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प्रभास खण्ड · अध्याय 134

पुष्करावर्तकानदीमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 133अध्याय-सूचीअध्याय 135

श्लोक 1 (skanda.7.134.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि पुष्करावर्तकां नदीम्। ब्रह्मकुंडादुत्तरतो नातिदूरे व्यवस्थिताम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi puṣkarāvartakāṁ nadīm| brahmakuṁḍāduttarato nātidūre vyavasthitām

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तत्पश्चात् उस पुष्करावर्तका नदी के पास जाना चाहिए, जो ब्रह्मकुंड से उत्तर दिशा में न अधिक दूर स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.134.2)

पुरा यज्ञे वर्तमाने सोमस्य तु महात्मनः। ब्रह्मा सुरगणैः सार्धं प्रभासं क्षेत्रमागतः

purā yajñe vartamāne somasya tu mahātmanaḥ| brahmā suragaṇaiḥ sārdhaṁ prabhāsaṁ kṣetramāgataḥ

पूर्वकाल में जब महात्मा सोम का यज्ञ चल रहा था, तब ब्रह्मा देवगणों सहित प्रभास क्षेत्र में आए।

श्लोक 3 (skanda.7.134.3)

सोमनाथप्रतिष्ठार्थमृक्षराजनिमंत्रितः। प्रतिज्ञातं पुरा तेन ब्रह्मणा लोककारिणा

somanāthapratiṣṭhārthamṛkṣarājanimaṁtritaḥ| pratijñātaṁ purā tena brahmaṇā lokakāriṇā

नक्षत्रों के राजा द्वारा सोमनाथ की प्रतिष्ठा के लिए निमंत्रित किए गए उस लोककर्ता ब्रह्मा ने पूर्वकाल में यह प्रतिज्ञा की थी—

श्लोक 4 (skanda.7.134.4)

यावत्स्थास्याम्यहं मर्त्ये कस्मिंश्चित्कारणांतरे। तावत्संध्यात्रयं वंद्यं नित्यमेव त्रिपुष्करे

yāvatsthāsyāmyahaṁ martye kasmiṁścitkāraṇāṁtare| tāvatsaṁdhyātrayaṁ vaṁdyaṁ nityameva tripuṣkare

—जब तक मैं किसी भी कारणवश मर्त्यलोक में रहूँ, तब तक मुझे नित्य ही त्रिपुष्कर में तीनों संध्याओं की वंदना करनी होगी।

श्लोक 5 (skanda.7.134.5)

एतस्मिन्नेव काले तु लग्नकाल उपस्थिते। आदिष्टं शोभनं कालं ब्राह्मणैर्दैवचिन्तकैः

etasminneva kāle tu lagnakāla upasthite| ādiṣṭaṁ śobhanaṁ kālaṁ brāhmaṇairdaivacintakaiḥ

उसी समय, शुभ लग्न का काल आने पर, ज्योतिष जानने वाले ब्राह्मणों ने उस शुभ मुहूर्त का निर्देश दिया।

श्लोक 6 (skanda.7.134.6)

ततस्तं प्रस्थितं ज्ञात्वा पुष्करे तु पितामहम्। संध्यार्थं रात्रिनाथो वै वाक्यमेतदुवाच ह

tatastaṁ prasthitaṁ jñātvā puṣkare tu pitāmaham| saṁdhyārthaṁ rātrinātho vai vākyametaduvāca ha

तब पितामह को पुष्कर संध्या के लिए प्रस्थान करते जानकर, चंद्रमा ने उनसे यह वचन कहा—

श्लोक 7 (skanda.7.134.7)

दैवज्ञैः कलितः काल एष एव शुभोदयः। यथा कालात्ययो न स्यात्तथा नीतिर्विधीयताम्

daivajñaiḥ kalitaḥ kāla eṣa eva śubhodayaḥ| yathā kālātyayo na syāttathā nītirvidhīyatām

"ज्योतिषियों द्वारा गणना किया गया शुभ मुहूर्त यही है; अतः ऐसी युक्ति की जाए कि समय का अतिक्रमण न हो।"

श्लोक 8 (skanda.7.134.8)

तं ज्ञात्वा सांप्रतं कालं ब्रह्मा लोकपितामहः। मनसा चिन्तयामास पुष्कराणि समाहितः

taṁ jñātvā sāṁprataṁ kālaṁ brahmā lokapitāmahaḥ| manasā cintayāmāsa puṣkarāṇi samāhitaḥ

उस उपस्थित समय को जानकर, लोकपितामह ब्रह्मा ने एकाग्रचित्त होकर मन ही मन पुष्करों का ध्यान किया।

श्लोक 9 (skanda.7.134.9)

तानि वै स्मृतमात्राणि ब्रह्मणा वरवर्णिनि। प्रादुर्भूतानि तत्रैव नद्यास्तीरे सुशोभने

tāni vai smṛtamātrāṇi brahmaṇā varavarṇini| prādurbhūtāni tatraiva nadyāstīre suśobhane

हे वरवर्णिनि, ब्रह्मा द्वारा स्मरण किए जाते ही वे पुष्कर उसी सुंदर नदी-तट पर प्रकट हो गए।

श्लोक 10 (skanda.7.134.10)

आवर्तास्तत्र सञ्जाता ज्येष्ठमध्यकनीयसः। अथ नामाकरोत्तस्या ब्रह्मा लोकपितामहः

āvartāstatra sañjātā jyeṣṭhamadhyakanīyasaḥ| atha nāmākarottasyā brahmā lokapitāmahaḥ

वहाँ ज्येष्ठ, मध्यम तथा कनिष्ठ भँवर उत्पन्न हो गए; तब लोकपितामह ब्रह्मा ने उस नदी का नामकरण किया।

श्लोक 11 (skanda.7.134.11)

पुष्करावर्तका नाम्ना अद्यप्रभृति शोभना। नदी प्रयास्यते लोके ख्यातिं मम प्रसादतः

puṣkarāvartakā nāmnā adyaprabhṛti śobhanā| nadī prayāsyate loke khyātiṁ mama prasādataḥ

"आज से यह सुंदर नदी 'पुष्करावर्तका' नाम से मेरी कृपा से लोक में ख्याति को प्राप्त करेगी।"

श्लोक 12 (skanda.7.134.12)

अत्र स्नात्वा नरो भक्त्या तर्पयिष्यति यः पितॄन्। त्रिपुष्करसमं पुण्यं लप्स्यते स तथेप्सितम्

atra snātvā naro bhaktyā tarpayiṣyati yaḥ pitṝn| tripuṣkarasamaṁ puṇyaṁ lapsyate sa tathepsitam

"यहाँ स्नान कर जो मनुष्य भक्तिपूर्वक पितरों का तर्पण करेगा, वह त्रिपुष्कर के समान पुण्य तथा अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करेगा।"

श्लोक 13 (skanda.7.134.13)

श्रावणे शुक्लपक्षस्य तृतीयायां नरोत्तमः। यः पितॄंस्तर्पयेत्तत्र तृप्तिः कल्पायुतं भवेत्

śrāvaṇe śuklapakṣasya tṛtīyāyāṁ narottamaḥ| yaḥ pitṝṁstarpayettatra tṛptiḥ kalpāyutaṁ bhavet

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को जो श्रेष्ठ मनुष्य वहाँ पितरों का तर्पण करता है, उसके पितरों को दस हजार कल्पों तक तृप्ति प्राप्त होती है।

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