प्रभास खण्ड · अध्याय 21
सोमेश्वरोत्पत्तिप्रसंगे शिवाराधनोपदेशवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.21.1)
देव्युवाच। श्रुतं सर्वमशेषेण चन्द्रस्योत्पत्ति कारणम्। चिह्नं यथाऽभवत्तस्य सांप्रतं तत्प्रकीर्त्तय
devyuvāca| śrutaṁ sarvamaśeṣeṇa candrasyotpatti kāraṇam| cihnaṁ yathā'bhavattasya sāṁprataṁ tatprakīrttaya
देवी ने कहा—मैंने चंद्रमा की उत्पत्ति का कारण संपूर्ण रूप से सुन लिया। अब यह बताइए कि उसका कलंक-चिह्न किस प्रकार हुआ।
श्लोक 2 (skanda.7.21.2)
ईश्वर उवाच। ब्रह्मणस्तु पुरा देवि दक्षो नाम सुतोऽभवत्। प्रजाः सृजेति उद्दिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयंभुवा
īśvara uvāca| brahmaṇastu purā devi dakṣo nāma suto'bhavat| prajāḥ sṛjeti uddiṣṭaḥ pūrvaṁ dakṣaḥ svayaṁbhuvā
ईश्वर ने कहा—हे देवी! पूर्वकाल में ब्रह्मा का दक्ष नामक पुत्र हुआ। स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा दक्ष को पहले ही "प्रजा उत्पन्न करो" ऐसा आदेश दिया गया।
श्लोक 3 (skanda.7.21.3)
षष्टिं दक्षोऽसृजत्कन्या वैरिण्यां वै प्रजापतिः। ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश
ṣaṣṭiṁ dakṣo'sṛjatkanyā vairiṇyāṁ vai prajāpatiḥ| dadau sa daśa dharmāya kaśyapāya trayodaśa
प्रजापति दक्ष ने वैरिणी से साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं; उनमें से दस धर्म को और तेरह कश्यप को प्रदान कीं।
श्लोक 4 (skanda.7.21.4)
सप्त विशतिं सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने। द्वे चैव भृगुपुत्राय द्वे कृशाश्वाय धीमते
sapta viśatiṁ somāya catasro'riṣṭanemine| dve caiva bhṛguputrāya dve kṛśāśvāya dhīmate
सत्ताईस सोम को, चार अरिष्टनेमि को; दो भृगुपुत्र को, और दो बुद्धिमान् कृशाश्व को।
श्लोक 5 (skanda.7.21.5)
द्वे चैवांगिरसे तद्वत्तासां नामानि विस्तरात्। शृणु त्वं देवि मातॄणां प्रजाविस्तरमादितः
dve caivāṁgirase tadvattāsāṁ nāmāni vistarāt| śṛṇu tvaṁ devi mātṝṇāṁ prajāvistaramāditaḥ
और वैसे ही दो अंगिरा को। हे देवी! उनके नाम विस्तार से तथा माताओं की संतति का विस्तार आदि से सुनो।
श्लोक 6 (skanda.7.21.6)
मरुत्वती वसुर्जामी लंबा भानुररुन्धती। संकल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिनि
marutvatī vasurjāmī laṁbā bhānurarundhatī| saṁkalpā ca muhūrtā ca sādhyā viśvā ca bhāmini
मरुत्वती, वसु, जामी, लंबा, भानु, अरुंधती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या और विश्वा, हे भामिनी!
श्लोक 7 (skanda.7.21.7)
धर्म पत्न्यः समाख्याता दक्षः प्राचेतसो ददौ। अदितिर्दितिर्दनुस्तद्वदरिष्टा सुरसैव च
dharma patnyaḥ samākhyātā dakṣaḥ prācetaso dadau| aditirditirdanustadvadariṣṭā surasaiva ca
—ये धर्म की पत्नियाँ कही गई हैं, जिन्हें प्राचेतस दक्ष ने प्रदान किया। अदिति, दिति, दनु, वैसे ही अरिष्टा और सुरसा भी;
श्लोक 8 (skanda.7.21.8)
सुरभिर्विनता चैव नाम्ना क्रोधवशा त्विला। कद्रूस्त्विषा वसुस्तद्वत्तासां पुत्रान्वदामि वै
surabhirvinatā caiva nāmnā krodhavaśā tvilā| kadrūstviṣā vasustadvattāsāṁ putrānvadāmi vai
और सुरभि, विनता, तथा क्रोधवशा नाम वाली, और इला; कद्रू, त्विषा और वसु—अब मैं उनके पुत्रों को बताता हूँ।
श्लोक 9 (skanda.7.21.9)
विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यानजीजनत्। मरुत्वत्यां मरुत्वंतो वसोस्तु वसवस्तथा
viśvedevāstu viśvāyāḥ sādhyā sādhyānajījanat| marutvatyāṁ marutvaṁto vasostu vasavastathā
विश्वा से विश्वेदेव उत्पन्न हुए; साध्या ने साध्यों को जन्म दिया। मरुत्वती से मरुत्वंत, और वसु से वसुगण उत्पन्न हुए।
श्लोक 10 (skanda.7.21.10)
भानोस्तु भानवस्तेन मुहूर्त्तायां मुहूर्त्तकाः। लंबाया घोषनामानो नागवीथिस्तु जामिजा
