Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 20

चन्द्रोत्पत्तिवर्णनम्

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21

श्लोक 1 (skanda.7.20.1)

ईश्वर उवाच। अथ दैत्यावताराणां क्रमो हि कथ्यते पुनः। हिरण्यकशिपू राजा वर्षाणामर्बुदं बभौ

īśvara uvāca| atha daityāvatārāṇāṁ kramo hi kathyate punaḥ| hiraṇyakaśipū rājā varṣāṇāmarbudaṁ babhau

ईश्वर ने कहा—अब दैत्यों के अवतारों का क्रम पुनः कहा जाता है। राजा हिरण्यकशिपु दस करोड़ वर्षों तक (त्रिलोक-अधिपति रूप में) सुशोभित हुआ।

श्लोक 2 (skanda.7.20.2)

तथा शत सहस्राणि यानि कानि द्विसप्ततिम्। अशीतिं च सहस्राणि त्रैलोक्यस्येश्वरोऽभवत्

tathā śata sahasrāṇi yāni kāni dvisaptatim| aśītiṁ ca sahasrāṇi trailokyasyeśvaro'bhavat

और एक लाख वर्ष, तथा बहत्तर हजार और अस्सी हजार वर्षों तक भी वह त्रैलोक्य का ईश्वर रहा।

श्लोक 3 (skanda.7.20.3)

सौत्येऽहन्यतिरात्रस्य कश्यपस्याश्वमेधिके

sautye'hanyatirātrasya kaśyapasyāśvamedhike

कश्यप के अश्वमेध यज्ञ में, अतिरात्र के सौत्य दिन में—

श्लोक 4 (skanda.7.20.4)

उपक्षिप्ता सनं यत्तु होतुरर्थे हिरण्मयम्। निषसाद स गर्तोऽत्र हिरण्यकशिपुस्ततः

upakṣiptā sanaṁ yattu hoturarthe hiraṇmayam| niṣasāda sa garto'tra hiraṇyakaśipustataḥ

—जब होता के निमित्त एक सुवर्णमय आसन रखा गया, तब वहाँ हिरण्यकशिपु उस गर्त में जा बैठा।

श्लोक 5 (skanda.7.20.5)

शतवर्षसहस्राणां तपश्चक्रे सुदुश्चरम्। दशवर्षसहस्राणि दित्या गर्भे स्थितः पुरा

śatavarṣasahasrāṇāṁ tapaścakre suduścaram| daśavarṣasahasrāṇi dityā garbhe sthitaḥ purā

उसने एक लाख वर्षों तक अत्यंत दुष्कर तप किया; पूर्वकाल में वह दस हजार वर्षों तक दिति के गर्भ में स्थित रहा था।

श्लोक 6 (skanda.7.20.6)

हिरण्यकशिपोर्दैत्यः श्लोको गीतः पुरातनः। राजा हिरण्यकशिपुर्यां यामाशां निरीक्षते

hiraṇyakaśipordaityaḥ śloko gītaḥ purātanaḥ| rājā hiraṇyakaśipuryāṁ yāmāśāṁ nirīkṣate

हिरण्यकशिपु दैत्य के विषय में एक पुरातन श्लोक गाया गया है—"राजा हिरण्यकशिपु जिस-जिस दिशा की ओर देखता था,

श्लोक 7 (skanda.7.20.7)

तस्यां तस्यां दिशि सुरा नमश्चक्रुः सहर्षिभिः १। पर्याये तस्य राजाभूद्बलिर्वर्षार्बुदं पुनः

tasyāṁ tasyāṁ diśi surā namaścakruḥ saharṣibhiḥ 1| paryāye tasya rājābhūdbalirvarṣārbudaṁ punaḥ

उसी-उसी दिशा में देवता ऋषियों सहित नमस्कार करते थे।" उसके पश्चात् बलि पुनः दस करोड़ वर्षों तक राजा हुआ।

श्लोक 8 (skanda.7.20.8)

षष्टिं चैव सहस्राणि त्रिंशच्च नियुतानि च। बले राज्याधिकारस्तु याव त्कालं बभूव ह

ṣaṣṭiṁ caiva sahasrāṇi triṁśacca niyutāni ca| bale rājyādhikārastu yāva tkālaṁ babhūva ha

साठ हजार वर्ष तथा तीस नियुत वर्ष—इतने काल तक बलि का राज्याधिकार बना रहा।

श्लोक 9 (skanda.7.20.9)

प्रह्लादो निगृहीतोऽभूत्तावत्कालं तथा सुरैः १। इंद्रादयस्ते विख्याता असुराञ्जघ्नुरोजसा

prahlādo nigṛhīto'bhūttāvatkālaṁ tathā suraiḥ 1| iṁdrādayaste vikhyātā asurāñjaghnurojasā

उतने ही समय तक प्रह्लाद देवताओं द्वारा नियंत्रित रहा; उस समय विख्यात इंद्र आदि देवताओं ने अपने बल से असुरों का वध किया।

श्लोक 10 (skanda.7.20.10)

दैत्यसंस्थमिदं सर्वमा सीद्दशयुगं किल। असपत्नं ततः सर्वमष्टादशयुगं पुनः

daityasaṁsthamidaṁ sarvamā sīddaśayugaṁ kila| asapatnaṁ tataḥ sarvamaṣṭādaśayugaṁ punaḥ

यह संपूर्ण जगत् दस युगों तक दैत्यों के अधीन रहा; इसके पश्चात् अठारह युगों तक यह पूर्णतः निष्कंटक (देवताओं के अधीन) रहा।

श्लोक 11 (skanda.7.20.11)

