प्रभास खण्ड · अध्याय 207
पात्रापात्रविचारवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.207.1)
ईश्वर उवाच। अतः परं प्रवक्ष्यामि श्राद्धदानान्यनुक्रमात्। तारणाय च भूतानां सरस्वत्यब्धिसंगमे
īśvara uvāca| ataḥ paraṁ pravakṣyāmi śrāddhadānānyanukramāt| tāraṇāya ca bhūtānāṁ sarasvatyabdhisaṁgame
ईश्वर ने कहा—अब इसके आगे मैं प्राणियों के उद्धार के लिए सरस्वती और समुद्र के संगम पर श्राद्ध-दानों को क्रमशः कहूँगा।
श्लोक 2 (skanda.7.207.2)
लोके श्रेष्ठतमं सर्वं ह्यात्मनश्चापि यत्प्रियम्। सर्वं पितॄणां दातव्यं तदेवाक्षय्यमिच्छताम्
loke śreṣṭhatamaṁ sarvaṁ hyātmanaścāpi yatpriyam| sarvaṁ pitṝṇāṁ dātavyaṁ tadevākṣayyamicchatām
इस लोक में जो कुछ भी सर्वश्रेष्ठ है और जो अपने को भी प्रिय है, वह सब पितरों को देना चाहिए—अक्षय फल की इच्छा रखने वालों के लिए यही उपाय है।
श्लोक 3 (skanda.7.207.3)
जांबूनदमयं दिव्यं विमानं सूर्यसन्निभम्। दिव्याप्सरोभिः संकीर्णमन्नदो लभतेऽक्षयम्
jāṁbūnadamayaṁ divyaṁ vimānaṁ sūryasannibham| divyāpsarobhiḥ saṁkīrṇamannado labhate'kṣayam
अन्न का दान करने वाला एक दिव्य सुवर्णमय विमान प्राप्त करता है, जो सूर्य के समान तेजस्वी और दिव्य अप्सराओं से भरा हुआ होता है, तथा वह अक्षय है।
श्लोक 4 (skanda.7.207.4)
आच्छादनं तु यो दद्यादहतं श्राद्धकर्मणि। आयुः प्रकाशमैश्वर्यं रूपं तु लभते च सः
ācchādanaṁ tu yo dadyādahataṁ śrāddhakarmaṇi| āyuḥ prakāśamaiśvaryaṁ rūpaṁ tu labhate ca saḥ
जो व्यक्ति श्राद्ध-कर्म में नया वस्त्र दान करता है, वह आयु, तेज, ऐश्वर्य तथा सुन्दर रूप प्राप्त करता है।
श्लोक 5 (skanda.7.207.5)
कमण्डलुं च यो दद्याद्ब्राह्मणे वेदपारगे। मधुक्षीरस्रवा धेनुर्दातारमनुगच्छति
kamaṇḍaluṁ ca yo dadyādbrāhmaṇe vedapārage| madhukṣīrasravā dhenurdātāramanugacchati
जो व्यक्ति वेदपारंगत ब्राह्मण को कमण्डलु दान करता है, उसके पीछे मधु और दूध की धारा बहाने वाली गाय चलती है।
श्लोक 6 (skanda.7.207.6)
यः श्राद्धे अभयं दद्यात्प्राणिनां जीवितैषिणाम्। अश्वदानसहस्रेण रथदानशतेन च। दन्तिनां च सहस्रेण अभयं च विशिष्यते
yaḥ śrāddhe abhayaṁ dadyātprāṇināṁ jīvitaiṣiṇām| aśvadānasahasreṇa rathadānaśatena ca| dantināṁ ca sahasreṇa abhayaṁ ca viśiṣyate
जो व्यक्ति श्राद्ध में जीवन की इच्छा रखने वाले प्राणियों को अभयदान देता है, वह दान सहस्र अश्व-दान, सौ रथ-दान, तथा सहस्र हाथी-दान से भी श्रेष्ठ माना गया है।
श्लोक 7 (skanda.7.207.7)
यानि रत्नानि मेदिन्यां वाहनानि स्त्रियस्तथा। क्षिप्रं प्राप्नोति तत्सर्वं पितृभक्तस्तु मानवः
yāni ratnāni medinyāṁ vāhanāni striyastathā| kṣipraṁ prāpnoti tatsarvaṁ pitṛbhaktastu mānavaḥ
पृथ्वी पर जितने भी रत्न, वाहन तथा स्त्रियाँ हैं, वह सब पितृ-भक्त मनुष्य शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 8 (skanda.7.207.8)
पितरः सर्वलोकेषु तिथिकालेषु देवताः। सर्वे पुरुषमायांति निपानमिव धेनवः
pitaraḥ sarvalokeṣu tithikāleṣu devatāḥ| sarve puruṣamāyāṁti nipānamiva dhenavaḥ
सभी लोकों में स्थित पितर, तिथि के अवसर पर देवता बनकर, गौओं के जलाशय की ओर जाने के समान सब मिलकर उस पुरुष के पास आते हैं।
श्लोक 9 (skanda.7.207.9)
मा स्म ते प्रतिगच्छेयुः पर्वकाले ह्यपूजिताः। मोघास्तेषां भवन्त्वाशाः परत्रेह च मा क्वचित्
mā sma te pratigaccheyuḥ parvakāle hyapūjitāḥ| moghāsteṣāṁ bhavantvāśāḥ paratreha ca mā kvacit
पर्व के अवसर पर पूजित हुए बिना वे कहीं लौट न जाएँ; उनकी आशाएँ इस लोक अथवा परलोक में कहीं भी व्यर्थ न हों।
श्लोक 10 (skanda.7.207.10)
सरस्वत्यास्तु सान्निध्यं यस्त्वेकं भोजयेद्द्विजम्। कोटिभोज्यफलं तस्य जायते नात्र संशयः
sarasvatyāstu sānnidhyaṁ yastvekaṁ bhojayeddvijam| koṭibhojyaphalaṁ tasya jāyate nātra saṁśayaḥ
सरस्वती के समीप जो एक भी ब्राह्मण को भोजन कराता है, उसे करोड़ों ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल प्राप्त होता है—इसमें संशय नहीं है।
श्लोक 11 (skanda.7.207.11)
अमावास्यां नरो यस्तु परान्नमुपभुञ्जते। तस्य मासकृतं पुण्यमन्नदातुः प्रजायते
amāvāsyāṁ naro yastu parānnamupabhuñjate| tasya māsakṛtaṁ puṇyamannadātuḥ prajāyate
