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प्रभास खण्ड · अध्याय 125

पौलोमीश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 124अध्याय-सूचीअध्याय 126

श्लोक 1 (skanda.7.125.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महालिंगं महादेवि सुरप्रियम्। रावणेश्वरवायव्ये धनुषां त्रिंशकेऽन्तरे

īśvara uvāca| tato gacchenmahāliṁgaṁ mahādevi surapriyam| rāvaṇeśvaravāyavye dhanuṣāṁ triṁśake'ntare

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तत्पश्चात् देवताओं के प्रिय उस महालिंग के पास जाना चाहिए, जो रावणेश्वर से वायव्य दिशा में तीस धनुष की दूरी पर स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.125.2)

स्थितं कामप्रदं लिंगं सर्वपातकनाशनम्। पौलोमीश्वरनामाढ्यं पौलोम्या संप्रतिष्ठितम्

sthitaṁ kāmapradaṁ liṁgaṁ sarvapātakanāśanam| paulomīśvaranāmāḍhyaṁ paulomyā saṁpratiṣṭhitam

वह इच्छापूर्ण करने वाला, सर्वपापनाशक लिंग वहाँ स्थित है, जो पौलोमीश्वर नाम से समन्वित है और पौलोमी (इन्द्राणी) द्वारा प्रतिष्ठित किया गया था।

श्लोक 3 (skanda.7.125.3)

तारकेण यदा ध्वस्तास्त्रिदशाः संगरे स्थिताः। त्रैलोक्यं विहृतं सर्वं स्वयमिन्द्रत्वमागतः

tārakeṇa yadā dhvastāstridaśāḥ saṁgare sthitāḥ| trailokyaṁ vihṛtaṁ sarvaṁ svayamindratvamāgataḥ

जब तारकासुर ने युद्ध में स्थित देवताओं को पराजित कर दिया, तीनों लोकों को हर लिया, और स्वयं इन्द्रपद को प्राप्त कर लिया,

श्लोक 4 (skanda.7.125.4)

तदा शक्रः सुदुःखार्तो भयोद्विग्नो ननाश वै। तदा तद्भार्यया देवि इन्द्राण्या शोककर्षया

tadā śakraḥ suduḥkhārto bhayodvigno nanāśa vai| tadā tadbhāryayā devi indrāṇyā śokakarṣayā

तब अत्यंत दुःखी तथा भय से व्याकुल शक्र भाग गए; हे देवि, तब शोक से कृश हुई उनकी पत्नी इन्द्राणी ने—

श्लोक 5 (skanda.7.125.5)

इन्द्रस्य जयमिच्छन्त्या शंभुराराधितस्तया। ततस्तुष्टो महादेवस्तामुवाच शुभेक्षणाम्

indrasya jayamicchantyā śaṁbhurārādhitastayā| tatastuṣṭo mahādevastāmuvāca śubhekṣaṇām

—इन्द्र की विजय चाहते हुए शंभु की आराधना की; तब प्रसन्न हुए महादेव ने शुभनेत्रा उस देवी से कहा—

श्लोक 6 (skanda.7.125.6)

भगवानुवाच। उत्पत्स्यति सुतोऽस्माकं षण्मुखस्तु महाबलः। तारकं दैत्यराजानं स चैनं घातयिष्यति

bhagavānuvāca| utpatsyati suto'smākaṁ ṣaṇmukhastu mahābalaḥ| tārakaṁ daityarājānaṁ sa cainaṁ ghātayiṣyati

भगवान ने कहा—हमारा पुत्र, महाबली षण्मुख, उत्पन्न होगा; वही दैत्यराज तारक का वध करेगा।

श्लोक 7 (skanda.7.125.7)

गच्छ त्वं विज्वरा भूत्वा शृणु भूयो वचश्च मे

gaccha tvaṁ vijvarā bhūtvā śṛṇu bhūyo vacaśca me

तुम चिंतारहित होकर जाओ, और मेरी यह बात फिर से सुनो—

श्लोक 8 (skanda.7.125.8)

अत्र स्थितमिदं लिंगं योऽस्माकं पूजयिष्यति। स नूनं मे गणो भूत्वा मत्सकाशमुपेष्यति

atra sthitamidaṁ liṁgaṁ yo'smākaṁ pūjayiṣyati| sa nūnaṁ me gaṇo bhūtvā matsakāśamupeṣyati

यहाँ स्थित इस हमारे लिंग की जो भी पूजा करेगा, वह निश्चय ही मेरा गण बनकर मेरे समीप आएगा।

श्लोक 9 (skanda.7.125.9)

एवमुक्ता गता साध्वी देवराड्यत्र संस्थितः। सर्वदुःखविनिर्मुक्ता सर्वदैत्यभयोज्झिता

evamuktā gatā sādhvī devarāḍyatra saṁsthitaḥ| sarvaduḥkhavinirmuktā sarvadaityabhayojjhitā

यह कहे जाने पर वह साध्वी वहाँ गई, जहाँ देवराज इन्द्र स्थित थे, और सम्पूर्ण दुःखों से मुक्त होकर सब दैत्यों के भय से रहित हो गई।

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