Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 126

शाण्डिल्येश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 125अध्याय-सूचीअध्याय 127

श्लोक 1 (skanda.7.126.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि शांडिल्येश्वरमुत्तमम्। ब्रह्मणः पश्चिमे भागे धनुषां षोडशांतरे

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi śāṁḍilyeśvaramuttamam| brahmaṇaḥ paścime bhāge dhanuṣāṁ ṣoḍaśāṁtare

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तत्पश्चात् उत्तम शांडिल्येश्वर के पास जाना चाहिए, जो ब्रह्मलिंग से पश्चिम दिशा में सोलह धनुष की दूरी पर स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.126.2)

महाप्रभावं लिङ्गं तद्दर्शनात्पापनाशनम्

mahāprabhāvaṁ liṅgaṁ taddarśanātpāpanāśanam

वह महाप्रभावशाली लिंग है, जिसके दर्शन मात्र से पापों का नाश हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.7.126.3)

शांडिल्योनाम ब्रह्मर्षिः सारथिर्ब्रह्मणः स्मृतः। तपस्वी स महातेजा ज्ञाननिष्ठो जितेन्द्रियः

śāṁḍilyonāma brahmarṣiḥ sārathirbrahmaṇaḥ smṛtaḥ| tapasvī sa mahātejā jñānaniṣṭho jitendriyaḥ

शांडिल्य नामक ब्रह्मर्षि, जो ब्रह्मा के सारथि माने जाते हैं, वे महातेजस्वी, ज्ञाननिष्ठ, जितेन्द्रिय तपस्वी थे।

श्लोक 4 (skanda.7.126.4)

स प्रभासं समासाद्य तपस्तेपे सुदारुणम्। प्रतिष्ठाप्य महालिंगं सोमेशादुत्तरे स्थितम्

sa prabhāsaṁ samāsādya tapastepe sudāruṇam| pratiṣṭhāpya mahāliṁgaṁ someśāduttare sthitam

वे प्रभास क्षेत्र में जाकर अत्यंत घोर तप करने लगे, और सोमेश से उत्तर दिशा में एक महालिंग स्थापित किया।

श्लोक 5 (skanda.7.126.5)

स स्वयं पूजयामास दिव्याब्दानां शतं प्रिये। ततोऽभिलषितं प्राप्य कृतकृत्यो बभूव ह

sa svayaṁ pūjayāmāsa divyābdānāṁ śataṁ priye| tato'bhilaṣitaṁ prāpya kṛtakṛtyo babhūva ha

हे प्रिये, उसने स्वयं सौ दिव्य वर्षों तक उसकी पूजा की; तत्पश्चात् इच्छित वस्तु को प्राप्त कर वह कृतकृत्य हो गया।

श्लोक 6 (skanda.7.126.6)

नन्दीश्वरप्रसादेन अणिमादिगुणैर्युतः। तं दृष्ट्वा तु नरः सद्यो विपापः संप्रजायते

nandīśvaraprasādena aṇimādiguṇairyutaḥ| taṁ dṛṣṭvā tu naraḥ sadyo vipāpaḥ saṁprajāyate

नन्दीश्वर की कृपा से वे अणिमा आदि सिद्धियों से युक्त हो गए। उस लिंग का दर्शन करते ही मनुष्य तत्काल पापरहित हो जाता है।

श्लोक 7 (skanda.7.126.7)

बाल्ये वयसि यत्पापं वार्धक्ये यौवनेऽपि वा। अज्ञानाज्ज्ञानतो वाऽपि यः करोति नरः प्रिये। तत्सर्वं नाशमायाति शांडिल्येश्वरदर्शनात्

bālye vayasi yatpāpaṁ vārdhakye yauvane'pi vā| ajñānājjñānato vā'pi yaḥ karoti naraḥ priye| tatsarvaṁ nāśamāyāti śāṁḍilyeśvaradarśanāt

हे प्रिये, बाल्यावस्था में, वृद्धावस्था में अथवा यौवन में मनुष्य जो भी पाप अज्ञान से अथवा जानबूझकर करता है, वह सब शांडिल्येश्वर के दर्शन से नष्ट हो जाता है।

अध्याय 125अध्याय-सूचीअध्याय 127