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प्रभास खण्ड · अध्याय 109

अनिलेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 108अध्याय-सूचीअध्याय 110

श्लोक 1 (skanda.7.109.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि अनिलेश्वरमुत्तमम्। तस्योत्तरेशानदिक्स्थं धनुषां त्रितये प्रिये॥

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi anileśvaramuttamam| tasyottareśānadiksthaṁ dhanuṣāṁ tritaye priye||

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, उसके पश्चात् उत्तम अनिलेश्वर तीर्थ की ओर जाना चाहिए। हे प्रिये, यह उससे उत्तर-ईशान दिशा में तीन धनुष की दूरी पर स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.109.2)

लिंगं महाप्रभावं हि दर्शनात्पापनाशनम्। वसूनां पञ्चमो योऽसावनिलः परिकीर्तितः॥

liṁgaṁ mahāprabhāvaṁ hi darśanātpāpanāśanam| vasūnāṁ pañcamo yo'sāvanilaḥ parikīrtitaḥ||

वह लिंग अत्यन्त प्रभावशाली है, जिसके दर्शन से पापों का नाश होता है। वसुओं में जो पाँचवाँ है, वह अनिल कहा गया है।

श्लोक 3 (skanda.7.109.3)

स चाऽऽराध्य महादेवं प्रत्यक्षीकृतवान्भवम्। लिंगं प्रतिष्ठयामास सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः॥

sa cā''rādhya mahādevaṁ pratyakṣīkṛtavānbhavam| liṁgaṁ pratiṣṭhayāmāsa samyakchraddhāsamanvitaḥ||

उसने महादेव की आराधना करके भव शिव को साक्षात् किया, और सम्यक् श्रद्धा से युक्त होकर उस लिंग की प्रतिष्ठा की।

श्लोक 4 (skanda.7.109.4)

एवमीशप्रभावेन सुतस्तस्याऽप्यभूद्बली। मनोजवेति विख्यातो ह्यविज्ञातगतिस्तथा॥

evamīśaprabhāvena sutastasyā'pyabhūdbalī| manojaveti vikhyāto hyavijñātagatistathā||

इस प्रकार ईश शिव के प्रभाव से उसका भी एक बलवान् पुत्र हुआ, जो मनोजव नाम से विख्यात हुआ, और जिसकी गति किसी को ज्ञात नहीं थी।

श्लोक 5 (skanda.7.109.5)

तं दृष्ट्वा व्याधिना मर्त्यो पीड्यते न कदाचन। नान्धो न बधिरो मूको न रोगी न च निर्धनः। कदाचिज्जायते मर्त्यस्तेन दृष्टेन भूतले॥

taṁ dṛṣṭvā vyādhinā martyo pīḍyate na kadācana| nāndho na badhiro mūko na rogī na ca nirdhanaḥ| kadācijjāyate martyastena dṛṣṭena bhūtale||

उसका दर्शन करके मनुष्य कभी भी व्याधि से पीड़ित नहीं होता। उसके दर्शन से इस भूतल पर मनुष्य कभी अन्धा, बहरा, गूँगा, रोगी अथवा निर्धन नहीं होता।

श्लोक 6 (skanda.7.109.6)

पुष्पमेकं तु यो दद्यात्तस्य लिंगस्य चोपरि। सुखसौभाग्यसंपन्नः स सदा रूपवान्भवेत्॥

puṣpamekaṁ tu yo dadyāttasya liṁgasya copari| sukhasaubhāgyasaṁpannaḥ sa sadā rūpavānbhavet||

जो कोई इस लिंग के ऊपर एक भी पुष्प अर्पित करता है, वह सुख और सौभाग्य से सम्पन्न होकर सदा रूपवान् होता है।

श्लोक 7 (skanda.7.109.7)

इत्येवं कथितं देवि माहात्म्यं पापनाशनम्। श्रुत्वाऽनुमोद्य भावेन सर्वकामैः समृद्ध्यते॥

ityevaṁ kathitaṁ devi māhātmyaṁ pāpanāśanam| śrutvā'numodya bhāvena sarvakāmaiḥ samṛddhyate||

हे देवि, इस प्रकार यह पापनाशक माहात्म्य कहा गया। इसे सुनकर, भावपूर्वक अनुमोदन करने से मनुष्य सभी कामनाओं से समृद्ध हो जाता है।

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