प्रभास खण्ड · अध्याय 110
प्रभासेश्वर माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.7.110.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेद्वरारोहे प्रभासेश्वरमुत्तमम्। गौरीतपोवनाद्देवि पश्चिमे समुदाहृतम्॥
īśvara uvāca| tato gacchedvarārohe prabhāseśvaramuttamam| gaurītapovanāddevi paścime samudāhṛtam||
ईश्वर ने कहा—हे वरारोहे, उसके पश्चात् उत्तम प्रभासेश्वर के पास जाना चाहिए, जो हे देवि, गौरी के तपोवन से पश्चिम दिशा में स्थित बताया गया है।
श्लोक 2 (skanda.7.110.2)
धनुषां सप्तके देवि नातिदूरे व्यवस्थितम्। स्थापितं तन्महालिंगं वसूनामष्टमेन हि॥
dhanuṣāṃ saptake devi nātidūre vyavasthitam| sthāpitaṃ tanmahāliṃgaṃ vasūnāmaṣṭamena hi||
हे देवि, वह सात धनुष की दूरी पर, अधिक दूर नहीं, स्थित है; वह महालिंग वसुओं में आठवें वसु के द्वारा स्थापित किया गया था।
श्लोक 3 (skanda.7.110.3)
प्रभास इति नाम्ना हि शिवपूजारतेन वै। स पुत्रकामो देवेशि प्रभासक्षेत्रमागतः॥
prabhāsa iti nāmnā hi śivapūjāratena vai| sa putrakāmo deveśi prabhāsakṣetramāgataḥ||
प्रभास नामक वह वसु शिवपूजा में सदा रत रहता था; हे देवेशि, पुत्र की कामना से वह प्रभासक्षेत्र में आया।
श्लोक 4 (skanda.7.110.4)
प्रतिष्ठाप्य महालिङ्गं चचार विपुलं तपः। आग्नेयमिति विख्यातं दिव्याब्दानां शतं प्रिये॥
pratiṣṭhāpya mahāliṅgaṃ cacāra vipulaṃ tapaḥ| āgneyamiti vikhyātaṃ divyābdānāṃ śataṃ priye||
हे प्रिये, उस महालिंग की स्थापना करके, जो आग्नेय नाम से विख्यात हुआ, उसने सौ दिव्य वर्षों तक विशाल तपस्या की।
श्लोक 5 (skanda.7.110.5)
ततस्तस्य महादेवि सम्यक्छ्रद्धान्वितस्य वै। तुतोष भगवान्रुद्रो ददौ यन्मनसीप्सितम्॥
tatastasya mahādevi samyakchraddhānvitasya vai| tutoṣa bhagavānrudro dadau yanmanasīpsitam||
हे महादेवि, तब सम्यक् श्रद्धा से युक्त उसकी तपस्या से भगवान् रुद्र संतुष्ट हुए और उसके मन में जो अभीष्ट था, वह प्रदान किया।
श्लोक 6 (skanda.7.110.6)
बृहस्पतेस्तु भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी। प्रभासस्य तु सा भार्या वसूनामष्टमस्य च॥
bṛhaspatestu bhaginī bhuvanā brahmavādinī| prabhāsasya tu sā bhāryā vasūnāmaṣṭamasya ca||
ब्रह्मज्ञान की वक्ता बृहस्पति की बहन भुवना, वसुओं में आठवें प्रभास की पत्नी बनी।
श्लोक 7 (skanda.7.110.7)
विश्वकर्मा सुतस्तस्याः सृष्टिकर्ता प्रजापतिः। देवानां तक्षको विद्वान्मनोर्मातामहः स्मृतः॥
viśvakarmā sutastasyāḥ sṛṣṭikartā prajāpatiḥ| devānāṃ takṣako vidvānmanormātāmahaḥ smṛtaḥ||
उसका पुत्र विश्वकर्मा हुआ, जो सृष्टि करने वाला प्रजापति, देवताओं का विद्वान् शिल्पी और मनु का नाना कहा गया है।
श्लोक 8 (skanda.7.110.8)
तक्षकः सूर्यबिंबस्य तेजसः शातनो महान्। एवं तस्याऽभवत्पुत्रो वसूनामष्टमस्य वै॥
takṣakaḥ sūryabiṃbasya tejasaḥ śātano mahān| evaṃ tasyā'bhavatputro vasūnāmaṣṭamasya vai||
वही सूर्यमण्डल के तेज को घटाने वाला महान् शिल्पी था; इस प्रकार वह वसुओं में आठवें प्रभास का पुत्र हुआ।
श्लोक 9 (skanda.7.110.9)
प्रभासनाम्नो देवेशि तल्लिंगाराधनोद्यतः। इति ते कथितं देवि प्रभासेश्वरसूचकम्॥
prabhāsanāmno deveśi talliṃgārādhanodyataḥ| iti te kathitaṃ devi prabhāseśvarasūcakam||
हे देवेशि, वह प्रभास नामक वसु उस लिंग की आराधना में सदा तत्पर रहा। इस प्रकार, हे देवि, तुम्हें प्रभासेश्वर का यह परिचायक वृत्तान्त कहा गया।
श्लोक 10 (skanda.7.110.10)
माहात्म्यं सर्वपापघ्नं सर्वकामप्रदं शुभम्। यस्तं पूजयते भक्त्या सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः॥
māhātmyaṃ sarvapāpaghnaṃ sarvakāmapradaṃ śubham| yastaṃ pūjayate bhaktyā samyakchraddhāsamanvitaḥ||
यह माहात्म्य सब पापों का नाश करने वाला, सब कामनाओं को देने वाला और शुभ है। जो भक्ति और सम्यक् श्रद्धा से युक्त होकर उसकी पूजा करता है,
श्लोक 11 (skanda.7.110.11)
भूमिशायी निराहारो जपन्वै शतरुद्रियम्। माघे मासि चतुर्दश्यां स्नात्वा सागरसंगमे॥
bhūmiśāyī nirāhāro japanvai śatarudriyam| māghe māsi caturdaśyāṃ snātvā sāgarasaṃgame||
भूमि पर शयन करते हुए, निराहार रहकर शतरुद्रिय का जप करते हुए, माघ मास की चतुर्दशी को समुद्र-संगम में स्नान करके—
श्लोक 12 (skanda.7.110.12)
पंचामृतेन संस्नाप्य पूजयित्वा विधानतः॥
paṃcāmṛtena saṃsnāpya pūjayitvā vidhānataḥ||
पंचामृत से अभिषेक करके और विधिपूर्वक पूजा करके—
श्लोक 13 (skanda.7.110.13)
य एवं कुरुते देवि सम्यग्यात्रामहोत्सवम्। स मुक्तः पातकैः सर्वैः सर्वकामैः समृद्ध्यते। वृषस्तत्रैव दातव्यः सम्यग्यात्राफलेप्सुभिः॥
ya evaṃ kurute devi samyagyātrāmahotsavam| sa muktaḥ pātakaiḥ sarvaiḥ sarvakāmaiḥ samṛddhyate| vṛṣastatraiva dātavyaḥ samyagyātrāphalepsubhiḥ||
हे देवि, जो इस प्रकार सम्यक् यात्रा-महोत्सव करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर सब कामनाओं से समृद्ध होता है। यात्रा का सम्पूर्ण फल चाहने वालों को वहाँ बैल का दान अवश्य करना चाहिए।