जो मनुष्य अमावास्या को दूसरे के अन्न का भोजन करता है, उस महीने का सारा पुण्य अन्न देने वाले को ही प्राप्त होता है।
श्लोक 12 (skanda.7.207.12)
षण्मासमयने भुंक्ते त्रीन्मासान्विषुवे स्मृतम्। वर्षैर्द्वादशभिश्चैव यत्पुण्यं समुपार्जितम्। तत्सर्वं विलयं याति भुक्त्वा सूर्येन्दुसंप्लवे
ṣaṇmāsamayane bhuṁkte trīnmāsānviṣuve smṛtam| varṣairdvādaśabhiścaiva yatpuṇyaṁ samupārjitam| tatsarvaṁ vilayaṁ yāti bhuktvā sūryendusaṁplave
अयन पर दूसरे का अन्न खाने से छह महीने का, तथा विषुव पर तीन महीने का पुण्य नष्ट हो जाता है; और सूर्य-चन्द्र ग्रहण के समय भोजन करने से बारह वर्षों में अर्जित सारा पुण्य नष्ट हो जाता है।
श्लोक 13 (skanda.7.207.13)
साग्रं मासं रवेः क्रान्तावाद्यश्राद्धे त्रिवत्सरम्। मासिकेऽप्यथ वर्षस्य षण्मासे त्वर्धवत्सरम्
sāgraṁ māsaṁ raveḥ krāntāvādyaśrāddhe trivatsaram| māsike'pyatha varṣasya ṣaṇmāse tvardhavatsaram
सूर्य के संक्रमण पर एक मास से अधिक, आद्य-श्राद्ध में तीन वर्ष का, मासिक श्राद्ध में एक वर्ष का, तथा छह मास के श्राद्ध में आधे वर्ष का पुण्य नष्ट हो जाता है।
श्लोक 14 (skanda.7.207.14)
तथा संचयनश्राद्धे जातिजन्मकृतं नृणाम्। मृत शय्याप्रतिग्राही वेदस्यैव च विक्रयी। ब्रह्मस्वहारी च नरस्तस्य शुद्धिर्न विद्यते
tathā saṁcayanaśrāddhe jātijanmakṛtaṁ nṛṇām| mṛtaśayyāpratigrāhī vedasyaiva ca vikrayī| brahmasvahārī ca narastasya śuddhirna vidyate
इसी प्रकार अस्थि-संचयन श्राद्ध में मनुष्यों का जन्म-भर का पुण्य नष्ट हो जाता है। मृतक की शय्या ग्रहण करने वाला, वेद को बेचने वाला, तथा ब्रह्मस्व का अपहरण करने वाला मनुष्य—इनकी कभी शुद्धि नहीं होती।
श्लोक 15 (skanda.7.207.15)
तडागानां सहस्रेण ह्यश्वमेधशतेन च। गवां कोटि प्रदानेन भूमिहर्ता न शुद्ध्यति
taḍāgānāṁ sahasreṇa hyaśvamedhaśatena ca| gavāṁ koṭi pradānena bhūmihartā na śuddhyati
एक हजार तालाब बनवाने से, सौ अश्वमेध यज्ञों से, अथवा करोड़ गौओं के दान से भी भूमि-हरण करने वाला शुद्ध नहीं होता।
श्लोक 16 (skanda.7.207.16)
सुवर्णमाषं गामेकां भूमेरप्यर्धमंगुलम्। हरन्नरकमाप्नोति यावदाभूतसंप्लवम्
suvarṇamāṣaṁ gāmekāṁ bhūmerapyardhamaṁgulam| harannarakamāpnoti yāvadābhūtasaṁplavam
एक माषा सोना, एक गाय, अथवा भूमि का आधा अंगुल भी हरण करने वाला प्रलयकाल तक नरक में रहता है।
श्लोक 17 (skanda.7.207.17)
ब्रह्महत्या सुरापानं दरिद्रस्य तु यद्धनम्। गुरोः पत्नी हिरण्यं च स्वर्गस्थमपि पातयेत्
brahmahatyā surāpānaṁ daridrasya tu yaddhanam| guroḥ patnī hiraṇyaṁ ca svargasthamapi pātayet
ब्रह्महत्या, मदिरापान, दरिद्र का धन हरण करना, गुरु की पत्नी से सम्पर्क, तथा गुरु का स्वर्ण हरण करना—ये स्वर्ग में स्थित को भी गिरा देते हैं।
श्लोक 18 (skanda.7.207.18)
सहस्रसंमिता धेनुरनड्वान्दश धेनवः। दशानडुत्समं यानं दशयानसमो हयः
sahasrasaṁmitā dhenuranaḍvāndaśa dhenavaḥ| daśānaḍutsamaṁ yānaṁ daśayānasamo hayaḥ
एक गाय सहस्र के तुल्य मानी गई है, एक बैल दस गौओं के तुल्य है; दस बैलों के तुल्य एक यान है, दस यानों के तुल्य एक अश्व है।
श्लोक 19 (skanda.7.207.19)
दशहयसमा कन्या भूमिदानं ततोऽधिकम्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन विक्रयं नैव कारयेत्
daśahayasamā kanyā bhūmidānaṁ tato'dhikam| tasmātsarvaprayatnena vikrayaṁ naiva kārayet
दस अश्वों के तुल्य एक कन्या-दान है, और भूमि-दान उससे भी बढ़कर है; इसलिए सब प्रकार से यत्नपूर्वक भूमि का विक्रय कभी नहीं करना चाहिए।
श्लोक 20 (skanda.7.207.20)
विशेषतो महाक्षेत्रे सर्वपातकनाशने। चितिकाष्ठं च वै स्पृष्ट्वा यज्ञयूपांस्तथैव च। वेदविक्रयकर्तारं स्पृष्ट्वा स्नानं विधीयते
viśeṣato mahākṣetre sarvapātakanāśane| citicāṣṭhaṁ ca vai spṛṣṭvā yajñayūpāṁstathaiva ca| vedavikrayakartāraṁ spṛṣṭvā snānaṁ vidhīyate
विशेष रूप से इस महाक्षेत्र में, जो सब पापों का नाशक है, चिता की लकड़ी को छूने पर, यज्ञ-यूप को छूने पर, तथा वेद बेचने वाले को छूने पर स्नान करना विहित है।
श्लोक 21 (skanda.7.207.21)
आदेशं पठते यस्तु आदेशं च ददाति यः। द्वावेतौ पापकर्माणौ पातालतलवासिनौ
ādeśaṁ paṭhate yastu ādeśaṁ ca dadāti yaḥ| dvāvetau pāpakarmāṇau pātālatalavāsinau
