प्रभास खण्ड · अध्याय 222
रुक्मवतीश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.222.1)
ईश्वर उवाच। तत्रैव संस्थितं लिंगं रुक्मवत्या प्रतिष्ठितम्। सर्वपापोपशमनं सर्वकामफलप्रदम्
īśvara uvāca| tatraiva saṁsthitaṁ liṅgaṁ rukmavatyā pratiṣṭhitam| sarvapāpopaśamanaṁ sarvakāmaphalapradam
ईश्वर ने कहा—वहीं रुक्मवती द्वारा प्रतिष्ठित वह लिंग स्थित है, जो समस्त पापों को शान्त करने वाला और समस्त कामनाओं का फल देने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.7.222.2)
तत्र स्नात्वा महातीर्थे लिंगं संप्लाव्य यत्नतः। विप्रेभ्यो दापयेद्वित्तं मुच्यते सर्वपातकैः
tatra snātvā mahātīrthe liṅgaṁ saṁplāvya yatnataḥ| viprebhyo dāpayedvittaṁ mucyate sarvapātakaiḥ
वहाँ उस महातीर्थ में स्नान करके यत्नपूर्वक लिंग का अभिषेक करे तथा ब्राह्मणों को धन दान कराए; इससे मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।