते ब्रह्माणमुद्दिश्य सा भक्तिर्वैदिकोच्यते॥
iṣṭirdhṛtiḥ somapānaṁ yājñiyaṁ karma sarvaśaḥ| ṛgyajuḥsāmajāpyāni saṁhitādhyayanāni ca| kriyate brahmāṇamuddiśya sā bhaktirvaidikocyate||
इष्टि यज्ञ, धृति, सोमपान और समस्त याज्ञिक कर्म, तथा ऋक्, यजुः और साम के जप एवं संहिताओं का अध्ययन—जो यह सब ब्रह्मा को लक्ष्य करके किया जाता है, वह भक्ति वैदिकी कही जाती है।
श्लोक 14 (skanda.7.107.14)
प्राणायामपरो नित्यं ध्यानवान्विजितेंद्रियः। भैक्ष्यभक्षी व्रती चापि सर्वप्रत्याहृतेंद्रियः॥
prāṇāyāmaparo nityaṁ dhyānavānvijitendriyaḥ| bhaikṣyabhakṣī vratī cāpi sarvapratyāhṛtendriyaḥ||
जो नित्य प्राणायाम में तत्पर, ध्यानशील, इन्द्रियों को जीतने वाला है; जो भिक्षा से प्राप्त अन्न खाता है, व्रती है, और जिसकी सभी इन्द्रियाँ पूर्णतः प्रत्याहृत हैं—
श्लोक 15 (skanda.7.107.15)
धारणं हृदये कृत्वा ध्यायमानः प्रजेश्वरम्। हृत्पद्मकर्णिकासीनं रक्तवर्णं सुलोचनम्॥
dhāraṇaṁ hṛdaye kṛtvā dhyāyamānaḥ prajeśvaram| hṛtpadmakarṇikāsīnaṁ raktavarṇaṁ sulocanam||
हृदय में धारणा करके, हृदय-कमल की कर्णिका पर विराजमान, लाल वर्ण वाले, सुन्दर नेत्रों वाले प्रजापति का ध्यान करता है।
श्लोक 16 (skanda.7.107.16)
पश्यन्नुद्द्योतितमुखं ब्रह्माणं सुकटीतटम्। रक्तवर्णं चतुर्बाहुं वरदाभयहस्तकम्। एवं यश्चिंतयेद्देवं ब्रह्मभक्तः स उच्यते॥
paśyannuddyotitamukhaṁ brahmāṇaṁ sukaṭītaṭam| raktavarṇaṁ caturbāhuṁ varadābhayahastakam| evaṁ yaściṁtayeddevaṁ brahmabhaktaḥ sa ucyate||
उस ब्रह्मा को देखते हुए, जिनका मुख देदीप्यमान है, जिनकी कमर सुन्दर है, जो लाल वर्ण के, चार भुजाओं वाले, वरद और अभय मुद्रा में हाथ धारण किये हुए हैं—इस प्रकार जो देव का चिन्तन करता है, वही ब्रह्मभक्त कहा जाता है।
श्लोक 17 (skanda.7.107.17)
विधिं च शृणु मे देवि यः स्मृतः क्षेत्रवासिनाम्॥
vidhiṁ ca śṛṇu me devi yaḥ smṛtaḥ kṣetravāsinām||
हे देवि, अब मुझसे वह विधि सुनो, जो क्षेत्रवासियों के लिए स्मृत है।
श्लोक 18 (skanda.7.107.18)
निर्ममा निरहंकारा निःसंगा निष्परिग्रहाः। चतुर्वर्गेपि निःस्नेहाः समलोष्टाश्मकांचनाः॥
nirmamā nirahaṁkārā niḥsaṁgā niṣparigrahāḥ| caturvargepi niḥsnehāḥ samaloṣṭāśmakāṁcanāḥ||
वे ममता-रहित, अहंकार-रहित, संग-रहित, परिग्रह-रहित होते हैं; वे चारों पुरुषार्थों में भी स्नेह-रहित होते हैं, और मिट्टी के ढेले, पत्थर तथा सोने को समान समझते हैं।
श्लोक 19 (skanda.7.107.19)
भूतानां कर्मभिर्नित्यं त्रिविधैरभयप्रदाः। प्राणायामपरा नित्यं परध्यानपरायणाः॥
bhūtānāṁ karmabhirnityaṁ trividhairabhayapradāḥ| prāṇāyāmaparā nityaṁ paradhyānaparāyaṇāḥ||
वे अपने तीन प्रकार के कर्मों से सभी प्राणियों को सदा अभय प्रदान करने वाले हैं; वे नित्य प्राणायाम में तत्पर और परम ध्यान में लीन रहते हैं।
श्लोक 20 (skanda.7.107.20)
जापिनः शुचयो नित्यं यतिधर्मक्रियापराः। सांख्ययोगविधिज्ञा ये धर्मविच्छिन्नसंशयाः॥
jāpinaḥ śucayo nityaṁ yatidharmakriyāparāḥ| sāṁkhyayogavidhijñā ye dharmavicchinnasaṁśayāḥ||
वे नित्य जपशील, पवित्र, यति-धर्म के अनुष्ठान में तत्पर हैं; वे सांख्य और योग की विधि को जानने वाले हैं, धर्म को जानने वाले और संशय-रहित हैं।
श्लोक 21 (skanda.7.107.21)
ब्रह्मपूजारता नित्यं ते विप्राः क्षेत्रवासिनः। तैर्यथा पूजनीयो वै बालरूपी पितामहः॥
brahmapūjāratā nityaṁ te viprāḥ kṣetravāsinaḥ| tairyathā pūjanīyo vai bālarūpī pitāmahaḥ||
वे क्षेत्रवासी विप्र सदा ब्रह्मा की पूजा में रत रहते हैं। उनके द्वारा बालरूपधारी पितामह जिस प्रकार पूजनीय हैं—
श्लोक 22 (skanda.7.107.22)
तथाहं कीर्त्तयिष्यामि शृणुष्वैकमनाः प्रिये। स्नात्वा तु विमले तीर्थे शुक्लांबरधरः शुचिः। पूजोपहारसंयुक्तस्ततो ब्रह्माणमर्चयेत्॥
tathāhaṁ kīrttayiṣyāmi śṛṇuṣvaikamanāḥ priye| snātvā tu vimale tīrthe śuklāṁbaradharaḥ śuciḥ| pūjopahārasaṁyuktastato brahmāṇamarcayet||
वह मैं तुम्हें बताऊँगा, हे प्रिये, एकाग्रचित्त होकर सुनो। निर्मल तीर्थ में स्नान करके, शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण करके, पूजा-सामग्री से युक्त होकर, तत्पश्चात् ब्रह्मा का पूजन करे।
श्लोक 23 (skanda.7.107.23)
पूर्वं संस्नाप्य विधिना पंचामृतरसोदकैः। गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम्॥
pūrvaṁ saṁsnāpya vidhinā paṁcāmṛtarasodakaiḥ| gomūtraṁ gomayaṁ kṣīraṁ dadhi sarpiḥ kuśodakam||
सर्वप्रथम पंचामृत के रसों तथा जल से विधिपूर्वक स्नान कराए—गोमूत्र, गोमय, दूध, दही, घी और कुशोदक से बना पंचामृत।
श्लोक 24 (skanda.7.107.24)
गायत्र्या गृह्य गोमूत्रं गंधद्वारेति गोमयम्। आप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णेति वै दधि॥
gāyatryā gṛhya gomūtraṁ gaṁdhadvāreti gomayam| āpyāyasveti ca kṣīraṁ dadhikrāvṇeti vai dadhi||
गायत्री मन्त्र से गोमूत्र, गन्धद्वारा मन्त्र से गोमय, आप्यायस्व मन्त्र से दूध, तथा दधिक्राव्णः मन्त्र से दही ग्रहण करे।
श्लोक 25 (skanda.7.107.25)
तेजोऽसि शुक्रमित्याज्यं देवस्य त्वा कुशोदकम्। आपोहिष्ठेति मंत्रेण पंचगव्येन स्नापयेत्॥
