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प्रभास खण्ड · अध्याय 208

दानपात्रब्राह्मणमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 207अध्याय-सूचीअध्याय 209

श्लोक 1 (skanda.7.208.1)

देव्युवाच। इदं देयमिदं देयमिति प्रोक्तं तु यच्छ्रुतौ। दानादानविशेषांस्तु श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः

devyuvāca| idaṁ deyamidaṁ deyamiti proktaṁ tu yacchrutau| dānādānaviśeṣāṁstu śrotumicchāmi tattvataḥ

देवी ने कहा—श्रुति में जो 'यह देने योग्य है, यह देने योग्य है' ऐसा कहा गया है, मैं दान और अदान के विशेष भेदों को यथार्थ रूप से सुनना चाहती हूँ।

श्लोक 2 (skanda.7.208.2)

कानि दानानि शस्तानि कस्मै देयानि कान्यपि। कालं देशं च पात्रं च सर्वमाचक्ष्व मे विभो

kāni dānāni śastāni kasmai deyāni kānyapi| kālaṁ deśaṁ ca pātraṁ ca sarvamācakṣva me vibho

कौन-से दान प्रशस्त हैं, वे किसको देने चाहिए, हे विभो, समय, स्थान तथा पात्र—यह सब मुझे बताइए।

श्लोक 3 (skanda.7.208.3)

ईश्वर उवाच। वृथा जन्मानि चत्वारि वृथा दानानि षोडश। सुजन्मानि च चत्वारि महादानानि षोडश

īśvara uvāca| vṛthā janmāni catvāri vṛthā dānāni ṣoḍaśa| sujanmāni ca catvāri mahādānāni ṣoḍaśa

ईश्वर ने कहा—चार जन्म व्यर्थ होते हैं, और सोलह दान व्यर्थ होते हैं; चार जन्म सुफलदायक होते हैं, और सोलह महादान होते हैं।

श्लोक 4 (skanda.7.208.4)

देव्युवाच। एतद्विस्तरतो ब्रूहि देवदेवजगत्पते

devyuvāca| etadvistarato brūhi devadevajagatpate

देवी ने कहा—हे देवदेव, हे जगत्पते, यह मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 5 (skanda.7.208.5)

ईश्वर उवाच। वृथा जन्मानि चत्वारि यानि तानि निबोध मे। कुपुत्राणां वृथा जन्म ये च धर्मबहिष्कृताः। प्रवासं ये च गच्छंति परदाररताः सदा

īśvara uvāca| vṛthā janmāni catvāri yāni tāni nibodha me| kuputrāṇāṁ vṛthā janma ye ca dharmabahiṣkṛtāḥ| pravāsaṁ ye ca gacchaṁti paradāraratāḥ sadā

ईश्वर ने कहा—मुझसे वे चार व्यर्थ जन्म सुनो। दुष्ट पुत्रों का जन्म व्यर्थ है, जो धर्म से बहिष्कृत हैं उनका जन्म व्यर्थ है, जो सदा परदेश में रहते हैं उनका जन्म व्यर्थ है, तथा जो सदा परस्त्री में आसक्त रहते हैं उनका जन्म व्यर्थ है।

श्लोक 6 (skanda.7.208.6)

परपाकं च येऽश्नंति परदाररताश्च ये। अप्रत्याख्यं वृथा दानं सदोषं च तथा प्रिये

parapākaṁ ca ye'śnaṁti paradāraratāśca ye| apratyākhyaṁ vṛthā dānaṁ sadoṣaṁ ca tathā priye

जो दूसरों के द्वारा पकाया अन्न खाते हैं, और जो परस्त्री में आसक्त रहते हैं—हे प्रिये, उन्हें दिया गया दान, तथा जो बिना अस्वीकार किए दिया गया अथवा दोषयुक्त दान है, वह व्यर्थ है।

श्लोक 7 (skanda.7.208.7)