त्रैलोक्यमिदमव्यग्रं महेंद्रेण तु पालितम्। त्रेतायुगे तु दशमे कार्त्तवीर्यो महाबलः

trailokyamidamavyagraṁ maheṁdreṇa tu pālitam| tretāyuge tu daśame kārttavīryo mahābalaḥ

यह त्रैलोक्य महेंद्र द्वारा निर्विघ्न रूप से पालित हुआ। फिर दसवें त्रेतायुग में महाबली कार्तवीर्य—

श्लोक 12 (skanda.7.20.12)

पंचाशीतिसहस्राणि वर्षाणां वै नराधिपः। स सप्तरत्नवान्सम्राट् चक्रवर्ती बभूव ह

paṁcāśītisahasrāṇi varṣāṇāṁ vai narādhipaḥ| sa saptaratnavānsamrāṭ cakravartī babhūva ha

—पचासी हजार वर्षों तक राजा रहा; वह सप्तरत्नधारी सम्राट् और चक्रवर्ती हुआ।

श्लोक 13 (skanda.7.20.13)

द्वीपेषु सप्तसु स वै खड्गी चर्मी शरासनी। रथी राजा सानुचरो योगाच्चौरानपश्यत

dvīpeṣu saptasu sa vai khaḍgī carmī śarāsanī| rathī rājā sānucaro yogāccaurānapaśyata

सातों द्वीपों में खड्ग, ढाल और धनुष धारण किए हुए, रथ पर सवार वह राजा अपने अनुचरों सहित योगबल से चोरों को देख लेता था।

श्लोक 14 (skanda.7.20.14)

प्रणष्टद्रव्यता यस्य स्मरणान्न भवेन्नृणाम्। चतुर्युगे त्वतिक्रांते मनौ ह्येकादशे प्रभौ

praṇaṣṭadravyatā yasya smaraṇānna bhavennṛṇām| caturyuge tvatikrāṁte manau hyekādaśe prabhau

उसका स्मरण मात्र करने से मनुष्यों की वस्तुएँ नष्ट नहीं होती थीं। एक चतुर्युग बीत जाने पर, ग्यारहवें मनु के शासन में—

श्लोक 15 (skanda.7.20.15)

अर्द्धावशिष्टे तस्मिंस्तु द्वापरे संप्रवर्तिते। मानवस्य नरिष्यंतो ह्यासीत्पुत्रो मदः किल

arddhāvaśiṣṭe tasmiṁstu dvāpare saṁpravartite| mānavasya nariṣyaṁto hyāsītputro madaḥ kila

—और उसका आधा भाग शेष रहते, द्वापर के प्रवर्तित होने पर, मानव नरिष्यंत का पुत्र मद नामक हुआ।

श्लोक 16 (skanda.7.20.16)

नवमस्तस्य दायादस्तृणबिंदुरिति स्मृतः। त्रेतायुगमुखे राजा तृतीये संबभूव ह

navamastasya dāyādastṛṇabiṁduriti smṛtaḥ| tretāyugamukhe rājā tṛtīye saṁbabhūva ha

उसका नवाँ वंशज तृणबिंदु नाम से स्मृत है; वह तीसरे त्रेतायुग के आरंभ में राजा हुआ।

श्लोक 17 (skanda.7.20.17)

तस्य कन्या त्विलविला रूपे णाप्रतिमाऽभवत्। पुलस्त्याय स राजर्षिस्तां कन्यां प्रत्यपादयत्

tasya kanyā tvilavilā rūpe ṇāpratimā'bhavat| pulastyāya sa rājarṣistāṁ kanyāṁ pratyapādayat

उसकी पुत्री इलविला रूप में अनुपम थी; उस राजर्षि ने वह कन्या पुलस्त्य को प्रदान की।

श्लोक 18 (skanda.7.20.18)

ऋषिरैलविलो यस्यां विश्रवाः समपद्यत। तस्य पत्न्यश्च तिस्रस्तु पौलस्त्यकुलमंडनाः

ṛṣirailavilo yasyāṁ viśravāḥ samapadyata| tasya patnyaśca tisrastu paulastyakulamaṁḍanāḥ

उससे ऋषि विश्रवा, जो ऐलविल कहलाए, उत्पन्न हुए। उनकी तीन पत्नियाँ थीं, जो पौलस्त्य कुल की भूषण थीं।

श्लोक 19 (skanda.7.20.19)

बृहस्पतेः शुभा कन्या नाम्ना वै वेदवर्णिनी। पुष्पोत्कटा च वीका च उभे माल्यवतः सुते

bṛhaspateḥ śubhā kanyā nāmnā vai vedavarṇinī| puṣpotkaṭā ca vīkā ca ubhe mālyavataḥ sute

बृहस्पति की शुभ कन्या, वेदवर्णिनी नाम वाली; तथा पुष्पोत्कटा और वीका—दोनों मान्यवान् की पुत्रियाँ।

श्लोक 20 (skanda.7.20.20)

केकसी मालिनः कन्या तस्यां देवि शृणु प्रजाः। ज्येष्ठं वैश्रवणं तस्य सुषुवे वरवर्णिनी

kekasī mālinaḥ kanyā tasyāṁ devi śṛṇu prajāḥ| jyeṣṭhaṁ vaiśravaṇaṁ tasya suṣuve varavarṇinī

और मालिन की पुत्री केकसी—हे देवी! उससे उत्पन्न संतानों को सुनो। उस वरवर्णिनी ने उनके ज्येष्ठ पुत्र वैश्रवण (कुबेर) को जन्म दिया।

श्लोक 21 (skanda.7.20.21)