जो व्यक्ति आदेश को व्यापार के रूप में पढ़ता है और जो उसे इस प्रकार सिखाता है—ये दोनों पापकर्मी पाताल-लोक में निवास करते हैं।
श्लोक 22 (skanda.7.207.22)
आदेशं पठते यस्तु राजद्वारे तु मानवः। सोऽपि देवि भवेद्वृक्ष ऊषरे कंटकावृतः। स्थितो वै नृपतिद्वारि यः कुर्याद्वेदविक्रयम्
ādeśaṁ paṭhate yastu rājadvāre tu mānavaḥ| so'pi devi bhavedvṛkṣa ūṣare kaṁṭakāvṛtaḥ| sthito vai nṛpatidvāri yaḥ kuryādvedavikrayam
जो मनुष्य राजद्वार पर आदेश पढ़ता है, हे देवि, वह भी ऊसर भूमि में काँटों से घिरा हुआ वृक्ष बनता है; तथा जो राजद्वार पर खड़े होकर वेद बेचता है, उसकी भी यही गति होती है।
श्लोक 23 (skanda.7.207.23)
ब्रह्महत्यासमं पापं न भूतं न भविष्यति। वरं कुर्वन्ध्रुवं देवि न कुर्याद्वेदविक्रयम्
brahmahatyāsamaṁ pāpaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati| varaṁ kurvandhruvaṁ devi na kuryādvedavikrayam
ब्रह्महत्या के समान पाप न कभी हुआ है और न होगा; हे देवि, ब्रह्महत्या करना उससे भी श्रेष्ठ है, किन्तु निश्चित रूप से वेद का विक्रय कभी नहीं करना चाहिए।
श्लोक 24 (skanda.7.207.24)
हत्वा गाश्च वरं मांसं भक्षयीत द्विजाधमः। वरं जीवेत्समं म्लेच्छैर्न कुर्याद्वेदविक्रयम्
hatvā gāśca varaṁ māṁsaṁ bhakṣayīta dvijādhamaḥ| varaṁ jīvetsamaṁ mlecchairna kuryādvedavikrayam
अधम द्विज के लिए गौ मारकर उसका मांस खा लेना भी श्रेष्ठ है, म्लेच्छों के समान जीवन बिताना भी श्रेष्ठ है, किन्तु वेद का विक्रय कभी नहीं करना चाहिए।
श्लोक 25 (skanda.7.207.25)
प्रत्यक्षोक्तिः प्रत्ययश्च प्रश्नपूर्वः प्रतिग्रहः। याजनाऽध्यापने वादः षड्विधो वेदविक्रयः
pratyakṣoktiḥ pratyayaśca praśnapūrvaḥ pratigrahaḥ| yājanā'dhyāpane vādaḥ ṣaḍvidho vedavikrayaḥ
प्रत्यक्ष कथन, विश्वास-पूर्वक कथन, प्रश्न-पूर्वक दक्षिणा-ग्रहण, याजन तथा अध्यापन में वाद-विवाद—इन छह प्रकारों से वेद का विक्रय होता है।
श्लोक 26 (skanda.7.207.26)
वेदाक्षराणि यावन्ति नियुंक्ते स्वार्थकारणात्। तावतीर्भ्रूणहत्या वै प्राप्नुयाद्वेदविक्रयी
vedākṣarāṇi yāvanti niyuṁkte svārthakāraṇāt| tāvatīrbhrūṇahatyā vai prāpnuyādvedavikrayī
जितने वेद के अक्षरों को कोई स्वार्थ के लिए प्रयुक्त करता है, वेद बेचने वाला उतनी ही भ्रूण-हत्याओं के पाप को प्राप्त करता है।
श्लोक 27 (skanda.7.207.27)
वेदानुयोगाद्यो दद्याद्ब्राह्मणाय प्रतिग्रहम्। स पूर्वं नरकं याति ब्राह्मणस्तदनन्तरम्
vedānuyogādyo dadyādbrāhmaṇāya pratigraham| sa pūrvaṁ narakaṁ yāti brāhmaṇastadanantaram
जो व्यक्ति वेद-पाठ के बदले ब्राह्मण को दक्षिणा देता है, वह पहले नरक जाता है, और उसके बाद वह ब्राह्मण भी।
श्लोक 28 (skanda.7.207.28)
वैश्वदेवेन हीना ये हीनाश्चातिथ्यतोऽपि ये। कर्मणा सर्ववृषला वेदयुक्ता ह्यपि द्विजाः
vaiśvadevena hīnā ye hīnāścātithyato'pi ye| karmaṇā sarvavṛṣalā vedayuktā hyapi dvijāḥ
जो वैश्वदेव से रहित हैं, जो अतिथि-सत्कार से भी रहित हैं—वे द्विज वेद-युक्त होने पर भी कर्म से सब वृषल हैं।
श्लोक 29 (skanda.7.207.29)
येषामध्ययनं नास्ति ये च केचिदनग्नयः। कुलं वाऽश्रोत्रियं येषां ते सर्वे शूद्रजातयः
yeṣāmadhyayanaṁ nāsti ye ca kecidanagnayaḥ| kulaṁ vā'śrotriyaṁ yeṣāṁ te sarve śūdrajātayaḥ
जिनका वेदाध्ययन नहीं हुआ, जो अग्निहोत्र-रहित हैं, तथा जिनका कुल श्रोत्रिय-रहित है—वे सब शूद्र-तुल्य ही हैं।
श्लोक 30 (skanda.7.207.30)
मृतेऽहनि पितुर्यस्तु न कुर्याच्छ्राद्धमादरात्। मातुश्चैव वरारोहे स द्विजः शूद्रसंनिभः
mṛte'hani pituryastu na kuryācchrāddhamādarāt| mātuścaiva varārohe sa dvijaḥ śūdrasannibhaḥ
जो पुत्र पिता की मृत्यु-तिथि पर आदरपूर्वक श्राद्ध नहीं करता, अथवा हे वरारोहे, माता की भी नहीं करता, वह द्विज शूद्र के समान है।
श्लोक 31 (skanda.7.207.31)
मृतके यस्तु भुञ्जीत गृहीतशशिभास्करे। गजच्छायासु यः कश्चित्तं च शूद्रवदाचरेत्
mṛtake yastu bhuñjīta gṛhītaśaśibhāskare| gajacchāyāsu yaḥ kaścittaṁ ca śūdravadācaret
जो व्यक्ति मृतक-कार्य में, ग्रहण-काल में, अथवा गजच्छाया के अवसर पर भोजन करता है, उसके साथ भी शूद्र के समान व्यवहार करे।
श्लोक 32 (skanda.7.207.32)
ब्रह्मचारिणि यज्ञे च यतौ शिल्पिनि दीक्षिते। यज्ञे विवाहे सत्रे च सूतकं न कदाचन