tejo'si śukramityājyaṁ devasya tvā kuśodakam| āpohiṣṭheti maṁtreṇa paṁcagavyena snāpayet||
तेजोऽसि शुक्रम् मन्त्र से घृत, तथा देवस्य त्वा मन्त्र से कुशोदक लेकर, आपो हि ष्ठा मन्त्र से पंचगव्य द्वारा स्नान कराए।
श्लोक 26 (skanda.7.107.26)
कपिलापंचगव्येन कुशवारियुतेन च। स्नापयेन्मंत्रपूतेन ब्रह्मस्नानं हि तत्स्मृतम्॥
kapilāpaṁcagavyena kuśavāriyutena ca| snāpayenmaṁtrapūtena brahmasnānaṁ hi tatsmṛtam||
कपिला गाय के पंचगव्य से, कुश-मिश्रित जल से, मन्त्रों से पवित्र किये गये द्रव्यों से स्नान कराए—यही ब्रह्म-स्नान स्मृत है।
श्लोक 27 (skanda.7.107.27)
वर्षकोटिसहस्रैस्तु यत्पापं समुपार्जितम्। सुरज्येष्ठं तु संस्नाप्य दहेत्सर्वं न संशयः॥
varṣakoṭisahasraistu yatpāpaṁ samupārjitam| surajyeṣṭhaṁ tu saṁsnāpya dahetsarvaṁ na saṁśayaḥ||
करोड़ों-हजारों वर्षों में अर्जित किया गया जो भी पाप हो, देवताओं में श्रेष्ठ ब्रह्मा को स्नान कराकर वह सब निःसन्देह भस्म हो जाता है।
श्लोक 28 (skanda.7.107.28)
एवं संस्नाप्य विधिना ब्रह्माणं बालरूपिणम्। कर्पूरागरुतोयेन ततः संस्नापयेद्द्विजः॥
evaṁ saṁsnāpya vidhinā brahmāṇaṁ bālarūpiṇam| karpūrāgarutoyena tataḥ saṁsnāpayeddvijaḥ||
इस प्रकार विधिपूर्वक बालरूपधारी ब्रह्मा को स्नान कराकर, तत्पश्चात् द्विज कर्पूर और अगर मिश्रित जल से पुनः स्नान कराए।
श्लोक 29 (skanda.7.107.29)
एवं कृत्वार्च्चयेद्देवं गायत्रीन्यासयोगतः। मूर्ध्नः पादतलं यावत्प्रणवं विन्यसेद्बुधः॥
evaṁ kṛtvārccayeddevaṁ gāyatrīnyāsayogataḥ| mūrdhnaḥ pādatalaṁ yāvatpraṇavaṁ vinyasedbudhaḥ||
ऐसा करके गायत्री-न्यास की विधि से देव का पूजन करे। बुद्धिमान् पुरुष सिर से लेकर पैर के तलवे तक प्रणव ॐकार का न्यास करे।
श्लोक 30 (skanda.7.107.30)
तकारं विन्यसेन्मूर्ध्नि सकारं मुखमण्डले। विकारं कंठदेशे तु तुकारं चांगसंधिषु॥
takāraṁ vinyasenmūrdhni sakāraṁ mukhamaṇḍale| vikāraṁ kaṁṭhadeśe tu tukāraṁ cāṁgasaṁdhiṣu||
गायत्री मन्त्र के त अक्षर का न्यास सिर पर, स का मुख-मण्डल पर, वि का कण्ठ-प्रदेश में, तथा तु का अंग-संधियों में करे।
श्लोक 31 (skanda.7.107.31)
वकारं हृदि मध्ये तु रेकारं पार्श्वयोर्द्वयोः। णिकारं दक्षिणे कुक्षौ यकारं वामसंज्ञिते॥
vakāraṁ hṛdi madhye tu rekāraṁ pārśvayordvayoḥ| ṇikāraṁ dakṣiṇe kukṣau yakāraṁ vāmasaṁjñite||
व का न्यास हृदय के मध्य में, रे का दोनों पार्श्वों में, णि का दाहिनी कुक्षि में, तथा य का बायीं कुक्षि में करे।
श्लोक 32 (skanda.7.107.32)
भकारं कटिनाभिस्थं गोकारं पार्श्वयोर्द्वयोः। देकारं जानुनोर्न्यस्य वकारं पादपद्मयोः॥
bhakāraṁ kaṭinābhisthaṁ gokāraṁ pārśvayordvayoḥ| dekāraṁ jānunornyasya vakāraṁ pādapadmayoḥ||
भ को कमर और नाभि में स्थापित करे, गो को दोनों पार्श्वों में, दे को दोनों घुटनों में स्थापित करके, व को चरण-कमलों में स्थापित करे।
श्लोक 33 (skanda.7.107.33)
स्यकारमंगुष्ठयोर्न्यस्य धीकारमुरसि न्यसेत्। मकारं जानुमूले तु हिकारं गुह्यमाश्रितम्॥
syakāramaṁguṣṭhayornyasya dhīkāramurasi nyaset| makāraṁ jānumūle tu hikāraṁ guhyamāśritam||
स्य को दोनों अंगूठों में स्थापित करके, धी को वक्षःस्थल में स्थापित करे; म को घुटनों के मूल में, तथा हि को गुह्य-स्थान पर आश्रित करके स्थापित करे।
श्लोक 34 (skanda.7.107.34)
धिकारं हृदये न्यस्य योकारं चाधरोष्ठके। योकारं च तथैवान्यमुत्तरोष्ठे न्यसेत्सुधीः॥
dhikāraṁ hṛdaye nyasya yokāraṁ cādharoṣṭhake| yokāraṁ ca tathaivānyamuttaroṣṭhe nyasetsudhīḥ||
धि को हृदय में स्थापित करके, यो को निचले होंठ पर स्थापित करे; उसी प्रकार बुद्धिमान् पुरुष दूसरे यो को ऊपरी होंठ पर स्थापित करे।
श्लोक 35 (skanda.7.107.35)
नकारं नासिकाग्रे तु प्रकारं नेत्रमाश्रितम्। चोकारं च भ्रुवोर्मध्ये दकारं प्राणमाश्रितम्॥
nakāraṁ nāsikāgre tu prakāraṁ netramāśritam| cokāraṁ ca bhruvormadhye dakāraṁ prāṇamāśritam||
न को नासिका के अग्र भाग में, प्र को नेत्रों पर आश्रित करके स्थापित करे; चो को दोनों भौंहों के मध्य में, तथा द को प्राण पर आश्रित करके स्थापित करे।
श्लोक 36 (skanda.7.107.36)
यात्कारं च ललाटांते विन्यसेद्वै सुरेश्वरि। न्यासं कृत्वाऽऽत्मनो देहे देवे कुर्यात्तथा प्रिये॥
yātkāraṁ ca lalāṭāṁte vinyasedvai sureśvari| nyāsaṁ kṛtvātmano dehe deve kuryāttathā priye||
हे सुरेश्वरि, यात् अक्षर का न्यास ललाट के अन्त भाग में करे। हे प्रिये, इस प्रकार अपने शरीर में न्यास करके, उसी प्रकार देव की प्रतिमा में भी न्यास करे।
श्लोक 37 (skanda.7.107.37)
सर्वोपहारसंपन्नं कृत्वा सम्यङ्निरीक्षयेत्। कुंकुमागरुकर्पूरचंदनेन विमिश्रितम्॥
sarvopahārasaṁpannaṁ kṛtvā samyaṅnirīkṣayet| kuṁkumāgarukarpūracaṁdanena vimiśritam||
सभी उपहारों से सम्पन्न करके भलीभाँति निरीक्षण करे, कुंकुम, अगर, कर्पूर और चन्दन से मिश्रित द्रव्यों को तैयार करे।
श्लोक 38 (skanda.7.107.38)
गंधतोयैरुपस्कृत्य गायत्र्या प्रणवेन च। प्रोक्षयेत्सर्वद्रव्याणि पश्चादर्चनमारभेत्॥
