प्रभास खण्ड · अध्याय 172
भरतेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.172.1)
ततो गच्छेन्महादेवि लिंगं तद्भरतेश्वरम्। तस्मादुत्तरकोणस्थं नातिदूरं व्यवस्थितम्
tato gacchenmahādevi liṁgaṁ tadbharateśvaram| tasmāduttarakoṇasthaṁ nātidūraṁ vyavasthitam
इसके पश्चात् हे महादेवि, भरतेश्वर नामक उस लिंग के पास जाना चाहिए, जो वहाँ से उत्तर कोण में न अधिक दूर स्थित है।
श्लोक 2 (skanda.7.172.2)
भरतो नाम राजाऽभूदाग्नीध्रः प्रथितः क्षितौ। यस्येदं भारतं वर्षं नाम्ना लोकेषु गीयते
bharato nāma rājā'bhūdāgnīdhraḥ prathitaḥ kṣitau| yasyedaṁ bhārataṁ varṣaṁ nāmnā lokeṣu gīyate
पृथ्वी पर आग्नीध्र के पुत्र भरत नामक विख्यात राजा हुए, जिनके नाम से यह भारतवर्ष लोक में गाया जाता है।
श्लोक 3 (skanda.7.172.3)
स च चक्रे तपो घोरं क्षेत्रेऽस्मिन्पार्वति प्रिये। दिव्यं वर्षसहस्रं तु प्रतिष्ठाप्य महेश्वरम्
sa ca cakre tapo ghoraṁ kṣetre'sminpārvati priye| divyaṁ varṣasahasraṁ tu pratiṣṭhāpya maheśvaram
हे प्रिये पार्वति, उसने इस क्षेत्र में महेश्वर की प्रतिष्ठा कर एक दिव्य सहस्र वर्ष तक घोर तप किया।
श्लोक 4 (skanda.7.172.4)
पुत्रकामो नरश्रेष्ठः पूजयामास शंकरम्। ततस्तुष्टः स भगवान्वरं दातुं समुत्सुकः
putrakāmo naraśreṣṭhaḥ pūjayāmāsa śaṁkaram| tatastuṣṭaḥ sa bhagavānvaraṁ dātuṁ samutsukaḥ
पुत्र की कामना करने वाले उस श्रेष्ठ नरपति ने शंकर की पूजा की; तब प्रसन्न होकर वह भगवान् वर देने के लिए उत्सुक हो गये।
श्लोक 5 (skanda.7.172.5)
अष्टौ पुत्रान्ददौ तस्मै कन्यां चैकां यशस्विनीम्। स तु प्राप्याभिलषितं कृतकृत्यो नराधिपः
aṣṭau putrāndadau tasmai kanyāṁ caikāṁ yaśasvinīm| sa tu prāpyābhilaṣitaṁ kṛtakṛtyo narādhipaḥ
उन्होंने उसे आठ पुत्र और एक यशस्विनी कन्या प्रदान की; अभीष्ट को प्राप्त कर वह राजा कृतकृत्य हो गया।
श्लोक 6 (skanda.7.172.6)
भारतं नवधा कृत्वा पुत्रेभ्यः प्रददौ पृथक्। तेषां नामांकितान्येव ततो द्वीपानि जज्ञिरे
bhārataṁ navadhā kṛtvā putrebhyaḥ pradadau pṛthak| teṣāṁ nāmāṁkitānyeva tato dvīpāni jajñire
उसने भारतवर्ष को नौ भागों में विभक्त कर पृथक्-पृथक् पुत्रों को दिया; तब उनके नामों से अंकित द्वीप उत्पन्न हुए।
श्लोक 7 (skanda.7.172.7)
इन्द्रद्वीपः कसेरुश्च ताम्रवर्णो गभस्तिमान्। नागद्वीपस्तथा सौम्यो गान्धर्वस्त्वथ चारुणः
indradvīpaḥ kaseruśca tāmravarṇo gabhastimān| nāgadvīpastathā saumyo gāndharvastvatha cāruṇaḥ
इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गान्धर्व और चारुण (द्वीप)—
श्लोक 8 (skanda.7.172.8)