अष्टदं हरिच्छ्मश्रुं शंकुकर्णं विलोहितम्। श्वपादं ह्रस्वबाहुं च पिंगलं शुचिभूषणम्

aṣṭadaṁ haricchmaśruṁ śaṁkukarṇaṁ vilohitam| śvapādaṁ hrasvabāhuṁ ca piṁgalaṁ śucibhūṣaṇam

वह आठ दाँतों वाला, पिंगल दाढ़ी वाला, नुकीले कानों वाला, अत्यंत लाल वर्ण वाला, श्वान-सदृश पैरों वाला, छोटी भुजाओं वाला, पीत नेत्रों वाला तथा शुद्ध आभूषणों वाला था।

श्लोक 22 (skanda.7.20.22)

त्रिपादं तु महाकायं स्थूलशीर्षं महाहनुम्। एवंविधं सुतं दृष्ट्वा विरूपं रूपतस्तदा

tripādaṁ tu mahākāyaṁ sthūlaśīrṣaṁ mahāhanum| evaṁvidhaṁ sutaṁ dṛṣṭvā virūpaṁ rūpatastadā

तीन पैरों वाला, विशाल शरीर वाला, स्थूल शिर वाला, बड़ी हनु वाला। ऐसे विरूप पुत्र को रूप की दृष्टि से देखकर—

श्लोक 23 (skanda.7.20.23)

तदा दृष्ट्वाब्रवीत्तं तु कुबेरोऽयमिति स्वयम्। कुत्सायां क्वितिशब्दोयं शरीरं वेरमुच्यते

tadā dṛṣṭvābravīttaṁ tu kubero'yamiti svayam| kutsāyāṁ kvitiśabdoyaṁ śarīraṁ veramucyate

—उसे देखकर विश्रवा ने स्वयं उसे "कुबेर" कहा; "कु" शब्द निंदा में प्रयुक्त होता है, और "वेर" शरीर को कहते हैं।

श्लोक 24 (skanda.7.20.24)

कुबेरः कुशरीरत्वान्नाम्ना तेन च सोंकितः। तस्य भार्य्याऽभवद्वृद्धिः पुत्रस्तु नलकूबरः

kuberaḥ kuśarīratvānnāmnā tena ca soṁkitaḥ| tasya bhāryyā'bhavadvṛddhiḥ putrastu nalakūbaraḥ

कुशरीर होने के कारण वह उसी नाम से अंकित हुआ, अर्थात् कुबेर। उसकी पत्नी वृद्धि थी, और पुत्र नलकूबर था।

श्लोक 25 (skanda.7.20.25)

कैकस्यजनयत्पुत्रं रावणं राक्षसाधिपम्। शंकुकर्णं दशग्रीवं पिगलं रक्तमूर्द्धजम्

kaikasyajanayatputraṁ rāvaṇaṁ rākṣasādhipam| śaṁkukarṇaṁ daśagrīvaṁ pigalaṁ raktamūrddhajam

केकसी ने राक्षसों के अधिपति रावण नामक पुत्र को जन्म दिया—नुकीले कानों वाला, दस ग्रीवाओं वाला, पीत वर्ण वाला, लाल केशों वाला।

श्लोक 26 (skanda.7.20.26)

वसुपादं विंशद्भुजं महाकायं महाबलम्। कालांजननिभं चैव दंष्ट्रिणं रक्तलोचनम्

vasupādaṁ viṁśadbhujaṁ mahākāyaṁ mahābalam| kālāṁjananibhaṁ caiva daṁṣṭriṇaṁ raktalocanam

आठ पैरों वाला, बीस भुजाओं वाला, विशाल शरीर वाला, महाबली; काजल के समान काला, दाढ़ों वाला, लाल नेत्रों वाला।

श्लोक 27 (skanda.7.20.27)

राक्षसेनौजसा युक्तं रूपेण च बलेन च। निसर्गाद्दारुणः क्रूरो रावणाद्रावणः स्मृतः

rākṣasenaujasā yuktaṁ rūpeṇa ca balena ca| nisargāddāruṇaḥ krūro rāvaṇādrāvaṇaḥ smṛtaḥ

राक्षस-तेज, रूप और बल से युक्त, स्वभाव से भीषण और क्रूर—"रावण" (गर्जन करने वाला) होने के कारण वह "रावण" नाम से स्मृत हुआ।

श्लोक 28 (skanda.7.20.28)

हिरण्यकशिपुस्त्वासीत्स राजा पूर्वजन्मनि। चतुर्युगानि राजा तु तथा दश स राक्षसः

hiraṇyakaśipustvāsītsa rājā pūrvajanmani| caturyugāni rājā tu tathā daśa sa rākṣasaḥ

पूर्वजन्म में वह राजा हिरण्यकशिपु था। वह चतुर्युगों तक राजा रहा, और उसी प्रकार दस चतुर्युगों तक राक्षस रहा।

श्लोक 29 (skanda.7.20.29)

पंच कोटीस्तु वर्षाणां संख्यताः संख्याया प्रिये। नियुतान्येकषष्टिं च संख्यावद्भिरुदाहृतम्

paṁca koṭīstu varṣāṇāṁ saṁkhyatāḥ saṁkhyāyā priye| niyutānyekaṣaṣṭiṁ ca saṁkhyāvadbhirudāhṛtam

हे प्रिये! संख्या के अनुसार पाँच करोड़ वर्ष तथा गणनाकर्ताओं द्वारा कहे गए इकसठ नियुत वर्ष—

श्लोक 30 (skanda.7.20.30)

