प्रभास खण्ड · अध्याय 223
पुरुषोत्तमतीर्थप्रेततीर्थमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.223.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि लिंगं त्रैलोक्यपूजितम्। गात्रोत्सर्गमिति ख्यातं तस्य दक्षिणतः स्थितम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi liṅgaṁ trailokyapūjitam| gātrotsargamiti khyātaṁ tasya dakṣiṇataḥ sthitam
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तत्पश्चात् त्रैलोक्य द्वारा पूजित उस लिंग के पास जाना चाहिए, जो गात्रोत्सर्ग नाम से विख्यात है और उससे (ऋणमोचन से) दक्षिण में स्थित है।
श्लोक 2 (skanda.7.223.2)
यत्र गात्रं परित्यक्तं बलभद्रेण धीमता। अन्यैश्चैव महाभागैर्यादवैस्तत्र संयुगे
yatra gātraṁ parityaktaṁ balabhadreṇa dhīmatā| anyaiścaiva mahābhāgairyādavaistatra saṁyuge
जहाँ बुद्धिमान् बलभद्र ने तथा अन्य महाभाग्यशाली यादवों ने वहाँ परस्पर युद्ध में अपने शरीर का त्याग किया था।
श्लोक 3 (skanda.7.223.3)
यत्र ते यादवाः क्षीणा ब्रह्मशापबलाहिना। एतत्पुरुषोत्तमं क्षेत्रं समन्ताद्धनुषां शतम्
yatra te yādavāḥ kṣīṇā brahmaśāpabalāhinā| etatpuruṣottamaṁ kṣetraṁ samantāddhanuṣāṁ śatam
जहाँ वे यादव ब्राह्मण-शाप के बल से नष्ट हुए। यह पुरुषोत्तम क्षेत्र चारों ओर सौ धनुष परिमाण का है।
श्लोक 4 (skanda.7.223.4)
यत्र साक्षात्स्वयं देवि तिष्ठते पुरुषोत्तमः। तदेव वैष्णवं क्षेत्रं कलौ पातकनाशनम्
yatra sākṣātsvayaṁ devi tiṣṭhate puruṣottamaḥ| tadeva vaiṣṇavaṁ kṣetraṁ kalau pātakanāśanam
जहाँ हे देवि, साक्षात् स्वयं पुरुषोत्तम विराजमान हैं। वही वैष्णव क्षेत्र कलियुग में पापनाशक है।
श्लोक 5 (skanda.7.223.5)
रहस्यं परमं देवि तीर्थानां प्रवरं हि तत्। पूर्वं कृतयुगे देवि प्रेततीर्थं च संस्मृतम्
rahasyaṁ paramaṁ devi tīrthānāṁ pravaraṁ hi tat| pūrvaṁ kṛtayuge devi pretatīrthaṁ ca saṁsmṛtam
हे देवि, यह परम रहस्य है, तीर्थों में सबसे श्रेष्ठ है। हे देवि, पूर्वकाल में सतयुग में इसे प्रेततीर्थ के नाम से स्मरण किया जाता था।
श्लोक 6 (skanda.7.223.6)
कलौ युगे तु संप्राप्ते गात्रोत्सर्गमिति त्वभूत्। ऋणमोचनपार्श्वे तु मध्ये तु पापमोचनात्
kalau yuge tu saṁprāpte gātrotsargamiti tvabhūt| ṛṇamocanapārśve tu madhye tu pāpamocanāt
किन्तु कलियुग के आने पर यह गात्रोत्सर्ग नाम से प्रसिद्ध हुआ; यह ऋणमोचन के निकट, पापमोचन के मध्य में स्थित है।
श्लोक 7 (skanda.7.223.7)
एतन्मध्यं समाश्रित्य मृतः पापैर्विमुच्यते। तस्य किं वर्ण्यते देवि यत्रानन्तफलं महत्
etanmadhyaṁ samāśritya mṛtaḥ pāpairvimucyate| tasya kiṁ varṇyate devi yatrānantaphalaṁ mahat
इस मध्य स्थान का आश्रय लेकर मरने वाला पापों से मुक्त हो जाता है। हे देवि, इसका क्या वर्णन किया जाए, जहाँ अनन्त महान् फल प्राप्त होता है?
