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प्रभास खण्ड · अध्याय 22

सोमवरप्रदानवर्णनम्

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

श्लोक 1 (skanda.7.22.1)

ईश्वर उवाच। दक्षेणैवमनुज्ञातः शोचन्कर्म स्वकं तदा। दुःखशोकपरीतात्मा प्रभासं क्षेत्रमागतः

īśvara uvāca| dakṣeṇaivamanujñātaḥ śocankarma svakaṁ tadā| duḥkhaśokaparītātmā prabhāsaṁ kṣetramāgataḥ

ईश्वर ने कहा—दक्ष द्वारा इस प्रकार अनुमति दिए जाने पर, अपने ही कर्म पर शोक करते हुए, दुःख और शोक से व्याकुल चित्त वाले वे प्रभासक्षेत्र में आए।

श्लोक 2 (skanda.7.22.2)

स गत्वा दक्षिणं तीरं सागरस्य समीपतः। ददर्श पर्वतं तत्र कृतस्मरमिति श्रुतम्

sa gatvā dakṣiṇaṁ tīraṁ sāgarasya samīpataḥ| dadarśa parvataṁ tatra kṛtasmaramiti śrutam

समुद्र के समीप दक्षिण तट पर जाकर उन्होंने वहाँ कृतस्मर नामक प्रसिद्ध पर्वत देखा।

श्लोक 3 (skanda.7.22.3)

यक्षविद्याधराकीर्णं किन्नरैरुपशोभितम्। चंदनागुरुकर्पूरैरशोकैस्तिलकैः शुभैः

yakṣavidyādharākīrṇaṁ kinnarairupaśobhitam| caṁdanāgurukarpūrairaśokaistilakaiḥ śubhaiḥ

यक्ष और विद्याधरों से भरा, किन्नरों से सुशोभित; चंदन, अगुरु, कर्पूर, अशोक तथा शुभ तिलक वृक्षों से युक्त;

श्लोक 4 (skanda.7.22.4)

कल्हारैः शतपत्रैश्च पुष्पितैः फलितैः शुभैः। आम्रजम्बूकपित्थैश्च दाडिमैः पनसैस्तथा

kalhāraiḥ śatapatraiśca puṣpitaiḥ phalitaiḥ śubhaiḥ| āmrajambūkapitthaiśca dāḍimaiḥ panasaistathā

कमल और शतपत्र कमलों से, पुष्पित और फलित शुभ वृक्षों से; आम, जामुन, कैंथ, अनार तथा कटहल से युक्त;

श्लोक 5 (skanda.7.22.5)

निंबुजम्बीरनागैश्च कदलीखंडमंडितैः। क्रमुकैर्नागवल्ल्याद्यैः शालैस्तालैस्तमालकैः

niṁbujambīranāgaiśca kadalīkhaṁḍamaṁḍitaiḥ| kramukairnāgavallyādyaiḥ śālaistālaistamālakaiḥ

नींबू, बीजौरा, नागकेसर से, केले के कुंजों से सुशोभित; सुपारी, पान की बेलों, साल, ताल तथा तमाल वृक्षों से युक्त;

श्लोक 6 (skanda.7.22.6)

बीजपूरकखर्जूरैर्द्राक्षामधुरपाटलैः। बिल्वचंपकतिंद्वाद्यैः कदंबककुभैस्तथा

bījapūrakakharjūrairdrākṣāmadhurapāṭalaiḥ| bilvacaṁpakatiṁdvādyaiḥ kadaṁbakakubhaistathā

बीजौरा, खजूर, अंगूर, मीठे पाटल वृक्षों से; बिल्व, चंपा, तेंदू आदि से, कदंब तथा कुटज वृक्षों से युक्त;

श्लोक 7 (skanda.7.22.7)

धवाशोकशिरीषाद्यैर्नानावृक्षैश्च शोभितम्। कामं कामफलैर्वृक्षैः पुष्पितैः फलितैः शुभैः

dhavāśokaśirīṣādyairnānāvṛkṣaiśca śobhitam| kāmaṁ kāmaphalairvṛkṣaiḥ puṣpitaiḥ phalitaiḥ śubhaiḥ

धव, अशोक, शिरीष आदि नाना वृक्षों से सुशोभित; इच्छानुसार फल देने वाले, पुष्पित-फलित शुभ वृक्षों से भरपूर;

श्लोक 8 (skanda.7.22.8)

हंसकारंडवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम्। कोकिलाभिः शुकैश्चैव नानापक्षिनिनादि तम्

haṁsakāraṁḍavākīrṇaṁ cakravākopaśobhitam| kokilābhiḥ śukaiścaiva nānāpakṣininādi tam

हंस और कारंडवों से भरा, चक्रवाक पक्षियों से सुशोभित; कोयल और तोतों सहित नाना पक्षियों की ध्वनि से गूंजता हुआ;

श्लोक 9 (skanda.7.22.9)

जातिस्मराः पक्षिणश्च व्याजह्रुर्मानुषीं गिरम्। गंधर्वकिंनरयुगैः सिद्धविद्याधरोरगैः

jātismarāḥ pakṣiṇaśca vyājahrurmānuṣīṁ giram| gaṁdharvakiṁnarayugaiḥ siddhavidyādharoragaiḥ

जो पक्षी अपने पूर्वजन्म का स्मरण रखते थे, वे मानवी वाणी में बोलते थे; गंधर्व, किन्नर, सिद्ध, विद्याधर तथा नागों के युगलों से युक्त—

श्लोक 10 (skanda.7.22.10)

क्रीडद्भिर्विविधैर्दिव्यैः शोभितं पर्वतोत्तमम्। देवगंधर्वनृत्यैश्च वेणुवीणानिनादितम्

krīḍadbhirvividhairdivyaiḥ śobhitaṁ parvatottamam| devagaṁdharvanṛtyaiśca veṇuvīṇānināditam

—विविध दिव्य क्रीड़ाओं से सुशोभित वह श्रेष्ठ पर्वत, देवताओं और गंधर्वों के नृत्य से तथा वेणु-वीणा के निनाद से गूंज रहा था;

श्लोक 11 (skanda.7.22.11)

वेदध्वनितघोषेण यज्ञहोमाग्निहोत्रजैः। समावृतं सर्वमाज्यगंधिभिरुच्छ्रितम्

vedadhvanitaghoṣeṇa yajñahomāgnihotrajaiḥ| samāvṛtaṁ sarvamājyagaṁdhibhirucchritam

वेद-ध्वनि के घोष से, यज्ञ, होम तथा अग्निहोत्र से उत्पन्न सुगंध से सब ओर से घिरा, घृत की गंध से सर्वत्र आच्छादित तथा उन्नत;

श्लोक 12 (skanda.7.22.12)

शोभितं चर्षिभिर्दिव्यैश्चातुर्विद्यैर्द्विजोत्तमैः। अत्रिश्चैव वसिष्ठश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः

śobhitaṁ carṣibhirdivyaiścāturvidyairdvijottamaiḥ| atriścaiva vasiṣṭhaśca pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ

चतुर्विद्या में पारंगत श्रेष्ठ द्विजों तथा दिव्य ऋषियों से सुशोभित—अत्रि, वसिष्ठ, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु,

श्लोक 13 (skanda.7.22.13)

भृगुश्चैव मरीचिश्च भरद्वाजोऽथ कश्यपः। मनुर्यमोंऽगिरा विष्णुः शातातपपराशरौ

bhṛguścaiva marīciśca bharadvājo'tha kaśyapaḥ| manuryamoṁ'girā viṣṇuḥ śātātapaparāśarau

भृगु, मरीचि, भरद्वाज, कश्यप, मनु, यम, अंगिरा, विष्णु, शातातप तथा पराशर,

श्लोक 14 (skanda.7.22.14)

आपस्तंबोऽथ संवर्तः कात्यः कात्यायनो मुनिः। गौतमः शंखलिखितौ तथा वाचस्पतिर्मुनिः

āpastaṁbo'tha saṁvartaḥ kātyaḥ kātyāyano muniḥ| gautamaḥ śaṁkhalikhitau tathā vācaspatirmuniḥ

आपस्तंब, संवर्त, काट्य, मुनि कात्यायन, गौतम, शंख-लिखित, तथा मुनि वाचस्पति,

श्लोक 15 (skanda.7.22.15)

जामदग्न्यो याज्ञवल्क्य ऋष्यशृंगो विभांडकः। गार्ग्यशौनकदाल्भ्याश्च व्यास उद्दालकः शुकः

jāmadagnyo yājñavalkya ṛṣyaśṛṁgo vibhāṁḍakaḥ| gārgyaśaunakadālbhyāśca vyāsa uddālakaḥ śukaḥ