आरूढपतिते चैव अन्यायोपार्जितं धनम्। वृथा ब्रह्महने दानं पतिते तस्करे तथा

ārūḍhapatite caiva anyāyopārjitaṁ dhanam| vṛthā brahmahane dānaṁ patite taskare tathā

उच्च कुल से पतित हुए को, अन्यायपूर्वक अर्जित धन को, ब्रह्महत्यारे को, पतित को, तथा चोर को दिया गया दान व्यर्थ है।

श्लोक 8 (skanda.7.208.8)

गुरोश्चाप्रीतिजनने कृतघ्ने ग्रामयाजके। ब्रह्मबन्धौ च यद्दत्तं यद्दत्तं वृषलीपतौ

guroścāprītijanane kṛtaghne grāmayājake| brahmabandhau ca yaddattaṁ yaddattaṁ vṛṣalīpatau

गुरु को अप्रसन्न करने वाले को, कृतघ्न को, ग्राम-याजक को, ब्रह्मबन्धु को, तथा वृषलीपति को दिया गया दान व्यर्थ है।

श्लोक 9 (skanda.7.208.9)

वेदविक्रयिणे चैव यस्य चोपपतिर्गृहे। स्त्रीनिर्जिते च यद्दत्तं वृथादानानि षोडश

vedavikrayiṇe caiva yasya copapatirgṛhe| strīnirjite ca yaddattaṁ vṛthādānāni ṣoḍaśa

वेद बेचने वाले को, जिसके घर में उपपति हो उसे, तथा स्त्री द्वारा वशीभूत पुरुष को दिया गया दान—इस प्रकार ये सोलह दान व्यर्थ कहे गए हैं।

श्लोक 10 (skanda.7.208.10)

सुजन्म च सुपुत्राणां ये च धर्मे रता नराः। प्रवासं न च गच्छंति परदारपराङ्मुखाः

sujanma ca suputrāṇāṁ ye ca dharme ratā narāḥ| pravāsaṁ na ca gacchaṁti paradāraparāṅmukhāḥ

उत्तम सन्तान का जन्म, जो पुरुष धर्म में रत रहते हैं, जो परदेश नहीं जाते, तथा जो परस्त्री से विमुख रहते हैं—इनका जन्म सुफलदायक है।

श्लोक 11 (skanda.7.208.11)

गावः सुवर्णं रजतं रत्नानि च सरस्वती। तिलाः कन्या गजोश्वश्च शय्या वस्त्रं तथा मही

gāvaḥ suvarṇaṁ rajataṁ ratnāni ca sarasvatī| tilāḥ kanyā gajośvaśca śayyā vastraṁ tathā mahī

गौ, सुवर्ण, चाँदी, रत्न, सरस्वती, तिल, कन्या, हाथी, अश्व, शय्या, वस्त्र, तथा भूमि—

श्लोक 12 (skanda.7.208.12)

धान्यं पयश्च च्छत्रं च गृहं चोपस्करान्वितम्। एतान्येव महादेवि महादानानि षोडश

dhānyaṁ payaśca cchatraṁ ca gṛhaṁ copaskarānvitam| etānyeva mahādevi mahādānāni ṣoḍaśa

अन्न, दूध, छत्र, तथा गृहोपकरणों सहित घर—हे महादेवि, ये ही सोलह महादान हैं।

श्लोक 13 (skanda.7.208.13)

गर्वावृतस्तु यो दद्याद्भयात्क्रोधात्तथैव च। भुंक्ते दानफलं तद्धि गर्भस्थो नात्र संशय

garvāvṛtastu yo dadyādbhayātkrodhāttathaiva ca| bhuṁkte dānaphalaṁ taddhi garbhastho nātra saṁśaya

जो व्यक्ति अहंकार से आवृत होकर, अथवा भय या क्रोध से दान देता है, उस दान के फल को वह गर्भ में रहते हुए ही भोगता है, इसमें संशय नहीं है।

श्लोक 14 (skanda.7.208.14)

