प्रभास खण्ड · अध्याय 164
अश्विनेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.164.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि तस्मात्पूर्वेण संस्थितम्। महापापौघशमनं पूजितं सर्वकामदम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi tasmātpūrveṇa saṁsthitam| mahāpāpaughaśamanaṁ pūjitaṁ sarvakāmadam
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर उससे पूर्व दिशा में स्थित, महापापसमूह को शान्त करने वाले, पूजित तथा सर्वकामप्रद लिंग के पास जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.7.164.2)
अश्विनेश्वरनामानं धनुषां पंचके स्थितम्। सर्वरोगप्रशमनं दृष्टं सर्वार्थसाधकम्
aśvineśvaranāmānaṁ dhanuṣāṁ paṁcake sthitam| sarvarogapraśamanaṁ dṛṣṭaṁ sarvārthasādhakam
वह अश्विनेश्वर नाम से पाँच धनुष की दूरी पर स्थित है, सब रोगों को शान्त करने वाला तथा सब अर्थों को सिद्ध करने वाला देखा गया है।
श्लोक 3 (skanda.7.164.3)
ये केचिद्रोगिणो लोके तेषां तद्भेषजं महत्। माघमासे द्वितीयायां दर्शनं तस्य दुर्लभम्
ye kecidrogiṇo loke teṣāṁ tadbheṣajaṁ mahat| māghamāse dvitīyāyāṁ darśanaṁ tasya durlabham
संसार में जो भी रोगी हैं, उनके लिए वह महान् औषधि है; परन्तु माघ मास की द्वितीया को उसका दर्शन दुर्लभ होता है।
श्लोक 4 (skanda.7.164.4)
तस्मात्पश्येच्च तद्भक्त्या यदि श्रेयोऽभिकांक्षितम्। महापापौघशमनं पूजितं सर्वकामदम्
tasmātpaśyecca tadbhaktyā yadi śreyo'bhikāṁkṣitam| mahāpāpaughaśamanaṁ pūjitaṁ sarvakāmadam
अतः यदि कल्याण की कामना हो तो भक्तिपूर्वक उसका दर्शन करना चाहिए, जो महापापसमूह को शान्त करने वाला, पूजित तथा सर्वकामप्रद है।
श्लोक 5 (skanda.7.164.5)
इति लिङ्गद्वयं देवि सूर्यपुत्रप्रतिष्ठितम्। तस्मिन्नेव दिने पश्येत्संयतात्मा नरोत्तमः
iti liṅgadvayaṁ devi sūryaputrapratiṣṭhitam| tasminneva dine paśyetsaṁyatātmā narottamaḥ
हे देवि, इस प्रकार सूर्यपुत्रों (अश्विनीकुमारों) द्वारा प्रतिष्ठित दोनों लिंगों को संयमित चित्त वाला श्रेष्ठ मनुष्य उसी दिन देखे।