जामदग्न्य, याज्ञवल्क्य, ऋष्यशृंग, विभांडक, गार्ग्य, शौनक, दाल्भ्य, व्यास, उद्दालक, शुक,

श्लोक 16 (skanda.7.22.16)

नारदः पर्वतश्चैव दुर्वासा उग्रतापसः। शाकल्यो गालवश्चैव जाबालिर्मुद्गलस्तथा

nāradaḥ parvataścaiva durvāsā ugratāpasaḥ| śākalyo gālavaścaiva jābālirmudgalastathā

नारद, पर्वत, उग्र तपस्वी दुर्वासा, शाकल्य, गालव, जाबालि तथा मुद्गल,

श्लोक 17 (skanda.7.22.17)

विश्वामित्रः कौशिकश्च जह्नुर्विश्वावसुस्तथा। धौम्यश्चैव शतानन्दो वैशंपायनजिष्णवः

viśvāmitraḥ kauśikaśca jahnurviśvāvasustathā| dhaumyaścaiva śatānando vaiśaṁpāyanajiṣṇavaḥ

विश्वामित्र, कौशिक, जह्नु, विश्वावसु, धौम्य, शतानंद, वैशंपायन तथा जिष्णु,

श्लोक 18 (skanda.7.22.18)

शाकटायनवार्द्धिक्यावग्निको बादरायणः। वालखिल्या महात्मानो ये च भूमण्डले स्थिताः

śākaṭāyanavārddhikyāvagniko bādarāyaṇaḥ| vālakhilyā mahātmāno ye ca bhūmaṇḍale sthitāḥ

शाकटायन, वार्द्धिक्य, अग्निक, बादरायण, तथा महात्मा वालखिल्यगण—ये और भूमंडल पर स्थित अन्य भी जितने ऋषि हैं,

श्लोक 19 (skanda.7.22.19)

ते सर्वे तत्र तिष्ठंति पर्वते तु कृतस्मरे। तेजस्विनो ब्रह्मपुत्रा ऋषयो धार्मिकाः प्रिये

te sarve tatra tiṣṭhaṁti parvate tu kṛtasmare| tejasvino brahmaputrā ṛṣayo dhārmikāḥ priye

वे सब उसी कृतस्मर पर्वत पर निवास करते हैं—हे प्रिये! वे तेजस्वी, ब्रह्मा के पुत्र, धार्मिक ऋषि हैं।

श्लोक 20 (skanda.7.22.20)

ज्वलंतस्तपसा सर्वे निर्द्धूमा इव पावकाः। मासोपवासिनः केचित्केचित्पक्षोपवासिनः

jvalaṁtastapasā sarve nirddhūmā iva pāvakāḥ| māsopavāsinaḥ kecitkecitpakṣopavāsinaḥ

वे सब तप से जलते हुए, धूमरहित अग्नि के समान थे; उनमें से कोई मासोपवासी थे, कोई पक्षोपवासी;

श्लोक 21 (skanda.7.22.21)

त्रैरात्रिकाः सांतपना निराहारास्तथा परे। केचित्पुष्प फलाहाराः शीर्णपर्णाशिनस्तथा

trairātrikāḥ sāṁtapanā nirāhārāstathā pare| kecitpuṣpa phalāhārāḥ śīrṇaparṇāśinastathā

कोई त्रैरात्रिक व्रत करते, कोई संतापन व्रत करते, कोई पूर्णतः निराहार रहते; कोई पुष्प-फलाहारी थे, कोई सूखे पत्ते खाने वाले थे,

श्लोक 22 (skanda.7.22.22)

केचिद्गोमयभक्षाश्च जलाहारास्तथा परे। साग्निहोत्राः सुविद्वांसो मोक्षमार्गार्थचिन्तकाः

kecidgomayabhakṣāśca jalāhārāstathā pare| sāgnihotrāḥ suvidvāṁso mokṣamārgārthacintakāḥ

कोई गोबर खाने वाले थे, कोई जलाहारी थे; अग्निहोत्रधारी, सुविद्वान्, मोक्षमार्ग के लक्ष्य का चिंतन करने वाले—

श्लोक 23 (skanda.7.22.23)

इति हासपुराणादिश्रुतिस्मृतिविशारदाः। एते चान्ये च बहवो मार्कंडेयपुरोगमाः

iti hāsapurāṇādiśrutismṛtiviśāradāḥ| ete cānye ca bahavo mārkaṁḍeyapurogamāḥ

—इस प्रकार इतिहास, पुराण आदि, श्रुति और स्मृति में पारंगत—ये तथा मार्कंडेय आदि अन्य बहुत से ऋषि भी,

श्लोक 24 (skanda.7.22.24)

प्रभासं क्षेत्रमासाद्य संस्थिता कृतपर्वते। एवं कृतस्मरस्तत्र सर्वदेवनिषेवितः। मन्वंतरेस्मिन्यो देवि निर्दग्धो वडवाग्निना

prabhāsaṁ kṣetramāsādya saṁsthitā kṛtaparvate| evaṁ kṛtasmarastatra sarvadevaniṣevitaḥ| manvaṁtaresminyo devi nirdagdho vaḍavāgninā

प्रभासक्षेत्र को प्राप्त कर उस कृतपर्वत पर निवास करते हैं। इस प्रकार वह कृतस्मर पर्वत, वहाँ समस्त देवताओं द्वारा सेवित, हे देवी! इस मन्वंतर में वडवाग्नि द्वारा दग्ध हुआ था।

श्लोक 25 (skanda.7.22.25)

तं दृष्ट्वा पर्वतं रम्यं दृष्ट्वा चैव महोदधिम्। प्रदक्षिणं ततश्चक्रे सप्तकृत्वो निशाकरः। गिरेः प्रदक्षिणां कृत्वा गतो यत्र महेश्वरः

taṁ dṛṣṭvā parvataṁ ramyaṁ dṛṣṭvā caiva mahodadhim| pradakṣiṇaṁ tataścakre saptakṛtvo niśākaraḥ| gireḥ pradakṣiṇāṁ kṛtvā gato yatra maheśvaraḥ

उस रमणीय पर्वत को देखकर, और महासागर को भी देखकर, निशाकर ने फिर उसकी सात बार प्रदक्षिणा की; पर्वत की प्रदक्षिणा करके वे वहाँ गए जहाँ महेश्वर थे।

श्लोक 26 (skanda.7.22.26)

समीपे तु समुद्रस्य स्पर्शलिंगस्वरूपवान्। प्रसादयामास विभुं प्रसन्नेनांतरात्मना

samīpe tu samudrasya sparśaliṁgasvarūpavān| prasādayāmāsa vibhuṁ prasannenāṁtarātmanā

समुद्र के समीप, स्पर्शलिंग-रूप में विद्यमान उस विभु को उन्होंने प्रसन्न अंतरात्मा से प्रसन्न करने का प्रयत्न किया,

श्लोक 27 (skanda.7.22.27)

मरणं वेति संध्याय शरणं वा महेश्वरम्। वरं शापाभिघातार्थं मृत्युं वा शंकरान्मम

maraṇaṁ veti saṁdhyāya śaraṇaṁ vā maheśvaram| varaṁ śāpābhighātārthaṁ mṛtyuṁ vā śaṁkarānmama

यह निश्चय करके कि या तो मृत्यु होगी या महेश्वर की शरण; शाप के आघात को दूर करने के लिए शंकर से वरदान या मृत्यु—

श्लोक 28 (skanda.7.22.28)

इति सोमो मतिं कृत्वा तपसाऽऽ राधयञ्छिवम्। यावद्वर्षसहस्रं तु फलमूलाशनोऽभवत्

iti somo matiṁ kṛtvā tapasā'' rādhayañchivam| yāvadvarṣasahasraṁ tu phalamūlāśano'bhavat

इस प्रकार निश्चय करके सोम ने तप द्वारा शिव की आराधना की; एक सहस्र वर्षों तक वे केवल फल-मूल का आहार करते रहे।

श्लोक 29 (skanda.7.22.29)

पूर्णे वर्षसहस्रे तु चतुर्थे वरवर्णिनि। तुतोष भगवान्रुद्रो वाक्यं चेदमुवाच ह

pūrṇe varṣasahasre tu caturthe varavarṇini| tutoṣa bhagavānrudro vākyaṁ cedamuvāca ha

जब पूरे एक सहस्र वर्ष, अर्थात् चौथा भाग, बीत गया, हे वरवर्णिनी! तब भगवान् रुद्र प्रसन्न हुए और यह वचन कहा—

श्लोक 30 (skanda.7.22.30)

परितुष्टोऽस्मि ते चंद्र वरं वरय सुव्रत। किं ते कामं करोम्यद्य ब्रूहि यत्स्यात्सुदुर्ल्लभम्

parituṣṭo'smi te caṁdra varaṁ varaya suvrata| kiṁ te kāmaṁ karomyadya brūhi yatsyātsudurllabham

