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प्रभास खण्ड · अध्याय 162

अष्टकुलेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 161अध्याय-सूचीअध्याय 163

श्लोक 1 (skanda.7.162.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि तस्माद्दक्षिणतः स्थितम्। लक्ष्मणेशाच्च पूर्वस्मिँल्लिंगमष्टकुलेश्वरम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi tasmāddakṣiṇataḥ sthitam| lakṣmaṇeśācca pūrvasmim̐lliṅgamaṣṭakuleśvaram

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर उससे दक्षिण दिशा में तथा लक्ष्मणेश से पूर्व दिशा में स्थित अष्टकुलेश्वर नामक लिंग के पास जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.7.162.2)

सर्वपापप्रशमनं महाविषप्रणाशनम्। पूजितं सिद्धगन्धर्वैर्वाञ्छितार्थप्रदायकम्

sarvapāpapraśamanaṁ mahāviṣapraṇāśanam| pūjitaṁ siddhagandharvairvāñchitārthapradāyakam

वह सब पापों को शान्त करने वाला, महाविष का नाश करने वाला, सिद्धों और गन्धर्वों द्वारा पूजित तथा वांछित अर्थ को देने वाला है।

श्लोक 3 (skanda.7.162.3)

यस्तं पूजयते मर्त्यः कृष्णाष्टम्यां विधानतः। स मुक्तः पातकैर्घोरैर्नागलोके महीयते

yastaṁ pūjayate martyaḥ kṛṣṇāṣṭamyāṁ vidhānataḥ| sa muktaḥ pātakairghorairnāgaloke mahīyate

जो मनुष्य कृष्ण पक्ष की अष्टमी को विधिपूर्वक उसकी पूजा करता है, वह घोर पापों से मुक्त होकर नागलोक में सम्मानित होता है।

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