gaṁdhatoyairupaskṛtya gāyatryā praṇavena ca| prokṣayetsarvadravyāṇi paścādarcanamārabhet||
सुगन्धित जल से युक्त करके, गायत्री तथा प्रणव मन्त्र से सभी द्रव्यों का प्रोक्षण करे, तत्पश्चात् अर्चना आरम्भ करे।
श्लोक 39 (skanda.7.107.39)
दिव्यै पुष्पैः सुगंधैश्च मालतीकमलादिभिः। अशोकैः शतपत्रैश्च बकुलैः पूजयेत्क्रमात्॥
divyai puṣpaiḥ sugaṁdhaiśca mālatīkamalādibhiḥ| aśokaiḥ śatapatraiśca bakulaiḥ pūjayetkramāt||
दिव्य और सुगन्धित पुष्पों से, मालती, कमल आदि से, अशोक, शतपत्र कमल तथा बकुल के फूलों से क्रमशः पूजन करे।
श्लोक 40 (skanda.7.107.40)
कृष्णागरुसुधूपेन घृतदीपैस्तथोत्तमैः। ततः प्रदापयेत्तत्र नैवेद्यं विविधं क्रमात्॥
kṛṣṇāgarusudhūpena ghṛtadīpaistathottamaiḥ| tataḥ pradāpayettatra naivedyaṁ vividhaṁ kramāt||
काले अगर की उत्तम धूप से तथा घृत के उत्तम दीपों से पूजन करे, तत्पश्चात् वहाँ क्रमशः नाना प्रकार के नैवेद्य अर्पित करे।
श्लोक 41 (skanda.7.107.41)
खण्डलड्डुकश्रीवेष्टकांसाराशोकपल्लवैः। स्वस्तिकोल्लिपिकादुग्धातिलवेष्टकिलाटिकाम्॥
khaṇḍalaḍḍukaśrīveṣṭakāṁsārāśokapallavaiḥ| svastikollipikādugdhātilaveṣṭakilāṭikām||
खण्ड-लड्डू, श्रीवेष्टक, आंसार, अशोक-पल्लव, स्वस्तिक, उल्लिपिका, दुग्ध, तिलवेष्टक और किलाटिका (जैसे विविध नैवेद्य अर्पित करे)।
श्लोक 42 (skanda.7.107.42)
फलानि चैव पक्वानि मूलमंत्रेण दापयेत्। ऋग्वेदं च यजुर्वेदं सामवेदं च पूजयेत्॥
phalāni caiva pakvāni mūlamaṁtreṇa dāpayet| ṛgvedaṁ ca yajurvedaṁ sāmavedaṁ ca pūjayet||
पके हुए फल भी मूल मन्त्र से अर्पित करे। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का भी पूजन करे।
श्लोक 43 (skanda.7.107.43)
ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यं धर्मं संपूजयेद्बुधः। ईशानादिक्रमाद्देवि दिशासु विदिशासु च॥
jñānaṁ vairāgyamaiśvaryaṁ dharmaṁ saṁpūjayedbudhaḥ| īśānādikramāddevi diśāsu vidiśāsu ca||
बुद्धिमान् पुरुष ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य और धर्म का भी पूजन करे। हे देवि, ईशान आदि के क्रम से दिशाओं और विदिशाओं में (इनकी स्थापना करे)।
श्लोक 44 (skanda.7.107.44)
चतुर्द्दशविद्यास्थानानि ब्रह्मणोऽग्रे प्रपूजयेत्। हृदयानि ततो न्यस्य देवस्य पुरतः क्रमात्॥
caturddaśavidyāsthānāni brahmaṇo'gre prapūjayet| hṛdayāni tato nyasya devasya purataḥ kramāt||
ब्रह्मा के सम्मुख चौदह विद्या-स्थानों का भी पूजन करे, तत्पश्चात् देव के सामने क्रमशः हृदय-मन्त्रों का न्यास करे।
श्लोक 45 (skanda.7.107.45)
आपोहिष्ठेति ऋगियं हृदयं परिकीर्त्तितम्। ऋतं सत्यं शिखा प्रोक्ता उदुत्यं नेत्रमादिशेत्॥
āpohiṣṭheti ṛgiyaṁ hṛdayaṁ parikīrttitam| ṛtaṁ satyaṁ śikhā proktā udutyaṁ netramādiśet||
आपो हि ष्ठा नामक यह ऋचा हृदय कही गयी है। ऋतं सत्यं यह शिखा कही गयी है; उदुत्यम् को नेत्र कहा गया है।
श्लोक 46 (skanda.7.107.46)
चित्रं देवानामित्येवं सर्वलोकेषु विश्रुतम्। ब्रह्मंस्ते छादयामीति कवचं समुदाहृतम्॥
citraṁ devānāmityevaṁ sarvalokeṣu viśrutam| brahmaṁste chādayāmīti kavacaṁ samudāhṛtam||
चित्रं देवानाम् नामक यह मन्त्र सभी लोकों में विख्यात है। ब्रह्मन् ते छादयामि यह कवच-मन्त्र कहा गया है।
श्लोक 47 (skanda.7.107.47)
भूर्भुवः स्वरितीरेश पूजनं परिकीर्तितम्। गायत्र्या पूजयेद्देवमोंकारेणाभिमंत्रितम्॥
bhūrbhuvaḥ svaritīreśa pūjanaṁ parikīrtitam| gāyatryā pūjayeddevamoṁkāreṇābhimaṁtritam||
हे ईश, भूर्भुवःस्वः इस मन्त्र से पूजन कहा गया है। ॐकार से अभिमन्त्रित करके गायत्री द्वारा देव का पूजन करे।
श्लोक 48 (skanda.7.107.48)
प्रणवेनापरान्सर्वानृग्वेदादीन्प्रपूजयेत्। गायत्री परमो मंत्रो वेदमाता विभावरी॥
praṇavenāparānsarvānṛgvedādīnprapūjayet| gāyatrī paramo maṁtro vedamātā vibhāvarī||
प्रणव से अन्य सभी ऋग्वेदादि का भी पूजन करे। गायत्री परम मन्त्र है, वेदों की माता है, तेजोमयी है।
श्लोक 49 (skanda.7.107.49)
गायत्र्यक्षरतत्त्वैस्तु ब्रह्माणं यस्तु पूजयेत्। उपोष्य पंचदश्यां तु स याति परमं पदम्॥
gāyatryakṣaratattvaistu brahmāṇaṁ yastu pūjayet| upoṣya paṁcadaśyāṁ tu sa yāti paramaṁ padam||
जो कोई गायत्री के अक्षर-तत्त्वों से ब्रह्मा का पूजन करता है, और पंचदशी (पूर्णिमा) को उपवास रखता है, वह परम पद को प्राप्त होता है।
श्लोक 50 (skanda.7.107.50)
संसारसागरं घोरमुत्तितीर्षुर्द्विजो यदि। प्रभासे कार्त्तिके मासि ब्रह्माणं पूजयेत्सदा॥
saṁsārasāgaraṁ ghoramuttitīrṣurdvijo yadi| prabhāse kārttike māsi brahmāṇaṁ pūjayetsadā||
यदि कोई द्विज इस घोर संसार-सागर को पार करना चाहता है, तो उसे प्रभास में कार्तिक मास में सदा ब्रह्मा का पूजन करना चाहिए।
श्लोक 51 (skanda.7.107.51)
यस्य दर्शनमात्रेण अश्वमेधफलं लभेत्। कस्तं न पूजयेद्विद्वान्प्रभासे बालरूपिणम्॥
yasya darśanamātreṇa aśvamedhaphalaṁ labhet| kastaṁ na pūjayedvidvānprabhāse bālarūpiṇam||
जिसके दर्शनमात्र से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है, प्रभास में उस बालरूपधारी को कौन विद्वान् नहीं पूजेगा?