श्लोक 8 (skanda.7.223.8)
अथमेधसहस्रस्य फलं स्नात्वा ह्यवाप्यते। यत्राश्वत्थं समासाद्य समाधिन्यस्तमानसः
athamedhasahasrasya phalaṁ snātvā hyavāpyate| yatrāśvatthaṁ samāsādya samādhinyastamānasaḥ
वहाँ स्नान करने से सहस्र यज्ञों का फल प्राप्त होता है, जहाँ अश्वत्थ वृक्ष के पास पहुँचकर, समाधि में मन को स्थिर करके,
श्लोक 9 (skanda.7.223.9)
मुमोच दुस्त्यजान्प्राणान्ब्रह्मद्वारेण केशवः। तत्र नारायणं साक्षाद्बलभद्रं च रुक्मिणीम्
mumoca dustyajānprāṇānbrahmadvāreṇa keśavaḥ| tatra nārāyaṇaṁ sākṣādbalabhadraṁ ca rukmiṇīm
केशव ने ब्रह्मरन्ध्र के द्वारा अपने दुस्त्यज प्राणों का त्याग किया। वहाँ साक्षात् नारायण, बलभद्र और रुक्मिणी की,
श्लोक 10 (skanda.7.223.10)
पूजयित्वा विधानेन मुच्यते पातकत्रयात्। तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या यः संतर्पयते पितॄन्
pūjayitvā vidhānena mucyate pātakatrayāt| tatra snātvā naro bhaktyā yaḥ saṁtarpayate pitṝn
—विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य तीनों प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य वहाँ स्नान करके भक्तिपूर्वक पितरों को तर्पण देता है,
श्लोक 11 (skanda.7.223.11)
प्रेतत्वात्पितरो मुक्ता भवन्ति श्राद्धदायिनः। गोघ्नः सुरापो दुर्मेधा ब्रह्महा गुरुतल्पगः
pretatvātpitaro muktā bhavanti śrāddhadāyinaḥ| goghnaḥ surāpo durmedhā brahmahā gurutalpagaḥ
—उसके पितर श्राद्ध देने से प्रेतत्व से मुक्त हो जाते हैं। गोहत्यारा, सुरापायी, दुर्बुद्धि, ब्रह्महत्यारा, गुरुपत्नीगामी—
श्लोक 12 (skanda.7.223.12)
तत्र स्नात्वा नरः सद्यो विपापः संप्रपद्यते। बाल्ये वयसि यत्पापं वार्द्धके यौवनेऽपि वा
tatra snātvā naraḥ sadyo vipāpaḥ saṁprapadyate| bālye vayasi yatpāpaṁ vārddhake yauvane'pi vā
—ऐसा मनुष्य भी वहाँ स्नान करके तत्काल निष्पाप हो जाता है। बाल्यावस्था में, वृद्धावस्था में अथवा यौवन में जो भी पाप,
श्लोक 13 (skanda.7.223.13)
अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि यः करोति नरः प्रिये। तत्र स्नात्वा प्रमुच्येत तीर्थे गात्रप्रमोचने
ajñānājjñānato vāpi yaḥ karoti naraḥ priye| tatra snātvā pramucyeta tīrthe gātrapramocane
—हे प्रिये, चाहे अनजाने में हो या जानते हुए, मनुष्य जो भी पाप करता है, गात्रप्रमोचन तीर्थ में स्नान करके उससे मुक्त हो जाता है।
श्लोक 14 (skanda.7.223.14)
तत्र पिण्डप्रदानेन पितॄणां जायते परा। तृप्तिर्वर्षशतं यावदेतदाह पुरा हरिः
tatra piṇḍapradānena pitṝṇāṁ jāyate parā| tṛptirvarṣaśataṁ yāvadetadāha purā hariḥ
वहाँ पिण्डदान करने से पितरों को सौ वर्षों तक परम तृप्ति प्राप्त होती है—ऐसा पूर्वकाल में हरि ने कहा था।
श्लोक 15 (skanda.7.223.15)
यः पुनश्चान्नदानं तु तत्र कुर्यात्समाहितः। तस्यान्वयेऽपि देवेशि न प्रेतो जायते नरः
yaḥ punaścānnadānaṁ tu tatra kuryātsamāhitaḥ| tasyānvaye'pi deveśi na preto jāyate naraḥ
और जो पुनः वहाँ एकाग्रचित्त होकर अन्नदान करता है, हे देवेशि, उसके वंश में भी कोई मनुष्य प्रेत नहीं होता।
श्लोक 16 (skanda.7.223.16)
श्रीदेव्युवाच। प्रेततीर्थमिति प्रोक्तं पश्चाद्गात्रविमोचनम्। वद मे देवदेवेश प्रेततीर्थस्य कारणम्
śrīdevyuvāca| pretatīrthamiti proktaṁ paścādgātravimocanam| vada me devadeveśa pretatīrthasya kāraṇam
श्री देवी ने कहा—यह पहले प्रेततीर्थ कहलाता था और बाद में गात्रविमोचन। हे देवदेवेश, मुझे प्रेततीर्थ नाम पड़ने का कारण बताइए।
श्लोक 17 (skanda.7.223.17)
ईश्वर उवाच। शृणु देवि प्रवक्ष्यामि प्रेततीर्थस्य कारणम्। यच्छ्रुत्वा मानवो भक्त्या मुक्तः स्यात्सर्वकिल्बिषैः
īśvara uvāca| śṛṇu devi pravakṣyāmi pretatīrthasya kāraṇam| yacchrutvā mānavo bhaktyā muktaḥ syātsarvakilbiṣaiḥ
