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प्रभास खण्ड · अध्याय 136

लोमशेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 135अध्याय-सूचीअध्याय 137

श्लोक 1 (skanda.7.136.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि लोमशेश्वरमुत्तमम्। दुःखान्तकारिणीपूर्वे धनुषां सप्तके स्थितम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi lomaśeśvaramuttamam| duḥkhāntakāriṇīpūrve dhanuṣāṁ saptake sthitam

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तत्पश्चात् उत्तम लोमशेश्वर के पास जाना चाहिए, जो दुःखान्तकारिणी से पूर्व दिशा में सात धनुष की दूरी पर स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.136.2)

स्थापितं तत्र देवेशि लोमशेन महर्षिणा। गुहामध्ये महालिंगं तपः कृत्वा सुदुश्चरम्

sthāpitaṁ tatra deveśi lomaśena maharṣiṇā| guhāmadhye mahāliṁgaṁ tapaḥ kṛtvā suduścaram

हे देवेशि, वहाँ गुफा के मध्य महर्षि लोमश ने अत्यंत दुष्कर तप करके वह महालिंग स्थापित किया।

श्लोक 3 (skanda.7.136.3)

कोटीनां त्रितयं सार्धमिंद्राद्याः स्वर्भुजः प्रिये। यदा नाशं गमिष्यंति तदा तस्य क्षयो ध्रुवम्

koṭīnāṁ tritayaṁ sārdhamiṁdrādyāḥ svarbhujaḥ priye| yadā nāśaṁ gamiṣyanti tadā tasya kṣayo dhruvam

हे प्रिये, साढ़े तीन करोड़ इन्द्र आदि जो स्वर्ग के भोक्ता हैं, जब वे नाश को प्राप्त होंगे, तभी निश्चय ही उस लोमश ऋषि का भी क्षय होगा।

श्लोक 4 (skanda.7.136.4)

यावंति देहरोमाणि इन्द्रास्तावन्त एव च। क्रमादिन्द्रे विनष्टे तु तल्लोमपतनं भवेत्

yāvaṁti deharomāṇi indrāstāvanta eva ca| kramādindre vinaṣṭe tu tallomapatanaṁ bhavet

उसके शरीर पर जितने रोम हैं, उतने ही इन्द्र हैं; जब क्रमशः एक-एक इन्द्र का नाश होता है, तब उसका एक-एक रोम गिरता है।

श्लोक 5 (skanda.7.136.5)

एवमीशप्रसादेन चिरायुर्लोमशोऽभवत्। ब्रह्माणः षड्विनश्यन्ति समग्रायुषि लोमशे

evamīśaprasādena cirāyurlomaśo'bhavat| brahmāṇaḥ ṣaḍvinaśyanti samagrāyuṣi lomaśe

इस प्रकार ईश्वर की कृपा से लोमश दीर्घायु हो गए; लोमश की पूर्ण आयु में छह ब्रह्मा नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 6 (skanda.7.136.6)

य एवं पूजयेद्भक्त्या तल्लिंगं लोमशार्चितम्। सोऽपि दीर्घायुराप्नोति निर्व्याधिर्नीरुजः सुखी

ya evaṁ pūjayedbhaktyā talliṁgaṁ lomaśārcitam| so'pi dīrghāyurāpnoti nirvyādhirnīrujaḥ sukhī

जो भी इस प्रकार भक्तिपूर्वक लोमश द्वारा अर्चित उस लिंग की पूजा करता है, वह भी दीर्घायु, व्याधिरहित, रोगरहित तथा सुखी होता है।

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