"हे चंद्र! मैं तुमसे संतुष्ट हूँ; हे सुव्रत! वरदान माँगो। आज मैं तुम्हारी कौन-सी कामना पूर्ण करूँ? बताओ, चाहे वह अत्यंत दुर्लभ ही क्यों न हो।"

श्लोक 31 (skanda.7.22.31)

एवं प्रत्यक्षमापन्नं दृष्ट्वा देवं वृषध्वजम्। प्रणम्य तं यथाभक्त्या स्तुतिं चक्रे निशाकरः

evaṁ pratyakṣamāpannaṁ dṛṣṭvā devaṁ vṛṣadhvajam| praṇamya taṁ yathābhaktyā stutiṁ cakre niśākaraḥ

इस प्रकार वृषभध्वज देव को साक्षात् प्रकट हुआ देखकर, निशाकर ने उन्हें प्रणाम कर यथाशक्ति भक्तिपूर्वक स्तुति की—

श्लोक 32 (skanda.7.22.32)

चंद्र उवाच। ॐ नमो देवदेवाय शिवाय परमात्मने। अप्रमेयस्वरूपाय ब्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणे

caṁdra uvāca| oṁ namo devadevāya śivāya paramātmane| aprameyasvarūpāya byaktāvyaktasvarūpiṇe

चंद्र ने कहा—ॐ, देवाधिदेव शिव परमात्मा को नमस्कार, जो अप्रमेय स्वरूप वाले हैं, व्यक्त-अव्यक्त स्वरूप वाले हैं;

श्लोक 33 (skanda.7.22.33)

त्वं पतिर्योगिनामीश त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्। त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोंकारः प्रजापतिः

tvaṁ patiryogināmīśa tvayi sarvaṁ pratiṣṭhitam| tvaṁ yajñastvaṁ vaṣaṭkārastvamoṁkāraḥ prajāpatiḥ

आप योगियों के स्वामी हैं, हे ईश्वर! आप में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। आप यज्ञ हैं, आप वषट्कार हैं, आप ओंकार और प्रजापति हैं;

श्लोक 34 (skanda.7.22.34)

चतुर्विंशत्यधिकं च भुवनानां शतद्वयम्। तस्योपरि परं ज्योतिर्जागर्ति तव केवलम्

caturviṁśatyadhikaṁ ca bhuvanānāṁ śatadvayam| tasyopari paraṁ jyotirjāgarti tava kevalam

दो सौ चौबीस भुवनों के ऊपर आपकी ही परम ज्योति अकेली जाग्रत रहती है।

श्लोक 35 (skanda.7.22.35)

कल्पांत आदिवाराहमुक्तब्रह्मांडसंस्थितौ। आधारस्तंभभूताय तेजोलिंगाय ते नमः

kalpāṁta ādivārāhamuktabrahmāṁḍasaṁsthitau| ādhārastaṁbhabhūtāya tejoliṁgāya te namaḥ

कल्पांत में आदिवाराह द्वारा मुक्त किए गए ब्रह्मांड के आधार-स्तंभस्वरूप, आपको तेजोलिंग के रूप में नमस्कार;

श्लोक 36 (skanda.7.22.36)

नमोऽनामयनाम्ने ते नमस्ते कृत्तिवाससे। नमो भैरवनाथाय नमः सोमेश्वराय ते

namo'nāmayanāmne te namaste kṛttivāsase| namo bhairavanāthāya namaḥ someśvarāya te

अनामय नाम वाले आपको नमस्कार, कृत्तिवास (चर्म धारण करने वाले) आपको नमस्कार; भैरवनाथ को नमस्कार, सोमेश्वर आपको नमस्कार।

श्लोक 37 (skanda.7.22.37)

इति संज्ञाभिरेताभिः स्तुत्याभिरमृतेश्वरः। भूतैर्भव्यैर्भविष्यैश्च स्तूयसे सुरसत्तमैः

iti saṁjñābhiretābhiḥ stutyābhiramṛteśvaraḥ| bhūtairbhavyairbhaviṣyaiśca stūyase surasattamaiḥ

इन्हीं स्तुत्य नामों से, हे अमृतेश्वर! आप भूत, भव्य और भविष्य के श्रेष्ठ देवताओं द्वारा स्तुति किए जाते हैं।

श्लोक 38 (skanda.7.22.38)

आद्यो विरंचिनामाभूद्ब्रह्मा लोकपितामहः। मृत्युञ्जयेति ते नाम तदाऽभूत्पार्वतीपते

ādyo viraṁcināmābhūdbrahmā lokapitāmahaḥ| mṛtyuñjayeti te nāma tadā'bhūtpārvatīpate

जब प्रथम ब्रह्मा विरंचि नाम से हुए, लोकपितामह, तब हे पार्वतीपते! आपका नाम "मृत्युंजय" हुआ था;

श्लोक 39 (skanda.7.22.39)

द्वितीयोऽभूद्यदा ब्रह्मा पद्मभूरिति विश्रुतः। तदा कालाग्निरुद्रेति तव नाम प्रकीर्तितम्

dvitīyo'bhūdyadā brahmā padmabhūriti viśrutaḥ| tadā kālāgnirudreti tava nāma prakīrtitam

जब द्वितीय ब्रह्मा "पद्मभू" नाम से विश्रुत हुए, तब आपका नाम "कालाग्निरुद्र" कहा गया;

श्लोक 40 (skanda.7.22.40)

तृतीयोऽभूद्यदा ब्रह्मा स्वयंभूरिति विश्रुतः। अमृतेशेति ते नाम कीर्तितं कीर्तिवर्द्धनम्

tṛtīyo'bhūdyadā brahmā svayaṁbhūriti viśrutaḥ| amṛteśeti te nāma kīrtitaṁ kīrtivarddhanam

जब तृतीय ब्रह्मा "स्वयंभू" नाम से विश्रुत हुए, तब आपका कीर्ति बढ़ाने वाला नाम "अमृतेश" कीर्तित हुआ;

श्लोक 41 (skanda.7.22.41)

चतुर्थोऽभूद्यदा ब्रह्मा परमेष्ठीति विश्रुतः। अनामयेति देवेश तव नाम स्मृतं तदा

caturtho'bhūdyadā brahmā parameṣṭhīti viśrutaḥ| anāmayeti deveśa tava nāma smṛtaṁ tadā

जब चतुर्थ ब्रह्मा "परमेष्ठी" नाम से विश्रुत हुए, हे देवेश! तब आपका नाम "अनामय" स्मृत हुआ;

श्लोक 42 (skanda.7.22.42)

पंचमोऽभूद्यदा ब्रह्मा सुरज्येष्ठ इति श्रुतः। कृत्तिवासेति ते नाम बभूव त्रिपुरांतक

paṁcamo'bhūdyadā brahmā surajyeṣṭha iti śrutaḥ| kṛttivāseti te nāma babhūva tripurāṁtaka

जब पंचम ब्रह्मा "सुरज्येष्ठ" नाम से श्रुत हुए, हे त्रिपुरांतक! तब आपका नाम "कृत्तिवास" हुआ;

श्लोक 43 (skanda.7.22.43)

षष्ठश्चाभूद्यदा ब्रह्मा हेमगर्भ इति स्मृतः। तदा भैरवनाथेति तव नाम प्रकीर्तितम्

ṣaṣṭhaścābhūdyadā brahmā hemagarbha iti smṛtaḥ| tadā bhairavanātheti tava nāma prakīrtitam

जब छठे ब्रह्मा "हेमगर्भ" नाम से स्मृत हुए, तब आपका नाम "भैरवनाथ" कहा गया;

श्लोक 44 (skanda.7.22.44)

अधुना वर्त्तते योऽसौ शतानंद इति श्रुतः। आदिसोमेन यश्चासौ वामनेत्रोद्भवेन ते

adhunā varttate yo'sau śatānaṁda iti śrutaḥ| ādisomena yaścāsau vāmanetrodbhavena te

अभी जो सातवें ब्रह्मा "शतानंद" नाम से श्रुत हैं, तथा जो आपके वामनेत्र से उत्पन्न हुए आदिसोम हैं—

श्लोक 45 (skanda.7.22.45)

प्रतिष्ठार्थं तु लिंगस्य आनीतश्चाष्टवार्षिकः। बालरूपी तदा तेन सोमनाथेति कीर्तितम्

pratiṣṭhārthaṁ tu liṁgasya ānītaścāṣṭavārṣikaḥ| bālarūpī tadā tena somanātheti kīrtitam

