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प्रभास खण्ड · अध्याय 122

चित्रांगदेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 121अध्याय-सूचीअध्याय 123

श्लोक 1 (skanda.7.122.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि लिंगं चित्रांगदेश्वरम्। तस्यैव नैर्ऋते भागे धनुर्विंशतिभिः स्थितम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi liṁgaṁ citrāṁgadeśvaram| tasyaiva nairṛte bhāge dhanurviṁśatibhiḥ sthitam

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तत्पश्चात् चित्रांगदेश्वर नामक लिंग के पास जाना चाहिए, जो उसी से नैर्ऋत्य दिशा में बीस धनुष की दूरी पर स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.122.2)

चित्रांगदेन देवेशि गंधर्वपतिना प्रिये। क्षेत्रं पवित्रं ज्ञात्वा वै लिंगं तत्र प्रतिष्ठितम्। कृत्वा तपो महाघोरं समाराध्य महेश्वरम्

citrāṁgadena deveśi gaṁdharvapatinā priye| kṣetraṁ pavitraṁ jñātvā vai liṁgaṁ tatra pratiṣṭhitam| kṛtvā tapo mahāghoraṁ samārādhya maheśvaram

हे प्रिये देवेशि, गन्धर्वराज चित्रांगद ने इस पवित्र क्षेत्र को जानकर वहाँ यह लिंग प्रतिष्ठित किया था, अत्यंत घोर तप कर उन्होंने महेश्वर की आराधना की।

श्लोक 3 (skanda.7.122.3)

अथ यो भावसंयुक्तस्तल्लिंगं संप्रपूजयेत्। गांधर्वलोकमाप्नोति गन्धर्वैः सह मोदते

atha yo bhāvasaṁyuktastalliṁgaṁ saṁprapūjayet| gāṁdharvalokamāpnoti gandharvaiḥ saha modate

जो भी भावयुक्त होकर उस लिंग की भलीभाँति पूजा करता है, वह गन्धर्वलोक को प्राप्त कर गन्धर्वों के साथ आनंद करता है।

श्लोक 4 (skanda.7.122.4)

तत्र शुक्लत्रयोदश्यां संस्नाप्य विधिना शिवम्। पूजयेद्विविधैः पुष्पैर्गंधधूपैरनुक्रमात्। स प्राप्नोत्यखिलं कामं मनसा यद्यदीप्सितम्

tatra śuklatrayodaśyāṁ saṁsnāpya vidhinā śivam| pūjayedvividhaiḥ puṣpairgaṁdhadhūpairanukramāt| sa prāpnotyakhilaṁ kāmaṁ manasā yadyadīpsitam

वहाँ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को विधिपूर्वक शिव को स्नान कराकर, क्रमशः विविध पुष्पों तथा गन्ध-धूप से जो पूजा करता है, वह मन में जो-जो कामना करता है, वह सब पूर्ण कामना प्राप्त करता है।

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