षष्टिं चैव सहस्राणि वर्षाणां स हि रावणः। देवतानामृषीणां च घोरं कृत्वा प्रजागरम्

ṣaṣṭiṁ caiva sahasrāṇi varṣāṇāṁ sa hi rāvaṇaḥ| devatānāmṛṣīṇāṁ ca ghoraṁ kṛtvā prajāgaram

—और साठ हजार वर्ष—इतने काल तक वह रावण देवताओं और ऋषियों को घोर अनिद्रा में डाले रहा—

श्लोक 31 (skanda.7.20.31)

त्रेतायुगे चतुर्विंशे रावणस्तपसः क्षयात्। रामं दाशरथिं प्राप्य सगणः क्षयमेयिवान्

tretāyuge caturviṁśe rāvaṇastapasaḥ kṣayāt| rāmaṁ dāśarathiṁ prāpya sagaṇaḥ kṣayameyivān

—और चौबीसवें त्रेतायुग में रावण, अपने तप के क्षय के कारण, दशरथ-पुत्र राम को पाकर अपने गणों सहित नष्ट हो गया।

श्लोक 32 (skanda.7.20.32)

योऽसौ देवि दशग्रीवः संबभूवारिमर्द्दनः। दमघोषस्य राजर्षेः पुत्रो विख्यातपौरुषः

yo'sau devi daśagrīvaḥ saṁbabhūvārimarddanaḥ| damaghoṣasya rājarṣeḥ putro vikhyātapauruṣaḥ

हे देवी! वही शत्रुओं को कुचलने वाला दशग्रीव, दमघोष राजर्षि के विख्यात पराक्रमी पुत्र के रूप में—

श्लोक 33 (skanda.7.20.33)

श्रुतश्रवायां चैद्यस्तु शिशुपालो बभूव ह। रावणं कुंभकर्णं च कन्यां शूर्पणखां तथा

śrutaśravāyāṁ caidyastu śiśupālo babhūva ha| rāvaṇaṁ kuṁbhakarṇaṁ ca kanyāṁ śūrpaṇakhāṁ tathā

—श्रुतश्रवा से शिशुपाल नामक चैद्य राजा हुआ। रावण, कुम्भकर्ण और कन्या शूर्पणखा—

श्लोक 34 (skanda.7.20.34)

विभीषणं चतुर्थं च कैकस्यजनयत्सुतान्। मनोहरः प्रहस्तश्च महापार्श्वः खरस्तथा

vibhīṣaṇaṁ caturthaṁ ca kaikasyajanayatsutān| manoharaḥ prahastaśca mahāpārśvaḥ kharastathā

—तथा चौथे विभीषण—इन पुत्रों को केकसी ने जन्म दिया। मनोहर, प्रहस्त, महापार्श्व तथा खर भी—

श्लोक 35 (skanda.7.20.35)

पुष्पोत्कटायास्ते पुत्राः कन्या कुम्भीनसी तथा। त्रिशिरा दूषणश्चैव विद्युज्जिह्वश्च राक्षसः। कन्यैका श्यामिका नाम वीकायाः प्रसवः स्मृतः

puṣpotkaṭāyāste putrāḥ kanyā kumbhīnasī tathā| triśirā dūṣaṇaścaiva vidyujjihvaśca rākṣasaḥ| kanyaikā śyāmikā nāma vīkāyāḥ prasavaḥ smṛtaḥ

—ये पुष्पोत्कटा के पुत्र थे, तथा कन्या कुम्भीनसी भी; त्रिशिरा, दूषण और राक्षस विद्युज्जिह्व। वीका की एक कन्या श्यामिका नाम से स्मृत है।

श्लोक 36 (skanda.7.20.36)

इत्येते क्रूरकर्माणः पौलस्त्या राक्षसा नव। विभीषणो विशुद्धात्मा दशमः परिकीर्तितः

ityete krūrakarmāṇaḥ paulastyā rākṣasā nava| vibhīṣaṇo viśuddhātmā daśamaḥ parikīrtitaḥ

इस प्रकार ये नौ क्रूरकर्मी पौलस्त्य राक्षस हुए; और विशुद्ध आत्मा वाले विभीषण को दसवाँ कहा गया है।

श्लोक 37 (skanda.7.20.37)

पुलहस्य मृगाः पुत्राः सर्वे व्यालाश्च दंष्ट्रिणः। भूताः पिशाचाः सर्पाश्च शूकरा हस्तिनस्तथा

pulahasya mṛgāḥ putrāḥ sarve vyālāśca daṁṣṭriṇaḥ| bhūtāḥ piśācāḥ sarpāśca śūkarā hastinastathā

पुलह के पुत्र मृग, समस्त दाढ़ों वाले सर्प, भूत, पिशाच, सर्प, शूकर तथा हाथी थे।

श्लोक 38 (skanda.7.20.38)

अनपत्यः क्रतुस्त्वस्मिन्स्मृतो वैवस्वतेंतरे। अत्रेः पत्न्यो दशैवासन्सुन्दर्यश्च पतिव्रताः

anapatyaḥ kratustvasminsmṛto vaivasvateṁtare| atreḥ patnyo daśaivāsansundaryaśca pativratāḥ

इस वैवस्वत मन्वंतर में क्रतु संतानरहित स्मृत हैं। अत्रि की दस पत्नियाँ थीं, सुंदर और पतिव्रता।

श्लोक 39 (skanda.7.20.39)

भद्राश्वस्य घृताच्यंता जज्ञिरे दश चाप्सराः

bhadrāśvasya ghṛtācyaṁtā jajñire daśa cāpsarāḥ

भद्राश्वा से लेकर घृताची तक, दस अप्सराएँ उत्पन्न हुईं (उनकी पत्नियों के रूप में)।

श्लोक 40 (skanda.7.20.40)