ईश्वर ने कहा—हे देवि, सुनो, मैं प्रेततीर्थ का कारण बताता हूँ, जिसे भक्तिपूर्वक सुनकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 18 (skanda.7.223.18)
पुराऽऽसीद्गौतमोनाम महर्षिः शंसितव्रतः। भृगुकल्पात्समायातः क्षेत्रे प्राभासिके शुभे
purā''sīdgautamonāma maharṣiḥ śaṁsitavrataḥ| bhṛgukalpātsamāyātaḥ kṣetre prābhāsike śubhe
पूर्वकाल में गौतम नामक एक शंसितव्रत महर्षि थे, जो भृगुकल्प (भृगुकच्छ) से शुभ प्रभास क्षेत्र में आए थे।
श्लोक 19 (skanda.7.223.19)
अयने चोत्तरे पुण्ये श्रीसोमेशदिदृक्षया। दृष्ट्वा सोमेश्वरं देवं स्नात्वा तीर्थेषु कृत्स्नशः
ayane cottare puṇye śrīsomeśadidṛkṣayā| dṛṣṭvā someśvaraṁ devaṁ snātvā tīrtheṣu kṛtsnaśaḥ
पुण्यकारी उत्तरायण में श्री सोमेश्वर के दर्शन की इच्छा से, सोमेश्वर देव का दर्शन करके तथा समस्त तीर्थों में स्नान करके,
श्लोक 20 (skanda.7.223.20)
स गच्छंस्तीर्थयात्रायां गात्रोत्सर्गं ततो गतः। अथासौ ब्राह्मणो देवि यावत्सीमामुपागतः
sa gacchaṁstīrthayātrāyāṁ gātrotsargaṁ tato gataḥ| athāsau brāhmaṇo devi yāvatsīmāmupāgataḥ
—वे तीर्थयात्रा करते हुए तत्पश्चात् गात्रोत्सर्ग गए। हे देवि, ज्यों ही वह ब्राह्मण उसकी सीमा के निकट पहुँचा,
श्लोक 21 (skanda.7.223.21)
तावद्विष्णुप्रियं तत्र ददृशे वैष्णवं वनम्। पुरुषोत्तमनामाढ्यं क्षेत्रं च धनुषां शतम्
tāvadviṣṇupriyaṁ tatra dadṛśe vaiṣṇavaṁ vanam| puruṣottamanāmāḍhyaṁ kṣetraṁ ca dhanuṣāṁ śatam
—त्यों ही उसने वहाँ विष्णु को प्रिय वैष्णव वन तथा पुरुषोत्तम नाम से समृद्ध सौ धनुष परिमाण के क्षेत्र को देखा।
श्लोक 22 (skanda.7.223.22)
तस्मिन्क्षेत्रे स चापश्यत्पंच प्रेतान्सुदारुणान्। महावृक्षसमारूढान्महाकायान्महोत्कटान्
tasminkṣetre sa cāpaśyatpaṁca pretānsudāruṇān| mahāvṛkṣasamārūḍhānmahākāyānmahotkaṭān
उस क्षेत्र में उसने पाँच अत्यन्त भयंकर प्रेतों को देखा, जो एक विशाल वृक्ष पर चढ़े हुए थे, विराट शरीर वाले तथा अत्यन्त उग्र थे,
श्लोक 23 (skanda.7.223.23)
ऊर्ध्वकेशाञ्छंकुकर्णान्स्नायुनद्धकलेवरान्। विमांसरुधिरान्नग्नानथ कृष्णकलेवरान्
ūrdhvakeśāñchaṁkukarṇānsnāyunaddhakalevarān| vimāṁsarudhirānnagnānatha kṛṣṇakalevarān
जिनके बाल खड़े थे, जिनके कान कीलों जैसे थे, जिनके शरीर स्नायुओं से बँधे थे, जो मांस-रहित और रक्तहीन थे, नग्न तथा काले शरीर वाले थे।
श्लोक 24 (skanda.7.223.24)
दृष्ट्वाऽसौ भयसंत्रस्तो विनष्टोऽस्मीत्यचिन्तयत्। ध्यात्वाऽऽह सुचिरं कालं धैर्यमास्थाय यत्नतः
dṛṣṭvā'sau bhayasaṁtrasto vinaṣṭo'smītyacintayat| dhyātvā''ha suciraṁ kālaṁ dhairyamāsthāya yatnataḥ
उन्हें देखकर भयभीत होकर उसने सोचा—'मैं नष्ट हो गया।' दीर्घकाल तक विचार करके, यत्नपूर्वक धैर्य धारण करके उसने कहा—
श्लोक 25 (skanda.7.223.25)
के यूयं विकृताकारा दृष्टाः पूर्वं मया पुरा। न कदाचिद्यथा यूयं किमर्थं क्षेत्रमध्यतः
ke yūyaṁ vikṛtākārā dṛṣṭāḥ pūrvaṁ mayā purā| na kadācidyathā yūyaṁ kimarthaṁ kṣetramadhyataḥ
'तुम कौन हो, जो इस विकृत रूप में दिखाई दे रहे हो, जिन्हें मैंने पहले कभी नहीं देखा? क्षेत्र के मध्य में किस कारण तुम,'
श्लोक 26 (skanda.7.223.26)
धावमानाः सुदुःखार्ता एतन्मे कौतुकं महत्
dhāvamānāḥ suduḥkhārtā etanme kautukaṁ mahat
'—अत्यन्त दुःख से पीड़ित होकर दौड़ रहे हो? मुझे इसका बड़ा कौतूहल है।'
श्लोक 27 (skanda.7.223.27)
प्रेता ऊचुः। वयं प्रेता महाभाग दूरादिह समागताः। श्रुत्वा तीर्थवरं पुण्यं प्रवेशं न लभामहे
pretā ūcuḥ| vayaṁ pretā mahābhāga dūrādiha samāgatāḥ| śrutvā tīrthavaraṁ puṇyaṁ praveśaṁ na labhāmahe
