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प्रभास खण्ड · अध्याय 137

कङ्कालभैरवक्षेत्रपालमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 136अध्याय-सूचीअध्याय 138

श्लोक 1 (skanda.7.137.1)

ईश्वर उवाच। तत्रैव संस्थितं पश्येत्क्षेत्रपालमनुत्तमम्। कंकालभैरवं नाम भैरवेण नियोजितम्। तस्य क्षेत्रस्य रक्षार्थं प्राणिनां दुष्टचेतसाम्

īśvara uvāca| tatraiva saṁsthitaṁ paśyetkṣetrapālamanuttamam| kaṁkālabhairavaṁ nāma bhairaveṇa niyojitam| tasya kṣetrasya rakṣārthaṁ prāṇināṁ duṣṭacetasām

ईश्वर ने कहा—वहीं पर उस अनुपम क्षेत्रपाल को देखना चाहिए, जो कंकालभैरव नाम से प्रसिद्ध है, जिसे भैरव ने दुष्ट चित्तवाले प्राणियों से उस क्षेत्र की रक्षा के लिए नियुक्त किया है।

श्लोक 2 (skanda.7.137.2)

श्रावणे शुक्लपञ्चम्यामष्टम्यामाश्विनस्य च। यस्तं पूजयते भक्त्या बलिपुष्पादिभिः क्रमात्

śrāvaṇe śuklapañcamyāmaṣṭamyāmāśvinasya ca| yastaṁ pūjayate bhaktyā balipuṣpādibhiḥ kramāt

जो मनुष्य श्रावण मास की शुक्ल पञ्चमी को तथा आश्विन मास की अष्टमी को भक्तिपूर्वक क्रमशः बलि, पुष्प आदि उपहारों से उसकी पूजा करता है,

श्लोक 3 (skanda.7.137.3)

तस्य क्षेत्रे निवसतः पुष्करस्य महात्मनः। निर्विघ्नकारी भवति तथा रक्षति पुत्रवत्

tasya kṣetre nivasataḥ puṣkarasya mahātmanaḥ| nirvighnakārī bhavati tathā rakṣati putravat

उस क्षेत्र में निवास करने वाले महात्मा पुष्कर के लिए वह देव विघ्नों को दूर करने वाला होता है और पुत्र के समान उसकी रक्षा करता है।

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