Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 171

दशरथेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 170अध्याय-सूचीअध्याय 172

श्लोक 1 (skanda.7.171.1)

ततो गच्छेन्महादेवि देवीमेकल्लवीरिकाम्। एकल्लवीरायाम्ये तु नातिदूरे व्यवस्थिताम्

tato gacchenmahādevi devīmekallavīrikām| ekallavīrāyāmye tu nātidūre vyavasthitām

इसके पश्चात् हे महादेवि, देवी एकल्लवीरिका के पास जाना चाहिए, जो उस स्थान के दक्षिण में न अधिक दूर स्थित हैं।

श्लोक 2 (skanda.7.171.2)

पूर्वं दशरथो योऽसौ सूर्यवंशविभूषणः। प्रभासं क्षेत्रमासाद्य तपश्चक्रे सुदुश्चरम्

pūrvaṁ daśaratho yo'sau sūryavaṁśavibhūṣaṇaḥ| prabhāsaṁ kṣetramāsādya tapaścakre suduścaram

पूर्वकाल में सूर्यवंश के भूषण राजा दशरथ ने प्रभासक्षेत्र को प्राप्त कर अत्यंत दुष्कर तप किया।

श्लोक 3 (skanda.7.171.3)

लिंगं तत्र प्रतिष्ठाप्य तोषयामास शांकरम्। स देवं प्रार्थयामास पुत्रं चैवामितौजसम्

liṁgaṁ tatra pratiṣṭhāpya toṣayāmāsa śāṁkaram| sa devaṁ prārthayāmāsa putraṁ caivāmitaujasam

वहाँ लिंग की स्थापना कर उन्होंने भगवान् शंकर को संतुष्ट किया और उस देवता से अमित तेजस्वी पुत्र की प्रार्थना की।

श्लोक 4 (skanda.7.171.4)

ददौ तस्य तदा पुत्रं देवं त्रैलोक्यपूजितम्। रामेति नाम यस्यासीत्त्रैलोक्ये प्रथितं यशः

dadau tasya tadā putraṁ devaṁ trailokyapūjitam| rāmeti nāma yasyāsītrailokye prathitaṁ yaśaḥ

तब उन्होंने उसे त्रैलोक्य-पूजित पुत्र दिया, जिसका नाम राम था और जिसका यश तीनों लोकों में विख्यात हुआ।

श्लोक 5 (skanda.7.171.5)

यस्याद्यापीह गायन्ति भूर्भुवःस्वर्निवासिनः। देवदैत्यासुराः सर्वे वाल्मीक्याद्या महर्षयः

yasyādyāpīha gāyanti bhūrbhuvaḥsvarnivāsinaḥ| devadaityāsurāḥ sarve vālmīkyādyā maharṣayaḥ

जिसका यश आज भी यहाँ भूः, भुवः और स्वः लोकों के निवासी गाते हैं—सभी देव, दैत्य, असुर तथा वाल्मीकि आदि महर्षिगण।

श्लोक 6 (skanda.7.171.6)

तल्लिंगस्य प्रभावेन प्राप्तं राज्ञा महद्यशः। कार्तिक्यां कार्तिके मासि विधिना यस्तमर्चयेत्। दीपपूजोपहारेण यशस्वी सोऽपि जायते

talliṁgasya prabhāvena prāptaṁ rājñā mahadyaśaḥ| kārtikyāṁ kārtike māsi vidhinā yastamarcayet| dīpapūjopahāreṇa yaśasvī so'pi jāyate

उस लिंग के प्रभाव से ही राजा ने महान् यश प्राप्त किया। कार्तिक मास की कार्तिकी को जो विधिपूर्वक दीप और पूजा के उपहार से उसका अर्चन करता है, वह भी यशस्वी हो जाता है।

अध्याय 170अध्याय-सूचीअध्याय 172