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प्रभास खण्ड · अध्याय 138

तृणबिन्द्वीश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 137अध्याय-सूचीअध्याय 139

श्लोक 1 (skanda.7.138.1)

ईश्वर उवाच। तस्यैव पश्चिमे भागे धनुषां पञ्चके स्थितम्। तृणबिन्द्वीश्वरं नाम तीव्रभक्त्या प्रतिष्ठितम्

īśvara uvāca| tasyaiva paścime bhāge dhanuṣāṁ pañcake sthitam| tṛṇabindvīśvaraṁ nāma tīvrabhaktyā pratiṣṭhitam

ईश्वर ने कहा—उसी के पश्चिम भाग में पाँच धनुष की दूरी पर तीव्र भक्ति से प्रतिष्ठित तृणबिन्द्वीश्वर नामक लिंग स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.138.2)

कृत्वा महत्तपो देवि तृणबिन्दुर्मुनीश्वरः। मासि मासि कुशाग्रेण जलबिन्दुं निपीय वै

kṛtvā mahattapo devi tṛṇabindurmunīśvaraḥ| māsi māsi kuśāgreṇa jalabinduṁ nipīya vai

हे देवि, मुनिश्रेष्ठ तृणबिन्दु ने महान् तप करते हुए प्रतिमास कुश की नोक से जल की एक बूँद पीकर,

श्लोक 3 (skanda.7.138.3)

संवत्सराण्यनेकानि एवमाराध्य चेश्वरम्। संप्राप्तं परमां सिद्धिं क्षेत्रे प्राभासिके शुभे

saṁvatsarāṇyanekāni evamārādhya ceśvaram| saṁprāptaṁ paramāṁ siddhiṁ kṣetre prābhāsike śubhe

इस प्रकार अनेक वर्षों तक ईश्वर की आराधना करके उस शुभ प्राभासिक क्षेत्र में परम सिद्धि को प्राप्त हुआ।

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