श्लोक 52 (skanda.7.107.52)
यस्यैकदिवसप्रांते सदेवासुरमानवाः। विलयं यांति देवेशि कस्तं न प्रतिपूजयेत्॥
yasyaikadivasaprāṁte sadevāsuramānavāḥ| vilayaṁ yāṁti deveśi kastaṁ na pratipūjayet||
हे देवेशि, जिसके एक दिन के अन्त में देवता, असुर और मनुष्य सहित सब लय को प्राप्त हो जाते हैं, उसे कौन नहीं पूजेगा?
श्लोक 53 (skanda.7.107.53)
पिता यः सर्वदेवानां भूतानां च पितामहः। यस्मादेष स तैः पूज्यो ब्राह्मणैः क्षेत्रवासिभिः॥
pitā yaḥ sarvadevānāṁ bhūtānāṁ ca pitāmahaḥ| yasmādeṣa sa taiḥ pūjyo brāhmaṇaiḥ kṣetravāsibhiḥ||
जो सभी देवताओं के पिता और समस्त प्राणियों के पितामह हैं, इसीलिए वे क्षेत्रवासी ब्राह्मणों द्वारा पूजनीय हैं।
श्लोक 54 (skanda.7.107.54)
रुद्ररूपी विश्वरूपी स एव भुवनेश्वरः। पौर्णमास्यामुपोषित्वा ब्रह्माणं जगतां पतिम्। अर्चयेद्यो विधानेन सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥
rudrarūpī viśvarūpī sa eva bhuvaneśvaraḥ| paurṇamāsyāmupoṣitvā brahmāṇaṁ jagatāṁ patim| arcayedyo vidhānena so'śvamedhaphalaṁ labhet||
वे ही रुद्ररूपी, विश्वरूपी, भुवनों के ईश्वर हैं। जो पूर्णिमा को उपवास करके विधिपूर्वक जगत् के स्वामी ब्रह्मा का पूजन करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 55 (skanda.7.107.55)
कार्त्तिके मासि देवस्य रथयात्रा प्रकीर्त्तिता। यां कृत्वा मानवो भक्त्या याति ब्रह्मसलोकताम्॥
kārttike māsi devasya rathayātrā prakīrttitā| yāṁ kṛtvā mānavo bhaktyā yāti brahmasalokatām||
कार्तिक मास में इस देव की रथयात्रा कही गयी है, जिसे भक्तिपूर्वक करके मनुष्य ब्रह्मा के लोक में सहवास पाता है।
श्लोक 56 (skanda.7.107.56)
कार्त्तिके मासि देवेशि पौर्णमास्यां चतुर्मुखम्। मार्गेण चर्मणा सार्द्धं सावित्र्या च परंतपः॥
kārttike māsi deveśi paurṇamāsyāṁ caturmukham| mārgeṇa carmaṇā sārddhaṁ sāvitryā ca paraṁtapaḥ||
हे देवेशि, कार्तिक मास की पूर्णिमा को शत्रुतापन राजा चतुर्मुख ब्रह्मा को मार्ग में चर्म (चँवर) के साथ, सावित्री के साथ (रथ में विराजमान करके)—
श्लोक 57 (skanda.7.107.57)
भ्रामयेन्नगरं सर्वं नानावाद्यैः समन्वितम्। स्थापयेद्भ्रामयित्वा तु सकलं नगरं नृपः॥
bhrāmayennagaraṁ sarvaṁ nānāvādyaiḥ samanvitam| sthāpayedbhrāmayitvā tu sakalaṁ nagaraṁ nṛpaḥ||
नाना प्रकार के वाद्यों के साथ सम्पूर्ण नगर में घुमाए। सम्पूर्ण नगर में घुमाकर राजा उसे पुनः स्थापित करे।
श्लोक 58 (skanda.7.107.58)
ब्राह्मणान्भोजयित्वाग्रे शांडिलेयं प्रपूज्य च। आरोपयेद्रथे देवं पुण्यवादित्रनिःस्वनैः॥
brāhmaṇānbhojayitvāgre śāṇḍileyaṁ prapūjya ca| āropayedrathe devaṁ puṇyavāditraniḥsvanaiḥ||
पहले ब्राह्मणों को भोजन कराकर तथा शाण्डिलेय को भलीभाँति पूजकर, पुण्यदायी वाद्यों की ध्वनि के साथ देव को रथ पर आरोहण कराए।
श्लोक 59 (skanda.7.107.59)
रथाग्रे शांडिलीपुत्रं पूजयित्वा विधानतः। ब्राह्मणान्वाचयित्वा च कृत्वा पुण्याहमंगलम्॥
rathāgre śāṇḍilīputraṁ pūjayitvā vidhānataḥ| brāhmaṇānvācayitvā ca kṛtvā puṇyāhamaṁgalam||
रथ के सामने शाण्डिली-पुत्र का विधिपूर्वक पूजन करके, ब्राह्मणों से (मंगल-श्लोक) पढ़वाकर तथा पुण्याहवाचन का मंगल-कर्म कराके—
श्लोक 60 (skanda.7.107.60)
देवमारोपयित्वा तु रथे कुर्यात्प्रजागरम्। नानाविधैः प्रेक्षणकैर्ब्रह्मशेषैश्च पुष्कलैः॥
devamāropayitvā tu rathe kuryātprajāgaram| nānāvidhaiḥ prekṣaṇakairbrahmaśeṣaiśca puṣkalaiḥ||
देव को रथ पर आरोहण कराकर, नाना प्रकार के तमाशों तथा प्रचुर ब्रह्म-प्रसाद के साथ रात्रि-जागरण करे।
श्लोक 61 (skanda.7.107.61)
नारोढव्यं रथे देवि शूद्रेण शुभमिच्छता। नाधर्मेण विशेषेण मुक्त्वैकं भोजकं प्रिये॥
nāroḍhavyaṁ rathe devi śūdreṇa śubhamicchatā| nādharmeṇa viśeṣeṇa muktvaikaṁ bhojakaṁ priye||
हे देवि, कल्याण चाहने वाले शूद्र को रथ पर नहीं चढ़ना चाहिए, तथा विशेष रूप से अधर्मी को भी नहीं—हे प्रिये, केवल एक भोजक (पुजारी) को छोड़कर।
श्लोक 62 (skanda.7.107.62)
ब्रह्मणो दक्षिणे पार्श्वे सावित्रीं स्थापयेत्प्रिये। भोजकं वामपार्श्वे तु पुरतः पंकजं न्यसेत्॥
brahmaṇo dakṣiṇe pārśve sāvitrīṁ sthāpayetpriye| bhojakaṁ vāmapārśve tu purataḥ paṁkajaṁ nyaset||
हे प्रिये, ब्रह्मा के दाहिने पार्श्व में सावित्री को स्थापित करे, बायें पार्श्व में भोजक को, तथा सामने कमल को स्थापित करे।
श्लोक 63 (skanda.7.107.63)
एवं तूर्यनिनादैश्च शंखशब्दैश्च पुष्कलैः। भ्रामयित्वा रथं देवि पुरं सर्वं च दक्षिणम्। स्वस्थाने स्थापयेद्भूयः कृत्वा नीराजनं बुधः॥
evaṁ tūryaninādaiśca śaṁkhaśabdaiśca puṣkalaiḥ| bhrāmayitvā rathaṁ devi puraṁ sarvaṁ ca dakṣiṇam| svasthāne sthāpayedbhūyaḥ kṛtvā nīrājanaṁ budhaḥ||
इस प्रकार तुरही की ध्वनियों और प्रचुर शंख-नाद के साथ, हे देवि, रथ को सम्पूर्ण नगर में तथा दक्षिण दिशा में भी घुमाकर, बुद्धिमान् पुरुष नीराजन (आरती) करके पुनः उसे अपने स्थान पर स्थापित करे।
श्लोक 64 (skanda.7.107.64)
य एवं कुरुते यात्रां भक्त्या यश्चापि पश्यति। रथं वाऽऽकर्षयेद्यस्तु स गच्छेद्ब्रह्मणः पदम्॥