bhānostu bhānavastena muhūrttāyāṁ muhūrttakāḥ| laṁbāyā ghoṣanāmāno nāgavīthistu jāmijā
भानु से भानुगण, मुहूर्ता से मुहूर्तकगण; लंबा से घोष नामधारी, और जामी से नागवीथि उत्पन्न हुए।
श्लोक 11 (skanda.7.21.11)
संकल्पायास्तु संकल्पो धर्मपुत्रा दश स्मृताः। आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानलोऽनिलः
saṁkalpāyāstu saṁkalpo dharmaputrā daśa smṛtāḥ| āpo dhruvaśca somaśca dharaścaivānalo'nilaḥ
संकल्पा से संकल्प उत्पन्न हुआ। धर्म के दस पुत्र स्मृत हैं—आप, ध्रुव, सोम, धर, अनल, अनिल,
श्लोक 12 (skanda.7.21.12)
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोष्टौ प्रकीर्तिताः। आपस्य पुत्रा वैदंड्यः श्रमः शान्तो ध्वनिस्तथा
pratyūṣaśca prabhāsaśca vasavoṣṭau prakīrtitāḥ| āpasya putrā vaidaṁḍyaḥ śramaḥ śānto dhvanistathā
प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गए हैं। आप के पुत्र वैदंड्य, श्रम, शांत तथा ध्वनि हैं।
श्लोक 13 (skanda.7.21.13)
ध्रुवस्य पुत्रो भगवान्कालो लोकप्रकालनः। सोमस्य भगवाञ्छर्वो ध्रुवश्च गृहबोधनः
dhruvasya putro bhagavānkālo lokaprakālanaḥ| somasya bhagavāñcharvo dhruvaśca gṛhabodhanaḥ
ध्रुव का पुत्र भगवान् काल है, जो लोकों के समय का निर्धारक है। सोम का पुत्र भगवान् शर्व है, तथा गृहबोधन नामक ध्रुव भी।
श्लोक 14 (skanda.7.21.14)
हुतहव्यवहश्चैव धरस्य द्रविण स्मृतः। मनोजवोऽनिलस्यासीदविज्ञातगतिस्तथा
hutahavyavahaścaiva dharasya draviṇa smṛtaḥ| manojavo'nilasyāsīdavijñātagatistathā
हुतहव्यवह और द्रविण, धर के पुत्र स्मृत हैं। मनोजव तथा अविज्ञातगति, अनिल के पुत्र हुए।
श्लोक 15 (skanda.7.21.15)
देवलो भगवान्योगी प्रत्यूषस्याभवन्सुताः। बृहस्पतेस्तु भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी
devalo bhagavānyogī pratyūṣasyābhavansutāḥ| bṛhaspatestu bhaginī bhuvanā brahmavādinī
भगवान् योगी देवल प्रत्यूष के पुत्र हुए। और बृहस्पति की बहन भुवना, जो ब्रह्मवादिनी थी—
श्लोक 16 (skanda.7.21.16)
प्रभासस्य तु सा भार्या वसूनामष्टमस्य च। विश्वकर्मा सुतस्तस्य शिल्पकर्त्ता प्रजापतिः
prabhāsasya tu sā bhāryā vasūnāmaṣṭamasya ca| viśvakarmā sutastasya śilpakarttā prajāpatiḥ
—वह आठवें वसु प्रभास की पत्नी थी; उसका पुत्र विश्वकर्मा था, जो शिल्पकर्ता प्रजापति है।
श्लोक 17 (skanda.7.21.17)
तुषितानां तु साध्यानां नामान्येतानि वच्मि ते। मनोऽनुमन्ता प्राणश्च नरोऽपानश्च वीर्यवान्
tuṣitānāṁ tu sādhyānāṁ nāmānyetāni vacmi te| mano'numantā prāṇaśca naro'pānaśca vīryavān
तुषित कहलाने वाले साध्यों के ये नाम मैं तुम्हें बताता हूँ—मनस्, अनुमंता, प्राण, नर, तथा पराक्रमी अपान,
श्लोक 18 (skanda.7.21.18)
भक्तिर्भयोऽनघश्चैव हंसो नारायणस्तथा। विभुश्चैव प्रभुश्चैव साध्या द्वादश कीर्तिताः
bhaktirbhayo'naghaścaiva haṁso nārāyaṇastathā| vibhuścaiva prabhuścaiva sādhyā dvādaśa kīrtitāḥ
भक्ति, भय, अनघ, हंस, तथा नारायण, और विभु तथा प्रभु—ये बारह साध्य कहे गए हैं।
श्लोक 19 (skanda.7.21.19)
कश्यपस्य प्रवक्ष्यामि सन्ततिं वरवर्णिनि। अंशो धाता भगस्त्वष्टा मित्रोऽथ वरुणो र्यमा
kaśyapasya pravakṣyāmi santatiṁ varavarṇini| aṁśo dhātā bhagastvaṣṭā mitro'tha varuṇo ryamā
हे वरवर्णिनी! अब मैं कश्यप की संतति बताता हूँ—अंश, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण और अर्यमा;
श्लोक 20 (skanda.7.21.20)
विवस्वान्सविता पूषा ह्यंशुमान्विष्णुरेव च। एते सहस्रकिरणा आदित्या द्वादश स्मृताः
vivasvānsavitā pūṣā hyaṁśumānviṣṇureva ca| ete sahasrakiraṇā ādityā dvādaśa smṛtāḥ
विवस्वान्, सविता, पूषा, अंशुमान् तथा विष्णु ही—ये सहस्र किरणों वाले बारह आदित्य स्मृत हैं।
श्लोक 21 (skanda.7.21.21)
अजैकपादहिर्बुध्न्यो विरूपाक्षोऽथ रैवतः
ajaikapādahirbudhnyo virūpākṣo'tha raivataḥ
अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष तथा रैवत;
श्लोक 22 (skanda.7.21.22)
हरश्च बहुरूपश्च त्र्यंबकश्च सुरेश्वरः
haraśca bahurūpaśca tryaṁbakaśca sureśvaraḥ
हर, बहुरूप, त्र्यंबक तथा सुरेश्वर;
श्लोक 23 (skanda.7.21.23)
सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः। एते रुद्राः समाख्याता एकादश गणेश्वराः
sāvitraśca jayantaśca pinākī cāparājitaḥ| ete rudrāḥ samākhyātā ekādaśa gaṇeśvarāḥ
और सावित्र, जयंत, पिनाकी तथा अपराजित—ये ग्यारह रुद्र कहे गए हैं, जो गणों के ईश्वर हैं।
श्लोक 24 (skanda.7.21.24)
दितिः पुत्रद्वयं लेभे कश्यपाद्बलगर्वितम्। हिरण्यकशिपुं श्रेष्ठं हिरण्याक्षं तथानुजम्
ditiḥ putradvayaṁ lebhe kaśyapādbalagarvitam| hiraṇyakaśipuṁ śreṣṭhaṁ hiraṇyākṣaṁ tathānujam
दिति ने कश्यप से बल में गर्वित दो पुत्र प्राप्त किए—श्रेष्ठ हिरण्यकशिपु और उसका अनुज हिरण्याक्ष।
श्लोक 25 (skanda.7.21.25)
हिरण्यकशिपोर्दैत्यैः श्लोकोगीतः पुरातनैः
hiraṇyakaśipordaityaiḥ ślokogītaḥ purātanaiḥ
हिरण्यकशिपु के विषय में प्राचीन दैत्यों द्वारा एक श्लोक गाया गया था—
श्लोक 26 (skanda.7.21.26)
राजा हिरण्यकशिपुर्यांयामाशां निरीक्षते। तस्यां तस्यां दिशि सुरा नमश्चक्रुर्महर्षिभिः। हिरण्यकशिपोः पुत्राश्चत्वारः सुमहाबलाः
rājā hiraṇyakaśipuryāṁyāmāśāṁ nirīkṣate| tasyāṁ tasyāṁ diśi surā namaścakrurmaharṣibhiḥ| hiraṇyakaśipoḥ putrāścatvāraḥ sumahābalāḥ
"राजा हिरण्यकशिपु जिस-जिस दिशा की ओर देखता था, उसी-उसी दिशा में देवता महर्षियों सहित नमस्कार करते थे।" हिरण्यकशिपु के चार अत्यंत बलशाली पुत्र थे।
श्लोक 27 (skanda.7.21.27)
प्रह्लादः पूर्वजस्तेषामनुह्रादस्ततः परः। ह्रादश्चैव ह्रदश्चैव पुत्राश्चैते प्रकीर्तिताः
prahlādaḥ pūrvajasteṣāmanuhrādastataḥ paraḥ| hrādaścaiva hradaścaiva putrāścaite prakīrtitāḥ
उनमें प्रह्लाद ज्येष्ठ था, फिर अनुह्राद; और ह्राद तथा संह्राद—ये उसके पुत्र कहे गए हैं।
श्लोक 28 (skanda.7.21.28)
उभौ सुन्दोपसुन्दौ तु ह्रदपुत्रौ बभूवतुः। ह्रादस्य पुत्रस्त्वेकोऽभून्मूक इत्यभिविश्रुतः
ubhau sundopasundau tu hradaputrau babhūvatuḥ| hrādasya putrastveko'bhūnmūka ityabhiviśrutaḥ
संह्राद के दोनों पुत्र सुंद और उपसुंद हुए। अनुह्राद का एक ही पुत्र था, जो मूक नाम से विख्यात हुआ।
श्लोक 29 (skanda.7.21.29)
मारीचः सुंदपुत्रस्तु ताडकायामजायत। दण्डके निहतः सोऽयं राघवेण वलीयसा
mārīcaḥ suṁdaputrastu tāḍakāyāmajāyata| daṇḍake nihataḥ so'yaṁ rāghaveṇa valīyasā
सुंद के पुत्र मारीच का जन्म ताड़का से हुआ; वह दंडक वन में शक्तिशाली राघव (राम) द्वारा मारा गया।
श्लोक 30 (skanda.7.21.30)
मूको विनिहतश्चापि कैराते सब्यसाचिना। संह्रादस्य तु दैत्यस्य निवातकवचाः कुले
mūko vinihataścāpi kairāte sabyasācinā| saṁhrādasya tu daityasya nivātakavacāḥ kule
मूक भी सव्यसाची (अर्जुन) द्वारा वराह-रूप में मारा गया। दैत्य संह्राद के कुल में निवातकवच हुए—
श्लोक 31 (skanda.7.21.31)
तिस्रः कोट्यस्तु विख्याता निहताः सव्यसाचिना। गवेष्ठी कालनेमिश्च जंभो वल्कल एव च
tisraḥ koṭyastu vikhyātā nihatāḥ savyasācinā| gaveṣṭhī kālanemiśca jaṁbho valkala eva ca
—तीन करोड़ की संख्या में विख्यात, जो सव्यसाची द्वारा मारे गए। गवेष्ठी, कालनेमि, जंभ तथा वल्कल,
श्लोक 32 (skanda.7.21.32)
जृंभः षष्ठोनुजस्तेषां स्मृताः प्रह्रादसूनवः। शुंभश्चैव निशुंभश्च गवेष्ठिनः सुतौ स्मृतौ
jṛṁbhaḥ ṣaṣṭhonujasteṣāṁ smṛtāḥ prahrādasūnavaḥ| śuṁbhaścaiva niśuṁbhaśca gaveṣṭhinaḥ sutau smṛtau
और छठा तथा सबसे छोटा जृंभ—ये प्रह्लाद के वंशज स्मृत हैं। शुंभ और निशुंभ गवेष्ठी के पुत्र स्मृत हैं।
श्लोक 33 (skanda.7.21.33)
धनुकश्चासिलोमा च शुंभपुत्रौ प्रकीर्तितौ। विरोचनस्य पुत्रस्तु बलिरेकः प्रतापवान्