—उसी बालरूपी आठ वर्षीय सोम को लिंग-प्रतिष्ठा के निमित्त लाया गया, और तब उन्होंने आपको "सोमनाथ" कहकर कीर्तित किया।

श्लोक 46 (skanda.7.22.46)

तदाप्रभृति सोमानां लक्षाणां द्वितयं गतम्

tadāprabhṛti somānāṁ lakṣāṇāṁ dvitayaṁ gatam

तब से अब तक दो लाख चंद्र (वर्ष) बीत चुके हैं,

श्लोक 47 (skanda.7.22.47)

सहस्रद्वितयं चैव शतं चैव षडुत्तरम्

sahasradvitayaṁ caiva śataṁ caiva ṣaḍuttaram

और दो सहस्र तथा एक सौ छह और भी,

श्लोक 48 (skanda.7.22.48)

सप्तमोऽहं महादेव आत्रेय इति विश्रुतः। प्राचेतसेन दक्षेण शप्तस्त्वां शरणं गतः। रक्ष मां देवदेवेश क्षयिणं पापरोगिणम्

saptamo'haṁ mahādeva ātreya iti viśrutaḥ| prācetasena dakṣeṇa śaptastvāṁ śaraṇaṁ gataḥ| rakṣa māṁ devadeveśa kṣayiṇaṁ pāparogiṇam

हे महादेव! मैं सातवाँ, आत्रेय नाम से विख्यात हूँ। प्राचेतस दक्ष द्वारा शापित होकर मैं आपकी शरण में आया हूँ। हे देवाधिदेव! मुझ क्षयरोग से पीड़ित, इस पापरोग से ग्रस्त की रक्षा कीजिए।

श्लोक 49 (skanda.7.22.49)

इति संस्तुवतस्तस्य चंद्रस्य करुणाकरः। तुतोष भगवान्रुद्रो वाक्यं चेदमुवाच ह

iti saṁstuvatastasya caṁdrasya karuṇākaraḥ| tutoṣa bhagavānrudro vākyaṁ cedamuvāca ha

इस प्रकार चंद्रमा की स्तुति सुनकर, करुणानिधान भगवान् रुद्र प्रसन्न हुए और यह वचन कहा—

श्लोक 50 (skanda.7.22.50)

परितुष्टोऽस्मि ते चंद्र वरं वरय सुव्रत। कि ते कामं करोम्यद्य ब्रूहि यत्स्यात्सुदुर्ल्लभम्

parituṣṭo'smi te caṁdra varaṁ varaya suvrata| ki te kāmaṁ karomyadya brūhi yatsyātsudurllabham

"हे चंद्र! मैं तुमसे संतुष्ट हूँ; हे सुव्रत! वरदान माँगो। आज मैं तुम्हारी कौन-सी कामना पूर्ण करूँ? बताओ, चाहे वह अत्यंत दुर्लभ ही क्यों न हो।

श्लोक 51 (skanda.7.22.51)

मम नामानि गुह्यानि मम प्रियतराणि च। पठिष्यंति नरा ये तु दास्ये तेषां मनोगतम्

mama nāmāni guhyāni mama priyatarāṇi ca| paṭhiṣyaṁti narā ye tu dāsye teṣāṁ manogatam

जो मनुष्य मेरे इन गोपनीय और अत्यंत प्रिय नामों का पाठ करेंगे, उन्हें मैं उनकी मनोकामना दूँगा।

श्लोक 52 (skanda.7.22.52)

अतीता ये चंद्रमसो भविष्यंति च येऽधुना। तेषां पूज्यमिदं लिंगं यावदन्योऽष्टवार्षिकः

atītā ye caṁdramaso bhaviṣyaṁti ca ye'dhunā| teṣāṁ pūjyamidaṁ liṁgaṁ yāvadanyo'ṣṭavārṣikaḥ

जो चंद्रमा व्यतीत हो चुके हैं और जो अभी होने वाले हैं, उन सभी के लिए यह लिंग पूज्य है, जब तक अगला आठ वर्षीय सोम न आए।

श्लोक 53 (skanda.7.22.53)

आः परं चतुर्वक्त्रो ब्रह्मा यो भविता यदा। प्राणनाथेति देवस्य तदा नाम भविष्यति

āḥ paraṁ caturvaktro brahmā yo bhavitā yadā| prāṇanātheti devasya tadā nāma bhaviṣyati

और उसके पश्चात् जब चतुर्मुख ब्रह्मा होने वाले होंगे, तब देव का नाम "प्राणनाथ" होगा।

श्लोक 54 (skanda.7.22.54)

प्राणास्तु वायवः प्रोक्तास्तदाराधननाम तत्। प्राणनाथेति संप्रोक्तं मेऽधुना तद्भविष्यति

prāṇāstu vāyavaḥ proktāstadārādhananāma tat| prāṇanātheti saṁproktaṁ me'dhunā tadbhaviṣyati

प्राण को वायु कहा गया है; उसके आराधन के नाम से ही 'प्राणनाथ' नाम अभी मेरा भविष्य में होगा।

श्लोक 55 (skanda.7.22.55)

तस्मादग्नीशनामेति कालरुद्रेत्यनंतरम्। तारकेति ततो नाम भविष्यत्येव कीर्तितम्

tasmādagnīśanāmeti kālarudretyanaṁtaram| tāraketi tato nāma bhaviṣyatyeva kīrtitam

उसके पश्चात् 'अग्नीश' नाम होगा, फिर 'कालरुद्र'; फिर 'तारक' नाम होना कीर्तित है।

श्लोक 56 (skanda.7.22.56)

मृत्युञ्जयेति देवस्य भविता तदनंतरम्। त्र्यंबकेशस्त्वितीशेति भुवनेशेत्यनन्तरम्

mṛtyuñjayeti devasya bhavitā tadanaṁtaram| tryaṁbakeśastvitīśeti bhuvaneśetyanantaram

उसके पश्चात् देव का नाम पुनः 'मृत्युंजय' होगा; फिर 'त्र्यंबकेश'; फिर 'भुवनेश';

श्लोक 57 (skanda.7.22.57)

भूतनाथेति घोरेति ब्रह्मेशेत्यथ नामकम्। भविष्यं पृथिवीशेति आदिनाथेत्यनंतरम्

bhūtanātheti ghoreti brahmeśetyatha nāmakam| bhaviṣyaṁ pṛthivīśeti ādināthetyanaṁtaram

फिर 'भूतनाथ', फिर 'घोर', फिर 'ब्रह्मेश' नाम; फिर भविष्य में 'पृथिवीश'; फिर 'आदिनाथ';

श्लोक 58 (skanda.7.22.58)

कल्पेश्वरेति देवस्य चंद्रनाथेत्यनन्तरम्। नाम देवस्य यद्भावि सांप्रतं ते प्रकाशितम्

kalpeśvareti devasya caṁdranāthetyanantaram| nāma devasya yadbhāvi sāṁprataṁ te prakāśitam

फिर देव का नाम 'कल्पेश्वर'; और फिर 'चंद्रनाथ' नाम—इस प्रकार देव के भविष्य में होने वाले नाम अब तुम्हें प्रकट कर दिए गए।

श्लोक 59 (skanda.7.22.59)

इत्येवमादि नामानि स्वसंख्यातानि षोडश। गतानि संभविष्यंति कालस्यानंतभावतः

ityevamādi nāmāni svasaṁkhyātāni ṣoḍaśa| gatāni saṁbhaviṣyaṁti kālasyānaṁtabhāvataḥ

इस प्रकार ये कुल सोलह नाम, कुछ बीत चुके और कुछ भविष्य में होने वाले, काल की अनंतता के कारण होते हैं—

श्लोक 60 (skanda.7.22.60)

एकैकं वर्तते नाम ब्रह्मणः प्रलयावधि

ekaikaṁ vartate nāma brahmaṇaḥ pralayāvadhi

—प्रत्येक एक नाम एक ब्रह्मा के प्रलय-पर्यंत चलता है।

श्लोक 61 (skanda.7.22.61)

ततोन्यज्जायते नाम यथा नामानुरूपतः

tatonyajjāyate nāma yathā nāmānurūpataḥ

उसके पश्चात् दूसरा नाम उत्पन्न होता है, जैसा उस नाम के अनुरूप हो।

श्लोक 62 (skanda.7.22.62)

अथ किं बहुनोक्तेन रहस्यं ते प्रकाशितम्। वत्स यत्कारणेनेह तपस्तप्तं त्वयाऽखिलम्। तन्मे निःशेषतो ब्रूहि दास्ये तुष्टोऽस्मि ते वरम्

atha kiṁ bahunoktena rahasyaṁ te prakāśitam| vatsa yatkāraṇeneha tapastaptaṁ tvayā'khilam| tanme niḥśeṣato brūhi dāsye tuṣṭo'smi te varam