ya evaṁ kurute yātrāṁ bhaktyā yaścāpi paśyati| rathaṁ vākarṣayedyastu sa gacchedbrahmaṇaḥ padam||
जो इस प्रकार भक्तिपूर्वक यात्रा करता है, जो इसे देखता भी है, तथा जो रथ को खींचता है, वह ब्रह्मा के पद को प्राप्त करता है।
श्लोक 65 (skanda.7.107.65)
यो दीपं धारयेत्तत्र ब्रह्मणो रथपृष्ठगः। पदेपदेऽश्वमेधस्य स फलं विंदते महत्॥
yo dīpaṁ dhārayettatra brahmaṇo rathapṛṣṭhagaḥ| padepade'śvamedhasya sa phalaṁ viṁdate mahat||
जो ब्रह्मा के रथ के पीछे चलते हुए वहाँ दीपक धारण करता है, वह पग-पग पर अश्वमेध यज्ञ का महान् फल प्राप्त करता है।
श्लोक 66 (skanda.7.107.66)
यो न कारयते राजा रथयात्रां तु ब्रह्मणः। स पच्यते महादेवि रौरवे कालमक्षयम्॥
yo na kārayate rājā rathayātrāṁ tu brahmaṇaḥ| sa pacyate mahādevi raurave kālamakṣayam||
जो राजा ब्रह्मा की रथयात्रा नहीं कराता, हे महादेवि, वह रौरव नरक में अक्षय काल तक पचता रहता है।
श्लोक 67 (skanda.7.107.67)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन राष्ट्रस्य क्षेममिच्छता। रथयात्रां विशेषेण स्वयं राजा प्रवर्त्तयेत्॥
tasmātsarvaprayatnena rāṣṭrasya kṣemamicchatā| rathayātrāṁ viśeṣeṇa svayaṁ rājā pravarttayet||
इसलिए राष्ट्र का कल्याण चाहने वाले राजा को सम्पूर्ण प्रयत्न से, विशेष रूप से, स्वयं रथयात्रा का आयोजन करना चाहिए।
श्लोक 68 (skanda.7.107.68)
प्रतिपद्ब्राह्मणांश्चापि भोजयेद्विधिवत्सुधीः। वासोभिरहतैश्चापि गन्धमाल्यानुलेपनैः॥
pratipadbrāhmaṇāṁścāpi bhojayedvidhivatsudhīḥ| vāsobhirahataiścāpi gandhamālyānulepanaiḥ||
प्रतिपदा को बुद्धिमान् पुरुष विधिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराए, तथा उन्हें बिना सिले हुए वस्त्रों, गन्ध, मालाओं और अनुलेपन से भी सम्मानित करे।
श्लोक 69 (skanda.7.107.69)
कार्त्तिके मास्यमावास्यां यस्तु दीपप्रदीपनम्। शालायां ब्रह्मणः कुर्यात्स गच्छेत्परमं पदम्॥
kārttike māsyamāvāsyāṁ yastu dīpapradīpanam| śālāyāṁ brahmaṇaḥ kuryātsa gacchetparamaṁ padam||
जो कोई कार्तिक मास की अमावस्या को ब्रह्मा के मन्दिर में दीप-प्रज्वलन करता है, वह परम पद को प्राप्त होता है।
श्लोक 70 (skanda.7.107.70)
उत्सवेषु च सर्वेषु सर्वकाले विशेषतः। पूजयेयुरिमं विप्रा ब्रह्माणं जगतां गुरुम्॥
utsaveṣu ca sarveṣu sarvakāle viśeṣataḥ| pūjayeyurimaṁ viprā brahmāṇaṁ jagatāṁ gurum||
सभी उत्सवों में तथा सभी समयों में विशेष रूप से विप्रों को जगत् के गुरु इस ब्रह्मा का पूजन करना चाहिए।
श्लोक 71 (skanda.7.107.71)
यथाकृत्यप्रयोगेण सम्यक्छ्रद्धा समन्विताः। पूज्यो दिव्योपचारेण यथावित्तानुसारतः॥
yathākṛtyaprayogeṇa samyakchraddhā samanvitāḥ| pūjyo divyopacāreṇa yathāvittānusārataḥ||
यथोचित कृत्य के प्रयोग से, सम्यक् श्रद्धा से युक्त होकर, अपनी सामर्थ्य के अनुसार दिव्य उपचारों से उनका पूजन करना चाहिए।
श्लोक 72 (skanda.7.107.72)
एवं ते कथितं देवि पूजामाहात्म्यमुत्तमम्। प्रभासक्षेत्रमाहात्म्यं ब्रह्मणो बालरूपिणः॥
evaṁ te kathitaṁ devi pūjāmāhātmyamuttamam| prabhāsakṣetramāhātmyaṁ brahmaṇo bālarūpiṇaḥ||
हे देवि, इस प्रकार तुम्हें बालरूपधारी ब्रह्मा के पूजन का उत्तम माहात्म्य तथा प्रभासक्षेत्र का माहात्म्य बता दिया गया।
श्लोक 73 (skanda.7.107.73)
तस्याहं कथयिष्यामि नाम्नामष्टोत्तरं शतम्। प्रदत्त्वा च पठित्वा च यज्ञायुतफलं लभेत्॥
tasyāhaṁ kathayiṣyāmi nāmnāmaṣṭottaraṁ śatam| pradattvā ca paṭhitvā ca yajñāyutaphalaṁ labhet||
अब मैं उनके एक सौ आठ नामों को बताऊँगा। इन्हें दान करने और पढ़ने से मनुष्य दस हज़ार यज्ञों का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 74 (skanda.7.107.74)
गायत्र्या लक्षजाप्येन सम्यग्जप्तेन यत्फलम्। तत्फलं समवाप्नोति स्तोत्रस्यास्य उदीरणात्॥
gāyatryā lakṣajāpyena samyagjaptena yatphalam| tatphalaṁ samavāpnoti stotrasyāsya udīraṇāt||
गायत्री के एक लाख जप को भलीभाँति करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल इस स्तोत्र के उच्चारण से प्राप्त होता है।
श्लोक 75 (skanda.7.107.75)
इदं स्तोत्रवरं दिव्यं रहस्यं पापनाशनम्। न देयं दुष्टबुद्धीनां निन्दकानां तथैव च॥
idaṁ stotravaraṁ divyaṁ rahasyaṁ pāpanāśanam| na deyaṁ duṣṭabuddhīnāṁ nindakānāṁ tathaiva ca||
यह उत्तम, दिव्य, रहस्यमय स्तोत्र पापों का नाशक है। इसे दुष्ट बुद्धि वालों तथा निन्दकों को कभी नहीं देना चाहिए।
श्लोक 76 (skanda.7.107.76)
ब्राह्मणाय प्रदातव्यं श्रोत्रियाय महात्मने। विष्णुना हि पुरा पृष्टं ब्रह्मणः स्तोत्रमुत्तमम्॥
brāhmaṇāya pradātavyaṁ śrotriyāya mahātmane| viṣṇunā hi purā pṛṣṭaṁ brahmaṇaḥ stotramuttamam||
इसे श्रोत्रिय महात्मा ब्राह्मण को ही देना चाहिए। ब्रह्मा का यह उत्तम स्तोत्र पूर्वकाल में विष्णु ने ही पूछा था।
श्लोक 77 (skanda.7.107.77)
केषुकेषु च स्थानेषु देवदेव पितामह। संचिन्त्यस्तन्ममाचक्ष्व त्वं हि सर्वविदुत्तम॥
keṣukeṣu ca sthāneṣu devadeva pitāmaha| saṁcintyastanmamācakṣva tvaṁ hi sarvaviduttama||
(विष्णु ने पूछा—) हे देवदेव पितामह, किन-किन स्थानों में आप चिन्तनीय हैं, यह मुझे बताइये, क्योंकि आप सबसे बढ़कर सर्वज्ञ हैं।