प्रेतों ने कहा—'हे महाभाग, हम प्रेत हैं, जो इस श्रेष्ठ और पुण्यकारी तीर्थ का समाचार सुनकर दूर से यहाँ आए हैं; किन्तु हमें इसमें प्रवेश नहीं मिलता।'
श्लोक 28 (skanda.7.223.28)
गणैरंतर्धानगतैः प्रहारैर्जर्जरीकृताः। लेखको रोहकश्चैव सूचकः शीघ्रगस्तथा
gaṇairaṁtardhānagataiḥ prahārairjarjarīkṛtāḥ| lekhako rohakaścaiva sūcakaḥ śīghragastathā
'—अदृश्य गणों के प्रहारों से जर्जरित होकर हम हैं—लेखक, रोहक, सूचक तथा शीघ्रग,'
श्लोक 29 (skanda.7.223.29)
अहं पर्युषितोनाम पञ्चमः पापकृत्तमः
ahaṁ paryuṣitonāma pañcamaḥ pāpakṛttamaḥ
'—और मैं पाँचवाँ हूँ, पर्युषित नाम वाला, सबसे अधिक पापकर्मी।'
श्लोक 30 (skanda.7.223.30)
गौतम उवाच। प्रेतयोनौ प्रवृत्तानां केन नामानि कृत्स्नशः। युष्माकं निर्मितान्येवमेतन्मे कौतुकं महत्
gautama uvāca| pretayonau pravṛttānāṁ kena nāmāni kṛtsnaśaḥ| yuṣmākaṁ nirmitānyevametanme kautukaṁ mahat
गौतम ने कहा—'प्रेतयोनि को प्राप्त हुए तुम लोगों के ये सब नाम किसके द्वारा इस प्रकार बनाए गए? मुझे इसका बड़ा कौतूहल है।'
श्लोक 31 (skanda.7.223.31)
प्रेता ऊचुः। याचमानस्य विप्रस्य लिखत्येष धरातले। नोत्तरं पठते किञ्चित्तेनासौ लेखकः स्मृतः
pretā ūcuḥ| yācamānasya viprasya likhatyeṣa dharātale| nottaraṁ paṭhate kiñcittenāsau lekhakaḥ smṛtaḥ
प्रेतों ने कहा—'याचना करने वाले ब्राह्मण के समक्ष यह पृथ्वी पर लिख देता था, किन्तु कोई उत्तर मुख से नहीं बोलता था—इसलिए यह लेखक कहलाया।'
श्लोक 32 (skanda.7.223.32)
द्वितीयो ब्राह्मणभयात्प्रासादमधिरोहति। ततोऽसौ रोहकाख्योऽभूच्छृणु विप्र तृतीयकम्
dvitīyo brāhmaṇabhayātprāsādamadhirohati| tato'sau rohakākhyo'bhūcchṛṇu vipra tṛtīyakam
'दूसरा ब्राह्मण के भय से महल की छत पर चढ़ जाता था; इसलिए यह रोहक नाम से प्रसिद्ध हुआ। हे विप्र, अब तीसरे के विषय में सुनो।'
श्लोक 33 (skanda.7.223.33)
सूचिता बहवोऽनेन ब्राह्मणा वित्तसंयुताः। राज्ञे पापेन तेनासौ सूचको भुवि विश्रुतः
sūcitā bahavo'nena brāhmaṇā vittasaṁyutāḥ| rājñe pāpena tenāsau sūcako bhuvi viśrutaḥ
'इस पापी ने धनवान् ब्राह्मणों की राजा से बहुत बार चुगली की थी; इसलिए यह पृथ्वी पर सूचक नाम से विख्यात हुआ।'
श्लोक 34 (skanda.7.223.34)
ब्राह्मणैः प्रार्थ्यमानस्तु शीघ्रं धावति नित्यशः। न कदाचिद्ददाति स्म तेनासौ शीघ्रगः स्मृतः
brāhmaṇaiḥ prārthyamānastu śīghraṁ dhāvati nityaśaḥ| na kadāciddadāti sma tenāsau śīghragaḥ smṛtaḥ
'ब्राह्मणों द्वारा याचना किए जाने पर यह सदा शीघ्रता से भाग जाता था और कभी कुछ नहीं देता था; इसलिए यह शीघ्रग कहलाया।'
श्लोक 35 (skanda.7.223.35)
मया कदन्नं दत्तं च पर्युषितं ब्राह्मणोत्तमे। ब्राह्मणेभ्यः सदा दानं मिष्टान्नेन तु पोषणम्
mayā kadannaṁ dattaṁ ca paryuṣitaṁ brāhmaṇottame| brāhmaṇebhyaḥ sadā dānaṁ miṣṭānnena tu poṣaṇam
'मैंने श्रेष्ठ ब्राह्मण को भी घटिया और बासी अन्न दिया, जबकि यह कहता रहा कि ब्राह्मणों को सदा मिष्टान्न से दान-पोषण दिया जाता है—'
श्लोक 36 (skanda.7.223.36)
तस्मात्पर्युषितोनाम संजातोऽहं धरातले
tasmātparyuṣitonāma saṁjāto'haṁ dharātale
'—इसलिए मैं पृथ्वी पर पर्युषित नाम से प्रसिद्ध हुआ।'
श्लोक 37 (skanda.7.223.37)
गौतम उवाच। न विना भोजनेनैव वर्तन्ते प्राणिनो भुवि। किमाहारा भवन्तो वै वदध्वं मम कौतुकात्
gautama uvāca| na vinā bhojanenaiva vartante prāṇino bhuvi| kimāhārā bhavanto vai vadadhvaṁ mama kautukāt
गौतम ने कहा—'पृथ्वी पर प्राणी भोजन के बिना नहीं रहते। तो आप लोग किस आहार पर जीवित रहते हैं? मेरे कौतूहलवश मुझे बताइए।'
श्लोक 38 (skanda.7.223.38)
प्रेता ऊचुः। प्राप्ते भोजनकाले तु यत्र युद्धं प्रवर्तते। तस्यान्नस्य रसं सर्वं भुंजामो द्विजसत्तम
pretā ūcuḥ| prāpte bhojanakāle tu yatra yuddhaṁ pravartate| tasyānnasya rasaṁ sarvaṁ bhuṁjāmo dvijasattama