बालत्वेऽपि च सोऽश्नाति यद्दत्तं दंभकारणात्। मन्युना मंतुना चैव तथैवार्थस्य कारणात्

bālatve'pi ca so'śnāti yaddattaṁ daṁbhakāraṇāt| manyunā maṁtunā caiva tathaivārthasya kāraṇāt

जो दान दंभ के कारण, क्रोध से, अभिमान से, अथवा स्वार्थ के लिए दिया जाता है, उसका फल वह बाल्यावस्था में ही भोग लेता है।

श्लोक 15 (skanda.7.208.15)

देशे काले च पात्रे च शुद्धेन मनसा तथा। न्यायार्जितं च यो दद्याद्यौवने स तदश्नुते

deśe kāle ca pātre ca śuddhena manasā tathā| nyāyārjitaṁ ca yo dadyādyauvane sa tadaśnute

जो व्यक्ति उचित स्थान, समय और पात्र को देखकर शुद्ध मन से न्यायपूर्वक अर्जित धन का दान करता है, वह उसका फल यौवनावस्था में भोगता है।

श्लोक 16 (skanda.7.208.16)

अन्यायेनार्जितं द्रव्यमपात्रे प्रतिपादितम्। क्लिष्टं च विधिहीनं च वृद्धभावे तदश्नुते

anyāyenārjitaṁ dravyamapātre pratipāditam| kliṣṭaṁ ca vidhihīnaṁ ca vṛddhabhāve tadaśnute

अन्यायपूर्वक अर्जित धन को अपात्र को देना, कष्टपूर्वक तथा विधिरहित रूप से दिया गया दान—इसका फल वह वृद्धावस्था में भोगता है।

श्लोक 17 (skanda.7.208.17)

तस्माद्देशे च काले च सुपात्रे विधिना नरः। शुभार्जितं प्रयुञ्जीत श्रद्धया शाठ्यवर्जितः

tasmāddeśe ca kāle ca supātre vidhinā naraḥ| śubhārjitaṁ prayuñjīta śraddhayā śāṭhyavarjitaḥ

इसलिए मनुष्य को उचित स्थान और समय पर, सुपात्र को, विधिपूर्वक, शुभ अर्जित धन का, श्रद्धापूर्वक तथा छल-रहित होकर दान करना चाहिए।

श्लोक 18 (skanda.7.208.18)

स्वाध्यायाढ्यं योगवंतं प्रशांतं पुराणज्ञं पापभीरुं वदान्यम्। स्त्रीषु क्षान्तं धार्मिकं गोशरण्यं व्रतैः क्रान्तं तादृशं पात्रमाहुः

svādhyāyāḍhyaṁ yogavaṁtaṁ praśāṁtaṁ purāṇajñaṁ pāpabhīruṁ vadānyam| strīṣu kṣāntaṁ dhārmikaṁ gośaraṇyaṁ vratairkrāntaṁ tādṛśaṁ pātramāhuḥ

जो स्वाध्याय-सम्पन्न, योगवान्, शान्त, पुराण-ज्ञाता, पाप से भयभीत, उदार, स्त्रियों के प्रति संयमी, धार्मिक, गौओं का आश्रयदाता, तथा व्रतों से युक्त हो—ऐसे व्यक्ति को उत्तम पात्र कहा गया है।

श्लोक 19 (skanda.7.208.19)

सत्यं दमस्तपः शौचं सन्तोषोऽनैर्ष्यमार्जवम्। ज्ञानं शमो दया दानमेतत्पात्रस्य लक्षणम्

satyaṁ damastapaḥ śaucaṁ saṁtoṣo'nairṣyamārjavam| jñānaṁ śamo dayā dānametatpātrasya lakṣaṇam

सत्य, इन्द्रिय-संयम, तप, पवित्रता, सन्तोष, ईर्ष्यारहितता, सरलता, ज्ञान, शान्ति, दया, तथा दान—ये सब उत्तम पात्र के लक्षण हैं।

श्लोक 20 (skanda.7.208.20)