अब अधिक कहने से क्या लाभ? यह रहस्य तुम्हें प्रकट कर दिया गया। हे वत्स! जिस कारण से तुमने यह संपूर्ण तप किया, वह मुझे पूर्ण रूप से बताओ; मैं प्रसन्न होकर तुम्हें वर दूँगा।"

श्लोक 63 (skanda.7.22.63)

चन्द्र उवाच। अहं शप्तस्तु दक्षेण कस्मिंश्चित्कारणांतरे। यक्ष्मणा च क्षयं नीतस्तस्मात्त्वं त्रातुमर्हसि

candra uvāca| ahaṁ śaptastu dakṣeṇa kasmiṁścitkāraṇāṁtare| yakṣmaṇā ca kṣayaṁ nītastasmāttvaṁ trātumarhasi

चंद्र ने कहा—मैं दक्ष द्वारा किसी अन्य कारण से शापित होकर यक्ष्मा से क्षीण किया गया हूँ; इसलिए आप ही मुझे बचाने योग्य हैं।

श्लोक 64 (skanda.7.22.64)

शंभुरुवाच। अधुना भोः समं पश्य सर्वास्ता दक्षकन्यकाः। क्षयस्ते भविता पक्षं पक्षं वृद्धिर्भविष्यति

śaṁbhuruvāca| adhunā bhoḥ samaṁ paśya sarvāstā dakṣakanyakāḥ| kṣayaste bhavitā pakṣaṁ pakṣaṁ vṛddhirbhaviṣyati

शंभु ने कहा—अब हे भद्र! दक्ष की सभी कन्याओं को समान दृष्टि से देखो; तुम एक पक्ष क्षीण होगे और अगले पक्ष में वृद्धि को प्राप्त होगे।

श्लोक 65 (skanda.7.22.65)

पूर्वोचितां प्रभां सोम प्राप्स्यसे मत्प्रसादतः। प्राचेतसस्य दक्षस्य तपसा हतपाप्मनः

pūrvocitāṁ prabhāṁ soma prāpsyase matprasādataḥ| prācetasasya dakṣasya tapasā hatapāpmanaḥ

हे सोम! मेरी कृपा से तुम अपनी पूर्व-उचित कांति को पुनः प्राप्त करोगे—प्राचेतस दक्ष का, जिनका पाप तप से नष्ट हुआ है,

श्लोक 66 (skanda.7.22.66)

तस्यान्यथा वचः कर्तुं शक्यं नान्यैः सुरैरपि। ब्राह्मणाः कुपिता हन्युर्भस्मीकुर्युः स्वतेजसा

tasyānyathā vacaḥ kartuṁ śakyaṁ nānyaiḥ surairapi| brāhmaṇāḥ kupitā hanyurbhasmīkuryuḥ svatejasā

—उनके वचन को अन्यथा करना अन्य देवताओं के लिए भी संभव नहीं है। ब्राह्मण क्रोधित होकर मार डालते हैं, अपने तेज से भस्म कर देते हैं;

श्लोक 67 (skanda.7.22.67)

देवान्कुर्युरदेवांश्च नाशयेयुरिदं जगत्। ब्राह्मणाश्चैव देवाश्च तेज एकं द्विधा कृतम्

devānkuryuradevāṁśca nāśayeyuridaṁ jagat| brāhmaṇāścaiva devāśca teja ekaṁ dvidhā kṛtam

वे देवताओं को अदेव बना सकते हैं, इस जगत् का नाश कर सकते हैं। ब्राह्मण और देवता एक ही तेज हैं, जो दो भागों में विभक्त हैं;

श्लोक 68 (skanda.7.22.68)

प्रत्यक्षं ब्राह्मणा देवाः परोक्षं दिवि देवताः। न विना ब्राह्मणा देवैर्न देवा ब्राह्मणैर्विना

pratyakṣaṁ brāhmaṇā devāḥ parokṣaṁ divi devatāḥ| na vinā brāhmaṇā devairna devā brāhmaṇairvinā

ब्राह्मण प्रत्यक्ष देवता हैं, स्वर्ग में देवता परोक्ष हैं। ब्राह्मणों के बिना देवता नहीं हैं, और देवताओं के बिना ब्राह्मण नहीं हैं।

श्लोक 69 (skanda.7.22.69)

एकत्र मन्त्रा स्तिष्ठन्ति तेज एकत्र तिष्ठति। ब्राह्मणा देवता लोके ब्राह्मणा दिवि देवताः। त्रैलोक्ये ब्राह्मणाः श्रेष्ठा ब्राह्मणा एव कारणम्

ekatra mantrā stiṣṭhanti teja ekatra tiṣṭhati| brāhmaṇā devatā loke brāhmaṇā divi devatāḥ| trailokye brāhmaṇāḥ śreṣṭhā brāhmaṇā eva kāraṇam

एक ही स्थान में मंत्र स्थित रहते हैं, एक ही स्थान में तेज स्थित रहता है। ब्राह्मण लोक में देवता हैं, ब्राह्मण स्वर्ग में देवता हैं। त्रिलोक में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, ब्राह्मण ही (सबका) कारण हैं।

श्लोक 70 (skanda.7.22.70)

पितुर्नियुक्ताः पितरो भवंति क्रियासु दैवीषु भवंति देवाः। द्विजोत्तमा हस्तनिषक्ततोयास्तेनैव देहेन भवंति देवाः

piturniyuktāḥ pitaro bhavaṁti kriyāsu daivīṣu bhavaṁti devāḥ| dvijottamā hastaniṣaktatoyāstenaiva dehena bhavaṁti devāḥ

पिता की भाँति नियुक्त होकर वे पितर बन जाते हैं; दैवी क्रियाओं में वे देवता बन जाते हैं। द्विजोत्तम, हाथ में जल लिए हुए, उसी देह में देवता बन जाते हैं।

श्लोक 71 (skanda.7.22.71)

षट्क र्मतत्त्वाभिरतेषु नित्यं विप्रेषु वेदार्थकुतूहलेषु। न तेषु भक्त्या प्रविशंति घोरं महाभयं प्रेतभवं कदाचित्

ṣaṭka rmatattvābhirateṣu nityaṁ vipreṣu vedārthakutūhaleṣu| na teṣu bhaktyā praviśaṁti ghoraṁ mahābhayaṁ pretabhavaṁ kadācit

छह कर्मों के तत्त्व में सदा रत, वेदार्थ की जिज्ञासा रखने वाले विप्रों के प्रति भक्ति रखने वालों में, घोर महाभयंकर प्रेत-योनि कभी प्रवेश नहीं करती।

श्लोक 72 (skanda.7.22.72)

यद्ब्राह्मणाः स्तुत्यतमा वदन्ति तद्देवता कर्मभिराचरंति। तुष्टेषु तुष्टाः सततं भवन्ति प्रत्यक्षदेवेषु परोक्षदेवाः

yadbrāhmaṇāḥ stutyatamā vadanti taddevatā karmabhirācaraṁti| tuṣṭeṣu tuṣṭāḥ satataṁ bhavanti pratyakṣadeveṣu parokṣadevāḥ

जो अत्यंत स्तुत्य ब्राह्मण कहते हैं, देवता उसी को कर्मों द्वारा आचरित करते हैं। परोक्ष देवता सदा तभी प्रसन्न होते हैं जब प्रत्यक्ष देवता (ब्राह्मण) प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 73 (skanda.7.22.73)

यथा रुद्रा यथा देवा मरुतो वसवोऽश्विनौ। ब्रह्मा च सोमसूर्यौ च तथा लोके द्विजोत्तमाः

yathā rudrā yathā devā maruto vasavo'śvinau| brahmā ca somasūryau ca tathā loke dvijottamāḥ

जैसे रुद्र, जैसे देवता, मरुत्, वसु, अश्विनीकुमार, ब्रह्मा तथा सोम-सूर्य हैं, वैसे ही लोक में द्विजोत्तम हैं।

श्लोक 74 (skanda.7.22.74)

देवाधीनाः प्रजाः सर्वा यज्ञाधीनाश्च देवताः। ते यज्ञा ब्राह्मणाधीनास्तस्माद्देवा द्विजोत्तमाः

devādhīnāḥ prajāḥ sarvā yajñādhīnāśca devatāḥ| te yajñā brāhmaṇādhīnāstasmāddevā dvijottamāḥ

सभी प्रजाएँ देवताओं के अधीन हैं, और देवता यज्ञ के अधीन हैं। वे यज्ञ ब्राह्मणों के अधीन हैं, इसलिए द्विजोत्तम ही देवता हैं।

श्लोक 75 (skanda.7.22.75)