brahmacāriṇi yajñe ca yatau śilpini dīkṣite| yajñe vivāhe satre ca sūtakaṁ na kadācana
ब्रह्मचारी, यज्ञ, संन्यासी, शिल्पी, दीक्षित व्यक्ति, तथा यज्ञ, विवाह और सत्र में सूतक कभी नहीं लगता।
श्लोक 33 (skanda.7.207.33)
गोरक्षकान्वणिजकांस्तथा कारुकुशीलवान्। स्पृश्यान्वार्धुषिकांश्चैव विप्रान्शूद्रवदाचरेत्
gorakṣakānvaṇijakāṁstathā kārukuśīlavān| spṛśyānvārdhuṣikāṁścaiva viprānśūdravadācaret
गोरक्षक, व्यापारी, शिल्पकार, नट, तथा सूदखोर ब्राह्मणों के साथ, यद्यपि वे स्पृश्य हों, शूद्र के समान ही व्यवहार करे।
श्लोक 34 (skanda.7.207.34)
ब्राह्मणः पतनीयेषु वर्तमानो विकर्मसु। दाम्भिको दुष्कृतप्रायः स च शूद्रसमः स्मृतः
brāhmaṇaḥ patanīyeṣu vartamāno vikarmasu| dāmbhiko duṣkṛtaprāyaḥ sa ca śūdrasamaḥ smṛtaḥ
जो ब्राह्मण पतनकारी कुकर्मों में लगा रहता है, पाखण्डी है, तथा अधिकांशतः दुष्कर्म करने वाला है, वह भी शूद्र के समान माना गया है।
श्लोक 35 (skanda.7.207.35)
अस्नाताशी मलं भुंक्ते अजापी पूयशोणितम्। अहुत्वा तु कृमीन्भुंक्ते अदत्त्वा विषभोजनम्
asnātāśī malaṁ bhuṁkte ajāpī pūyaśoṇitam| ahutvā tu kṛmīnbhuṁkte adattvā viṣabhojanam
बिना स्नान किए भोजन करने वाला मल खाता है, बिना जप किए भोजन करने वाला पीब-रक्त खाता है, बिना हवन किए भोजन करने वाला कीड़े खाता है, तथा बिना दान किए भोजन करने वाला विष खाता है।
श्लोक 36 (skanda.7.207.36)
परान्नेन तु भुक्तेन मिथुनं योऽधिगच्छति। यस्यान्नं तस्य ते पुत्रा अन्नाच्छुक्रं प्रवर्तते
parānnena tu bhuktena mithunaṁ yo'dhigacchati| yasyānnaṁ tasya te putrā annācchukraṁ pravartate
जो व्यक्ति दूसरे का अन्न खाकर मैथुन करता है, उससे उत्पन्न पुत्र उसी के होते हैं जिसका अन्न खाया गया था, क्योंकि अन्न से ही वीर्य बनता है।
श्लोक 37 (skanda.7.207.37)
राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम्। आयुः सुवर्णकारान्नं यशश्चर्मावकर्तिनः
rājānnaṁ teja ādatte śūdrānnaṁ brahmavarcasam| āyuḥ suvarṇakārānnaṁ yaśaścarmāvakartinaḥ
राजा का अन्न तेज को हर लेता है, शूद्र का अन्न ब्रह्मतेज को हर लेता है, सुनार का अन्न आयु को हर लेता है, तथा चर्मकार का अन्न यश को हर लेता है।
श्लोक 38 (skanda.7.207.38)
कारुकान्नं प्रजा हन्ति बलं निर्णेजकस्य च। गणान्नं गणिकान्नं च लोकेभ्यः परिकृन्तति
kārukānnaṁ prajā hanti balaṁ nirṇejakasya ca| gaṇānnaṁ gaṇikānnaṁ ca lokebhyaḥ parikṛntati
शिल्पकार का अन्न सन्तान का नाश करता है, धोबी का अन्न बल का नाश करता है, तथा समूह का अन्न और वेश्या का अन्न व्यक्ति को समस्त लोकों से काट देता है।
श्लोक 39 (skanda.7.207.39)
पूयं चिकित्सकस्यान्नं पुंश्चल्यास्त्वन्नमिन्द्रियम्। विष्ठा वार्धुषिकस्यान्नं शस्त्रविक्रयिणो मलम्
pūyaṁ cikitsakasyānnaṁ puṁścalyāstvannamindriyam| viṣṭhā vārdhuṣikasyānnaṁ śastravikrayiṇo malam
वैद्य का अन्न पीब के समान है, वेश्या का अन्न इन्द्रिय-शक्ति को हरने वाला है, सूदखोर का अन्न विष्ठा के समान है, तथा शस्त्र बेचने वाले का अन्न मल के समान है।
श्लोक 40 (skanda.7.207.40)
गायत्रीसारमात्रोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः। नायंत्रितश्चतुर्वेदी सर्वाशी सर्वविक्रयी
gāyatrīsāramātro'pi varaṁ vipraḥ suyantritaḥ| nāyaṁtritaścaturvedī sarvāśī sarvavikrayī
जो ब्राह्मण केवल गायत्री-मन्त्र के सार को जानता हो किन्तु सुसंयमित हो, वह श्रेष्ठ है; किन्तु जो चारों वेदों का ज्ञाता होकर भी असंयमित, सर्वभक्षी तथा सब कुछ बेचने वाला हो, वह श्रेष्ठ नहीं है।
श्लोक 41 (skanda.7.207.41)
सद्यः पतति मांसेन लाक्षया लवणेन च। त्र्यहेण शूद्रो भवति ब्राह्मणः क्षीरविक्रयात्
sadyaḥ patati māṁsena lākṣayā lavaṇena ca| tryaheṇa śūdro bhavati brāhmaṇaḥ kṣīravikrayāt
मांस, लाख, तथा नमक बेचने से ब्राह्मण तत्काल पतित हो जाता है; और दूध बेचने से तीन दिनों में शूद्र बन जाता है।
श्लोक 42 (skanda.7.207.42)
रसा रसैर्नियंतव्या न त्वेव लवणं रसैः। कृतान्नं च कृतान्नेन तिला धान्येन तत्समाः
rasā rasairniyaṁtavyā na tveva lavaṇaṁ rasaiḥ| kṛtānnaṁ ca kṛtānnena tilā dhānyena tatsamāḥ
रसों का विनिमय रसों से ही करना चाहिए, नमक का विनिमय रसों से नहीं करना चाहिए; पके अन्न का विनिमय पके अन्न से, तथा तिल का विनिमय अनाज से करना उसी के समान है।