श्लोक 78 (skanda.7.107.78)
ब्रह्मोवाच। पुष्करेऽहं सुरश्रेष्ठो गयायां प्रपितामहः। कान्यकुब्जे वेदगर्भो भृगुक्षेत्रे चतुर्मुखः॥
brahmovāca| puṣkare'haṁ suraśreṣṭho gayāyāṁ prapitāmahaḥ| kānyakubje vedagarbho bhṛgukṣetre caturmukhaḥ||
ब्रह्मा ने कहा—पुष्कर में मैं सुरश्रेष्ठ हूँ, गया में प्रपितामह हूँ; कान्यकुब्ज में वेदगर्भ, तथा भृगुक्षेत्र में चतुर्मुख हूँ।
श्लोक 79 (skanda.7.107.79)
कौबेर्यां सृष्टिकर्ता च नन्दिपुर्यां बृहस्पतिः। प्रभासे बालरूपी च वाराणस्यां सुरप्रियः॥
kauberyāṁ sṛṣṭikartā ca nandipuryāṁ bṛhaspatiḥ| prabhāse bālarūpī ca vārāṇasyāṁ surapriyaḥ||
कौबेरी में सृष्टिकर्ता, नन्दिपुरी में बृहस्पति; प्रभास में बालरूपी, तथा वाराणसी में सुरप्रिय हूँ।
श्लोक 80 (skanda.7.107.80)
द्वारावत्यां चक्रदेवो वैदिशे भुवनाधिपः। पौंड्रके पुण्डरीकाक्षः पीताक्षो हस्तिनापुरे॥
dvārāvatyāṁ cakradevo vaidiśe bhuvanādhipaḥ| pauṇḍrake puṇḍarīkākṣaḥ pītākṣo hastināpure||
द्वारावती में चक्रदेव, वैदिश में भुवनाधिप; पौंड्रक में पुण्डरीकाक्ष, तथा हस्तिनापुर में पीताक्ष हूँ।
श्लोक 81 (skanda.7.107.81)
जयंत्यां विजयश्चासौ जयन्तः पुरुषोत्तमे। वाडेषु पद्महस्तोऽहं तमोलिप्ते तमोनुदः॥
jayaṁtyāṁ vijayaścāsau jayantaḥ puruṣottame| vāḍeṣu padmahasto'haṁ tamolipte tamonudaḥ||
जयन्ती में विजय, पुरुषोत्तम में जयन्त; वाड में पद्महस्त, तथा तमोलिप्त में तमोनुद हूँ।
श्लोक 82 (skanda.7.107.82)
आहिच्छत्र्यां जनानंदः काञ्चीपुर्यां जनप्रियः। कर्णाटस्य पुरे ब्रह्मा ऋषिकुण्डे मुनिस्तथा॥
āhicchatryāṁ janānaṁdaḥ kāñcīpuryāṁ janapriyaḥ| karṇāṭasya pure brahmā ṛṣikuṇḍe munistathā||
आहिच्छत्र में जनानन्द, काञ्चीपुरी में जनप्रिय; कर्णाट के नगर में ब्रह्मा, तथा ऋषिकुण्ड में मुनि हूँ।
श्लोक 83 (skanda.7.107.83)
श्रीकण्ठे श्रीनिवासश्च कामरूपे शुभंकरः। उच्छ्रियाणे देवकर्त्ता स्रष्टा जालंधरे तथा॥
śrīkaṇṭhe śrīnivāsaśca kāmarūpe śubhaṁkaraḥ| ucchriyāṇe devakarttā sraṣṭā jālaṁdhare tathā||
श्रीकण्ठ में श्रीनिवास, कामरूप में शुभंकर; उच्छ्रियाण में देवकर्ता, तथा जालन्धर में स्रष्टा हूँ।
श्लोक 84 (skanda.7.107.84)
मल्लिकाख्ये तथा विष्णुर्महेन्द्रे भार्गवस्तथा। गोनर्दः स्थविराकारे ह्युज्जयिन्यां पितामहः॥
mallikākhye tathā viṣṇurmahendre bhārgavastathā| gonardaḥ sthavirākāre hyujjayinyāṁ pitāmahaḥ||
मल्लिकाख्य में विष्णु, महेन्द्र में भार्गव; स्थविराकार में गोनर्द, तथा उज्जयिनी में पितामह हूँ।
श्लोक 85 (skanda.7.107.85)
कौशांब्यां तु महादेवो ह्ययोध्यायां तु राघवः। विरंचिश्चित्रकूटे तु वाराहो विन्ध्यपर्वते॥
kauśāṁbyāṁ tu mahādevo hyayodhyāyāṁ tu rāghavaḥ| viraṁciścitrakūṭe tu vārāho vindhyaparvate||
कौशाम्बी में महादेव, अयोध्या में राघव; चित्रकूट में विरञ्चि, तथा विन्ध्य पर्वत पर वाराह हूँ।
श्लोक 86 (skanda.7.107.86)
गंगाद्वारे सुरश्रेष्ठो हिमवन्ते तु शंकरः। देहिकायां स्रुचाहस्तः पद्महस्तस्तथाऽर्बुदे॥
gaṁgādvāre suraśreṣṭho himavaṁte tu śaṁkaraḥ| dehikāyāṁ srucāhastaḥ padmahastastathā'rbude||
गंगाद्वार में सुरश्रेष्ठ, हिमालय में शंकर; देहिका में स्रुचाहस्त, तथा अर्बुद में पद्महस्त हूँ।
श्लोक 87 (skanda.7.107.87)
वृन्दावने पद्मनेत्रः कुशहस्तश्च नैमिषे। गोपक्षेत्रे च गोविन्दः सुरेन्द्रो यमुनातटे॥
vṛndāvane padmanetraḥ kuśahastaśca naimiṣe| gopakṣetre ca govindaḥ surendro yamunātaṭe||
वृन्दावन में पद्मनेत्र, नैमिष में कुशहस्त; गोपक्षेत्र में गोविन्द, तथा यमुना तट पर सुरेन्द्र हूँ।
श्लोक 88 (skanda.7.107.88)
भागीरथ्यां पद्मतनुर्जनानन्दो जनस्थले। कौंकणे च स मध्वक्षः काम्पिल्ये कनकप्रभः॥
bhāgīrathyāṁ padmatanurjanānando janasthale| kauṁkaṇe ca sa madhvakṣaḥ kāmpilye kanakaprabhaḥ||
भागीरथी में पद्मतनु, जनस्थल में जनानन्द; कोंकण में मध्वक्ष, तथा काम्पिल्य में कनकप्रभ हूँ।
श्लोक 89 (skanda.7.107.89)
खेटके चान्नदाता च शंभुश्चैव क्रतुस्थले। लंकायां चैव पौलस्त्यः काश्मीरे हंसवाहनः॥
kheṭake cānnadātā ca śaṁbhuścaiva kratusthale| laṁkāyāṁ caiva paulastyaḥ kāśmīre haṁsavāhanaḥ||
खेटक में अन्नदाता, क्रतुस्थल में शम्भु; लंका में पौलस्त्य, तथा कश्मीर में हंसवाहन हूँ।
श्लोक 90 (skanda.7.107.90)
वसिष्ठश्चार्बुदे चैव नारदश्चोत्पलावने। मेधके श्रुतिदाता च प्रयागे यजुषां पतिः॥
vasiṣṭhaścārbude caiva nāradaścotpalāvane| medhake śrutidātā ca prayāge yajuṣāṁ patiḥ||
अर्बुद में वसिष्ठ, उत्पलावन में नारद; मेधक में श्रुतिदाता, तथा प्रयाग में यजुओं का स्वामी हूँ।
श्लोक 91 (skanda.7.107.91)
शिवलिंगे सामवेदो मर्कटे च मधुप्रियः। नारायणश्च गोमन्ते विदर्भायां द्विजप्रियः॥
śivaliṁge sāmavedo markaṭe ca madhupriyaḥ| nārāyaṇaśca gomante vidarbhāyāṁ dvijapriyaḥ||
शिवलिंग में सामवेद, मर्कट में मधुप्रिय; गोमन्त में नारायण, तथा विदर्भा में द्विजप्रिय हूँ।
श्लोक 92 (skanda.7.107.92)
अंकुलके ब्रह्मगर्भो ब्रह्मवाहे सुतप्रियः। इन्द्रप्रस्थे दुराधर्षश्चंपायां सुरमर्दनः॥