ब्राह्मणानर्चयेन्नित्यं ब्राह्मणांस्तर्पयेत्सदा। ब्राह्मणास्तारका लोके ब्राह्मणात्स्वर्गमश्नुते

brāhmaṇānarcayennityaṁ brāhmaṇāṁstarpayetsadā| brāhmaṇāstārakā loke brāhmaṇātsvargamaśnute

ब्राह्मणों की सदा पूजा करनी चाहिए, ब्राह्मणों को सदा तृप्त करना चाहिए। ब्राह्मण ही लोक में तारने वाले हैं, ब्राह्मण के द्वारा ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

श्लोक 76 (skanda.7.22.76)

अभेद्यमच्छेद्यमनादिमक्षयं विधिं पुराणं परिपालयन्ति। महामतिस्तानभिपूज्य वै द्विजान्भवेदजेयो दिवि देवराडिव

abhedyamacchedyamanādimakṣayaṁ vidhiṁ purāṇaṁ paripālayanti| mahāmatistānabhipūjya vai dvijānbhavedajeyo divi devarāḍiva

वे अभेद्य, अछेद्य, अनादि, अक्षय पुरातन विधि का पालन करते हैं। महाबुद्धिमान् मनुष्य इन द्विजों की पूजा करके स्वर्ग में देवराज के समान अजेय हो जाता है।

श्लोक 77 (skanda.7.22.77)

शक्यं हि कवचं भेत्तुं नाराचेन शरेण वा। अपि वज्र सहस्रेण ब्राह्मणाशीः सुदुर्भिदा

śakyaṁ hi kavacaṁ bhettuṁ nārācena śareṇa vā| api vajra sahasreṇa brāhmaṇāśīḥ sudurbhidā

कवच को लोहे के बाण या शर से, यहाँ तक कि सहस्र वज्रों से भेदा जा सकता है, परंतु ब्राह्मण के आशीर्वाद को भेदना अत्यंत दुष्कर है।

श्लोक 78 (skanda.7.22.78)

हुतेन शाम्यते पापं हुतमन्नेन शाम्यति। अन्नं हिरण्यदानेन हिरण्यं ब्राह्मणाशिषा

hutena śāmyate pāpaṁ hutamannena śāmyati| annaṁ hiraṇyadānena hiraṇyaṁ brāhmaṇāśiṣā

पाप हवन से शांत होता है, हवन अन्न से शांत होता है; अन्न स्वर्ण-दान से, और स्वर्ण ब्राह्मण के आशीर्वाद से (शांत होता है)।

श्लोक 79 (skanda.7.22.79)

य इच्छेन्नरकं गंतुं सपुत्रपशुबांधव। देवेष्वधिकृतं कुर्याद्ब्राह्मणेषु च गोषु च

ya icchennarakaṁ gaṁtuṁ saputrapaśubāṁdhava| deveṣvadhikṛtaṁ kuryādbrāhmaṇeṣu ca goṣu ca

जो पुत्र, पशु और बांधवों सहित नरक जाना चाहे, वह देवताओं, ब्राह्मणों तथा गौओं पर अधिकार जमाए।

श्लोक 80 (skanda.7.22.80)

ब्राह्मणान्द्वेष्टि यो मोहाद्देवान्गाश्च मखान्यदि। नैव तस्य परो लोको नाऽयं लोको दुरात्मनः

brāhmaṇāndveṣṭi yo mohāddevāngāśca makhānyadi| naiva tasya paro loko nā'yaṁ loko durātmanaḥ

जो मोहवश ब्राह्मणों से, देवताओं से, गौओं से तथा यज्ञों से द्वेष करता है, उस दुरात्मा के लिए न परलोक है, न यह लोक।

श्लोक 81 (skanda.7.22.81)

अनिन्द्या ब्राह्मणा गावः कांचनं सलिलं स्त्रियः। पृथिवी तु षडेतानि यो निन्दति स पातकी

anindyā brāhmaṇā gāvaḥ kāṁcanaṁ salilaṁ striyaḥ| pṛthivī tu ṣaḍetāni yo nindati sa pātakī

ब्राह्मण, गौ, स्वर्ण, जल, स्त्री तथा पृथ्वी—ये छह निंदा के योग्य नहीं हैं; जो इनकी निंदा करता है, वह पापी है।

श्लोक 82 (skanda.7.22.82)

अग्रं धर्मस्य राजानो मूलं धर्मस्य ब्राह्मणाः। तस्मान्मूलं न हिंसीत मूले ह्यग्रं प्रतिष्ठितम्

agraṁ dharmasya rājāno mūlaṁ dharmasya brāhmaṇāḥ| tasmānmūlaṁ na hiṁsīta mūle hyagraṁ pratiṣṭhitam

राजा धर्म के अग्रभाग हैं, ब्राह्मण धर्म के मूल हैं; इसलिए मूल की हिंसा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि मूल में ही अग्रभाग प्रतिष्ठित है।

श्लोक 83 (skanda.7.22.83)

फलं धर्मस्य राजानः पुष्पं धर्मस्य ब्राह्मणाः। तस्मात्पुष्पं न हिंसीत पुष्पात्संजायते फलम्

phalaṁ dharmasya rājānaḥ puṣpaṁ dharmasya brāhmaṇāḥ| tasmātpuṣpaṁ na hiṁsīta puṣpātsaṁjāyate phalam

राजा धर्म के फल हैं, ब्राह्मण धर्म के पुष्प हैं; इसलिए पुष्प की हिंसा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पुष्प से ही फल उत्पन्न होता है।

श्लोक 84 (skanda.7.22.84)

राजा वृक्षो ब्राह्मणास्तस्य मूलं पौराः पर्णं मन्त्रिणस्तस्य शाखाः। तस्माद्राज्ञा ब्राह्मणा रक्षणीया मूले गुप्ते नास्ति वृक्षस्य नाशः

rājā vṛkṣo brāhmaṇāstasya mūlaṁ paurāḥ parṇaṁ mantriṇastasya śākhāḥ| tasmādrājñā brāhmaṇā rakṣaṇīyā mūle gupte nāsti vṛkṣasya nāśaḥ

राजा वृक्ष है, ब्राह्मण उसकी जड़ हैं, नगरवासी पत्ते हैं, मंत्री उसकी शाखाएँ हैं; इसलिए राजा को ब्राह्मणों की रक्षा करनी चाहिए—जड़ के सुरक्षित रहने पर वृक्ष का नाश नहीं होता।

श्लोक 85 (skanda.7.22.85)

आसन्नो हि दहत्यग्निर्दूराद्दहति ब्राह्मणः। प्ररोहत्यग्निना दग्धं ब्रह्मदग्धं न रोहति

āsanno hi dahatyagnirdūrāddahati brāhmaṇaḥ| prarohatyagninā dagdhaṁ brahmadagdhaṁ na rohati

अग्नि तो पास आने पर ही जलाती है, परंतु ब्राह्मण दूर से ही जला सकता है; अग्नि से जला हुआ पुनः उग आता है, किंतु ब्रह्म-दग्ध कभी नहीं उगता।

श्लोक 86 (skanda.7.22.86)

ब्राह्मणानां च शापेन सर्वभक्षो हुताशनः। समुद्रश्चाप्यपेयस्तु विफलश्च पुरंदरः

brāhmaṇānāṁ ca śāpena sarvabhakṣo hutāśanaḥ| samudraścāpyapeyastu viphalaśca puraṁdaraḥ

ब्राह्मणों के शाप से ही अग्नि सर्वभक्षी हुई; समुद्र भी अपेय हुआ, और पुरंदर (इंद्र) निष्फल हो गए—

श्लोक 87 (skanda.7.22.87)

त्वं चन्द्र राजयक्ष्मी च पृथिव्यामूषराणि च। सूर्याचन्द्रमसोः पातः पुनरुद्धरणं तयोः

tvaṁ candra rājayakṣmī ca pṛthivyāmūṣarāṇi ca| sūryācandramasoḥ pātaḥ punaruddharaṇaṁ tayoḥ

—और हे चंद्र! तुम क्षयरोगी हुए, पृथ्वी पर ऊसर भूमि उत्पन्न हुई; सूर्य और चंद्रमा का पतन हुआ, तथा उन दोनों का पुनरुद्धार भी हुआ—

श्लोक 88 (skanda.7.22.88)

वनस्पतीनां निर्यासो दानवानां पराजयः। नागानां च वशीकारः क्षत्रस्योत्सादनं तथा। देवोत्पत्ति विपर्यासो लोकानां च विपर्ययः

vanaspatīnāṁ niryāso dānavānāṁ parājayaḥ| nāgānāṁ ca vaśīkāraḥ kṣatrasyotsādanaṁ tathā| devotpatti viparyāso lokānāṁ ca viparyayaḥ

