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प्रभास खण्ड · अध्याय 116

शंखोदक-कुण्डेश्वरी माहात्म्य

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श्लोक 1 (skanda.7.116.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि देवीं सौभाग्यकारिणीम्। कुण्डेश्वरीति विख्यातां पुष्कराद्वायुगोचरे॥

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi devīṃ saubhāgyakāriṇīm| kuṇḍeśvarīti vikhyātāṃ puṣkarādvāyugocare||

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, उसके पश्चात् सौभाग्य प्रदान करने वाली उस देवी के पास जाना चाहिए, जो पुष्कर से वायव्य दिशा में कुण्डेश्वरी नाम से विख्यात है।

श्लोक 2 (skanda.7.116.2)

धनुषां त्रिंशता देवि भूतनाथाच्च नैर्ऋते। संस्थिता पापदमनी दारिद्र्यौघविनाशिनी॥

dhanuṣāṃ triṃśatā devi bhūtanāthācca nairṛte| saṃsthitā pāpadamanī dāridryaughavināśinī||

हे देवि, वह भूतनाथ से नैऋत्य दिशा में तीस धनुष की दूरी पर स्थित है, पाप का दमन करने वाली और दरिद्रता के प्रवाह का नाश करने वाली।

श्लोक 3 (skanda.7.116.3)

तस्या नैर्ऋतदिग्भागे धनुःपञ्चदशे स्थितम्। शंखोदकंनाम कुण्डं सर्वपातकनाशनम्॥

tasyā nairṛtadigbhāge dhanuḥpañcadaśe sthitam| śaṃkhodakaṃnāma kuṇḍaṃ sarvapātakanāśanam||

उसकी नैऋत्य दिशा में पन्द्रह धनुष की दूरी पर शंखोदक नामक कुण्ड स्थित है, जो सब पातकों का नाशक है।

श्लोक 4 (skanda.7.116.4)

तत्र स्नात्वा तु ये मर्त्या नारी वा शुभवारिणि। पूजयेत्तां महादेवि शंखावर्तेति विश्रुताम्॥

tatra snātvā tu ye martyā nārī vā śubhavāriṇi| pūjayettāṃ mahādevi śaṃkhāvarteti viśrutām||

हे महादेवि, जो मनुष्य अथवा स्त्री उस शुभ जल में स्नान करके, शंखावर्ता के नाम से विख्यात उस देवी की पूजा करते हैं—

श्लोक 5 (skanda.7.116.5)

कलौ कुण्डेश्वरीनाम सर्वसौख्यप्रदायिनी। शंखो नाम पुरा देवि विष्णुना निहतः प्रिये॥

kalau kuṇḍeśvarīnāma sarvasaukhyapradāyinī| śaṃkho nāma purā devi viṣṇunā nihataḥ priye||

कलियुग में वही सब सुखों को देने वाली कुण्डेश्वरी नाम से पूजित होती है। हे प्रिय देवि, पूर्वकाल में शंख नामक असुर विष्णु द्वारा मारा गया था।

श्लोक 6 (skanda.7.116.6)

तस्य देहं समादाय महान्तं शंखरूपिणम्। तीर्थोदकेन संपूर्य प्रभासं क्षेत्रमागतः॥

tasya dehaṃ samādāya mahāntaṃ śaṃkharūpiṇam| tīrthodakena saṃpūrya prabhāsaṃ kṣetramāgataḥ||

शंख के आकार वाले उसके विशाल शरीर को लेकर, उसे तीर्थों के जल से भरकर, वे प्रभासक्षेत्र में आए।

श्लोक 7 (skanda.7.116.7)

तत्र शंखं तु प्रक्षाल्य कृतं तीर्थं महाप्रभम्। तत्र पूरितवाञ्छङ्खं मेघगम्भीरनिस्वनम्॥

tatra śaṃkhaṃ tu prakṣālya kṛtaṃ tīrthaṃ mahāprabham| tatra pūritavāñchaṅkhaṃ meghagambhīranisvanam||

वहाँ उस शंख को धोकर उन्होंने एक अत्यन्त तेजस्वी तीर्थ बनाया; वहाँ उन्होंने मेघ के समान गम्भीर ध्वनि से उस शंख को फूँका।

श्लोक 8 (skanda.7.116.8)

तस्य नादेन महता देवी तत्र समागता। पृच्छती कारणं तत्र तत्कुण्डस्य समीपगा। तेन कुण्डेश्वरी ख्याता कुण्डं शंखोदकं स्मृतम्॥

tasya nādena mahatā devī tatra samāgatā| pṛcchatī kāraṇaṃ tatra tatkuṇḍasya samīpagā| tena kuṇḍeśvarī khyātā kuṇḍaṃ śaṃkhodakaṃ smṛtam||

उस महान् नाद से देवी वहाँ आ पहुँचीं, और उस कुण्ड के समीप जाकर उसका कारण पूछने लगीं; इसी से वे कुण्डेश्वरी नाम से प्रसिद्ध हुईं और वह कुण्ड शंखोदक कहलाया।

श्लोक 9 (skanda.7.116.9)

माघे मासि तृतीयायां यस्तां पूजयते नरः। नारी वा भक्तिसंयुक्ता स गौरीपदमाप्नुयात्॥

māghe māsi tṛtīyāyāṃ yastāṃ pūjayate naraḥ| nārī vā bhaktisaṃyuktā sa gaurīpadamāpnuyāt||

माघ मास की तृतीया को जो पुरुष, अथवा भक्तियुक्त स्त्री, उसकी पूजा करते हैं, वे गौरी के पद को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 10 (skanda.7.116.10)

दंपत्योर्भोजनं तत्र देयं यात्राफलेप्सुभिः। कञ्चुकं फलदानं च गौरिणीनां च भोजनम्॥

daṃpatyorbhojanaṃ tatra deyaṃ yātrāphalepsubhiḥ| kañcukaṃ phaladānaṃ ca gauriṇīnāṃ ca bhojanam||

यात्रा का फल चाहने वालों को वहाँ किसी दम्पति को भोजन कराना चाहिए, तथा चोली और फल का दान तथा सधवा स्त्रियों को भोजन भी कराना चाहिए।

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