भद्रा शूद्रा च मद्रा च नलदा जलदा तथा। उर्णा पूर्णा च देवेशि या च गोपुच्छला स्मृता

bhadrā śūdrā ca madrā ca naladā jaladā tathā| urṇā pūrṇā ca deveśi yā ca gopucchalā smṛtā

भद्रा, शूद्रा, मद्रा, नलदा तथा जलदा; उर्णा, पूर्णा—हे देवेशि! तथा जो गोपुच्छला नाम से स्मृत है,

श्लोक 41 (skanda.7.20.41)

तथा तामरसा नाम दशमी रक्तकोटिका। एतासां च महादेवि ख्यातो भर्त्ता प्रभाकरः

tathā tāmarasā nāma daśamī raktakoṭikā| etāsāṁ ca mahādevi khyāto bharttā prabhākaraḥ

और दसवीं तामरसा, जो रक्तकोटिका नाम से भी जानी जाती है। हे महादेवी! इन सबका विख्यात पति प्रभाकर था।

श्लोक 42 (skanda.7.20.42)

स्वर्भानुना हते सूर्ये पतितेस्मिन्दिवो महीम्। तमोऽभिभूते लोकेस्मिन्प्रभा येन प्रवर्त्तिता

svarbhānunā hate sūrye patitesmindivo mahīm| tamo'bhibhūte lokesminprabhā yena pravarttitā

जब स्वर्भानु द्वारा आहत सूर्य आकाश से पृथ्वी पर गिर रहे थे, और यह जगत् अंधकार से आच्छन्न हो गया था, तब उन्हीं (प्रभाकर) के द्वारा प्रकाश पुनः प्रवर्तित हुआ।

श्लोक 43 (skanda.7.20.43)

स्वस्ति तेस्त्विति चैवोक्तः पतन्निह दिवाकरः। ब्रह्मर्षेर्वचनात्तस्य न पपात यतः प्रभुः

svasti testviti caivoktaḥ patanniha divākaraḥ| brahmarṣervacanāttasya na papāta yataḥ prabhuḥ

"तुम्हारा कल्याण हो" ऐसा कहे जाने पर, यहाँ गिरता हुआ दिवाकर, उस ब्रह्मर्षि के वचन के कारण नहीं गिरा, क्योंकि वे स्वयं प्रभावशाली थे।

श्लोक 44 (skanda.7.20.44)

ततः प्रभाकरेत्युक्तः प्रभुरेवं महर्षिभिः। भद्रायां जनयामाम् सोमं पुत्रं यशस्विनम्

tataḥ prabhākaretyuktaḥ prabhurevaṁ maharṣibhiḥ| bhadrāyāṁ janayāmām somaṁ putraṁ yaśasvinam

तब महर्षियों द्वारा "प्रभाकर" कहे गए उस प्रभु ने भद्रा में यशस्वी पुत्र सोम को जन्म दिया।

श्लोक 45 (skanda.7.20.45)

त्विषिमान्धर्मपुत्रस्तु सोमो देवो वरस्तु सः। शीतरश्मिः समुत्पन्नः कृत्तिकासु निशाचरः

tviṣimāndharmaputrastu somo devo varastu saḥ| śītaraśmiḥ samutpannaḥ kṛttikāsu niśācaraḥ

तेजस्वी, धर्मपुत्र सोम देव, वह श्रेष्ठ, शीतल किरणों वाला, कृत्तिकाओं में रात्रिचर के रूप में उत्पन्न हुआ।

श्लोक 46 (skanda.7.20.46)

पिता सोमस्य वै देवि जज्ञेऽत्रिर्भगवानृषिः। तत्रात्रिः सर्वलोकेशं भृत्वा स्वे नयने स्थितः

pitā somasya vai devi jajñe'trirbhagavānṛṣiḥ| tatrātriḥ sarvalokeśaṁ bhṛtvā sve nayane sthitaḥ

हे देवी! सोम के पिता भगवान् ऋषि अत्रि हुए। वहाँ अत्रि सर्वलोकेश्वर को अपने नेत्रों में धारण किए हुए स्थित रहे।

श्लोक 47 (skanda.7.20.47)

कर्मणा मनसा वाचा शुभान्येव समा चरत्। काष्ठकुड्यशिलाभूत ऊर्द्ध्वबाहुर्महाद्युतिः

karmaṇā manasā vācā śubhānyeva samā carat| kāṣṭhakuḍyaśilābhūta ūrddhvabāhurmahādyutiḥ

—कर्म, मन और वाणी से केवल शुभ आचरण करते हुए, काठ, दीवार या पत्थर के समान निश्चल, भुजाएँ ऊपर उठाए, महातेजस्वी—

श्लोक 48 (skanda.7.20.48)

सुदुस्तरं नाम तपस्तेन तप्तं महत्पुरा। त्रीणि वर्षसहस्राणि दिव्यानि सुरसुंदरि

sudustaraṁ nāma tapastena taptaṁ mahatpurā| trīṇi varṣasahasrāṇi divyāni surasuṁdari

—उसने पूर्वकाल में सुदुस्तर नामक महान् तप तीन हजार दिव्य वर्षों तक किया, हे देवसुंदरी!