एवंविधे तु यत्पात्रे गामेकां तु प्रयच्छति। समानवत्सां कपिलां धेनुं सर्वगुणान्विताम्

evaṁvidhe tu yatpātre gāmekāṁ tu prayacchati| samānavatsāṁ kapilāṁ dhenuṁ sarvaguṇānvitām

जो व्यक्ति इस प्रकार के पात्र को अपने बछड़े सहित एक तवे रंग की, सर्वगुण-सम्पन्न गाय दान करता है,

श्लोक 21 (skanda.7.208.21)

रौप्यपादां स्वर्णशृङ्गीं रुद्रलोके महीयते। एकां गां दशगुर्दद्याद्गोशती च तथा दश

raupyapādāṁ svarṇaśṛṅgīṁ rudraloke mahīyate| ekāṁ gāṁ daśagurdadyādgośatī ca tathā daśa

जिसके पाँव चाँदी के और सींग सोने के हों, ऐसी गाय दान करने वाला रुद्रलोक में महिमामंडित होता है। एक गाय का दान दस गौओं के दान के तुल्य है, तथा दस गौओं का दान सौ गौओं के तुल्य है।

श्लोक 22 (skanda.7.208.22)

शतं सहस्रगुर्दद्यात्सर्वे समफलाः स्मृताः। सुशीला सोमसंपन्ना तरुणी च पयस्विनी। सवत्सा न्यायलब्धा च प्रदेया ब्राह्मणाय गौः

śataṁ sahasragurdadyātsarve samaphalāḥ smṛtāḥ| suśīlā somasaṁpannā taruṇī ca payasvinī| savatsā nyāyalabdhā ca pradeyā brāhmaṇāya gauḥ

सौ गौओं का दान सहस्र गौओं के तुल्य है—ये सब समान फल देने वाले माने गए हैं। ब्राह्मण को वही गाय देनी चाहिए जो सुशील, सौम्यता से युक्त, तरुण, दुधारू, बछड़े सहित, तथा न्यायपूर्वक प्राप्त हो।

श्लोक 23 (skanda.7.208.23)

वंध्या सरोगा हीनांगी दुष्टा वृद्धा मृतप्रजा। अन्यायलब्धा दूरस्था नेदृशी गां प्रदापयेत्

vaṁdhyā sarogā hīnāṁgī duṣṭā vṛddhā mṛtaprajā| anyāyalabdhā dūrasthā nedṛśī gāṁ pradāpayet

बाँझ, रोगग्रस्त, अंगहीन, दुष्ट, वृद्ध, मृत-सन्तान वाली, अन्यायपूर्वक प्राप्त, अथवा दूरस्थ गाय—ऐसी गाय कभी दान न करे।

श्लोक 24 (skanda.7.208.24)

यो हीदृशीं गां ददाति देवोद्देशेन मानवः। प्रत्युताधोगतिं याति क्लिश्यते च महेश्वरि

yo hīdṛśīṁ gāṁ dadāti devoddeśena mānavaḥ| pratyutādhogatiṁ yāti kliśyate ca maheśvari

जो मनुष्य ऐसी गाय देवता के उद्देश्य से दान करता है, हे महेश्वरि, वह उलटे अधोगति को प्राप्त होता है और क्लेश भोगता है।

श्लोक 25 (skanda.7.208.25)

रुष्टा क्लिष्टा दुर्बला व्याधिता च न दातव्या या च मूल्यैरदत्तैः। लेशो विप्रेभ्यो यया जायते वै तस्या दातुश्चाफलाः सर्वलोकाः

ruṣṭā kliṣṭā durbalā vyādhitā ca na dātavyā yā ca mūlyairadattaiḥ| leśo viprebhyo yayā jāyate vai tasyā dātuścāphalāḥ sarvalokāḥ

क्रुद्ध स्वभाव वाली, पीड़ित, दुर्बल, तथा रोगग्रस्त गाय, अथवा जिसका मूल्य नहीं चुकाया गया हो, ऐसी गाय कभी न दे; जिस गाय से ब्राह्मणों को लेशमात्र भी कष्ट होता है, उसके दाता के लिए सभी लोक निष्फल हो जाते हैं।