dhanukaścāsilomā ca śuṁbhaputrau prakīrtitau| virocanasya putrastu balirekaḥ pratāpavān
धनुक और असिलोमा शुंभ के पुत्र कहे गए हैं। विरोचन का पुत्र एकमात्र प्रतापी बलि था।
श्लोक 34 (skanda.7.21.34)
हिरण्याक्षसुताः पंच विक्रांताः सुमहाबलाः। अन्धकः शकुनिश्चैव कालनाभस्तथैव च
hiraṇyākṣasutāḥ paṁca vikrāṁtāḥ sumahābalāḥ| andhakaḥ śakuniścaiva kālanābhastathaiva ca
हिरण्याक्ष के पाँच पराक्रमी और अत्यंत बलशाली पुत्र थे—अंधक, शकुनि, तथा कालनाभ,
श्लोक 35 (skanda.7.21.35)
महानाभश्च विक्रांतो भूतसंतापनस्तथा। शतं शतसहस्राणि निहतास्तारकामये
mahānābhaśca vikrāṁto bhūtasaṁtāpanastathā| śataṁ śatasahasrāṇi nihatāstārakāmaye
और पराक्रमी महानाभ, तथा भूतसंतापन। तारकामय (तारकासुर के युद्ध) में उनमें से दस करोड़ मारे गए।
श्लोक 36 (skanda.7.21.36)
इति संक्षपतः प्रोक्ता कश्यपान्वयसंततिः। यया व्याप्तं जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम्
iti saṁkṣapataḥ proktā kaśyapānvayasaṁtatiḥ| yayā vyāptaṁ jagatsarvaṁ sadevāsuramānuṣam
इस प्रकार संक्षेप में कश्यप के वंश की संतति कही गई, जिससे देवता, असुर और मनुष्यों सहित यह संपूर्ण जगत् व्याप्त है।
श्लोक 37 (skanda.7.21.37)
अथ याः कन्यका दत्ताः सप्तविंशतिरिंदवे। तासां मध्ये महादेवि प्रिया तस्य च रोहिणी
atha yāḥ kanyakā dattāḥ saptaviṁśatiriṁdave| tāsāṁ madhye mahādevi priyā tasya ca rohiṇī
अब जो सत्ताईस कन्याएँ चंद्रमा को दी गई थीं, हे महादेवी! उनमें उसकी प्रिय पत्नी रोहिणी थी।
श्लोक 38 (skanda.7.21.38)
अथ नक्षत्रनाथस्य तासां मध्येतिवल्लभा। बभूव रोहिणी देवी प्राणेभ्योऽपि गरीयसी
atha nakṣatranāthasya tāsāṁ madhyetivallabhā| babhūva rohiṇī devī prāṇebhyo'pi garīyasī
उन सबमें नक्षत्रनाथ की सर्वाधिक प्रिय देवी रोहिणी हुई, जो उन्हें अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय थी।
श्लोक 39 (skanda.7.21.39)
सर्वास्ताः संपरित्यज्य रोहिण्या सहितो रहः। रेमे कामपरीतात्मा वनेषूपवनेषु च। रमणीयेषु देशेषु कन्दरेषु गुहासु च
sarvāstāḥ saṁparityajya rohiṇyā sahito rahaḥ| reme kāmaparītātmā vaneṣūpavaneṣu ca| ramaṇīyeṣu deśeṣu kandareṣu guhāsu ca
अन्य सबको त्यागकर, कामासक्त-चित्त होकर वे रोहिणी के साथ एकांत में रमण करते थे—वनों में, उपवनों में, रमणीय प्रदेशों में, कंदराओं और गुफाओं में।
श्लोक 40 (skanda.7.21.40)
अथ ता दुःखसंपन्नाः पत्न्यः शेषा यशस्विनि। जग्मुश्च शरणं दक्षं वचनं चेदमब्रुवन्
atha tā duḥkhasaṁpannāḥ patnyaḥ śeṣā yaśasvini| jagmuśca śaraṇaṁ dakṣaṁ vacanaṁ cedamabruvan
तब हे यशस्विनी! वे शेष दुःखी पत्नियाँ दक्ष की शरण में गईं और यह वचन कहा—
श्लोक 41 (skanda.7.21.41)
सोमः सर्वा तिक्रम्य रोहिण्या सह मोदते। संवत्सरसहस्रं तु क्रीडमानो यथासुखम्
somaḥ sarvā tikramya rohiṇyā saha modate| saṁvatsarasahasraṁ tu krīḍamāno yathāsukham
"सोम हम सबको छोड़कर रोहिणी के साथ ही आनंद मनाते हैं। एक सहस्र वर्ष से वे यथेच्छ क्रीड़ा करते हुए,
श्लोक 42 (skanda.7.21.42)
अवशिष्टास्तु षड्विंशन्मलिना विगतश्रियः। पाणिग्रहणमारभ्य रोहिण्या सह चंद्रमाः
avaśiṣṭāstu ṣaḍviṁśanmalinā vigataśriyaḥ| pāṇigrahaṇamārabhya rohiṇyā saha caṁdramāḥ
जबकि हम शेष छब्बीस मलिन और श्रीहीन हो गई हैं। विवाह के समय से ही चंद्रमा रोहिणी के साथ ही रहते हैं—
श्लोक 43 (skanda.7.21.43)
संवत्सरसहस्रं तु जानात्येकां स शर्वरीम्। परित्यक्ता वयं तात शशिना दोषवर्जिताः
saṁvatsarasahasraṁ tu jānātyekāṁ sa śarvarīm| parityaktā vayaṁ tāta śaśinā doṣavarjitāḥ
—एक सहस्र वर्ष को भी वे मानो एक ही रात्रि के समान जानते हैं। हे तात! हम, दोषरहित होते हुए भी, चंद्रमा द्वारा परित्यक्त हैं।
श्लोक 44 (skanda.7.21.44)