श्लोक 49 (skanda.7.20.49)

तस्योर्द्ध्वरेतसस्तत्र स्थितस्यानिमिषस्य ह। सोमत्वं वपुरापेदे महाबुद्धेस्तु वै शुभे

tasyorddhvaretasastatra sthitasyānimiṣasya ha| somatvaṁ vapurāpede mahābuddhestu vai śubhe

ऊर्ध्वरेता होकर वहाँ स्थित, अनिमिष, महाबुद्धिमान् उस अत्रि का शरीर ही, हे शुभे! सोम-रूप को प्राप्त हुआ।

श्लोक 50 (skanda.7.20.50)

ऊर्द्ध्वमाचक्रमे तस्य सोमसंभावितात्मनः। नेत्राभ्यां सोमः सुस्राव दशधा द्योतयन्दिशः

ūrddhvamācakrame tasya somasaṁbhāvitātmanaḥ| netrābhyāṁ somaḥ susrāva daśadhā dyotayandiśaḥ

सोम-भावित आत्मा वाले उस अत्रि से वह ऊपर की ओर उठा, और उनके दोनों नेत्रों से सोम बहकर दसों दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ प्रवाहित हुआ।

श्लोक 51 (skanda.7.20.51)

तद्गर्भं विधिना दृष्टा दिशोदश दधुस्तदा। समेत्य धारयामासुर्न च धर्तुमशक्नुवन्

tadgarbhaṁ vidhinā dṛṣṭā diśodaśa dadhustadā| sametya dhārayāmāsurna ca dhartumaśaknuvan

विधि द्वारा उस गर्भ को देखकर, तब दसों दिशाओं ने उसे धारण किया; वे मिलकर उसे धारण करने का प्रयत्न करने लगीं, परंतु धारण करने में समर्थ न हो सकीं।

श्लोक 52 (skanda.7.20.52)

स ताभ्यः सहसैवेह दिग्भ्यो गर्भश्च शाश्वतः। पपात भावयँल्लोकाञ्छीतांशुः सर्वभावनः

sa tābhyaḥ sahasaiveha digbhyo garbhaśca śāśvataḥ| papāta bhāvayãllokāñchītāṁśuḥ sarvabhāvanaḥ

वह शाश्वत गर्भ उन दिशाओं से सहसा ही यहाँ गिर पड़ा—वह शीतकिरण, सर्वभावन, लोकों को प्रकाशित करता हुआ।

श्लोक 53 (skanda.7.20.53)

यदा न धारणे शक्तास्तस्य गर्भस्य ताः स्त्रियः। ततस्ताभ्यः स शीतांशुर्निपपात वसुंधराम्

yadā na dhāraṇe śaktāstasya garbhasya tāḥ striyaḥ| tatastābhyaḥ sa śītāṁśurnipapāta vasuṁdharām

जब वे स्त्रियाँ (दिशाएँ) उस गर्भ को धारण करने में असमर्थ हुईं, तब उनसे वह शीतांशु पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 54 (skanda.7.20.54)

पतितं सोममालोक्य ब्रह्मा लोकपितामहः। रथमारोपयामास लोकानां हितका म्यया

patitaṁ somamālokya brahmā lokapitāmahaḥ| rathamāropayāmāsa lokānāṁ hitakā myayā

सोम को गिरा हुआ देखकर, लोकपितामह ब्रह्मा ने लोकों के कल्याण की कामना से उसे रथ पर आरूढ़ कर दिया।

श्लोक 55 (skanda.7.20.55)

स तदैव मया देवि धर्मार्थं सत्यसंगरः। युक्तो वाजिसहस्रेण सितेन सुरसुंदरि

sa tadaiva mayā devi dharmārthaṁ satyasaṁgaraḥ| yukto vājisahasreṇa sitena surasuṁdari

हे देवसुंदरी! उसी समय मेरे द्वारा, धर्म के लिए सत्यप्रतिज्ञ होकर, वह सफेद सहस्र अश्वों से युक्त किया गया।

श्लोक 56 (skanda.7.20.56)

तस्मिन्निपतिते देवि पुत्रेत्रेः परमात्म नि। तुष्टुवुर्ब्रह्मणः पुत्रा मानसाः सप्त ये श्रुताः

tasminnipatite devi putretreḥ paramātma ni| tuṣṭuvurbrahmaṇaḥ putrā mānasāḥ sapta ye śrutāḥ

हे देवी! परमात्मा-स्वरूप उस अत्रिपुत्र के गिरने पर, ब्रह्मा के सात मानस पुत्र, जो श्रुति में प्रसिद्ध हैं, उसकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 57 (skanda.7.20.57)

तथैवांगिरसः सर्वे भृगोश्चैवात्मजास्तथा। ऋग्भिस्तु सामभिश्चैव तथैवांगिरसैरपि

tathaivāṁgirasaḥ sarve bhṛgoścaivātmajāstathā| ṛgbhistu sāmabhiścaiva tathaivāṁgirasairapi

और वैसे ही अंगिरा के सभी पुत्र, तथा भृगु के भी पुत्र—ऋचाओं से, सामों से, तथा आंगिरस मंत्रों से भी—

श्लोक 58 (skanda.7.20.58)

तस्य संस्तूयमानस्य तेजः सोमस्य भास्वतः। आप्यायमानं लोकांस्त्रीन्भासयामास सर्वशः

tasya saṁstūyamānasya tejaḥ somasya bhāsvataḥ| āpyāyamānaṁ lokāṁstrīnbhāsayāmāsa sarvaśaḥ

—इस प्रकार स्तुति किए जाते हुए उस देदीप्यमान सोम का तेज, बढ़ता हुआ, तीनों लोकों को सब ओर से प्रकाशित करने लगा।

श्लोक 59 (skanda.7.20.59)

स तेन रथमुख्येन सागरांतां वसुंधराम्। त्रिःसप्तकृत्वोतियशाश्चकाराभिप्रदक्षिणम्

sa tena rathamukhyena sāgarāṁtāṁ vasuṁdharām| triḥsaptakṛtvotiyaśāścakārābhipradakṣiṇam