aṁkulake brahmagarbho brahmavāhe sutapriyaḥ| indraprasthe durādharṣaścaṁpāyāṁ suramardanaḥ||
अंकुलक में ब्रह्मगर्भ, ब्रह्मवाह में सुतप्रिय; इन्द्रप्रस्थ में दुराधर्ष, तथा चम्पा में सुरमर्दन हूँ।
श्लोक 93 (skanda.7.107.93)
विरजायां महारूपः सुरूपो राष्ट्रवर्धने। कदंबके जनाध्यक्षो देवाध्यक्षः समस्थले॥
virajāyāṁ mahārūpaḥ surūpo rāṣṭravardhane| kadaṁbake janādhyakṣo devādhyakṣaḥ samasthale||
विरजा में महारूप, राष्ट्रवर्धन में सुरूप; कदम्बक में जनाध्यक्ष, तथा समस्थल में देवाध्यक्ष हूँ।
श्लोक 94 (skanda.7.107.94)
गंगाधरो रुद्रपीठे सुपीठे जलदः स्मृतः। त्र्यंबके त्रिपुरारिश्च श्रीशैले च त्रिलोचनः॥
gaṁgādharo rudrapīṭhe supīṭhe jaladaḥ smṛtaḥ| tryaṁbake tripurāriśca śrīśaile ca trilocanaḥ||
रुद्रपीठ में गंगाधर, सुपीठ में जलद स्मृत हूँ; त्र्यम्बक में त्रिपुरारि, तथा श्रीशैल में त्रिलोचन हूँ।
श्लोक 95 (skanda.7.107.95)
महादेवः प्लक्षपुरे कपाले वेधनाशनः। शृङ्गवेरपुरे शौरिर्निमिषे चक्रधारकः॥
mahādevaḥ plakṣapure kapāle vedhanāśanaḥ| śṛṅgaverapure śaurirnimiṣe cakradhārakaḥ||
प्लक्षपुर में महादेव, कपाल में वेधनाशन; शृङ्गवेरपुर में शौरि, तथा निमिष में चक्रधारक हूँ।
श्लोक 96 (skanda.7.107.96)
नन्दिपुर्यां विरूपाक्षो गौतमः प्लक्षपादपे। माल्यवान्हस्तिनाथे तु द्विजेन्द्रो वाचिके तथा॥
nandipuryāṁ virūpākṣo gautamaḥ plakṣapādape| mālyavānhastināthe tu dvijendro vācike tathā||
नन्दिपुरी में विरूपाक्ष, प्लक्षपादप में गौतम; हस्तिनाथ में माल्यवान्, तथा वाचिक में द्विजेन्द्र हूँ।
श्लोक 97 (skanda.7.107.97)
इन्द्रपुर्यां दिवानाथो भूतिकायां पुरंदरः। हंसबाहुश्च चन्द्रायां चंपायां गरुडप्रियः॥
indrapuryāṁ divānātho bhūtikāyāṁ puraṁdaraḥ| haṁsabāhuśca caṁdrāyāṁ caṁpāyāṁ garuḍapriyaḥ||
इन्द्रपुरी में दिवानाथ, भूतिका में पुरन्दर; चन्द्रा में हंसबाहु, तथा चम्पा में गरुडप्रिय हूँ।
श्लोक 98 (skanda.7.107.98)
महोदये महायक्षः सुयज्ञः पूतके वने। सिद्धेश्वरे शुक्लवर्णो विभायां पद्मबोधकः॥
mahodaye mahāyakṣaḥ suyajñaḥ pūtake vane| siddheśvare śuklavarṇo vibhāyāṁ padmabodhakaḥ||
महोदय में महायक्ष, पूतक वन में सुयज्ञ; सिद्धेश्वर में शुक्लवर्ण, तथा विभा में पद्मबोधक हूँ।
श्लोक 99 (skanda.7.107.99)
देवदारुवने लिंगी उदकेथ उमापतिः। विनायको मातृस्थाने अलकायां धनाधिपः॥
devadāruvane liṁgī udaketha umāpatiḥ| vināyako mātṛsthāne alakāyāṁ dhanādhipaḥ||
देवदारु वन में लिंगी, उदक में उमापति; मातृस्थान में विनायक, तथा अलका में धनाधिप हूँ।
श्लोक 100 (skanda.7.107.100)
त्रिकूटे चैव गोविंदः पाताले वासुकिस्तथा। कोविदारे युगाध्यक्षः स्त्रीराज्ये च सुरप्रियः॥
trikūṭe caiva goviṁdaḥ pātāle vāsukistathā| kovidāre yugādhyakṣaḥ strīrājye ca surapriyaḥ||
त्रिकूट में गोविन्द, पाताल में वासुकि; कोविदार में युगाध्यक्ष, तथा स्त्रीराज्य में सुरप्रिय हूँ।
श्लोक 101 (skanda.7.107.101)
पूर्णगिर्यां सुभोगश्च शाल्मल्यां तक्षकस्तथा। अमरे पापहा चैव अंबिकायां सुदर्शनः॥
pūrṇagiryāṁ subhogaśca śālmalyāṁ takṣakastathā| amare pāpahā caiva aṁbikāyāṁ sudarśanaḥ||
पूर्णगिरि में सुभोग, शाल्मली में तक्षक; अमर में पापहा, तथा अम्बिका में सुदर्शन हूँ।
श्लोक 102 (skanda.7.107.102)
नरवाप्यां महावीरः कान्तारे दुर्गनाशनः। पद्मवत्यां पद्मगृहो गगने मृगलाञ्छनः॥
naravāpyāṁ mahāvīraḥ kāntāre durganāśanaḥ| padmavatyāṁ padmagṛho gagane mṛgalāñchanaḥ||
नरवापी में महावीर, कान्तार में दुर्गनाशन; पद्मवती में पद्मगृह, तथा आकाश में मृगलाञ्छन हूँ।
श्लोक 103 (skanda.7.107.103)
अष्टोत्तरं नामशतं यत्रैतत्परिपठ्यते। तत्रैव मम सांनिध्यं त्रिसंध्यं मधुसूदन॥
aṣṭottaraṁ nāmaśataṁ yatraitatparipaṭhyate| tatraiva mama sāṁnidhyaṁ trisaṁdhyaṁ madhusūdana||
हे मधुसूदन, जहाँ भी यह एक सौ आठ नामों वाला स्तोत्र पढ़ा जाता है, वहीं तीनों संध्याओं में मेरी सांनिध्य रहती है।
श्लोक 104 (skanda.7.107.104)
तेषामपि यस्त्वेकं पश्येद्वै बालरूपिणम्। सर्वेषां लभते पुण्यं पूर्वोक्तानां च वेधसाम्॥
teṣāmapi yastvekaṁ paśyedvai bālarūpiṇam| sarveṣāṁ labhate puṇyaṁ pūrvoktānāṁ ca vedhasām||
इनमें से भी जो कोई एक बालरूपधारी विधाता का दर्शन करता है, वह पूर्वोक्त सभी विधाताओं के पुण्य को प्राप्त करता है।
श्लोक 105 (skanda.7.107.105)
एतैर्यो नामभिः कृष्ण प्रभासे स्तौति मां सदा। स्थानं मे विजयं लब्ध्वा मोदते शाश्वतीः समाः॥
etairyo nāmabhiḥ kṛṣṇa prabhāse stauti māṁ sadā| sthānaṁ me vijayaṁ labdhvā modate śāśvatīḥ samāḥ||
हे कृष्ण, जो इन नामों से प्रभास में सदा मेरी स्तुति करता है, वह मेरे विजय-स्थान को प्राप्त करके शाश्वत वर्षों तक आनन्दित रहता है।
श्लोक 106 (skanda.7.107.106)
मानसं वाचिकं चैव कायिकं चैव दुष्कृतम्। तत्सर्वं नाशमायाति मम स्तोत्रानुकीर्तनात्॥
mānasaṁ vācikaṁ caiva kāyikaṁ caiva duṣkṛtam| tatsarvaṁ nāśamāyāti mama stotrānukīrtanāt||
मन, वाणी और शरीर से किये गये जो भी दुष्कृत हैं, वे सब मेरे इस स्तोत्र के अनुकीर्तन से नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 107 (skanda.7.107.107)