श्लोक 43 (skanda.7.207.43)
भोजनाभ्यञ्जनाद्दानाद्यदन्यत्कुरुते तिलैः। कृमिभूतः स विष्ठायां पितृभिः सह मज्जति
bhojanābhyañjanāddānādyadanyatkurute tilaiḥ| kṛmibhūtaḥ sa viṣṭhāyāṁ pitṛbhiḥ saha majjati
जो व्यक्ति तिलों का प्रयोग भोजन, उबटन और दान के अतिरिक्त किसी अन्य प्रयोजन के लिए करता है, वह कीड़ा बनकर पितरों सहित विष्ठा में डूबता है।
श्लोक 44 (skanda.7.207.44)
अपूपश्च हिरण्यं च गामश्वं पृथिवीं तिलान्। अविद्वान्प्रतिगृह्णाति भस्मीभवति काष्ठवत्
apūpaśca hiraṇyaṁ ca gāmaśvaṁ pṛthivīṁ tilān| avidvānpratigṛhṇāti bhasmībhavati kāṣṭhavat
जो अज्ञानी पुरुष पूए, सोना, गाय, अश्व, भूमि, अथवा तिल को दान में ग्रहण करता है, वह काठ के समान जलकर भस्म हो जाता है।
श्लोक 45 (skanda.7.207.45)
हिरण्यमायु रत्नं च भूर्गौश्चाकर्षतस्तनुम्। अश्वश्चक्षुस्त्वचं वासो घृतं तेजस्तिलाः प्रजाः
hiraṇyamāyu ratnaṁ ca bhūrgauścākarṣatastanum| aśvaścakṣustvacaṁ vāso ghṛtaṁ tejastilāḥ prajāḥ
स्वर्ण, आयु और रत्न को, भूमि और गौ शरीर को, अश्व नेत्र और त्वचा को, वस्त्र और घृत तेज को, तथा तिल सन्तान को अज्ञानी दाता से खींच लेते हैं।
श्लोक 46 (skanda.7.207.46)
अग्निहोत्री तपस्वी च क्षणवान्क्रियते यदि। अग्निहोत्रं तपश्चैव सर्वं तद्धनिनो धनम्
agnihotrī tapasvī ca kṣaṇavānkriyate yadi| agnihotraṁ tapaścaiva sarvaṁ taddhanino dhanam
यदि अग्निहोत्री और तपस्वी क्षणिक लाभ के लिए धनवान की सेवा में लग जाए, तो उसका अग्निहोत्र और तप—यह सब उस धनवान का ही धन बन जाता है।
श्लोक 47 (skanda.7.207.47)
सोमविक्रयणे विष्ठा भेषजे पूयशोणितम्। नष्टं देवलके दानं ह्यप्रतिष्ठं च वार्धुके
somavikrayaṇe viṣṭhā bheṣaje pūyaśoṇitam| naṣṭaṁ devalake dānaṁ hyapratiṣṭhaṁ ca vārdhuke
सोम बेचने में विष्ठा के समान पाप है, औषध बेचने में पीब-रक्त के समान पाप है; देवल को दिया दान नष्ट हो जाता है, और सूदखोर को दिया दान अप्रतिष्ठित रहता है।
श्लोक 48 (skanda.7.207.48)
देवार्चनपरो विप्रो वित्तार्थी भुवनत्रये। असौ देवलकोनाम हव्यकव्येषु गर्हितः
devārcanaparo vipro vittārthī bhuvanatraye| asau devalakonāma havyakavyeṣu garhitaḥ
जो ब्राह्मण देव-पूजा में लगा रहता है किन्तु तीनों लोकों में धन का लोभी है, वह 'देवल' कहलाता है, और हव्य-कव्य दोनों में निन्दित है।
श्लोक 49 (skanda.7.207.49)
भ्रातुर्मृतस्यभायायां यो गच्छेत्कामपूर्वकम्। धर्मेणापि नियुक्तायां स ज्ञेयो दिधिषूपतिः
bhrāturmṛtasya bhāryāyāṁ yo gacchetkāmapūrvakam| dharmeṇāpi niyuktāyāṁ sa jñeyo didhiṣūpatiḥ
जो व्यक्ति मृत भाई की पत्नी के पास, यद्यपि वह धर्मानुसार नियुक्त हो, काम-वासना से प्रेरित होकर जाता है, वह 'दिधिषूपति' जाना जाता है।
श्लोक 50 (skanda.7.207.50)
दाराग्निहोत्रसंयोगं कुरुते योऽग्रजे स्थिते। परिवेत्ता स विज्ञेयः परिवित्तिस्तु पूर्वजः
dārāgnihotrasaṁyogaṁ kurute yo'graje sthite| parivettā sa vijñeyaḥ parivittistu pūrvajaḥ
जो अनुज बड़े भाई के रहते हुए विवाह तथा अग्निहोत्र-संस्कार करता है, वह 'परिवेत्ता' कहलाता है; और उसका बड़ा भाई 'परिवित्ति' कहलाता है।
श्लोक 51 (skanda.7.207.51)
यो नरोऽन्यस्य वासांसि कूपोद्यानगृहाणि च। अदत्तान्युपयुंजानः स तत्पापतुरीयभाक्
yo naro'nyasya vāsāṁsi kūpodyānagṛhāṇi ca| adattānyupayuṁjānaḥ sa tatpāpaturīyabhāk
जो मनुष्य दूसरे के वस्त्र, कुआँ, बगीचे तथा घर का बिना दिए ही उपयोग करता है, वह उसके पाप के चौथे भाग का भागी होता है।
श्लोक 52 (skanda.7.207.52)
आमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे वृषल्या सह मोदते। दातुर्यद्दुष्कृतं किञ्चित्तत्सर्वं प्रतिपद्यते
āmantritastu yaḥ śrāddhe vṛṣalyā saha modate| dāturyadduṣkṛtaṁ kiñcittatsarvaṁ pratipadyate
श्राद्ध में निमन्त्रित होकर जो व्यक्ति वृषली के साथ रमण करता है, दाता का जो भी दुष्कृत्य है, वह सब उसी को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 53 (skanda.7.207.53)
ऋतामृताभ्यां जीवेत मृतेन प्रमृतेन वा। सत्यानृताभ्यां जीवेत न श्ववृत्त्या कथंचन
ṛtāmṛtābhyāṁ jīveta mṛtena pramṛtena vā| satyānṛtābhyāṁ jīveta na śvavṛttyā kathaṁcana