उस प्रमुख रथ द्वारा उस अत्यंत यशस्वी सोम ने सागर-पर्यंत पृथ्वी की इक्कीस बार परिक्रमा की।

श्लोक 60 (skanda.7.20.60)

तस्य यच्चापि तत्तेजः पृथिवीमन्वपद्यत। ओषध्यस्ताः समुत्पन्नास्ते जसाऽज्वलयन्पुनः

tasya yaccāpi tattejaḥ pṛthivīmanvapadyata| oṣadhyastāḥ samutpannāste jasā'jvalayanpunaḥ

और उसका जो भी तेज पृथ्वी पर पड़ा, उससे औषधियाँ उत्पन्न हुईं, जो पुनः उसी तेज से प्रज्वलित हो उठीं।

श्लोक 61 (skanda.7.20.61)

ताभिर्धिनोत्ययं लोकं प्रजाश्चैव चतुर्विधाः। ओषध्यः फलपाकांताः कणाः सप्तदश स्मृताः

tābhirdhinotyayaṁ lokaṁ prajāścaiva caturvidhāḥ| oṣadhyaḥ phalapākāṁtāḥ kaṇāḥ saptadaśa smṛtāḥ

उनके द्वारा वह इस लोक तथा चार प्रकार की प्रजाओं को तृप्त करता है। फल-पाक तक पहुँचने वाली औषधियाँ सत्रह प्रकार की स्मृत हैं—

श्लोक 62 (skanda.7.20.62)

व्रीहयश्च यवाश्चैव गोधूमा अणवस्तिलाः

vrīhayaśca yavāścaiva godhūmā aṇavastilāḥ

—धान, जौ, गेहूँ, कँगनी तथा तिल,

श्लोक 63 (skanda.7.20.63)

प्रियंगुः कोविदारश्च कोरदूषाः सतीनकाः। माषा मुद्गा मसूराश्च निष्पावाः सकुलत्थकाः

priyaṁguḥ kovidāraśca koradūṣāḥ satīnakāḥ| māṣā mudgā masūrāśca niṣpāvāḥ sakulatthakāḥ

प्रियंगु और कोविदार, कोरदूष और सतीनक; उड़द, मूँग, मसूर, निष्पाव तथा कुलथी,

श्लोक 64 (skanda.7.20.64)

आढक्यश्चणकाश्चैव कणाः सप्तदश स्मृताः। इत्येता ओषधीनां च ग्राम्याणां जातयः स्मृताः

āḍhakyaścaṇakāścaiva kaṇāḥ saptadaśa smṛtāḥ| ityetā oṣadhīnāṁ ca grāmyāṇāṁ jātayaḥ smṛtāḥ

अरहर और चना—ये सत्रह अन्न कहे गए हैं। ये सब ग्राम्य औषधियों की जातियाँ स्मृत हैं।

श्लोक 65 (skanda.7.20.65)

ओषध्यो यज्ञियाश्चैव ग्राम्या रण्याश्चतुर्द्दश। व्रीहयश्च यवाश्चैव गोधूमास्त्वणवस्तिलाः

oṣadhyo yajñiyāścaiva grāmyā raṇyāścaturddaśa| vrīhayaśca yavāścaiva godhūmāstvaṇavastilāḥ

यज्ञीय औषधियाँ, चाहे ग्राम्य हों या वन्य, चौदह हैं—धान, जौ, गेहूँ, कँगनी तथा तिल,

श्लोक 66 (skanda.7.20.66)

प्रियंगुषष्ठा इत्येते सप्तमास्तु कुलत्थकाः। श्यामाकास्त्वथ नीवारा जर्तिलाः सगवेधुकाः

priyaṁguṣaṣṭhā ityete saptamāstu kulatthakāḥ| śyāmākāstvatha nīvārā jartilāḥ sagavedhukāḥ

प्रियंगु छठा है—इस प्रकार सातवाँ कुलथी है; तत्पश्चात् श्यामाक, नीवार, जर्तिल तथा गवेधुक,

श्लोक 67 (skanda.7.20.67)

ऊरुविन्दा मर्कटकास्तथा वेणुयवाश्च ये। ग्राम्यारण्यास्तथा ह्येता ओषध्यस्तु चतुर्दश

ūruvindā markaṭakāstathā veṇuyavāśca ye| grāmyāraṇyāstathā hyetā oṣadhyastu caturdaśa

ऊरुविंद, मर्कटक तथा वेणुयव—ये सभी, ग्राम्य और वन्य मिलाकर, चौदह औषधियाँ हैं।

श्लोक 68 (skanda.7.20.68)

तृणगुल्मलता वीरुद्वल्लीगुच्छादि कोटिशः। एतेषामधिपश्चन्द्रो धारयत्यखिलं जगत्

tṛṇagulmalatā vīrudvallīgucchādi koṭiśaḥ| eteṣāmadhipaścandro dhārayatyakhilaṁ jagat

तृण, गुल्म, लता, बेलें, गुच्छे आदि करोड़ों प्रकार के हैं—इन सबका अधिपति चंद्रमा ही संपूर्ण जगत् को धारण करता है।

श्लोक 69 (skanda.7.20.69)

ज्योत्स्नाभिर्भगवान्सोमो जगतो हितकाम्यया। ततस्तस्मै ददौ राज्यं ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः

jyotsnābhirbhagavānsomo jagato hitakāmyayā| tatastasmai dadau rājyaṁ brahmā brahmavidāṁ varaḥ

भगवान् सोम जगत् के कल्याण की कामना से अपनी चाँदनी से उसे पुष्ट करते हैं; तब ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ ब्रह्मा ने उन्हें राज्य प्रदान किया—