स रेमे सह रोहिण्या अस्माकमसुखप्रदः। अस्माकं दुःखदग्धानां श्रेयोऽतो मरणं भवेत्
sa reme saha rohiṇyā asmākamasukhapradaḥ| asmākaṁ duḥkhadagdhānāṁ śreyo'to maraṇaṁ bhavet
वे रोहिणी के साथ रमण करते हैं, हमें कोई सुख नहीं देते। दुःख से जलती हुई हमारे लिए तो मृत्यु ही श्रेयस्कर होगी।"
श्लोक 45 (skanda.7.21.45)
तासां तद्वचनं श्रुत्वा दुःखार्तानां प्रजापतिः। ब्रह्मतेजः समायुक्तः पुत्रीस्नेहेन कर्षितः। जगाम यत्र ऋक्षेशो वचनं चेदमब्रवीत्
tāsāṁ tadvacanaṁ śrutvā duḥkhārtānāṁ prajāpatiḥ| brahmatejaḥ samāyuktaḥ putrīsnehena karṣitaḥ| jagāma yatra ṛkṣeśo vacanaṁ cedamabravīt
उन दुःखी कन्याओं का यह वचन सुनकर, ब्रह्मतेज से युक्त प्रजापति दक्ष, पुत्री-स्नेह से खिंचे हुए, वहाँ गए जहाँ नक्षत्रेश (चंद्रमा) थे, और यह वचन कहा—
श्लोक 46 (skanda.7.21.46)
समं वर्त्तस्व कन्यासु मामकासु निशाकर। अन्यथा दोषभागी त्वं भविष्यसि न संशयः
samaṁ varttasva kanyāsu māmakāsu niśākara| anyathā doṣabhāgī tvaṁ bhaviṣyasi na saṁśayaḥ
"हे निशाकर! मेरी कन्याओं के साथ समान व्यवहार करो; अन्यथा तुम निश्चय ही दोष के भागी बनोगे।"
श्लोक 47 (skanda.7.21.47)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा लज्जयावनतः स्थितः। बाढमित्येव ऋक्षेंद्रो दक्षस्य पुरतोऽब्रवीत्
tasya tadvacanaṁ śrutvā lajjayāvanataḥ sthitaḥ| bāḍhamityeva ṛkṣeṁdro dakṣasya purato'bravīt
उनका वह वचन सुनकर चंद्रमा लज्जा से झुके हुए खड़े रहे; नक्षत्रेंद्र ने दक्ष के सामने केवल "स्वीकार है" ऐसा कहा।
श्लोक 48 (skanda.7.21.48)
अद्यप्रभृति विप्रर्षे समं वर्त्तयितास्म्यहम्। पुत्रीभिस्तव सत्यं वै शपेऽहं शपथेन ते
adyaprabhṛti viprarṣe samaṁ varttayitāsmyaham| putrībhistava satyaṁ vai śape'haṁ śapathena te
"हे विप्रर्षे! आज से मैं आपकी पुत्रियों के साथ समान व्यवहार करूँगा—यह सत्य है; मैं आपको शपथपूर्वक इसकी प्रतिज्ञा करता हूँ।"
श्लोक 49 (skanda.7.21.49)
एवं प्रतिज्ञासंयुक्ते निशानाथे तदांबिके। सर्वा रूपेण संयुक्तास्तस्य कन्या निवेदिताः
evaṁ pratijñāsaṁyukte niśānāthe tadāṁbike| sarvā rūpeṇa saṁyuktāstasya kanyā niveditāḥ
हे अंबिके! इस प्रकार निशानाथ द्वारा प्रतिज्ञा किए जाने पर, उनकी सभी रूपसंपन्न कन्याएँ उन्हें पुनः सौंप दी गईं।
श्लोक 50 (skanda.7.21.50)
दक्षः स्वभवनं गत्वा निर्वृतिं परमां गतः। चन्द्रोऽपि पूर्ववद्देवि रोहिण्यां निरतोऽभवत्
dakṣaḥ svabhavanaṁ gatvā nirvṛtiṁ paramāṁ gataḥ| candro'pi pūrvavaddevi rohiṇyāṁ nirato'bhavat
दक्ष अपने भवन को जाकर परम शांति को प्राप्त हुए। परंतु हे देवी! चंद्रमा पुनः पूर्ववत् रोहिणी में ही रत हो गए—
श्लोक 51 (skanda.7.21.51)
संपरित्यज्य ताः सर्वाः कामोपहतमानसः। अथ भूयस्तु ताः सर्वा दक्षं वचनमब्रुवन्
saṁparityajya tāḥ sarvāḥ kāmopahatamānasaḥ| atha bhūyastu tāḥ sarvā dakṣaṁ vacanamabruvan
—अन्य सबको छोड़कर, काम से अभिभूत चित्त होकर। तब पुनः वे सभी पत्नियाँ दक्ष से यह वचन कहने लगीं—
श्लोक 52 (skanda.7.21.52)
मलिनास्ताः कृशांग्यश्च दीनाः सर्वा विचेतसः। ततो दृष्ट्वा तथारूपं दक्षो मोहमुपागतः
malināstāḥ kṛśāṁgyaśca dīnāḥ sarvā vicetasaḥ| tato dṛṣṭvā tathārūpaṁ dakṣo mohamupāgataḥ
वे सब मलिन, कृशांगी, दीन और चेतनाशून्य हो गई थीं। उनका वैसा रूप देखकर दक्ष मोहित हो गए।
श्लोक 53 (skanda.7.21.53)
लब्धसंज्ञः पुनः सोऽपि क्रोधोद्भूततनूरुहः। उवाच सर्वाः स्वाः पुत्रीः किमित्थं मलिनांबराः। किमिदं निष्प्रभाः सर्वाः कथयध्वं ममानघाः
labdhasaṁjñaḥ punaḥ so'pi krodhodbhūtatanūruhaḥ| uvāca sarvāḥ svāḥ putrīḥ kimitthaṁ malināṁbarāḥ| kimidaṁ niṣprabhāḥ sarvāḥ kathayadhvaṁ mamānaghāḥ
पुनः चेत प्राप्त कर, क्रोध से रोमांचित होकर उन्होंने अपनी सभी पुत्रियों से कहा—"तुम सब मलिन वस्त्रों वाली क्यों हो? यह क्या है, तुम सब निस्तेज क्यों हो? हे निष्पाप कन्याओ! मुझे बताओ।"
