प्रभास खण्ड · अध्याय 221
ऋणमोचनमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.221.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि देवं च ऋणमोचनम्। तस्मिन्दृष्टे ऋणं न स्यान्मातापितृसमुद्भवम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi devaṁ ca ṛṇamocanam| tasmindṛṣṭe ṛṇaṁ na syānmātāpitṛsamudbhavam
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तत्पश्चात् ऋणमोचन देव के पास जाना चाहिए; उनका दर्शन करने से माता-पिता से उत्पन्न ऋण नहीं रहता।
श्लोक 2 (skanda.7.221.2)
पितरस्तु पुरा सर्वे दिव्यक्षेत्रं समागताः। प्रभासे तपसा युक्ताः स्थिता वर्षगणान्बहून्
pitarastu purā sarve divyakṣetraṁ samāgatāḥ| prabhāse tapasā yuktāḥ sthitā varṣagaṇānbahūn
पूर्वकाल में सभी पितर इस दिव्य क्षेत्र में आए और तपस्या में लीन होकर प्रभास में अनेक वर्षों तक रहे।
श्लोक 3 (skanda.7.221.3)
अग्निष्वात्ता बर्हिषदः सोमपा आज्यपास्तथा। लिंगं संस्थापयामासुः सर्वे भक्तिपरायणाः
agniṣvāttā barhiṣadaḥ somapā ājyapāstathā| liṅgaṁ saṁsthāpayāmāsuḥ sarve bhaktiparāyaṇāḥ
अग्निष्वात्त, बर्हिषद, सोमप तथा आज्यप—ये सभी पितृगण भक्तिपरायण होकर उस लिंग की स्थापना की।
श्लोक 4 (skanda.7.221.4)
ततः कालेन महता तुष्टस्तेषां महेश्वरः। ततः प्रत्यक्षतां गत्वा वाक्यमेतदुवाच ह
tataḥ kālena mahatā tuṣṭasteṣāṁ maheśvaraḥ| tataḥ pratyakṣatāṁ gatvā vākyametaduvāca ha
तब बहुत समय बीतने पर महेश्वर उनसे प्रसन्न हुए, और उनके सम्मुख साक्षात् प्रकट होकर यह वचन कहा।
श्लोक 5 (skanda.7.221.5)
परितुष्टोऽस्मि भद्रं वो ब्रूत यन्मनसेप्सितम्
parituṣṭo'smi bhadraṁ vo brūta yanmanasepsitam
मैं पूर्ण प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; जो तुम्हारे मन में अभीष्ट हो, वह कहो।
श्लोक 6 (skanda.7.221.6)
पितर ऊचुः। अस्माकं दीयतां वृत्तिर्जगत्यस्मिन्स्वयं कृते। देवानां च ऋषीणां च मानुषाणां महीतले
pitara ūcuḥ| asmākaṁ dīyatāṁ vṛttirjagatyasminsvayaṁ kṛte| devānāṁ ca ṛṣīṇāṁ ca mānuṣāṇāṁ mahītale
पितरों ने कहा—इस आपके द्वारा स्वयं रचे गए जगत् में, पृथ्वीतल पर देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्यों के बीच हमारी जीविका निश्चित हो।
श्लोक 7 (skanda.7.221.7)
भवानेव परो लोके सर्वेषां पद्मसंभव। आगत्य वर्णाश्चत्वार इह ये श्रद्धयान्विताः
bhavāneva paro loke sarveṣāṁ padmasaṁbhava| āgatya varṇāścatvāra iha ye śraddhayānvitāḥ
हे लोटस से उत्पन्न, आप ही सबके लिए परम शरण्य हैं; इस लोक में जो भी चारों वर्णों के लोग श्रद्धायुक्त होकर यहाँ आएँ,
श्लोक 8 (skanda.7.221.8)
पैतृकात्तु ऋणान्मुक्ता भवंतु गतकल्मषाः। व्यन्तरत्वं सुरश्रेष्ठ येषां वै पितरो गताः
paitṛkāttu ṛṇānmuktā bhavaṁtu gatakalmaṣāḥ| vyantaratvaṁ suraśreṣṭha yeṣāṁ vai pitaro gatāḥ
वे पितृ-ऋण से मुक्त होकर पापरहित हो जाएँ। हे देवश्रेष्ठ, जिनके पितर व्यन्तर-योनि को प्राप्त हुए हैं,
श्लोक 9 (skanda.7.221.9)
सर्प्पे वह्नि विषैर्वा ये नाशं नीताः पितामहाः। अपुत्रा वा सपुत्रा वा सपिण्डीकरणं विना
sarppe vahni viṣairvā ye nāśaṁ nītāḥ pitāmahāḥ| aputrā vā saputrā vā sapiṇḍīkaraṇaṁ vinā
जो पूर्वज सर्प, अग्नि अथवा विष से नष्ट हुए हों, चाहे पुत्रहीन हों या पुत्रवान्, किन्तु सपिण्डीकरण संस्कार के बिना रह गए हों,