—वृक्षों में गोंद का बहना, दानवों की पराजय, नागों का वशीकरण, तथा क्षत्रियों का उन्मूलन; देवताओं की उत्पत्ति का विपर्यास और लोकों का विपर्यय—

श्लोक 89 (skanda.7.22.89)

एवमादीनि तेजांसि ब्राह्मणानां महात्मनाम्। तस्माद्विप्रेषु नृपतिः प्रणमेन्नित्यमेव च

evamādīni tejāṁsi brāhmaṇānāṁ mahātmanām| tasmādvipreṣu nṛpatiḥ praṇamennityameva ca

—ऐसे ही अन्य भी महात्मा ब्राह्मणों के तेज हैं। इसलिए राजा को सदा ब्राह्मणों के समक्ष प्रणाम करना चाहिए।

श्लोक 90 (skanda.7.22.90)

परा मप्यापदं प्राप्तो ब्राह्मणान्न प्रकोपयेत्। ते ह्येनं कुपिता हन्युः सद्यः सबलवाहनम्

parā mapyāpadaṁ prāpto brāhmaṇānna prakopayet| te hyenaṁ kupitā hanyuḥ sadyaḥ sabalavāhanam

घोर आपत्ति में पड़ने पर भी राजा को ब्राह्मणों को क्रोधित नहीं करना चाहिए; क्योंकि क्रुद्ध होने पर वे सेना और वाहनों सहित उसे तत्काल नष्ट कर सकते हैं।

श्लोक 91 (skanda.7.22.91)

प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत्। एवं विद्वानविद्वान्वा ब्राह्मणो दैवतं महत्

praṇītaścāpraṇītaśca yathāgnirdaivataṁ mahat| evaṁ vidvānavidvānvā brāhmaṇo daivataṁ mahat

जैसे अग्नि, विधिपूर्वक प्रज्वलित हो या न हो, महान् देवता है, वैसे ही ब्राह्मण, विद्वान् हो या अविद्वान्, महान् देवता है।

श्लोक 92 (skanda.7.22.92)

श्मशानेष्वपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति। हूयमानश्च यज्ञेषु भूय एवाभिवर्द्धते

śmaśāneṣvapi tejasvī pāvako naiva duṣyati| hūyamānaśca yajñeṣu bhūya evābhivarddhate

श्मशान में भी तेजस्वी अग्नि कभी दूषित नहीं होती; और यज्ञों में आहुति दिए जाने पर वह और भी अधिक बढ़ती है।

श्लोक 93 (skanda.7.22.93)

एवं यद्यप्य निष्टेषु वर्त्तते सर्वकर्मसु। सर्वेषां ब्राह्मणः पूज्यो दैवतं परमं महत्

evaṁ yadyapya niṣṭeṣu varttate sarvakarmasu| sarveṣāṁ brāhmaṇaḥ pūjyo daivataṁ paramaṁ mahat

इसी प्रकार, यद्यपि ब्राह्मण सभी प्रकार के निंदनीय कर्मों में भी लगा हो, फिर भी वह सबके लिए पूज्य है, परम महान् देवता है।

श्लोक 94 (skanda.7.22.94)

क्षत्रस्यातिप्रवृद्धस्य ब्राह्मणानां प्रभावतः। ब्राह्मं हि परमं पूज्यं क्षत्रं हि ब्रह्मसंभवम्

kṣatrasyātipravṛddhasya brāhmaṇānāṁ prabhāvataḥ| brāhmaṁ hi paramaṁ pūjyaṁ kṣatraṁ hi brahmasaṁbhavam

क्षत्रियों की अत्यंत वृद्धि भी ब्राह्मणों के ही प्रभाव से होती है; ब्रह्म ही परम पूज्य है, क्योंकि क्षत्र ब्रह्म से ही उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 95 (skanda.7.22.95)

अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम्। तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति

adbhyo'gnirbrahmataḥ kṣatramaśmano lohamutthitam| teṣāṁ sarvatragaṁ tejaḥ svāsu yoniṣu śāmyati

जल से अग्नि, ब्रह्म से क्षत्र, पत्थर से लोहा उत्पन्न होता है; उनका सर्वव्यापी तेज अपनी-अपनी योनि में ही शांत होता है।

श्लोक 96 (skanda.7.22.96)

यान्समाश्रित्य तिष्ठन्ति देवलोकाश्च सर्वदा। ब्रह्मैव वचनं येषां को हिंस्यात्ताञ्जिजीविषुः

yānsamāśritya tiṣṭhanti devalokāśca sarvadā| brahmaiva vacanaṁ yeṣāṁ ko hiṁsyāttāñjijīviṣuḥ

जिनका आश्रय लेकर देवलोक सदा स्थित रहते हैं, जिनका वचन ही ब्रह्म है—उन्हें जीने की इच्छा रखने वाला कौन नष्ट करेगा?

श्लोक 97 (skanda.7.22.97)

म्रियमाणोऽप्याददीत न राजा ब्राह्मणात्करम्। न च क्षुधा ऽस्य संसीदेद्ब्राह्मणो विषये वसन्

mriyamāṇo'pyādadīta na rājā brāhmaṇātkaram| na ca kṣudhā 'sya saṁsīdedbrāhmaṇo viṣaye vasan

मरते हुए भी राजा ब्राह्मण से कर न ले; और उसके राज्य में रहने वाला ब्राह्मण भूख से पीड़ित न हो।

श्लोक 98 (skanda.7.22.98)

यस्य राज्ञश्च विषये ब्राह्मणः सीदति क्षुधा। तस्य तच्छतधा राष्ट्रमचिरादेव सीदति

yasya rājñaśca viṣaye brāhmaṇaḥ sīdati kṣudhā| tasya tacchatadhā rāṣṭramacirādeva sīdati

जिस राजा के राज्य में ब्राह्मण भूख से पीड़ित होता है, उस राजा का राष्ट्र शीघ्र ही सौ गुना नष्ट हो जाता है।

श्लोक 99 (skanda.7.22.99)

यद्राजा कुरुते पापं प्रमादाद्यच्च विभ्रमात्। वसन्तो ब्राह्मणा राष्ट्रे श्रोत्रियाः शमयन्ति तत्

yadrājā kurute pāpaṁ pramādādyacca vibhramāt| vasanto brāhmaṇā rāṣṭre śrotriyāḥ śamayanti tat

राजा जो भी पाप प्रमाद या भ्रम से करता है, राष्ट्र में निवास करने वाले श्रोत्रिय ब्राह्मण उसे शांत कर देते हैं।

श्लोक 100 (skanda.7.22.100)

पूर्वरात्रांतरात्रेषु द्विजैर्यस्य विधीयते। स राजा सह राष्ट्रेण वर्धते ब्रह्मतेजसा

pūrvarātrāṁtarātreṣu dvijairyasya vidhīyate| sa rājā saha rāṣṭreṇa vardhate brahmatejasā

जिस राजा के लिए रात्रि के पूर्वार्ध और मध्यभाग में द्विजों द्वारा विधि-विधान किया जाता है, वह राजा अपने राष्ट्र सहित ब्रह्मतेज से वृद्धि को प्राप्त होता है।

श्लोक 101 (skanda.7.22.101)

ब्राह्मणान्पूजयेन्नित्यं प्रातरुत्थाय भूमिपः। ब्राह्मणानां प्रसादेन दीव्यन्ति दिवि देवताः

brāhmaṇānpūjayennityaṁ prātarutthāya bhūmipaḥ| brāhmaṇānāṁ prasādena dīvyanti divi devatāḥ

राजा को प्रातः उठकर सदा ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए; ब्राह्मणों की कृपा से ही स्वर्ग में देवता शोभायमान होते हैं।

श्लोक 102 (skanda.7.22.102)

अथ किं बहुनोक्तेन ब्राह्मणा मामकी तनुः। ये केचित्सागरांतायां पृथिव्यां कीर्तिता द्विजाः। तदूपं देवदेवस्य शिवस्य परमात्मनः

atha kiṁ bahunoktena brāhmaṇā māmakī tanuḥ| ye kecitsāgarāṁtāyāṁ pṛthivyāṁ kīrtitā dvijāḥ| tadūpaṁ devadevasya śivasya paramātmanaḥ

अब अधिक कहने से क्या लाभ—ब्राह्मण ही मेरा शरीर हैं। जो भी द्विज इस समुद्र-पर्यंत पृथ्वी पर विख्यात हैं, वही देवाधिदेव परमात्मा शिव का रूप है।

श्लोक 103 (skanda.7.22.103)

एतान्द्विषंति ये मूढा ब्राह्मणान्संशितव्रतान्। ते मां द्विषंति वै नूनं पूजनात्पूजयन्ति माम्

etāndviṣaṁti ye mūḍhā brāhmaṇānsaṁśitavratān| te māṁ dviṣaṁti vai nūnaṁ pūjanātpūjayanti mām

