प्रभास खण्ड · अध्याय 108
प्रत्यूषेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.108.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि वसूनां लिंगमुत्तमम्। सोमेशादीशदिग्भागे पञ्चाशद्धनुषान्तरे॥
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi vasūnāṁ liṁgamuttamam| someśādīśadigbhāge pañcāśaddhanuṣāntare||
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, उसके पश्चात् वसुओं के उत्तम लिंग की ओर जाना चाहिए, जो सोमेश से ईशान दिशा में पचास धनुष की दूरी पर स्थित है।
श्लोक 2 (skanda.7.108.2)
स्थितं लिंगं महादेवि चतुर्वक्त्रं सुरप्रियम्। प्रत्यूषेश्वरनामानं महापातकनाशनम्॥
sthitaṁ liṁgaṁ mahādevi caturvaktraṁ surapriyam| pratyūṣeśvaranāmānaṁ mahāpātakanāśanam||
हे महादेवि, वहाँ स्थित लिंग चार मुखों वाला, देवताओं का प्रिय, तथा प्रत्यूषेश्वर नाम वाला है, जो महापातकों का नाशक है।
श्लोक 3 (skanda.7.108.3)
दर्शनात्तस्य देवस्य सप्तजन्मान्तरोद्भवम्। पापं प्रणाशमायाति सत्यंसत्यं वरानने॥
darśanāttasya devasya saptajanmāntarodbhavam| pāpaṁ praṇāśamāyāti satyaṁsatyaṁ varānane||
हे वरानने, उस देव के दर्शन से सात जन्मों में उत्पन्न हुआ पाप भी नष्ट हो जाता है—यह सत्य है, सत्य है।
श्लोक 4 (skanda.7.108.4)
देव्युवाच। कोऽसौ प्रत्यूषनामेति कथं लिंगं प्रतिष्ठितम्। कस्य पुत्रः स विख्यात एतन्मे वद शंकर॥
devyuvāca| ko'sau pratyūṣanāmeti kathaṁ liṁgaṁ pratiṣṭhitam| kasya putraḥ sa vikhyāta etanme vada śaṁkara||
देवी ने कहा—यह प्रत्यूष नाम वाले कौन हैं, और यह लिंग कैसे प्रतिष्ठित हुआ? वे किसके प्रसिद्ध पुत्र हैं—हे शंकर, यह मुझे बताइये।
श्लोक 5 (skanda.7.108.5)
ईश्वर उवाच। दक्षो ब्रह्मसुतो देवि प्रजापतिरिति स्मृतः। तस्य कन्याः पुरा षष्टिर्ददौ धर्माय वै दश॥
īśvara uvāca| dakṣo brahmasuto devi prajāpatiriti smṛtaḥ| tasya kanyāḥ purā ṣaṣṭirdadau dharmāya vai daśa||
ईश्वर ने कहा—हे देवि, ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति नाम से स्मृत हैं। उनकी साठ कन्याएँ थीं, जिनमें से दस उन्होंने पूर्वकाल में धर्म को दी थीं।
श्लोक 6 (skanda.7.108.6)
तासां मध्ये महादेवि एका विश्वेति विश्रुता। सा धर्माच्च महादेवि अष्टावजनयत्सुतान्॥
tāsāṁ madhye mahādevi ekā viśveti viśrutā| sā dharmācca mahādevi aṣṭāvajanayatsutān||
हे महादेवि, उनमें से एक विश्वा नाम से विख्यात थी। हे महादेवि, उसने धर्म से आठ पुत्रों को जन्म दिया।
श्लोक 7 (skanda.7.108.7)
आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवाऽनलोऽनिलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः॥
āpo dhruvaśca somaśca dharaścaivā'nalo'nilaḥ| pratyūṣaśca prabhāsaśca vasavo'ṣṭau prakīrtitāḥ||
आप, ध्रुव, सोम, धर, अनल, अनिल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं।
श्लोक 8 (skanda.7.108.8)
तेषां मध्ये सप्तमोऽसौ प्रत्यूष इति विश्रुतः। स पुत्रकामो देवेशि प्रभासं क्षेत्रमागतः॥
teṣāṁ madhye saptamo'sau pratyūṣa iti viśrutaḥ| sa putrakāmo deveśi prabhāsaṁ kṣetramāgataḥ||