श्लोक 54 (skanda.7.21.54)
असुरान्सानुगांश्चैव ये चान्ये सुरसत्तमाः। अद्य शापहतान्पुत्र्यः करिष्यामि न संशयः
asurānsānugāṁścaiva ye cānye surasattamāḥ| adya śāpahatānputryaḥ kariṣyāmi na saṁśayaḥ
"चाहे वे असुर हों अपने अनुचरों सहित, या अन्य कोई श्रेष्ठ देवता भी हों, हे पुत्रियो! मैं आज निःसंदेह उन्हें शाप से आहत कर दूँगा।"
श्लोक 55 (skanda.7.21.55)
एवमुक्तास्तु दक्षेण सर्वास्ताः समुदैरयन्
evamuktāstu dakṣeṇa sarvāstāḥ samudairayan
दक्ष द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वे सब एक साथ बोल उठीं—
श्लोक 56 (skanda.7.21.56)
न चास्माकं निशानाथ ऋतुमात्रमपि प्रभो। प्रयच्छति पुनस्तेन युष्मत्पार्श्वं समागताः
na cāsmākaṁ niśānātha ṛtumātramapi prabho| prayacchati punastena yuṣmatpārśvaṁ samāgatāḥ
"हे प्रभो निशानाथ! वे हमें अपना ऋतुकाल तक भी नहीं देते; इसी कारण हम पुनः आपकी शरण में आई हैं।
श्लोक 57 (skanda.7.21.57)
अनादृत्य तु ते वाक्यं रोहिण्यां निरतो रहः। रेमे कामपरीतात्मा अस्माकं शोकवर्द्धनः
anādṛtya tu te vākyaṁ rohiṇyāṁ nirato rahaḥ| reme kāmaparītātmā asmākaṁ śokavarddhanaḥ
आपकी बात की अवहेलना करके वे एकांत में केवल रोहिणी में ही रत रहते हैं; काम से अभिभूत चित्त होकर वे रमण करते हैं, जो हमारे शोक को बढ़ाने वाला है।"
श्लोक 58 (skanda.7.21.58)
तासां तद्वचनं श्रुत्वा दक्षः कोपमुपागतः। गत्वा चंद्रं महादेवि शशाप प्रमुखे स्थितम्
tāsāṁ tadvacanaṁ śrutvā dakṣaḥ kopamupāgataḥ| gatvā caṁdraṁ mahādevi śaśāpa pramukhe sthitam
उनका वह वचन सुनकर दक्ष क्रोधित हो गए। हे महादेवी! वे चंद्रमा के पास जाकर, सामने खड़े हुए उन्हें शाप दिया—
श्लोक 59 (skanda.7.21.59)
अनादृत्य हि मे वाक्यं यस्मात्त्वं रोहिणीरतः। संत्यज्य पुत्रीश्चास्माकं शेषा दोषेण वर्जिताः। तस्माद्यक्ष्मा शरीरं ते ग्रसिष्यति न संशयः
anādṛtya hi me vākyaṁ yasmāttvaṁ rohiṇīrataḥ| saṁtyajya putrīścāsmākaṁ śeṣā doṣeṇa varjitāḥ| tasmādyakṣmā śarīraṁ te grasiṣyati na saṁśayaḥ
"चूँकि तुमने मेरे वचन की अवहेलना करके रोहिणी में ही रत रहते हुए मेरी शेष निर्दोष पुत्रियों को त्याग दिया है, इसलिए निश्चय ही यक्ष्मा (क्षयरोग) तुम्हारे शरीर को ग्रस लेगा।"
श्लोक 60 (skanda.7.21.60)
एतस्मिन्नेव काले तु यक्ष्मा पर्वतपुत्रिके। दक्षेण तु समादिष्टस्तस्य कायं समाविशत्
etasminneva kāle tu yakṣmā parvataputrike| dakṣeṇa tu samādiṣṭastasya kāyaṁ samāviśat
हे पर्वतपुत्री! उसी समय दक्ष द्वारा आदिष्ट यक्ष्मा (रोग) ने उनके शरीर में प्रवेश किया।
श्लोक 61 (skanda.7.21.61)
यक्ष्मणा ग्रस्तकायोऽसौ क्षयं याति दिनेदिने
yakṣmaṇā grastakāyo'sau kṣayaṁ yāti dinedine
यक्ष्मा से ग्रस्त शरीर वाले वे दिन-प्रतिदिन क्षीण होते गए।
श्लोक 62 (skanda.7.21.62)
एवं सोमस्तु दक्षेण कृतशापो गतप्रभः। पपात वसुधां देवि निश्चेष्टो रोहिणीयुतः
evaṁ somastu dakṣeṇa kṛtaśāpo gataprabhaḥ| papāta vasudhāṁ devi niśceṣṭo rohiṇīyutaḥ
इस प्रकार दक्ष द्वारा शापित सोम, अपनी कांति खोकर, हे देवी! रोहिणी सहित निश्चेष्ट होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
श्लोक 63 (skanda.7.21.63)
लब्ध्वसंज्ञो मुहूर्तेन रोहिणीवाक्य मब्रवीत्
labdhvasaṁjño muhūrtena rohiṇīvākya mabravīt
क्षण भर में चेत प्राप्त कर उन्होंने रोहिणी से यह वचन कहा—
श्लोक 64 (skanda.7.21.64)
देवि कार्यं किमधुना त्वत्पित्रा शापितो ह्यहम्। क्षयकुष्ठेन संयुक्तः किं करोम्यधुना प्रिये
devi kāryaṁ kimadhunā tvatpitrā śāpito hyaham| kṣayakuṣṭhena saṁyuktaḥ kiṁ karomyadhunā priye
"हे देवी! अब क्या करना उचित है? मैं तुम्हारे पिता द्वारा शापित हुआ हूँ। हे प्रिये! क्षयरोग से युक्त होकर अब मैं क्या करूँ?"