अयं तु नवमो द्वीपः कुमार्या संज्ञितः प्रिये। अष्टौ द्वीपाः समुद्रेण प्लाविताश्च तथापरे
ayaṁ tu navamo dvīpaḥ kumāryā saṁjñitaḥ priye| aṣṭau dvīpāḥ samudreṇa plāvitāśca tathāpare
हे प्रिये, यह नवाँ द्वीप कुमारी नाम से जाना जाता है; शेष आठ द्वीप समुद्र से प्लावित हो गये।
श्लोक 9 (skanda.7.172.9)
ग्रामादिदेशसंयुक्ताः स्थिताः सागरमध्यगाः। एक एव स्थितस्तेषां कुमार्याख्यस्तु सांप्रतम्
grāmādideśasaṁyuktāḥ sthitāḥ sāgaramadhyagāḥ| eka eva sthitasteṣāṁ kumāryākhyastu sāṁpratam
वे गाँव आदि प्रदेशों से युक्त होकर सागर के मध्य में स्थित थे; अब उनमें से केवल कुमारी नामक द्वीप ही शेष है।
श्लोक 10 (skanda.7.172.10)
बिंदुसरः प्रभृत्येव सागराद्दक्षिणोत्तरम्। योजनानां सहस्रं तु एकं विस्तीर्ण एव तु
biṁdusaraḥ prabhṛtyeva sāgarāddakṣiṇottaram| yojanānāṁ sahasraṁ tu ekaṁ vistīrṇa eva tu
बिन्दुसरोवर से लेकर समुद्र तक दक्षिण-उत्तर में यह एक सहस्र योजन विस्तृत है।
श्लोक 11 (skanda.7.172.11)
योजनानां सहस्राणि नव दैर्घ्यं प्रकीर्तितम्। तस्यैतज्जृम्भितं देवि भरतस्य महात्मनः
yojanānāṁ sahasrāṇi nava dairghyaṁ prakīrtitam| tasyaitajjṛmbhitaṁ devi bharatasya mahātmanaḥ
नौ सहस्र योजन इसकी लम्बाई कही गई है; हे देवि, यह उस महात्मा भरत का विस्तार है।
श्लोक 12 (skanda.7.172.12)
षट्पञ्चाशदश्वमेधान्गंगामनु चकार यः। यस्त्रिंशद्यमुनाप्रान्ते भरतो लोकपूजितः
ṣaṭpañcāśadaśvamedhāngaṁgāmanu cakāra yaḥ| yastriṁśadyamunāprānte bharato lokapūjitaḥ
जिन्होंने गंगा के तट पर छप्पन अश्वमेध यज्ञ किए और यमुना के तट पर तीस, वे लोकपूजित भरत—
श्लोक 13 (skanda.7.172.13)
स चेश्वरप्रसादेन मोदते दिवि देववत्
sa ceśvaraprasādena modate divi devavat
वे ईश्वर के प्रसाद से स्वर्ग में देवताओं के समान आनन्द भोगते हैं।
श्लोक 14 (skanda.7.172.14)
यस्तत्प्रतिष्ठितं लिंगं भारतं पूजयिष्यति। स सर्वयज्ञदानानां फलं प्रापयिता धुवम्
yastatpratiṣṭhitaṁ liṁgaṁ bhārataṁ pūjayiṣyati| sa sarvayajñadānānāṁ phalaṁ prāpayitā dhuvam
जो कोई उस भरत द्वारा प्रतिष्ठित लिंग की पूजा करेगा, वह निश्चय ही समस्त यज्ञों और दानों के फल को प्राप्त करने वाला होगा।
श्लोक 15 (skanda.7.172.15)
कार्त्तिक्यां कृत्तिका योगे यस्तं पश्यति मानवः। न स पश्यति स्वप्नेपि नरकं घोरदारुणम्
kārttikyāṁ kṛttikā yoge yastaṁ paśyati mānavaḥ| na sa paśyati svapne'pi narakaṁ ghoradāruṇam
कार्तिकी में कृत्तिका नक्षत्र के योग में जो मनुष्य उसका दर्शन करता है, वह स्वप्न में भी भीषण और घोर नरक को नहीं देखता।