श्लोक 26 (skanda.7.208.26)

अतिथये प्रशान्ताय सीदते चाहिताग्नये। श्रोत्रियाय तथैकापि दत्ता बहुगुणा भवेत्

atithaye praśāntāya sīdate cāhitāgnaye| śrotriyāya tathaikāpi dattā bahuguṇā bhavet

एक ही गाय भी, यदि शान्त, दरिद्र, अग्निहोत्री, अतिथि तथा श्रोत्रिय को दी जाए, तो वह बहुगुणित फल देने वाली होती है।

श्लोक 27 (skanda.7.208.27)

गां विक्रीणाति चेद्देवि ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः। नासौ प्रशस्यते पात्रं ब्राह्मणो नैव स स्मृतः

gāṁ vikrīṇāti cedvevi brāhmaṇo jñānadurbalaḥ| nāsau praśasyate pātraṁ brāhmaṇo naiva sa smṛtaḥ

हे देवि, यदि कोई ज्ञान से दुर्बल ब्राह्मण गाय को बेच देता है, तो वह पात्र के रूप में प्रशंसनीय नहीं है, वह ब्राह्मण भी नहीं माना जाता।

श्लोक 28 (skanda.7.208.28)

बहुभ्यो न प्रदेयानि गौर्गृहं शयनं स्त्रियः। विभक्ता दक्षिणा ह्येषा दातारं नोपतिष्ठति

bahubhyo na pradeyāni gaurgṛhaṁ śayanaṁ striyaḥ| vibhaktā dakṣiṇā hyeṣā dātāraṁ nopatiṣṭhati

गाय, घर, शय्या तथा स्त्री—इन्हें अनेक लोगों को बाँटकर नहीं देना चाहिए; क्योंकि विभाजित दक्षिणा दाता के लिए फलदायी नहीं होती।

श्लोक 29 (skanda.7.208.29)

प्रासादा यत्र सौवर्णाः शय्या रत्नोज्ज्वलास्तथा। वराश्चाप्सरसो यत्र तत्र गच्छंति गोप्रदाः

prāsādā yatra sauvarṇāḥ śayyā ratnojjvalāstathā| varāścāpsaraso yatra tatra gacchaṁti gopradāḥ

जहाँ स्वर्णमय प्रासाद हैं, रत्नों से देदीप्यमान शय्याएँ हैं, तथा उत्तम अप्सराएँ हैं—गौ-दान करने वाले वहीं जाते हैं।

श्लोक 30 (skanda.7.208.30)

नास्ति भूमिसमं दानं नास्ति गंगासमा सरित्। नास्ति सत्यात्परो धर्मो नान्यो देवो महेश्वरात्

nāsti bhūmisamaṁ dānaṁ nāsti gaṁgāsamā sarit| nāsti satyātparo dharmo nānyo devo maheśvarāt

भूमि-दान के समान कोई दान नहीं है, गंगा के समान कोई नदी नहीं है, सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है, और महेश्वर से बढ़कर कोई देवता नहीं है।

श्लोक 31 (skanda.7.208.31)

उच्चैः पाषाणयुक्ता च न समा नैव चोषरा। न नदीकूलविकटा भूमिर्देया कदाचन

uccaiḥ pāṣāṇayuktā ca na samā naiva coṣarā| na nadīkūlavikaṭā bhūmirdeyā kadācana

अत्यधिक ऊँची, पत्थरों से युक्त, समतल न होने वाली, ऊसर, तथा नदी-तट की विकट भूमि—ऐसी भूमि कभी दान न करे।

श्लोक 32 (skanda.7.208.32)

षष्टिवर्षसहस्राणि स्वर्गे वसति भूमिदः। आच्छेत्ता चानुमंता च तान्येव नरकं व्रजेत्

ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi svarge vasati bhūmidaḥ| ācchettā cānumaṁtā ca tānyeva narakaṁ vrajet