मनुष्य को ऋत और अमृत से, अथवा मृत और प्रमृत से जीविका चलानी चाहिए; सत्य और अनृत से भी जीविका चला सकता है, किन्तु किसी भी स्थिति में श्ववृत्ति से जीविका न चलाए।
श्लोक 54 (skanda.7.207.54)
भक्ष्यं नित्यमृतं ज्ञेयममृतं स्यादयाचितम्। मृतं तु वृद्ध्याजीवित्वं प्रमृतं कर्षणं स्मृतम्
bhakṣyaṁ nityamṛtaṁ jñeyamamṛtaṁ syādayācitam| mṛtaṁ tu vṛddhyājīvitvaṁ pramṛtaṁ karṣaṇaṁ smṛtam
नित्य प्राप्त भोजन को 'ऋत' जानना चाहिए, बिना माँगे प्राप्त भोजन 'अमृत' है, ब्याज पर जीविका चलाना 'मृत' है, तथा कृषि से जीविका चलाना 'प्रमृत' कहा गया है।
श्लोक 55 (skanda.7.207.55)
सत्यानृतं च वाणिज्यं तेन चैवोपजीव्यते। सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत
satyānṛtaṁ ca vāṇijyaṁ tena caivopajīvyate| sevā śvavṛttirākhyātā tasmāttāṁ parivarjayeta
'सत्यानृत' का अर्थ है व्यापार, जिससे भी जीविका चलाई जाती है; सेवा को 'श्ववृत्ति' कहा गया है, इसलिए उसका परित्याग करना चाहिए।
श्लोक 56 (skanda.7.207.56)
विप्रयोनिं समासाद्य संकरं परिवर्जयेत्। मानुष्यं दुर्लभं लोके ब्राह्मण्यमधिकं ततः
viprayoniṁ samāsādya saṁkaraṁ parivarjayet| mānuṣyaṁ durlabhaṁ loke brāhmaṇyamadhikaṁ tataḥ
ब्राह्मण-योनि को प्राप्त कर मनुष्य को वर्ण-संकरता का त्याग करना चाहिए; इस लोक में मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, और उससे भी अधिक दुर्लभ ब्राह्मणत्व है।
श्लोक 57 (skanda.7.207.57)
एकशय्यासनं पक्तिर्भाण्डपक्वान्नमिश्रणम्। याजनाध्यापनं योनिस्तथा च सह भोजनम्। नवधा संकरः प्रोक्तो न कर्तव्योऽधमैः सह
ekaśayyāsanaṁ paktirbhāṇḍapakvānnamiśraṇam| yājanādhyāpanaṁ yonistathā ca saha bhojanam| navadhā saṁkaraḥ prokto na kartavyo'dhamaiḥ saha
एक ही शय्या और आसन पर बैठना, साथ रसोई पकाना, बर्तन और पके अन्न को मिलाना, याजन, अध्यापन, विवाह-सम्बन्ध, तथा साथ बैठकर भोजन करना—इस प्रकार 'संकर' नौ प्रकार का कहा गया है; इसे अधम लोगों के साथ कभी नहीं करना चाहिए।
श्लोक 58 (skanda.7.207.58)
अजीवन्कर्मणा स्वेन विप्रः क्षात्त्रं समाश्रयेत्। वैश्यकर्माऽथवा कुर्याद्वार्षलं परिवर्जयेत्
ajīvankarmaṇā svena vipraḥ kṣāttraṁ samāśrayet| vaiśyakarmā'thavā kuryādvārṣalaṁ parivarjayet
अपने कर्म से जीविका न चला सकने वाला ब्राह्मण क्षत्रिय के कर्म का आश्रय ले, अथवा वैश्य का कर्म करे, किन्तु शूद्र के कर्म का सदा त्याग करे।
श्लोक 59 (skanda.7.207.59)
कुसीदं कृषिवाणिज्यं प्रकुर्वीत स्वयं कृतम्। आपत्काले स्वयं कुर्वन्स्नानेन स्पृश्यते द्विजः
kusīdaṁ kṛṣivāṇijyaṁ prakurvīta svayaṁ kṛtam| āpatkāle svayaṁ kurvansnānena spṛśyate dvijaḥ
आपत्काल में वह स्वयं ब्याज, कृषि और वाणिज्य कर सकता है; स्वयं ऐसा करने वाला द्विज स्नान से ही पुनः स्पृश्य हो जाता है।
श्लोक 60 (skanda.7.207.60)
लब्धलाभः पितॄन्देवान्ब्रांह्मणांश्चैव तर्पयेत्। ते तृप्तास्तस्य तत्पापं शमयंति न संशयः
labdhalābhaḥ pitṝndevānbrāṁhmaṇāṁścaiva tarpayet| te tṛptāstasya tatpāpaṁ śamayaṁti na saṁśayaḥ
लाभ प्राप्त कर उसे पितरों, देवताओं तथा ब्राह्मणों को तृप्त करना चाहिए; वे तृप्त होकर उसके उस पाप को शान्त कर देते हैं, इसमें संशय नहीं है।
श्लोक 61 (skanda.7.207.61)
जलगोशकटारामयाञ्चावृद्धिवणिक्क्रियाः। अनूपं पर्वतो राजा दुर्भिक्षे जीविका स्मृताः
jalagośakaṭārāmayāñcāvṛddhivaṇikkriyāḥ| anūpaṁ parvato rājā durbhikṣe jīvikā smṛtāḥ
जल, गौ, गाड़ी, बगीचा तथा याचना—ये ब्याज और वाणिज्य के कार्य हैं; जलीय क्षेत्र, पर्वत, राजा की सेवा—ये दुर्भिक्ष के समय जीविका के साधन माने गए हैं।
श्लोक 62 (skanda.7.207.62)
असतोऽपि समादाय साधुभ्यो यः प्रयच्छति। धनं स्वामिनमात्मानं संतारयति दुस्तरात्
asato'pi samādāya sādhubhyo yaḥ prayacchati| dhanaṁ svāminamātmānaṁ saṁtārayati dustarāt
जो व्यक्ति असत् मार्ग से प्राप्त धन को भी साधुओं को दे देता है, वह उस धन के स्वामी को तथा स्वयं को दुस्तर संकट से पार कर देता है।
श्लोक 63 (skanda.7.207.63)
शूद्रे समगुणं दानं वैश्ये तद्द्विगुणं स्मृतम्। श्रोत्रिये तच्च साहस्रमनन्तं चाग्निहोत्रिके
śūdre samaguṇaṁ dānaṁ vaiśye taddviguṇaṁ smṛtam| śrotriye tacca sāhasramanantaṁ cāgnihotrike