प्रेतों ने कहा—'हे द्विजसत्तम, जब भोजन के समय कहीं झगड़ा होता है, तो हम उस अन्न के सम्पूर्ण रस को खाते हैं।'
श्लोक 39 (skanda.7.223.39)
नानुलिप्ते धरापृष्ठे यत्र भुंजन्ति मानवाः। भ्रष्टशौचा द्विजश्रेष्ठ तदस्माकं तु भोजनम्
nānulipte dharāpṛṣṭhe yatra bhuṁjanti mānavāḥ| bhraṣṭaśaucā dvijaśreṣṭha tadasmākaṁ tu bhojanam
'हे द्विजश्रेष्ठ, जहाँ मनुष्य बिना लीपी हुई अशुद्ध भूमि पर भोजन करते हैं, वही हमारा भोजन है।'
श्लोक 40 (skanda.7.223.40)
अप्रक्षालितपादस्तु यो भुंक्ते दक्षिणामुखः। यो वेष्टितशिरा भुंक्ते प्रेता भुंजन्ति नित्यशः
aprakṣālitapādastu yo bhuṁkte dakṣiṇāmukhaḥ| yo veṣṭitaśirā bhuṁkte pretā bhuṁjanti nityaśaḥ
'जो बिना पैर धोए दक्षिणमुख होकर भोजन करता है, अथवा सिर लपेटकर भोजन करता है, प्रेत सदा उस भोजन को खाते हैं।'
श्लोक 41 (skanda.7.223.41)
श्राद्धं संपश्यते श्वा चेन्नारी चैव रजस्वला। अन्त्यजः शूकरश्चान्नं तदस्माकं तु भोजनम्
śrāddhaṁ saṁpaśyate śvā cennārī caiva rajasvalā| antyajaḥ śūkaraścānnaṁ tadasmākaṁ tu bhojanam
'यदि श्राद्ध को कुत्ता देख ले, या रजस्वला स्त्री, या अन्त्यज, या सूअर देख ले, तो वह अन्न हमारा ही भोजन बन जाता है।'
श्लोक 42 (skanda.7.223.42)
त्यक्त्वा क्रमागतं विप्रं पूजितं प्रपितामहैः। यो दानं ददतेऽन्यस्मै तस्मै चाऽतुष्टचेतसा
tyaktvā kramāgataṁ vipraṁ pūjitaṁ prapitāmahaiḥ| yo dānaṁ dadate'nyasmai tasmai cā'tuṣṭacetasā
'जो व्यक्ति पूर्वजों द्वारा पूजित तथा परम्परागत कुलपुरोहित ब्राह्मण को छोड़कर असंतुष्ट मन से किसी अन्य को दान देता है—'
श्लोक 43 (skanda.7.223.43)
तस्य दानस्य यत्पुण्यं तदस्माकं प्रजायते। यस्मिन्गृहे सदोच्छिष्टं सदा च कलहो भवेत्
tasya dānasya yatpuṇyaṁ tadasmākaṁ prajāyate| yasmingṛhe sadocchiṣṭaṁ sadā ca kalaho bhavet
'—उस दान का जो पुण्य होता है, वह हमें प्राप्त हो जाता है। जिस घर में सदा जूठन पड़ी रहती है और सदा कलह होता रहता है—'
श्लोक 44 (skanda.7.223.44)
वैश्वदेवविहीने तु तत्र भुंजामहे वयम्
vaiśvadevavihīne tu tatra bhuṁjāmahe vayam
'—तथा जो वैश्वदेव यज्ञ से रहित होता है, वहाँ हम भोजन करते हैं।'
श्लोक 45 (skanda.7.223.45)
गौतम उवाच। युष्माकं कीदृशे गेहे प्रवेशो न च विद्यते। सत्यं वदत माऽसत्यं सत्यं साधुषु संगतम्
gautama uvāca| yuṣmākaṁ kīdṛśe gehe praveśo na ca vidyate| satyaṁ vadata mā'satyaṁ satyaṁ sādhuṣu saṁgatam
गौतम ने कहा—'किस प्रकार के घर में तुम्हारा प्रवेश नहीं होता? सत्य कहो, असत्य मत कहो; सत्य ही सज्जनों को शोभा देता है।'
श्लोक 46 (skanda.7.223.46)
प्रेता ऊचुः। वैश्वदेवोद्भवा यत्र धूमवर्तिः प्रदृश्यते। तस्मिन्गेहे न चास्माकं प्रवेशो विद्यते द्विज
pretā ūcuḥ| vaiśvadevodbhavā yatra dhūmavartiḥ pradṛśyate| tasmingehe na cāsmākaṁ praveśo vidyate dvija
प्रेतों ने कहा—'हे द्विज, जिस घर में वैश्वदेव से उत्पन्न धूम्र की रेखा दिखाई देती है, उस घर में हमारा प्रवेश नहीं होता।'
श्लोक 47 (skanda.7.223.47)
यस्मिन्गृहे प्रभाते तु क्रियते चोपलेपनम्। विद्यते वेद निर्घोषस्तत्रास्माकं न किंचन
yasmingṛhe prabhāte tu kriyate copalepanam| vidyate veda nirghoṣastatrāsmākaṁ na kiṁcana
'जिस घर में प्रातःकाल भूमि का उपलेपन किया जाता है और जहाँ वेदध्वनि होती है, वहाँ हमारा कुछ भी अधिकार नहीं है।'
श्लोक 48 (skanda.7.223.48)
गौतम उवाच। केन कर्मविपाकेन प्रेतत्वं व्रजते नरः। एतन्मे विस्तरेणैव यथावद्वक्तु मर्हथ
gautama uvāca| kena karmavipākena pretatvaṁ vrajate naraḥ| etanme vistareṇaiva yathāvadvaktu marhatha
गौतम ने कहा—'किस कर्म के फलस्वरूप मनुष्य प्रेतत्व को प्राप्त होता है? आप लोग मुझे यह विस्तारपूर्वक यथावत् बताएँ।'