श्लोक 70 (skanda.7.20.70)

बीजौषधीनां विप्राणां मंत्राणां च वरानने। सोऽभिषिक्तो महातेजा राजा राज्ये निशाकरः

bījauṣadhīnāṁ viprāṇāṁ maṁtrāṇāṁ ca varānane| so'bhiṣikto mahātejā rājā rājye niśākaraḥ

—बीज, औषधियों, ब्राह्मणों तथा मंत्रों पर, हे वरानने! इस प्रकार वह महातेजस्वी निशाकर राजा अपने राज्य में अभिषिक्त हुआ।

श्लोक 71 (skanda.7.20.71)

त्रीँल्लोकान्भावयामास स्वभासा भास्वतां वरः। तं सिनी च कुहूश्चैव द्युतिःपुष्टिः प्रभा वसुः

trī̃llokānbhāvayāmāsa svabhāsā bhāsvatāṁ varaḥ| taṁ sinī ca kuhūścaiva dyutiḥpuṣṭiḥ prabhā vasuḥ

उन प्रकाशमानों में श्रेष्ठ ने अपने प्रकाश से तीनों लोकों को पुष्ट किया; और सिनीवाली, कुहू, द्युति, पुष्टि, प्रभा, वसु,

श्लोक 72 (skanda.7.20.72)

कीर्तिर्धृतिश्च लक्ष्मीश्च नव देव्यः सिषेविरे। सप्तविंशतिरिंदोस्तु दाक्षायण्यो महाव्रताः

kīrtirdhṛtiśca lakṣmīśca nava devyaḥ siṣevire| saptaviṁśatiriṁdostu dākṣāyaṇyo mahāvratāḥ

कीर्ति, धृति और लक्ष्मी—इन नौ देवियों ने उनकी सेवा की। और दक्ष की सत्ताईस महाव्रता कन्याएँ—

श्लोक 73 (skanda.7.20.73)

ददौ प्राचेतसो दक्षो नक्षत्राणीति या विदुः। स तत्प्राप्य मह्द्राज्यं सोमः सोमवतां वरः

dadau prācetaso dakṣo nakṣatrāṇīti yā viduḥ| sa tatprāpya mahdrājyaṁ somaḥ somavatāṁ varaḥ

—जिन्हें विद्वान् नक्षत्र कहते हैं—दक्ष प्राचेतस ने उन्हें (विवाह में) प्रदान किया। उस महान् राज्य को पाकर सोम, सोमवानों में श्रेष्ठ,

श्लोक 74 (skanda.7.20.74)

समाजह्रे राजसूयं सहस्रशतदक्षिणम्। हिरण्यगर्भश्चोद्गाता ब्रह्मा ब्रह्मत्वमेयिवान्

samājahre rājasūyaṁ sahasraśatadakṣiṇam| hiraṇyagarbhaścodgātā brahmā brahmatvameyivān

उसने राजसूय यज्ञ किया, जिसमें दक्षिणा लाखों में थी। हिरण्यगर्भ उद्गाता हुए, और ब्रह्मा ने ब्रह्मत्व प्राप्त किया।

श्लोक 75 (skanda.7.20.75)

सदस्यस्तस्य भगवान्हरिर्नारायणः प्रभुः। सनत्कुमारप्रमुखैराद्यैर्ब्रह्मर्षिभिर्वृतः

sadasyastasya bhagavānharirnārāyaṇaḥ prabhuḥ| sanatkumārapramukhairādyairbrahmarṣibhirvṛtaḥ

उस यज्ञ के सदस्य भगवान् हरि नारायण प्रभु थे, जो सनत्कुमार आदि आद्य ब्रह्मर्षियों से घिरे हुए थे।

श्लोक 76 (skanda.7.20.76)

दक्षिणामददात्सोमस्त्रीँल्लोकांस्तु वरानने। तेभ्यो ब्रह्मर्षिमुख्येभ्यः सदस्येभ्यश्च वै शुभे

dakṣiṇāmadadātsomastrī̃llokāṁstu varānane| tebhyo brahmarṣimukhyebhyaḥ sadasyebhyaśca vai śubhe

हे वरानने! सोम ने दक्षिणा के रूप में तीनों लोकों को ही उन प्रमुख ब्रह्मर्षियों तथा सदस्यों को, हे शुभे! प्रदान किया।

श्लोक 77 (skanda.7.20.77)

प्राप्यावभृथमव्यग्रः सर्वदेवर्षिपूजितः। अतिराजति राजेन्द्रो दशधा भावयन्दिशः

prāpyāvabhṛthamavyagraḥ sarvadevarṣipūjitaḥ| atirājati rājendro daśadhā bhāvayandiśaḥ

अवभृथ स्नान को प्राप्त कर, निश्चिंत, समस्त देवर्षियों से पूजित, वह राजाधिराज दसों दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ अत्यंत सुशोभित हुआ।

श्लोक 78 (skanda.7.20.78)

तेन तत्प्राप दुष्प्राप्यमैश्वर्य्यमकृता त्मभिः। स एवं वर्त्तते चन्द्रश्चात्रेय इति विश्रुतः

tena tatprāpa duṣprāpyamaiśvaryyamakṛtā tmabhiḥ| sa evaṁ varttate candraścātreya iti viśrutaḥ

उसके द्वारा वह ऐश्वर्य प्राप्त हुआ जो असंस्कृत आत्मा वालों के लिए दुष्प्राप्य है। इस प्रकार वही चंद्रमा आज भी "आत्रेय" (अत्रि-पुत्र) नाम से विश्रुत होकर विद्यमान है।

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21