शूद्र को दिया गया दान साधारण फल देता है, वैश्य को दिया गया दान दोगुना फल देता है, श्रोत्रिय को दिया गया दान सहस्र गुना फल देता है, तथा अग्निहोत्री को दिया गया दान अनन्त फल देता है।
श्लोक 64 (skanda.7.207.64)
ब्राह्मणातिक्रमो नास्ति नाचरेद्यो व्यवस्थितिम्। ज्वलंतमग्निमुत्सृज्य न हि भस्मनि हूयते
brāhmaṇātikramo nāsti nācaredyo vyavasthitim| jvalaṁtamagnimutsṛjya na hi bhasmani hūyate
जो व्यक्ति इस व्यवस्था का पालन नहीं करता, उसके लिए ब्राह्मण को लाँघने में कोई दोष नहीं है; जलती हुई अग्नि को छोड़कर कोई राख में हवन नहीं करता।
श्लोक 65 (skanda.7.207.65)
विद्यातपोभ्यां हीनेन नैव ग्राह्यः प्रतिग्रहः। गृह्णन्प्रदातारमधो नयत्यात्मानमेव च
vidyātapobhyāṁ hīnena naiva grāhyaḥ pratigrahaḥ| gṛhṇanpradātāramadho nayatyātmānameva ca
विद्या और तप दोनों से रहित व्यक्ति को दान ग्रहण नहीं करना चाहिए; ऐसा दान ग्रहण करने वाला दाता को तथा स्वयं को भी अधोगति में ले जाता है।
श्लोक 66 (skanda.7.207.66)
तस्माच्छ्रोत्रिय एवार्हो गुणवाञ्छीलवाञ्छुचिः। अव्यंगस्तत्र निर्दोषः पात्राणां परमं स्मृतम्
tasmācchrotriya evārho guṇavāñchīlavāñchuciḥ| avyaṁgastatra nirdoṣaḥ pātrāṇāṁ paramaṁ smṛtam
इसलिए दान के योग्य वही है जो श्रोत्रिय, गुणवान, शीलवान, पवित्र, अंगहीनता से रहित तथा निर्दोष हो—ऐसा पात्र सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
श्लोक 67 (skanda.7.207.67)
कपालस्थं यथा तोयं श्वदृतौ च यथा पयः। दूषितं स्थानदोषेण वृत्तहीने तथा श्रुतम्
kapālasthaṁ yathā toyaṁ śvadṛtau ca yathā payaḥ| dūṣitaṁ sthānadoṣeṇa vṛttahīne tathā śrutam
जैसे कपाल में रखा जल और कुत्ते की खाल की मशक में रखा दूध स्थान के दोष से दूषित हो जाता है, वैसे ही चरित्रहीन व्यक्ति में रखा वेद-ज्ञान भी दूषित हो जाता है।
श्लोक 68 (skanda.7.207.68)
दत्तं पात्रमतिक्रम्य यदपात्रे प्रतिग्रहः। तद्दत्तं गामतिक्रम्य गर्दभस्य गवाह्निकम्
dattaṁ pātramatikramya yadapātre pratigrahaḥ| taddattaṁ gāmatikramya gardabhasya gavāhnikam
योग्य पात्र को छोड़कर अयोग्य को दिया गया दान वैसा ही है जैसे गाय को छोड़कर गधे को गाय का चारा दे दिया जाए।
श्लोक 69 (skanda.7.207.69)
वृत्तं तस्मात्तु संरक्षेद्वित्तमेति गतं पुनः। अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः
vṛttaṁ tasmāttu saṁrakṣedvittameti gataṁ punaḥ| akṣīṇo vittataḥ kṣīṇo vṛttatastu hato hataḥ
इसलिए चरित्र की ही रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि गया हुआ धन पुनः लौट आता है; धन से क्षीण व्यक्ति अक्षीण ही रहता है, किन्तु चरित्र से क्षीण व्यक्ति पूर्णतः नष्ट हो जाता है।
श्लोक 70 (skanda.7.207.70)
प्रथमं तु गुरौ दानं दत्त्वा श्रेष्ठमनुक्रमात्। ततोऽन्येषां तु विप्राणां दद्यात्पात्रानुरूपतः
prathamaṁ tu gurau dānaṁ dattvā śreṣṭhamanukramāt| tato'nyeṣāṁ tu viprāṇāṁ dadyātpātrānurūpataḥ
पहले गुरु को सर्वश्रेष्ठ दान क्रमपूर्वक देना चाहिए, फिर अन्य ब्राह्मणों को उनकी योग्यता के अनुरूप देना चाहिए।
श्लोक 71 (skanda.7.207.71)
गुरौ च दत्तं यद्दानं दत्तं पात्रेषु मानवैः। निष्फलं तद्भवेत्प्रेत्य यात्युताधोगतिं प्रति
gurau ca dattaṁ yaddānaṁ dattaṁ pātreṣu mānavaiḥ| niṣphalaṁ tadbhavetpretya yātyutādhogatiṁ prati
गुरु के लिए निश्चित दान को यदि मनुष्य अन्य पात्रों को दे देते हैं, तो वह मृत्यु के बाद निष्फल हो जाता है, बल्कि अधोगति की ओर ले जाता है।
श्लोक 72 (skanda.7.207.72)
अवमानं गुरोः कृत्वा कोपयित्वा तु दुर्मतिः। गुर्वमानहतो मूढो न शांतिमधि गच्छति
avamānaṁ guroḥ kṛtvā kopayitvā tu durmatiḥ| gurvamānahato mūḍho na śāṁtimadhi gacchati
गुरु का अपमान कर, उन्हें क्रुद्ध करके, दुर्बुद्धि और गुरु के अपमान से आहत वह मूढ़ व्यक्ति कभी शान्ति को प्राप्त नहीं करता।
श्लोक 73 (skanda.7.207.73)
गुरोरभावे तत्पुत्रं तद्भार्यां तत्सुतं विना। पुत्रं प्रपौत्रं दौहित्रं ह्यन्यं वा तत्कुलोद्भवम्
gurorabhāve tatputraṁ tadbhāryāṁ tatsutaṁ vinā| putraṁ prapautraṁ dauhitraṁ hyanyaṁ vā tatkulodbhavam
गुरु के अभाव में उनके पुत्र को, उनकी पत्नी को, अथवा पुत्र के अभाव में पौत्र, दौहित्र, अथवा उनके ही कुल में उत्पन्न किसी अन्य को गुरु-तुल्य समझे।
श्लोक 74 (skanda.7.207.74)
