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प्रभास खण्ड · अध्याय 115

पुष्करेश्वर माहात्म्य

अध्याय 114अध्याय-सूचीअध्याय 116

श्लोक 1 (skanda.7.115.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि पुष्करेश्वरमुत्तमम्। तस्यैव दक्षिणे भागे जानकीश्वरमुत्तमम्॥

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi puṣkareśvaramuttamam| tasyaiva dakṣiṇe bhāge jānakīśvaramuttamam||

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, उसके पश्चात् उत्तम पुष्करेश्वर की ओर जाना चाहिए, जो उत्तम जानकीश्वर के दक्षिण भाग में स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.115.2)

लिंगं महाप्रभावं तु ब्रह्मपुत्रेण पूजितम्। सनत्कुमारमुनिना श्रद्धया हेम पुष्करैः॥

liṃgaṃ mahāprabhāvaṃ tu brahmaputreṇa pūjitam| sanatkumāramuninā śraddhayā hema puṣkaraiḥ||

वह अत्यन्त प्रभावशाली लिंग ब्रह्मा के पुत्र मुनि सनत्कुमार के द्वारा श्रद्धापूर्वक सुवर्ण-कमलों से पूजित हुआ।

श्लोक 3 (skanda.7.115.3)

पूजितं तद्विधानेन तेन तत्पुष्करेश्वरम्। ख्यातं तत्र वरारोहे सर्वपातकनाशनम्॥

pūjitaṃ tadvidhānena tena tatpuṣkareśvaram| khyātaṃ tatra varārohe sarvapātakanāśanam||

उसके द्वारा विधिपूर्वक पूजित होने से ही वह पुष्करेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुआ; हे वरारोहे, वह वहाँ सब पातकों का नाशक कहलाया।

श्लोक 4 (skanda.7.115.4)

यस्तं पूजयते भक्त्या गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्। यात्रा कृता भवेत्तेन पौष्करी नात्र संशयः॥

yastaṃ pūjayate bhaktyā gandhapuṣpādibhiḥ kramāt| yātrā kṛtā bhavettena pauṣkarī nātra saṃśayaḥ||

जो भक्तिपूर्वक क्रमशः गन्ध, पुष्प आदि से इसकी पूजा करता है, उसके द्वारा पुष्करतीर्थ की यात्रा सम्पन्न हो जाती है—इसमें संशय नहीं है।

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