श्लोक 49 (skanda.7.223.49)
प्रेता ऊचुः। मृषाऽपहारिणो ये च ये चोच्छिष्टा व्रजन्ति च। गोब्राह्मणहताश्चैव प्रेतत्वं ते व्रजन्ति हि
pretā ūcuḥ| mṛṣā'pahāriṇo ye ca ye cocchiṣṭā vrajanti ca| gobrāhmaṇahatāścaiva pretatvaṁ te vrajanti hi
प्रेतों ने कहा—'जो झूठ बोलकर चोरी करते हैं, जो जूठे रहकर विचरण करते हैं, तथा जो गौ और ब्राह्मण की हत्या करते हैं, वे प्रेतत्व को प्राप्त होते हैं।'
श्लोक 50 (skanda.7.223.50)
पैशुन्यनिरता ये च कूटसाक्ष्यरता नराः। न्यायपक्षे न वर्तंते मृताः प्रेता भवंति ते
paiśunyaniratā ye ca kūṭasākṣyaratā narāḥ| nyāyapakṣe na vartaṁte mṛtāḥ pretā bhavaṁti te
'जो लोग चुगलखोरी में रत हैं तथा झूठी गवाही में रत हैं, जो न्याय के पक्ष में नहीं रहते, वे मरने पर प्रेत बनते हैं।'
श्लोक 51 (skanda.7.223.51)
श्लेष्ममूत्रपुरीषाणि ये क्षिपन्ति सरोवरे। प्रेतत्वं ते समासाद्य विचरंति च मानवाः
śleṣmamūtrapurīṣāṇi ye kṣipanti sarovare| pretatvaṁ te samāsādya vicaraṁti ca mānavāḥ
'जो मनुष्य कफ, मूत्र और मल सरोवर में फेंकते हैं, वे प्रेतत्व को प्राप्त होकर भटकते रहते हैं।'
श्लोक 52 (skanda.7.223.52)
दीयमानं तु विप्राणां गोषु विप्रातुरेषु च। मा देहीति प्रजल्पन्तस्ते च प्रेता भवंति च
dīyamānaṁ tu viprāṇāṁ goṣu viprātureṣu ca| mā dehīti prajalpantaste ca pretā bhavaṁti ca
'तथा जो ब्राह्मणों को, गौओं को अथवा पीड़ित ब्राह्मणों को दिए जाते हुए दान के समय "मत दो" ऐसा बोलते हैं, वे भी प्रेत बनते हैं।'
श्लोक 53 (skanda.7.223.53)
शूद्रान्नेनोदरस्थेन यदि विप्रो म्रियेत वै। प्रेतत्वं यात्यसौ नूनं यद्यपि स्यात्षडंगवित्
śūdrānnenodarasthena yadi vipro mriyeta vai| pretatvaṁ yātyasau nūnaṁ yadyapi syātṣaḍaṁgavit
'यदि किसी ब्राह्मण के पेट में शूद्र का अन्न रहते हुए ही उसकी मृत्यु हो जाए, तो वह निश्चय ही प्रेतत्व को प्राप्त होता है, चाहे वह षडंगवेत्ता ही क्यों न हो।'
श्लोक 54 (skanda.7.223.54)
यस्त्रीन्हले बलीवर्दान्वाहयेन्मदसंयुतः। अमावास्यां विशेषेण स प्रेतो जायते नरः
yastrīnhale balīvardānvāhayenmadasaṁyutaḥ| amāvāsyāṁ viśeṣeṇa sa preto jāyate naraḥ
'जो मदयुक्त होकर हल में तीन बैल जोतता है, विशेषतः अमावस्या को, वह मनुष्य प्रेत होता है।'
श्लोक 55 (skanda.7.223.55)
नास्तिको निंदकः क्षुद्रो नित्यनैमित्त्यवर्जितः। ब्राह्मणान्द्वेष्टि यो नूनं स प्रेतो जायते नरः
nāstiko niṁdakaḥ kṣudro nityanaimittyavarjitaḥ| brāhmaṇāndveṣṭi yo nūnaṁ sa preto jāyate naraḥ
'नास्तिक, निन्दक, क्षुद्र, नित्य-नैमित्तिक कर्मों से रहित, तथा जो निश्चय ही ब्राह्मणों से द्वेष रखता है, वह मनुष्य प्रेत होता है।'
श्लोक 56 (skanda.7.223.56)
विश्वासघातको यस्तु ब्रह्महा स्त्रीवधे रतः। गोघ्नो गुरुघ्रः पितृहा स प्रेतो जायते नरः
viśvāsaghātako yastu brahmahā strīvadhe rataḥ| goghno gurughraḥ pitṛhā sa preto jāyate naraḥ
'जो विश्वासघाती है, ब्रह्महत्यारा है, स्त्री-वध में रत है, गोहत्यारा, गुरुहत्यारा अथवा पितृहत्यारा है, वह मनुष्य प्रेत होता है।'
श्लोक 57 (skanda.7.223.57)
यस्य नैव प्रदत्तानि एकोद्दिष्टानि षोडश। मृतस्य न वृषोत्सर्गः स प्रेतो जायते नरः
yasya naiva pradattāni ekoddiṣṭāni ṣoḍaśa| mṛtasya na vṛṣotsargaḥ sa preto jāyate naraḥ
'जिसके लिए सोलह एकोद्दिष्ट श्राद्ध नहीं किए जाते तथा मृत्यु के पश्चात् वृषोत्सर्ग नहीं किया जाता, वह मनुष्य प्रेत होता है।'
श्लोक 58 (skanda.7.223.58)
एतद्धि सर्वमाख्यातं यत्पृष्टाः स्म द्विजोत्तम। भूयो ब्रूहि द्विजश्रेष्ठ यश्चास्ति तव संशयः
etaddhi sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭāḥ sma dvijottama| bhūyo brūhi dvijaśreṣṭha yaścāsti tava saṁśayaḥ