पुष्पोपहारैर्धूपैश्च ब्राह्मणानां च तर्पणैः। ध्यानेन च स्थिरेणाशु प्राप्यते यत्फलं नरैः। तत्फलं समवाप्नोति मम स्तोत्रानुकीर्तनात्॥
puṣpopahārairdhūpaiśca brāhmaṇānāṁ ca tarpaṇaiḥ| dhyānena ca sthireṇāśu prāpyate yatphalaṁ naraiḥ| tatphalaṁ samavāpnoti mama stotrānukīrtanāt||
पुष्प-उपहार, धूप, ब्राह्मणों के तर्पण, तथा स्थिर ध्यान के द्वारा मनुष्यों को जो फल शीघ्र प्राप्त होता है, वही फल इस मेरे स्तोत्र के अनुकीर्तन से प्राप्त होता है।
श्लोक 108 (skanda.7.107.108)
ब्रह्महत्यादिपापानि इह लोके कृतान्यपि। अकामतः कामतो वा तानि नश्यंति तत्क्षणात्॥
brahmahatyādipāpāni iha loke kṛtānyapi| akāmataḥ kāmato vā tāni naśyaṁti tatkṣaṇāt||
इस लोक में किये गये ब्रह्महत्या आदि पाप भी, चाहे अनजाने में हुए हों या जानबूझकर, वे तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 109 (skanda.7.107.109)
इदं स्तोत्रं ममाभीष्टं शृणुयाद्वा पठेच्च वा। स मुक्तः पातकैः सर्वैः प्राप्नुयान्महदीप्सितम्॥
idaṁ stotraṁ mamābhīṣṭaṁ śṛṇuyādvā paṭhecca vā| sa muktaḥ pātakaiḥ sarvaiḥ prāpnuyānmahadīpsitam||
जो इस मुझे अत्यन्त प्रिय स्तोत्र को सुने अथवा पढ़े, वह सभी पापों से मुक्त होकर महान् इच्छित वस्तु को प्राप्त करता है।
श्लोक 110 (skanda.7.107.110)
अन्यद्रहस्यं ते वच्मि शृणु कृष्ण यथार्थतः॥
anyadrahasyaṁ te vacmi śṛṇu kṛṣṇa yathārthataḥ||
हे कृष्ण, अब मैं तुम्हें एक और रहस्य बताता हूँ, उसे यथार्थ रूप से सुनो।
श्लोक 111 (skanda.7.107.111)
आग्नेयं तु यदा ऋक्षं कार्तिक्यां भवति क्वचित्। महती सा तिथिर्ज्ञेया प्रभासे मम वल्लभा॥
āgneyaṁ tu yadā ṛkṣaṁ kārtikyāṁ bhavati kvacit| mahatī sā tithirjñeyā prabhāse mama vallabhā||
जब कभी कार्तिकी पूर्णिमा को कृत्तिका नक्षत्र (आग्नेय) पड़ता है, वह तिथि महती जाननी चाहिए, जो प्रभास में मुझे अत्यन्त प्रिय है।
श्लोक 112 (skanda.7.107.112)
प्राजापत्यं यदा ऋक्षं तिथौ तस्यां भवेद्यदि। सा महाकार्तिकी पुण्या देवानामपि दुर्लभा॥
prājāpatyaṁ yadā ṛkṣaṁ tithau tasyāṁ bhavedyadi| sā mahākārtikī puṇyā devānāmapi durlabhā||
यदि उसी तिथि पर प्राजापत्य नक्षत्र (रोहिणी) भी पड़ जाए, तो वह महाकार्तिकी अत्यन्त पुण्यदायी होती है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।
श्लोक 113 (skanda.7.107.113)
मंदे वार्के गुरौ वाऽपि कार्तिकी कृत्तिकायुता। तत्राश्वमेधिकं पुण्यं दृष्ट्वा वै बालरूपिणम्॥
maṁde vārke gurau vā'pi kārtikī kṛttikāyutā| tatrāśvamedhikaṁ puṇyaṁ dṛṣṭvā vai bālarūpiṇam||
शनिवार, रविवार या गुरुवार को यदि कृत्तिका-युक्त कार्तिकी पड़े, तो वहाँ उस बालरूपधारी के दर्शन से अश्वमेध यज्ञ का पुण्य प्राप्त होता है।
श्लोक 114 (skanda.7.107.114)
विशाखासु यदा सूर्यः कृत्तिकासु च चन्द्रमाः। स योगः पद्मको नाम प्रभासे दुर्लभो हरे॥
viśākhāsu yadā sūryaḥ kṛttikāsu ca candramāḥ| sa yogaḥ padmako nāma prabhāse durlabho hare||
हे हरि, जब सूर्य विशाखा नक्षत्र में और चन्द्रमा कृत्तिका नक्षत्र में हो, वह योग 'पद्मक' नाम से जाना जाता है, जो प्रभास में दुर्लभ है।
श्लोक 115 (skanda.7.107.115)
तस्मिन्योगे नरो दृष्ट्वा प्रभासे बालरूपिणम्। पापकोटियुतो वाऽपि यमलोकं न पश्यति॥
tasminyoge naro dṛṣṭvā prabhāse bālarūpiṇam| pāpakoṭiyuto vā'pi yamalokaṁ na paśyati||
उस योग में प्रभास में बालरूपधारी का दर्शन करके मनुष्य, चाहे वह करोड़ों पापों से युक्त ही क्यों न हो, यमलोक को नहीं देखता।
श्लोक 116 (skanda.7.107.116)
ईश्वर उवाच। इत्येवं कथितं स्तोत्रं ब्रह्मणा हरये पुनः। मया तव समाख्यातं माहात्म्यं ब्रह्मदैवतम्॥
īśvara uvāca| ityevaṁ kathitaṁ stotraṁ brahmaṇā haraye punaḥ| mayā tava samākhyātaṁ māhātmyaṁ brahmadaivatam||
ईश्वर ने कहा—इस प्रकार यह स्तोत्र ब्रह्मा ने पुनः हरि को कहा था। मैंने तुम्हें यह ब्रह्मा-सम्बन्धी माहात्म्य बता दिया।
श्लोक 117 (skanda.7.107.117)
सर्वपापहरं नृणां श्रुतं सर्वार्थसाधकम्। भूमिदानं च दातव्यं तत्र यात्राफलेप्सुभिः॥
sarvapāpaharaṁ nṛṇāṁ śrutaṁ sarvārthasādhakam| bhūmidānaṁ ca dātavyaṁ tatra yātrāphalepsubhiḥ||
यह सुना जाने पर मनुष्यों के सभी पापों का नाशक है, तथा सभी प्रयोजनों को सिद्ध करने वाला है। वहाँ यात्रा का फल चाहने वालों को भूमि-दान भी करना चाहिए।
श्लोक 118 (skanda.7.107.118)
कमंडलुः श्वेतवस्त्रं महादानानि षोडश। तत्रैव देवि देयानि ब्रह्मणे बालरूपिणे॥
kamaṁḍaluḥ śvetavastraṁ mahādānāni ṣoḍaśa| tatraiva devi deyāni brahmaṇe bālarūpiṇe||
हे देवि, वहीं बालरूपधारी ब्रह्मा को कमण्डलु, श्वेत वस्त्र तथा सोलह महादान भी देने चाहिए।
श्लोक 119 (skanda.7.107.119)
महापर्वणि संप्राप्ते कुर्युः पारायणं द्विजाः। सर्वे ते ब्राह्मणा देवि क्षेत्रमध्यनिवासिनः॥
mahāparvaṇi saṁprāpte kuryuḥ pārāyaṇaṁ dvijāḥ| sarve te brāhmaṇā devi kṣetramadhyanivāsinaḥ||
हे देवि, महापर्व आने पर क्षेत्र के मध्य में निवास करने वाले वे सभी द्विज इसका पारायण (सम्पूर्ण पाठ) करें।