श्लोक 65 (skanda.7.21.65)
एवमुक्ता रोहिणी तु बाष्पव्याकुललोचना। दक्षशापहतं दृष्ट्वा सोमं वचनमब्रवीत्
evamuktā rohiṇī tu bāṣpavyākulalocanā| dakṣaśāpahataṁ dṛṣṭvā somaṁ vacanamabravīt
इस प्रकार कहे जाने पर, अश्रुओं से व्याकुल नेत्रों वाली रोहिणी, दक्ष के शाप से आहत सोम को देखकर यह वचन बोली—
श्लोक 66 (skanda.7.21.66)
येन शापस्तु ते दत्तस्तमेव शरणं व्रज। स ते शापाभिभूतस्य नूनं श्रेयो विधास्यति
yena śāpastu te dattastameva śaraṇaṁ vraja| sa te śāpābhibhūtasya nūnaṁ śreyo vidhāsyati
"जिनके द्वारा तुम्हें शाप दिया गया, उन्हीं की शरण में जाओ; शाप से अभिभूत तुम्हारे लिए वे ही निश्चय कल्याण करेंगे।
श्लोक 67 (skanda.7.21.67)
लप्स्यसे तत्प्रसादात्त्वं प्रभां पूर्वोचितां शुभाम्
lapsyase tatprasādāttvaṁ prabhāṁ pūrvocitāṁ śubhām
उन्हीं की कृपा से तुम अपनी पूर्व-उचित शुभ कांति को प्राप्त करोगे।"
श्लोक 68 (skanda.7.21.68)
रोहिण्या वचनं श्रुत्वा गतो दक्षसमीपतः। चंद्रः प्रोवाच विनयाद्वाष्प व्याकुललोचनः
rohiṇyā vacanaṁ śrutvā gato dakṣasamīpataḥ| caṁdraḥ provāca vinayādvāṣpa vyākulalocanaḥ
रोहिणी का वचन सुनकर चंद्रमा दक्ष के समीप गए, और अश्रुओं से व्याकुल नेत्रों सहित विनयपूर्वक बोले—
श्लोक 69 (skanda.7.21.69)
कुरुष्वानुग्रहं दक्ष प्रसन्नेनांतरात्मना। कोपं त्यज महर्षे त्वं ममोपरि दयां कुरु। त्वया क्रोधपरीतेन कारणे वाप्यकारणे। अनुकंपां च मे कृत्वा कार्यं शापस्य मोक्षणम्
kuruṣvānugrahaṁ dakṣa prasannenāṁtarātmanā| kopaṁ tyaja maharṣe tvaṁ mamopari dayāṁ kuru| tvayā krodhaparītena kāraṇe vāpyakāraṇe| anukaṁpāṁ ca me kṛtvā kāryaṁ śāpasya mokṣaṇam
"हे दक्ष! प्रसन्न अंतरात्मा से मुझ पर अनुग्रह कीजिए। हे महर्षे! क्रोध त्याग दीजिए, मुझ पर दया कीजिए। क्रोध से अभिभूत होकर आपने कारणवश या अकारण ही जो शाप दिया, उस पर अनुकंपा करके अब शाप से मुक्ति का उपाय कीजिए।"
श्लोक 70 (skanda.7.21.70)
विदितं तु महाभाग शप्तोहं येन कर्मणा। कुरुष्वानुग्रहं दक्ष मम दीनस्य याचतः
viditaṁ tu mahābhāga śaptohaṁ yena karmaṇā| kuruṣvānugrahaṁ dakṣa mama dīnasya yācataḥ
"हे महाभाग! मुझे ज्ञात है कि मैं किस कर्म के कारण शापित हुआ। हे दक्ष! दीन होकर याचना करते हुए मुझ पर अनुग्रह कीजिए।"
श्लोक 71 (skanda.7.21.71)
एवं विलपमानस्य सोमस्य तु महात्मनः। अनुग्रहे मतिं कृत्वा इदं वचनमब्रवीत्
evaṁ vilapamānasya somasya tu mahātmanaḥ| anugrahe matiṁ kṛtvā idaṁ vacanamabravīt
इस प्रकार विलाप करते हुए महात्मा सोम को देखकर, दक्ष ने अनुग्रह का विचार करके यह वचन कहा—
श्लोक 72 (skanda.7.21.72)
दक्ष उवाच। मया शापहतः सोम त्रातुं शक्यो न दैवतैः। यद्यद्ब्रवीम्यहं सोम तत्तथेति न संशयः
dakṣa uvāca| mayā śāpahataḥ soma trātuṁ śakyo na daivataiḥ| yadyadbravīmyahaṁ soma tattatheti na saṁśayaḥ
दक्ष ने कहा—"हे सोम! मेरे द्वारा शापित को देवता भी नहीं बचा सकते। हे सोम! मैं जो-जो कहता हूँ, वह वैसा ही होता है, निःसंदेह।
श्लोक 73 (skanda.7.21.73)
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च। पूर्वसृष्टानि यान्येव संभवंति हि तानि वै
āyuḥ karma ca vittaṁ ca vidyā nidhanameva ca| pūrvasṛṣṭāni yānyeva saṁbhavaṁti hi tāni vai
आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु—ये सब पूर्व से ही निर्धारित होकर घटित होते हैं।
श्लोक 74 (skanda.7.21.74)
असुराश्च सुराश्चैव ये चान्ये यक्षराक्षसाः। सर्वेपि शक्ता न त्रातुं वर्जयित्वा महेश्वरम्
asurāśca surāścaiva ye cānye yakṣarākṣasāḥ| sarvepi śaktā na trātuṁ varjayitvā maheśvaram
असुर हों या देवता, अथवा अन्य यक्ष-राक्षस भी हों—महेश्वर को छोड़कर कोई भी बचाने में समर्थ नहीं है।
श्लोक 75 (skanda.7.21.75)
एषां शापो मया दत्तोऽनुग्रहीष्य ति शंकरः। नान्यस्त्रातुं भवेच्छक्तो विना पशुपतिं भवम्। तत्त्वं शीघ्रतरं गच्छ समाराधय शंकर