श्लोक 10 (skanda.7.221.10)
न कृतानि पुरा येषामेकोद्दिष्टानि षोडश। तथा नैव वृषोत्सर्गो गोहताश्चाथ चान्त्यजैः
na kṛtāni purā yeṣāmekoddiṣṭāni ṣoḍaśa| tathā naiva vṛṣotsargo gohatāścātha cāntyajaiḥ
जिनके लिए पहले सोलह एकोद्दिष्ट श्राद्ध नहीं किए गए, जिनके लिए वृषोत्सर्ग नहीं किया गया, तथा जो गौ द्वारा या अन्त्यजों द्वारा मारे गए हों,
श्लोक 11 (skanda.7.221.11)
अथापरे ये च मृताः शौचेन तु विना कृताः। ते चात्र तर्पिताः सर्वे प्रयान्तु परमां गतिम्
athāpare ye ca mṛtāḥ śaucena tu vinā kṛtāḥ| te cātra tarpitāḥ sarve prayāntu paramāṁ gatim
और अन्य जो भी मृतक शुद्धिकरण के बिना ही अन्तिम संस्कार को प्राप्त हुए हों—वे सभी यहाँ तर्पित होकर परम गति को प्राप्त करें।
श्लोक 12 (skanda.7.221.12)
श्रीभगवानुवाच। स्नात्वा तु सलिले पुण्ये पितृणां चैव तर्पणम्। ये करिष्यंति मनुजाः पितृभक्तिपरायणाः
śrībhagavānuvāca| snātvā tu salile puṇye pitṛṇāṁ caiva tarpaṇam| ye kariṣyaṁti manujāḥ pitṛbhaktiparāyaṇāḥ
श्रीभगवान् ने कहा—जो मनुष्य इस पुण्य जल में स्नान कर, पितृ-भक्ति में लीन होकर पितरों का तर्पण करेंगे,
श्लोक 13 (skanda.7.221.13)
अहं वरप्रदस्तेषां तारयिष्यामि तत्क्षणात्। पितृन्सर्वान्न संदेहो यदि पापशतैर्वृताः
ahaṁ varapradasteṣāṁ tārayiṣyāmi tatkṣaṇāt| pitṛnsarvānna saṁdeho yadi pāpaśatairvṛtāḥ
मैं उनका वर देने वाला होकर उसी क्षण उनके सभी पितरों को पार कर दूँगा, चाहे वे सैकड़ों पापों से घिरे ही क्यों न हों—इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 14 (skanda.7.221.14)
अस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा यो लिंगं पूजयिष्यति। युष्माभिः स्थापितं लिंगं स मुक्तः पैतृकादृणात्
asmiṁstīrthe naraḥ snātvā yo liṅgaṁ pūjayiṣyati| yuṣmābhiḥ sthāpitaṁ liṅgaṁ sa muktaḥ paitṛkādṛṇāt
जो मनुष्य इस तीर्थ में स्नान कर, तुम्हारे द्वारा स्थापित इस लिंग की पूजा करेगा, वह पितृ-ऋण से मुक्त हो जाएगा।
श्लोक 15 (skanda.7.221.15)
यस्मादृणात्प्रमुच्येत अस्य लिंगस्य दर्शनात्। तस्मान्मया कृतं नाम ह्येतस्य ऋणमोचनम्
yasmādṛṇātpramucyeta asya liṅgasya darśanāt| tasmānmayā kṛtaṁ nāma hyetasya ṛṇamocanam
चूँकि इस लिंग के दर्शन से मनुष्य ऋण से मुक्त हो जाता है, इसलिए मैंने इसका नाम 'ऋणमोचन' रखा है।
श्लोक 16 (skanda.7.221.16)
ईश्वर उवाच। हिरण्यं मस्तके दत्त्वा यः स्नाति ऋणमोचने। आत्मा वै तारितस्तेन दत्तं भवति गोशतम्
īśvara uvāca| hiraṇyaṁ mastake dattvā yaḥ snāti ṛṇamocane| ātmā vai tāritastena dattaṁ bhavati gośatam
ईश्वर ने कहा—जो सिर पर सोना रखकर ऋणमोचन तीर्थ में स्नान करता है, वह स्वयं तर जाता है, और उसे सौ गौओं के दान के समान फल प्राप्त होता है।
श्लोक 17 (skanda.7.221.17)
एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तत्र श्राद्धं समाचरेत्। पूजयेत्तन्महादेवि पितृलिंगं सुरप्रियम्
evamuktvā sa bhagavāṁstatraivāntaradhīyata| tasmātsarvaprayatnena tatra śrāddhaṁ samācaret| pūjayettanmahādevi pitṛliṅgaṁ surapriyam
यह कहकर वे भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गए। इसलिए हर प्रकार से यत्नपूर्वक वहाँ श्राद्ध करना चाहिए, तथा हे महादेवि, देवताओं के प्रिय उस पितृ-लिंग की पूजा करनी चाहिए।