भूमि-दान करने वाला साठ हजार वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है; भूमि छीनने वाला तथा उसका समर्थन करने वाला उतने ही वर्षों तक नरक में जाता है।

श्लोक 33 (skanda.7.208.33)

कुरुते पुरुषः पापं यत्किञ्चिद्वृत्तिकर्शितः। अपि गोचर्ममात्रेण भूमिदानेन शुद्ध्यति

kurute puruṣaḥ pāpaṁ yatkiñcidvṛttikarśitaḥ| api gocarmamātreṇa bhūmidānena śuddhyati

जीविका के अभाव से पीड़ित मनुष्य जो भी पाप करता है, वह गाय के चमड़े के बराबर भी भूमि दान करने से शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 34 (skanda.7.208.34)

छत्रं शय्यासनं शंखो गजाश्वाश्चामराः स्त्रियः। भूमिश्चैषां प्रदानस्य शिवलोकः फलं स्मृतम्

chatraṁ śayyāsanaṁ śaṁkho gajāśvāścāmarāḥ striyaḥ| bhūmiścaiṣāṁ pradānasya śivalokaḥ phalaṁ smṛtam

छत्र, शय्या, आसन, शंख, हाथी, अश्व, चँवर, स्त्री, तथा भूमि—इन सबके दान का फल शिवलोक कहा गया है।

श्लोक 35 (skanda.7.208.35)

आदित्येऽहनि संक्रांतौ ग्रहणे चन्द्र सूर्ययोः। पारणैश्चैव गोदाने नोपोष्यः पौत्रवान्गृही

āditye'hani saṁkrāṁtau grahaṇe candrasūryayoḥ| pāraṇaiścaiva godāne nopoṣyaḥ pautravāngṛhī

रविवार को, संक्रान्ति को, तथा चन्द्र-सूर्यग्रहण के समय—पारणा तथा गोदान करने के अतिरिक्त, पौत्रवान् गृहस्थ को उपवास नहीं करना चाहिए।

श्लोक 36 (skanda.7.208.36)

इन्दुक्षये तु संक्रान्त्यामेकादश्यां शते कृते। उपवासं न कुर्वीत यदीच्छेत्संततिं ध्रुवम्

indukṣaye tu saṁkrāntyāmekādaśyāṁ śate kṛte| upavāsaṁ na kurvīta yadīcchetsaṁtatiṁ dhruvam

अमावास्या को, संक्रान्ति को, एकादशी को, तथा शतभिषा नक्षत्र में—यदि निश्चित सन्तान की इच्छा हो, तो उपवास न करे।

श्लोक 37 (skanda.7.208.37)

यथा शुक्ला तथा कृष्णा न विशेषोऽस्ति कश्चन। तथापि वर्धते धर्मः शुक्लायामेव सर्वदा

yathā śuklā tathā kṛṣṇā na viśeṣo'sti kaścana| tathāpi vardhate dharmaḥ śuklāyāmeva sarvadā

जैसी शुक्ल एकादशी है, वैसी ही कृष्ण एकादशी है, इनमें कोई विशेष भेद नहीं है; फिर भी धर्म सदा शुक्लपक्ष में ही अधिक बढ़ता है।

श्लोक 38 (skanda.7.208.38)

दशम्येकादशीविद्धा द्वादशी च क्षयं गता। नक्तं तत्र प्रकुर्वीत नोपवासो विधीयते

daśamyekādaśīviddhā dvādaśī ca kṣayaṁ gatā| naktaṁ tatra prakurvīta nopavāso vidhīyate

जो एकादशी दशमी से युक्त हो, तथा जो द्वादशी क्षीण हो गई हो, उस दिन नक्त-भोजन करे, उपवास विहित नहीं है।

श्लोक 39 (skanda.7.208.39)

उपोष्यैकादशीं यस्तु त्रयोदश्यां तु पारणम्। करोति तस्य नश्येत्तु द्वादशद्वादशीफलम्

upoṣyaikādaśīṁ yastu trayodaśyāṁ tu pāraṇam| karoti tasya naśyettu dvādaśadvādaśīphalam