'हे द्विजोत्तम, जो कुछ आपने पूछा, वह सब हमने कह दिया। हे द्विजश्रेष्ठ, आपके मन में जो भी सन्देह हो, वह पुनः पूछिए।'
श्लोक 59 (skanda.7.223.59)
गौतम उवाच। येन कर्मविपाकेनन प्रेतो जायते नरः। तन्मे वदत निःशेषं कौतुकं मेऽत्र विद्यते
gautama uvāca| yena karmavipākenana preto jāyate naraḥ| tanme vadata niḥśeṣaṁ kautukaṁ me'tra vidyate
गौतम ने कहा—'किस कर्म के परिपाक से मनुष्य प्रेत नहीं होता? यह मुझे सम्पूर्ण रूप से बताइए; मुझे इसमें कौतूहल है।'
श्लोक 60 (skanda.7.223.60)
प्रेता ऊचुः। तीर्थयात्रा रतो यस्तु देवार्चनपरायणः। ब्राह्मणेषु सदा भक्तो न प्रेतो जायते नरः
pretā ūcuḥ| tīrthayātrā rato yastu devārcanaparāyaṇaḥ| brāhmaṇeṣu sadā bhakto na preto jāyate naraḥ
प्रेतों ने कहा—'जो तीर्थयात्रा में रत है, देवपूजा में तत्पर है, तथा सदा ब्राह्मणों का भक्त है, वह मनुष्य प्रेत नहीं होता।'
श्लोक 61 (skanda.7.223.61)
नित्यं शृणोति शास्त्राणि नित्यं सेवति पंडितान्। वृद्धांस्तु पृच्छते नित्यं न स प्रेतो विजायते
nityaṁ śṛṇoti śāstrāṇi nityaṁ sevati paṁḍitān| vṛddhāṁstu pṛcchate nityaṁ na sa preto vijāyate
'जो नित्य शास्त्रों को सुनता है, नित्य पण्डितों की सेवा करता है, तथा नित्य वृद्धों से परामर्श लेता है, वह प्रेत नहीं बनता।'
श्लोक 62 (skanda.7.223.62)
एतस्मात्कारणात्प्राप्ता वयं सर्वे सुदूरतः। शक्नुमो प्रवेष्टुं च पुण्येऽस्मिन्क्षेत्र उत्तमे
etasmātkāraṇātprāptā vayaṁ sarve sudūrataḥ| śaknumo praveṣṭuṁ ca puṇye'sminkṣetra uttame
'इसी कारण से हम सब बहुत दूर से आए हुए हैं, फिर भी इस पुण्यमय उत्तम क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं।'
श्लोक 63 (skanda.7.223.63)
निर्विण्णाः प्रेतरूपेण तस्मात्त्वं द्विजसत्तम। गतिर्भव महाभाग सर्वेषां नः प्रयत्नतः
nirviṇṇāḥ pretarūpeṇa tasmāttvaṁ dvijasattama| gatirbhava mahābhāga sarveṣāṁ naḥ prayatnataḥ
'प्रेत रूप से खिन्न होकर हम आए हैं—अतः हे द्विजसत्तम, हे महाभाग, यत्नपूर्वक हम सबकी गति (मुक्ति का साधन) बनिए।'
श्लोक 64 (skanda.7.223.64)
गौतम उवाच। कथं वो जायते मोक्षो वदध्वं कृत्स्नशो मम। कृपयाविष्टचित्तोऽहं यतिष्ये नात्र संशयः
gautama uvāca| kathaṁ vo jāyate mokṣo vadadhvaṁ kṛtsnaśo mama| kṛpayāviṣṭacitto'haṁ yatiṣye nātra saṁśayaḥ
गौतम ने कहा—'तुम्हारा मोक्ष कैसे हो, यह मुझे सम्पूर्ण रूप से बताओ। मेरा चित्त करुणा से भर गया है; मैं अवश्य प्रयत्न करूँगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।'
श्लोक 65 (skanda.7.223.65)
प्रेता ऊचुः। प्रभूतकालमस्माकं प्रेतत्वे तिष्ठतां विभो। न त्वभ्येति पुमान्कश्चिदस्माकं यो गतिर्भवेत्
pretā ūcuḥ| prabhūtakālamasmākaṁ pretatve tiṣṭhatāṁ vibho| na tvabhyeti pumānkaścidasmākaṁ yo gatirbhavet
प्रेतों ने कहा—'हे विभो, हमें प्रेतत्व में रहते हुए बहुत काल हो गया है; हमारे निकट ऐसा कोई पुरुष नहीं आता जो हमारी गति बन सके।'
श्लोक 66 (skanda.7.223.66)
तस्मात्त्वं देहि नः श्राद्धं गत्वा क्षेत्रं तु वैष्णवम्। नामगोत्राणि चादाय मोक्षं यास्यामहे ततः
tasmāttvaṁ dehi naḥ śrāddhaṁ gatvā kṣetraṁ tu vaiṣṇavam| nāmagotrāṇi cādāya mokṣaṁ yāsyāmahe tataḥ
'अतः आप वैष्णव क्षेत्र में जाकर हमारे लिए श्राद्ध कीजिए; हमारे नाम-गोत्र लेकर आप ऐसा करें, तो हम उससे मोक्ष को प्राप्त होंगे।'
श्लोक 67 (skanda.7.223.67)
ईश्वर उवाच। ततोऽसौ ब्राह्मणो गत्वा दयाविष्टो हरेर्गृहम्। श्राद्धं च प्रददौ तेषामेकैकस्य पृथक्पृथक्
īśvara uvāca| tato'sau brāhmaṇo gatvā dayāviṣṭo harergṛham| śrāddhaṁ ca pradadau teṣāmekaikasya pṛthakpṛthak
ईश्वर ने कहा—तब वह ब्राह्मण करुणा से भरकर हरि के मन्दिर में गया और उन सबके लिए एक-एक करके पृथक्-पृथक् श्राद्ध किया।