उनमें से सातवाँ वह प्रत्यूष नाम से विख्यात है। हे देवेशि, पुत्र की कामना से वह प्रभास क्षेत्र में आया।
श्लोक 9 (skanda.7.108.9)
स ज्ञात्वा कामिकं क्षेत्रं प्रतिष्ठाप्य महेश्वरम्। तपश्चचार विपुलं दिव्यं वर्षशतं प्रिये। ध्यायन्देवं महादेवं शान्तस्तद्गतमानसः॥
sa jñātvā kāmikaṁ kṣetraṁ pratiṣṭhāpya maheśvaram| tapaścacāra vipulaṁ divyaṁ varṣaśataṁ priye| dhyāyandevaṁ mahādevaṁ śāntastadgatamānasaḥ||
वह इस क्षेत्र को कामनाओं को पूर्ण करने वाला जानकर, महेश्वर की प्रतिष्ठा करके, हे प्रिये, एक सौ दिव्य वर्षों तक विपुल तपस्या करता रहा, शान्त होकर उसी में मन लगाकर महादेव का ध्यान करता हुआ।
श्लोक 10 (skanda.7.108.10)
ततस्तुष्टो महादेवस्तस्य भक्त्या निरञ्जनः। ददौ तस्य सुतं देवि देवलं योगिनां वरम्॥
tatastuṣṭo mahādevastasya bhaktyā nirañjanaḥ| dadau tasya sutaṁ devi devalaṁ yogināṁ varam||
तब उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर, निष्कलंक महादेव ने उसे, हे देवि, योगियों में श्रेष्ठ देवल नामक पुत्र प्रदान किया।
श्लोक 11 (skanda.7.108.11)
ततः प्रभृति देवेशि तल्लिंगस्य प्रभावतः। देवलो भगवान्योगी प्रत्यूषस्याऽभवत्सुतः॥
tataḥ prabhṛti deveśi talliṁgasya prabhāvataḥ| devalo bhagavānyogī pratyūṣasyā'bhavatsutaḥ||
हे देवेशि, तभी से उस लिंग के प्रभाव से भगवान् योगी देवल प्रत्यूष के पुत्र हुए।
श्लोक 12 (skanda.7.108.12)
अनेन कारणेनासौ प्रत्यूषेश्वरसंज्ञितः॥
anena kāraṇenāsau pratyūṣeśvarasaṁjñitaḥ||
इसी कारण से वह लिंग प्रत्यूषेश्वर नाम से संज्ञित हुआ।
श्लोक 13 (skanda.7.108.13)
यश्चानपत्यः पुरुषस्तं समाराधयिष्यति। तस्यान्ववाये देवेशि संततिर्न विनश्यति॥
yaścānapatyaḥ puruṣastaṁ samārādhayiṣyati| tasyānvavāye deveśi saṁtatirna vinaśyati||
हे देवेशि, जो सन्तानहीन पुरुष उसकी आराधना करेगा, उसके वंश में सन्तान का नाश नहीं होगा।
श्लोक 14 (skanda.7.108.14)
यः प्रत्यूषे महादेवि प्रत्यूषेश्वरमुत्तमम्। पूजयिष्यति सद्भक्त्या सततं नियतात्मवान्। तस्यैष्यति क्षयं पापमपि ब्रह्मवधोद्भवम्॥
yaḥ pratyūṣe mahādevi pratyūṣeśvaramuttamam| pūjayiṣyati sadbhaktyā satataṁ niyatātmavān| tasyaiṣyati kṣayaṁ pāpamapi brahmavadhodbhavam||
हे महादेवि, जो संयमी पुरुष प्रत्यूष तिथि पर उत्तम प्रत्यूषेश्वर की सच्ची भक्ति से सतत पूजा करेगा, उसका ब्रह्महत्या से उत्पन्न पाप भी क्षीण हो जाएगा।
श्लोक 15 (skanda.7.108.15)
वृषस्तत्रैव दातव्यः सम्यग्यात्राफलेप्सुभिः॥
vṛṣastatraiva dātavyaḥ samyagyātrāphalepsubhiḥ||
वहीं यात्रा का सम्पूर्ण फल चाहने वालों को बैल का दान करना चाहिए।
श्लोक 16 (skanda.7.108.16)
माघे कृष्णचतुर्द्दश्यां जागृयात्तत्र वै निशि। सर्वेषां दानयज्ञानां फलं जागरणाल्लभेत्॥
māghe kṛṣṇacaturddaśyāṁ jāgṛyāttatra vai niśi| sarveṣāṁ dānayajñānāṁ phalaṁ jāgaraṇāllabhet||
माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी को वहाँ रात्रि में जागरण करना चाहिए; उस जागरण से सभी दानों और यज्ञों का फल प्राप्त होता है।