जो व्यक्ति एकादशी का उपवास करके त्रयोदशी को पारणा करता है, उसका बारह एकादशियों का फल नष्ट हो जाता है।

श्लोक 40 (skanda.7.208.40)

उपवासे तथा श्राद्धे न खादेद्दन्तधावनम्। दन्तानां काष्ठसंगाच्च हन्ति सप्तकुलानि वै

upavāse tathā śrāddhe na khādeddantadhāvanam| dantānāṁ kāṣṭhasaṁgācca hanti saptakulāni vai

उपवास और श्राद्ध के दिन दन्तधावन नहीं करना चाहिए; दाँतों में लकड़ी के संसर्ग से सात कुलों का नाश हो जाता है।

श्लोक 41 (skanda.7.208.41)

दर्शं च पौर्णमासं च पितुः सांवत्सरं दिनम्। पूर्वविद्धमकुर्वाणो नरकं प्रतिपद्यते

darśaṁ ca paurṇamāsaṁ ca pituḥ sāṁvatsaraṁ dinam| pūrvaviddhamakurvāṇo narakaṁ pratipadyate

अमावास्या, पूर्णिमा, तथा पिता के वार्षिक श्राद्ध का दिन—यदि इन्हें पूर्वविद्ध तिथि पर न किया जाए, तो नरक की प्राप्ति होती है।

श्लोक 42 (skanda.7.208.42)

हानिश्च संततेः प्रोक्ता दौर्भाग्यं समवाप्नुयात्। द्रव्याभावेथ श्राद्धस्य विधिं वक्ष्यामि तत्त्वतः

hāniśca saṁtateḥ proktā daurbhāgyaṁ samavāpnuyāt| dravyābhāvetha śrāddhasya vidhiṁ vakṣyāmi tattvataḥ

इससे सन्तान की हानि होती है और दुर्भाग्य प्राप्त होता है—ऐसा कहा गया है। अब मैं सामग्री के अभाव में श्राद्ध की विधि यथार्थ रूप से कहूँगा।

श्लोक 43 (skanda.7.208.43)

एकेनापि हि विप्रेण षट्पिण्डं श्राद्धमाचरेत्। षडर्घ्यान्पारयेत्तत्र तेभ्यो दद्याद्यथाविधि

ekenāpi hi vipreṇa ṣaṭpiṇḍaṁ śrāddhamācaret| ṣaḍarghyānpārayettatra tebhyo dadyādyathāvidhi

एक ही ब्राह्मण से भी छह पिण्डों वाला श्राद्ध किया जा सकता है; वहाँ छह अर्घ्य समर्पित करके यथाविधि उन्हें अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 44 (skanda.7.208.44)

पिता भुंक्ते द्विज करे मुखे भुंक्ते पितामहः। प्रपितामहस्तालुस्थः कण्ठे मातामहः स्मृतः

pitā bhuṁkte dvija kare mukhe bhuṁkte pitāmahaḥ| prapitāmahastāluṣthaḥ kaṇṭhe mātāmahaḥ smṛtaḥ

हे द्विज, पिता ब्राह्मण के हाथ में भोजन करता है, पितामह मुख में भोजन करता है, प्रपितामह तालु में स्थित होकर भोजन करता है, तथा मातामह कण्ठ में स्थित माने गए हैं।

श्लोक 45 (skanda.7.208.45)

प्रमातामहस्तु हृदये वृद्धो नाभौ तु संस्थितः। अलाभे ब्राह्मणस्यैव कुशः कार्यो द्विजः प्रिये। इदं सर्वपुराणेभ्यः सारमुद्धत्य चोच्यते

pramātāmahastu hṛdaye vṛddho nābhau tu saṁsthitaḥ| alābhe brāhmaṇasyaiva kuśaḥ kāryo dvijaḥ priye| idaṁ sarvapurāṇebhyaḥ sāramuddhatya cocyate