eṣāṁ śāpo mayā datto'nugrahīṣya ti śaṁkaraḥ| nānyastrātuṁ bhavecchakto vinā paśupatiṁ bhavam| tattvaṁ śīghrataraṁ gaccha samārādhaya śaṁkara
मेरे द्वारा दिया गया शाप—उस पर शंकर ही अनुग्रह करेंगे; भव पशुपति के अतिरिक्त कोई अन्य बचाने में समर्थ नहीं हो सकता। इसलिए तुम शीघ्रातिशीघ्र जाओ और शंकर की आराधना करो।
श्लोक 76 (skanda.7.21.76)
न शक्तोऽन्यः पुनश्चंद्रः कर्तुं त्वां निर्मलं पुनः। वर्जयित्वा महादेवं शितिकंठमुमापतिम्
na śakto'nyaḥ punaścaṁdraḥ kartuṁ tvāṁ nirmalaṁ punaḥ| varjayitvā mahādevaṁ śitikaṁṭhamumāpatim
हे चंद्रमा! शितिकंठ उमापति महादेव के अतिरिक्त अन्य कोई तुम्हें पुनः निर्मल करने में समर्थ नहीं है।"
श्लोक 77 (skanda.7.21.77)
दक्षस्य च वचः श्रुत्वा कृतांजलिपुटः स्थितः। प्रत्युवाच तदा सोमः प्रहष्टेनांतरात्मना
dakṣasya ca vacaḥ śrutvā kṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ| pratyuvāca tadā somaḥ prahaṣṭenāṁtarātmanā
दक्ष के वचन सुनकर, हाथ जोड़े खड़े सोम ने तब प्रसन्न अंतरात्मा से उत्तर दिया—
श्लोक 78 (skanda.7.21.78)
भगवन्यदि तुष्टोसि मम भक्तस्य सुव्रत। अनुग्रहे कृता बुद्धिस्तदाचक्ष्व कुतः शिवः
bhagavanyadi tuṣṭosi mama bhaktasya suvrata| anugrahe kṛtā buddhistadācakṣva kutaḥ śivaḥ
"हे भगवन्! हे सुव्रत! यदि आप अपने भक्त मुझसे प्रसन्न हैं और आपका मन अनुग्रह के लिए दृढ़ है, तो बताइए—शिव कहाँ हैं?
श्लोक 79 (skanda.7.21.79)
कस्मिन्स्थाने मया दक्ष द्रष्टव्योऽसौ महेश्वरः। तत्स्थानानि चरिष्यामि यानि तानि वदस्व मे
kasminsthāne mayā dakṣa draṣṭavyo'sau maheśvaraḥ| tatsthānāni cariṣyāmi yāni tāni vadasva me
हे दक्ष! किस स्थान पर मुझे उन महेश्वर के दर्शन होंगे? वे जो भी स्थान हों, मैं उनका भ्रमण करूँगा—मुझे बताइए।"
श्लोक 80 (skanda.7.21.80)
दक्ष उवाच। शृणु सोम प्रयत्नेन श्रुत्वा चैवावधारय। वारुणीं दिशमाश्रित्य सागरानूपसन्निधौ
dakṣa uvāca| śṛṇu soma prayatnena śrutvā caivāvadhāraya| vāruṇīṁ diśamāśritya sāgarānūpasannidhau
दक्ष ने कहा—"हे सोम! प्रयत्नपूर्वक सुनो और सुनकर उसे धारण करो। वारुणी दिशा (पश्चिम) का आश्रय लेकर, समुद्र-तट के समीप—
श्लोक 81 (skanda.7.21.81)
कृतस्मरस्यापरतो धन्वंतरशतत्रये। लिंगं महाप्रभावं च स्वयंभूतं व्यवस्थितम्
kṛtasmarasyāparato dhanvaṁtaraśatatraye| liṁgaṁ mahāprabhāvaṁ ca svayaṁbhūtaṁ vyavasthitam
—कृतस्मर से परे, तीन सौ धनुष की दूरी पर, महाप्रभावशाली स्वयंभू लिंग स्थित है—
श्लोक 82 (skanda.7.21.82)
सूर्य्यबिंबसमप्रख्यं सर्प मेखलमंडितम्। कुक्कुटांडकमानं तद्भूमिमध्ये व्यवस्थितम्
sūryyabiṁbasamaprakhyaṁ sarpa mekhalamaṁḍitam| kukkuṭāṁḍakamānaṁ tadbhūmimadhye vyavasthitam
—सूर्यमंडल के समान प्रकाशमान, सर्पों की मेखला से सुशोभित, मुर्गी के अंडे के बराबर आकार का, जो पृथ्वी के मध्य में स्थित है।
श्लोक 83 (skanda.7.21.83)
स्पर्शलिंगं हि तद्विद्धि तद्भक्त्या ज्ञास्यते भवान्। तत्र संनिहितो देवः शंकरः परमेश्वरः
sparśaliṁgaṁ hi tadviddhi tadbhaktyā jñāsyate bhavān| tatra saṁnihito devaḥ śaṁkaraḥ parameśvaraḥ
उसे 'स्पर्शलिंग' जानो; भक्ति से तुम उसे पहचान सकोगे। वहाँ परमेश्वर देव शंकर सदा संनिहित रहते हैं।
श्लोक 84 (skanda.7.21.84)
गच्छ त्वं तपसोग्रेण आराधय सुरेश्वरम्
gaccha tvaṁ tapasogreṇa ārādhaya sureśvaram
तुम वहाँ जाओ और उग्र तप से देवेश्वर की आराधना करो।
श्लोक 85 (skanda.7.21.85)
प्रशस्य देवदेवेशमात्मानं निर्मलं कुरु। यस्याशु वरदानेन प्राप्स्यसे रूपमुत्तमम्
praśasya devadeveśamātmānaṁ nirmalaṁ kuru| yasyāśu varadānena prāpsyase rūpamuttamam
देवाधिदेव की स्तुति करके अपने को निर्मल बनाओ; उनके शीघ्र वरदान से तुम अपना उत्तम रूप पुनः प्राप्त करोगे।"