जो मूढ़ जन कठोर व्रत वाले इन ब्राह्मणों से द्वेष करते हैं, वे निश्चय ही मुझसे द्वेष करते हैं; और पूजन से वे निश्चय ही मेरी पूजा करते हैं।

श्लोक 104 (skanda.7.22.104)

न प्रद्वेषस्ततः कार्यो ब्राह्मणेषु विजानता। प्रद्वेषेणाशु नश्यन्ति ब्रह्मशापहता नराः

na pradveṣastataḥ kāryo brāhmaṇeṣu vijānatā| pradveṣeṇāśu naśyanti brahmaśāpahatā narāḥ

इसलिए समझदार व्यक्ति को ब्राह्मणों से द्वेष नहीं करना चाहिए। द्वेष के कारण ब्रह्मशाप से आहत मनुष्य शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 105 (skanda.7.22.105)

इत्येवं कथितश्चन्द्र ब्राह्मणानां गुणार्णवः। कुरुष्वानन्तरं कार्य्यं यद्ब्रवीम्यहमेव ते

ityevaṁ kathitaścandra brāhmaṇānāṁ guṇārṇavaḥ| kuruṣvānantaraṁ kāryyaṁ yadbravīmyahameva te

हे चंद्र! इस प्रकार ब्राह्मणों के गुणों का सागर तुम्हें बता दिया गया। अब वह कार्य करो जो मैं तुम्हें आगे बताता हूँ।

श्लोक 106 (skanda.7.22.106)

शापस्यानुग्रहो दत्तो मया तव निशाकर। न चान्यथा वचः कर्त्तुं शक्यं तेषां द्रिजन्मनाम्

śāpasyānugraho datto mayā tava niśākara| na cānyathā vacaḥ karttuṁ śakyaṁ teṣāṁ drijanmanām

हे निशाकर! मैंने तुम्हारे शाप पर अनुग्रह प्रदान कर दिया है; परंतु उन द्विजातियों के वचन को अन्यथा करना संभव नहीं है।

श्लोक 107 (skanda.7.22.107)

शापानुग्रहदैः सर्वै देवैरपि सवासवैः

śāpānugrahadaiḥ sarvai devairapi savāsavaiḥ

—शाप और अनुग्रह देने वाले सभी देवताओं द्वारा भी, वासव (इंद्र) सहित।

श्लोक 108 (skanda.7.22.108)

तस्माच्चन्द्र त्वया शोको नैव कार्यो विजानता

tasmāccandra tvayā śoko naiva kāryo vijānatā

इसलिए हे चंद्र! यह समझते हुए तुम्हें कभी शोक नहीं करना चाहिए।

श्लोक 109 (skanda.7.22.109)

क्षयस्ते भविता पक्षं पक्षं वृद्धिर्भविष्यति। अथान्यद्वचनं चन्द्र शृणु कार्यं यथा त्वया

kṣayaste bhavitā pakṣaṁ pakṣaṁ vṛddhirbhaviṣyati| athānyadvacanaṁ candra śṛṇu kāryaṁ yathā tvayā

तुम एक पक्ष क्षीण होगे और अगले पक्ष में वृद्धि को प्राप्त होगे। अब हे चंद्र! एक और बात सुनो, जो तुम्हें करनी है।

श्लोक 110 (skanda.7.22.110)

इदं यत्सागरोपांते तिष्ठते लिंगमुत्तमम्। धरामध्यगतं तच्च देवानां दृष्टिगोचरम्

idaṁ yatsāgaropāṁte tiṣṭhate liṁgamuttamam| dharāmadhyagataṁ tacca devānāṁ dṛṣṭigocaram

यह जो समुद्र के तट पर उत्तम लिंग स्थित है, पृथ्वी के मध्य में स्थित, देवताओं की दृष्टि में आने वाला—

श्लोक 111 (skanda.7.22.111)

कुक्कुटांडसमप्रख्यं सर्पमेखलमंडितम्। ममाद्यं परमं तेजो न चान्यो वेद कश्चन

kukkuṭāṁḍasamaprakhyaṁ sarpamekhalamaṁḍitam| mamādyaṁ paramaṁ tejo na cānyo veda kaścana

—मुर्गी के अंडे के समान, सर्पों की मेखला से सुशोभित—यह मेरा आदि परम तेज है, इसे अन्य कोई नहीं जानता।

श्लोक 112 (skanda.7.22.112)

इतः सागरमध्ये तु धनुषां च शतत्रये। तिष्ठते तत्र लिंगं तु सुगुप्तं लक्षणान्वितम्

itaḥ sāgaramadhye tu dhanuṣāṁ ca śatatraye| tiṣṭhate tatra liṁgaṁ tu suguptaṁ lakṣaṇānvitam

यहाँ से समुद्र के मध्य में, तीन सौ धनुष की दूरी पर, एक और लिंग स्थित है, जो सुरक्षित और सभी लक्षणों से युक्त है—

श्लोक 113 (skanda.7.22.113)

आदिकल्पे महर्षीणां शापेन पतितं मम। लिंगं सागरमध्ये तु तत्त्वं शीघ्रं समानय

ādikalpe maharṣīṇāṁ śāpena patitaṁ mama| liṁgaṁ sāgaramadhye tu tattvaṁ śīghraṁ samānaya

—प्रथम कल्प में महर्षियों के शाप से गिरा हुआ, मेरा ही लिंग, समुद्र के मध्य में। तुम शीघ्र ही उसे यथार्थ रूप में ले आओ।

श्लोक 114 (skanda.7.22.114)

स्पर्शाख्यं यत्र मे लिंगं तत्र स्थाने निवेशय। निवेश्य तु प्रयत्नेन सहितो विश्वकर्मणा

sparśākhyaṁ yatra me liṁgaṁ tatra sthāne niveśaya| niveśya tu prayatnena sahito viśvakarmaṇā

जहाँ मेरा स्पर्श नामक लिंग है, उसी स्थान पर उसे स्थापित करो; और विश्वकर्मा के साथ मिलकर प्रयत्नपूर्वक स्थापित करके—

श्लोक 115 (skanda.7.22.115)

ततो ब्रह्माणमाहूय समेतं तु मुनीश्वरैः। प्रतिष्ठां कारय विभो इष्ट्वा तत्र महामखैः

tato brahmāṇamāhūya sametaṁ tu munīśvaraiḥ| pratiṣṭhāṁ kāraya vibho iṣṭvā tatra mahāmakhaiḥ

—फिर मुनीश्वरों सहित ब्रह्मा को बुलाकर, हे विभो! वहाँ महायज्ञों द्वारा इष्टि करके प्रतिष्ठा कराओ।

श्लोक 116 (skanda.7.22.116)

एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवांतरधीयत। ततः प्रभां पुनर्लेभे रात्रिनाथो वरानने

evamuktvā sa bhagavāṁstatraivāṁtaradhīyata| tataḥ prabhāṁ punarlebhe rātrinātho varānane

इतना कहकर वे भगवान् वहीं अंतर्धान हो गए। तत्पश्चात् हे वरानने! रात्रिनाथ (चंद्रमा) ने पुनः अपनी कांति प्राप्त की।

श्लोक 117 (skanda.7.22.117)

ततः प्रभृति तत्क्षेत्रं प्रभासमिति विश्रुतम्। निष्प्रभस्य प्रभा दत्ता प्रभासं तेन चोच्यते

tataḥ prabhṛti tatkṣetraṁ prabhāsamiti viśrutam| niṣprabhasya prabhā dattā prabhāsaṁ tena cocyate

तब से वह क्षेत्र "प्रभास" नाम से विख्यात हुआ; निष्प्रभ (कांतिहीन चंद्रमा) को प्रभा (कांति) दी गई, इसीलिए इसे प्रभास कहा जाता है।

श्लोक 118 (skanda.7.22.118)

दक्षस्य तु वृथा शापो न कृतस्तेन लांछनम्। सोमः प्रभासते लोकान्वरं प्राप्य महेश्वरात्। व्यक्तीभूतः स देवेशः सोमस्यैव महात्मनः

dakṣasya tu vṛthā śāpo na kṛtastena lāṁchanam| somaḥ prabhāsate lokānvaraṁ prāpya maheśvarāt| vyaktībhūtaḥ sa deveśaḥ somasyaiva mahātmanaḥ

इस प्रकार दक्ष का शाप व्यर्थ नहीं गया, न ही उसका कलंक-चिह्न मिटा; परंतु महेश्वर से वरदान पाकर सोम लोकों को प्रकाशित करते हैं। वे देवेश उसी महात्मा सोम के निमित्त प्रकट हुए।

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