प्रभास खण्ड · अध्याय 170
मातृगणबलदेवीमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.170.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि तत्र मातृगणान्सुधीः। तत्रैव बलदेवीं च नातिदूरे व्यवस्थिताम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi tatra mātṛgaṇānsudhīḥ| tatraiva baladevīṁ ca nātidūre vyavasthitām
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, बुद्धिमान् पुरुष को तदनन्तर वहाँ स्थित मातृगणों के पास तथा उन्हीं के निकट न अधिक दूर स्थित बलदेवी के पास जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.7.170.2)
श्रावण्यां श्रावणे मासि यस्तां पूजयते नरः। पायसैर्मधुना वापि दिव्यपुष्पोपहारकैः
śrāvaṇyāṁ śrāvaṇe māse yastāṁ pūjayate naraḥ| pāyasairmadhunā vāpi divyapuṣpopahārakaiḥ
श्रावण मास की श्रवण नक्षत्रयुक्त तिथि को जो मनुष्य खीर, मधु अथवा दिव्य पुष्पों के उपहार से उसकी पूजा करता है,
श्लोक 3 (skanda.7.170.3)
तस्य वर्षं महादेवि सुखं गच्छेत्सुपूजितम्
tasya varṣaṁ mahādevi sukhaṁ gacchetsupūjitam
हे महादेवि, भलीभाँति पूजा किए जाने पर उसका वर्ष सुखपूर्वक व्यतीत होता है।