पंचयोजनमध्ये तु श्रूयते स्वगुरुर्यदा। तदा नातिक्रमेद्दानं दद्यात्पात्रेषु मानवः
paṁcayojanamadhye tu śrūyate svagururyadā| tadā nātikrameddānaṁ dadyātpātreṣu mānavaḥ
यदि अपना गुरु पाँच योजन के भीतर सुना जाए, तो मनुष्य उसे लाँघकर अन्य पात्रों को दान न दे।
श्लोक 75 (skanda.7.207.75)
यतिश्चेत्प्रार्थयेल्लोभाद्दीयमानं प्रतिग्रहम्। न तस्य देयं विद्वद्भिर्न लोभः शस्यते यतेः
yatiścetprārthayellobhāddīyamānaṁ pratigraham| na tasya deyaṁ vidvadbhirna lobhaḥ śasyate yateḥ
यदि कोई संन्यासी लोभवश दिए जा रहे दान की याचना करे, तो विद्वानों को उसे नहीं देना चाहिए; क्योंकि संन्यासी के लिए लोभ प्रशंसनीय नहीं है।
श्लोक 76 (skanda.7.207.76)
धनं प्राप्य यतिर्लोके मौनं ज्ञानं च नाभ्यसेत्। उपभोगं तु दानेन जीवितं ब्रह्मचर्यया
dhanaṁ prāpya yatirloke maunaṁ jñānaṁ ca nābhyaset| upabhogaṁ tu dānena jīvitaṁ brahmacaryayā
धन प्राप्त कर संन्यासी इस लोक में मौन और ज्ञान का अभ्यास नहीं कर पाता; उपभोग दान से होता है, और जीवन ब्रह्मचर्य से चलता है, अर्थात् संन्यासी को इनसे दूर रहना चाहिए।
श्लोक 77 (skanda.7.207.77)
कुले जन्म च दीक्षाभिर्ये गतास्ते नरोत्तमाः। सौभाग्यमाप्नुयाल्लोके नूनं रसविवर्जनात्
kule janma ca dīkṣābhirye gatāste narottamāḥ| saubhāgyamāpnuyālloke nūnaṁ rasavivarjanāt
जो उत्तम पुरुष कुल में जन्म लेकर दीक्षाओं से संस्कारित होते हैं, वे इस लोक में रसों का त्याग करने से निश्चय ही सौभाग्य को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 78 (skanda.7.207.78)
आयुष्मत्यः प्रजाः सर्वा भवन्त्यामिषवर्जनात्
āyuṣmatyaḥ prajāḥ sarvā bhavantyāmiṣavarjanāt
मांस का त्याग करने से सभी सन्तानें दीर्घायु होती हैं।
श्लोक 79 (skanda.7.207.79)
चीरवल्कलधृक्त्यक्त्वा वस्त्राण्याभरणानि च। नागाधिपत्यं प्राप्नोति उपवासेन मानवः
cīravalkaladhṛktyaktvā vastrāṇyābharaṇāni ca| nāgādhipatyaṁ prāpnoti upavāsena mānavaḥ
वस्त्र और आभूषणों को त्यागकर वल्कल धारण करने वाला मनुष्य उपवास के द्वारा नागों के अधिपत्य को प्राप्त करता है।
श्लोक 80 (skanda.7.207.80)
क्रीडते सत्यवाक्येन स्वर्गे वै देवतैः सह। अहिंसया तथाऽऽरोग्यं दानात्कीर्तिमनुक्रमात्
krīḍate satyavākyena svarge vai devataiḥ saha| ahiṁsayā tathā'ārogyaṁ dānātkīrtimanukramāt
सत्यवचन से मनुष्य स्वर्ग में देवताओं के साथ क्रीड़ा करता है, अहिंसा से आरोग्य प्राप्त करता है, तथा दान से क्रमशः कीर्ति प्राप्त करता है।
श्लोक 81 (skanda.7.207.81)
द्विजशुश्रूषया राज्यं द्विजत्वं चातिपुष्कलम्। दिव्यरूपमवाप्नोति देवशुश्रूषया नरः
dvijaśuśrūṣayā rājyaṁ dvijatvaṁ cātipuṣkalam| divyarūpamavāpnoti devaśuśrūṣayā naraḥ
द्विजों की सेवा से सम्राज्य तथा अत्यन्त समृद्ध ब्राह्मणत्व प्राप्त होता है; देवताओं की सेवा से मनुष्य दिव्य रूप प्राप्त करता है।
श्लोक 82 (skanda.7.207.82)
अन्नदानाद्भवेत्तृप्तिः सर्वकामैरनुत्तमैः। दीपस्य तु प्रदानेन चक्षुष्माञ्जायते नरः
annadānādbhavettṛptiḥ sarvakāmairanuttamaiḥ| dīpasya tu pradānena cakṣuṣmāñjāyate naraḥ
अन्न-दान से सर्वोत्तम कामनाओं सहित तृप्ति प्राप्त होती है; दीप-दान से मनुष्य नेत्रवान् उत्पन्न होता है।
श्लोक 83 (skanda.7.207.83)
तुष्टिर्भवेत्सर्वकालं प्रदानाद्गन्धमाल्ययोः। लवणस्य तु दातारस्तिलानां सर्पिषस्तथा। तेजस्विनोऽपि जायन्ते भोगिनश्चिरजीविनः
tuṣṭirbhavetsarvakālaṁ pradānādgandhamālyayoḥ| lavaṇasya tu dātārastilānāṁ sarpiṣastathā| tejasvino'pi jāyante bhoginaścirajīvinaḥ
गन्ध और माला के दान से सदा सन्तोष प्राप्त होता है; नमक, तिल, तथा घृत के दाता तेजस्वी, भोगी तथा दीर्घजीवी उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 84 (skanda.7.207.84)
सुचित्रवस्त्राभरणोपधानं दद्यान्नरो यः शयनं द्विजाय। रूपान्वितां पक्ष्मवतीं मनोज्ञां भार्यामरालोपचितां लभेत्सः
sucitravastrābharaṇopadhānaṁ dadyānnaro yaḥ śayanaṁ dvijāya| rūpānvitāṁ pakṣmavatīṁ manojñāṁ bhāryāmarālopacitāṁ labhetsaḥ
जो मनुष्य किसी द्विज को सुन्दर चित्रित वस्त्र, आभूषण, तकिया-सहित शय्या दान करता है, वह सुन्दर रूप वाली, घनी पलकों वाली, मनोहर तथा उत्तम अलंकारों से सुसज्जित पत्नी प्राप्त करता है।