मातामह के पिता हृदय में, तथा वृद्ध पूर्वज नाभि में स्थित माने गए हैं। हे प्रिये, ब्राह्मण के अभाव में कुश को ही द्विज मानकर कार्य करना चाहिए। यह सब पुराणों का सार निकालकर कहा गया है।

श्लोक 46 (skanda.7.208.46)

न चैतन्नास्तिके देयं पिशुने वेदनिन्दके। प्रातःप्रातरिदं श्राव्यं पूजयित्वा महेश्वरम्

na caitannāstike deyaṁ piśune vedanindake| prātaḥprātaridaṁ śrāvyaṁ pūjayitvā maheśvaram

यह ज्ञान नास्तिक को, चुगलखोर को, तथा वेद की निन्दा करने वाले को नहीं देना चाहिए। प्रतिदिन प्रातःकाल महेश्वर की पूजा करके इसे सुनना चाहिए।

श्लोक 47 (skanda.7.208.47)

कुलीनं सर्वशास्त्रज्ञं यथा देवं महेश्वरम्। अस्य धर्मस्य वक्तारं छत्रं दद्यात्प्रपूजयेत्

kulīnaṁ sarvaśāstrajñaṁ yathā devaṁ maheśvaram| asya dharmasya vaktāraṁ chatraṁ dadyātprapūjayet

कुलीन, सर्वशास्त्रज्ञ, तथा भगवान् महेश्वर के समान इस धर्म के वक्ता को छत्र देकर सम्मानित करना चाहिए।

श्लोक 48 (skanda.7.208.48)

अपूज्याद्वाचकाद्यस्तु श्लोकमेकं शृणोति च। नासौ पुण्यमवाप्नोति शास्त्रचौरः स्मृतो हि सः

apūjyādvācakādyastu ślokamekaṁ śṛṇoti ca| nāsau puṇyamavāpnoti śāstracauraḥ smṛto hi saḥ

जो व्यक्ति किसी अनादृत वाचक से एक भी श्लोक सुनता है, वह पुण्य को प्राप्त नहीं करता; वह शास्त्र का चोर माना जाता है।

श्लोक 49 (skanda.7.208.49)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पूजयेद्वाचकं बुधः। अन्यथा निष्फलं तस्य पुस्तकश्रवणं भवेत्

tasmātsarvaprayatnena pūjayedvācakaṁ budhaḥ| anyathā niṣphalaṁ tasya pustakaśravaṇaṁ bhavet

इसलिए बुद्धिमान पुरुष को हर प्रकार से वाचक की पूजा करनी चाहिए, अन्यथा उसका पुस्तक-श्रवण निष्फल हो जाता है।

श्लोक 50 (skanda.7.208.50)

यस्यैव तिष्ठते गेहे शास्त्रमेतत्सदुर्लभम्। तस्य देवि गृहे तीर्थैः सह तिष्ठेच्छिवः स्वयम्

yasyaiva tiṣṭhate gehe śāstrametatsadurlabham| tasya devi gṛhe tīrthaiḥ saha tiṣṭhecchivaḥ svayam

हे देवि, जिसके घर में यह अत्यन्त दुर्लभ शास्त्र रहता है, उसके घर में शिव स्वयं समस्त तीर्थों के साथ निवास करते हैं।

श्लोक 51 (skanda.7.208.51)

बहुनात्र किमुक्तेन भवेन्मोक्षस्य भाजनम्। न चैतत्पिशुने देयं नास्तिके दंभसंयुते

bahunātra kimuktena bhavenmokṣasya bhājanam| na caitatpiśune deyaṁ nāstike daṁbhasaṁyute

यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ—वह मोक्ष का भागी बनता है। यह चुगलखोर को, नास्तिक को, तथा पाखण्डी को कभी नहीं देना चाहिए।

श्लोक 52 (skanda.7.208.52)

इदं शान्ताय दान्ताय देयं शैवद्विजन्मने

idaṁ śāṁtāya dāṁtāya deyaṁ śaivadvijanmane

यह ज्ञान शान्त, संयमी, तथा शिव-भक्त द्विज को ही देना चाहिए।

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