श्लोक 68 (skanda.7.223.68)
यस्ययस्य यदा श्राद्धं करोति द्विजसत्तमः। स रात्रौ स्वप्न एत्यैनं दर्शने वाक्यमब्रवीत्
yasyayasya yadā śrāddhaṁ karoti dvijasattamaḥ| sa rātrau svapna etyainaṁ darśane vākyamabravīt
जिस-जिस प्रेत का जब वह श्रेष्ठ ब्राह्मण श्राद्ध करता, वह रात्रि में स्वप्न में आकर दर्शन देकर यह वचन कहता—
श्लोक 69 (skanda.7.223.69)
प्रसादात्तव विप्रेन्द्र मुक्तोऽहं प्रेतयोनितः। स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि विमानं मे ह्युपस्थितम्
prasādāttava viprendra mukto'haṁ pretayonitaḥ| svasti te'stu gamiṣyāmi vimānaṁ me hyupasthitam
'हे विप्रेन्द्र, आपकी कृपा से मैं प्रेतयोनि से मुक्त हो गया हूँ। आपका कल्याण हो; अब मैं जाता हूँ—मेरा विमान उपस्थित है।'
श्लोक 70 (skanda.7.223.70)
एवं संतारितास्तेन चत्वारस्ते द्विजोत्तमाः। अथासौ ब्राह्मणश्रेष्ठः संप्राप्ते पञ्चमे दिने
evaṁ saṁtāritāstena catvāraste dvijottamāḥ| athāsau brāhmaṇaśreṣṭhaḥ saṁprāpte pañcame dine
इस प्रकार उसके द्वारा वे चारों प्रेत पार हो गए। तब पाँचवें दिन आने पर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने,
श्लोक 71 (skanda.7.223.71)
प्रददौ विधिपूर्वं तु श्राद्धं पर्युषितस्य च। अथापश्यत स्वप्नान्ते प्राप्तं पर्युषितं नरम्
pradadau vidhipūrvaṁ tu śrāddhaṁ paryuṣitasya ca| athāpaśyata svapnānte prāptaṁ paryuṣitaṁ naram
—पर्युषित के लिए भी विधिपूर्वक श्राद्ध किया। तब स्वप्न के अन्त में उसने पर्युषित को मनुष्य रूप में आया हुआ देखा,
श्लोक 72 (skanda.7.223.72)
दीनवाक्यं परिक्लिष्टं निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः
dīnavākyaṁ parikliṣṭaṁ niḥśvasantaṁ muhurmuhuḥ
—जो दीन वचन बोल रहा था, अत्यन्त क्लेश में था, तथा बार-बार दीर्घ श्वास ले रहा था।
श्लोक 73 (skanda.7.223.73)
पर्युषित उवाच। न मे जाता गतिर्विप्र मंदभाग्यस्य पापिनः। मया हृतं तडागार्थं यद्वित्तं प्रगुणीकृतम्
paryuṣita uvāca| na me jātā gatirvipra maṁdabhāgyasya pāpinaḥ| mayā hṛtaṁ taḍāgārthaṁ yadvittaṁ praguṇīkṛtam
पर्युषित ने कहा—'हे विप्र, मुझ मन्दभाग्य पापी को मुक्ति नहीं मिली। तालाब बनवाने के लिए जो धन एकत्र किया गया था, वह मैंने चुरा लिया था,'
श्लोक 74 (skanda.7.223.74)
गौतम उवाच। कथं ते जायते मोक्षो वद शीघ्रमशेषतः। करिष्ये नात्र संदेहो यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्
gautama uvāca| kathaṁ te jāyate mokṣo vada śīghramaśeṣataḥ| kariṣye nātra saṁdeho yadyapi syātsudurlabham
गौतम ने कहा—'तुम्हारी मुक्ति कैसे हो? शीघ्र और सम्पूर्ण रूप से बताओ। मैं अवश्य करूँगा, इसमें सन्देह नहीं, चाहे वह अत्यन्त दुर्लभ ही क्यों न हो।'
श्लोक 75 (skanda.7.223.75)
पर्युषित उवाच। अयने चोत्तरे प्राप्ते गत्वा तीर्थं हरिप्रियम्। श्राद्धं त्वं देहि मे नूनं ततो गतिर्भविष्यति
paryuṣita uvāca| ayane cottare prāpte gatvā tīrthaṁ haripriyam| śrāddhaṁ tvaṁ dehi me nūnaṁ tato gatirbhaviṣyati
पर्युषित ने कहा—'उत्तरायण के आने पर हरिप्रिय तीर्थ में जाकर निश्चय ही मेरे लिए श्राद्ध कीजिए; तभी मेरी गति होगी।'
श्लोक 76 (skanda.7.223.76)
ईश्वर उवाच। एवमुक्तः स विप्रेन्द्रस्तेन प्रेतेन वै मुनिः। अयने चोत्तरे प्राप्ते गत्वा तीर्थं हरिप्रियम्
īśvara uvāca| evamuktaḥ sa viprendrastena pretena vai muniḥ| ayane cottare prāpte gatvā tīrthaṁ haripriyam
ईश्वर ने कहा—उस प्रेत द्वारा ऐसा कहे जाने पर वे मुनिश्रेष्ठ ब्राह्मण उत्तरायण के आने पर हरिप्रिय तीर्थ में जाकर,
श्लोक 77 (skanda.7.223.77)
प्रददौ विधिवच्छ्राद्धं ततः पर्युषिताय च। ततः पर्युषितो रात्रौ स्वप्नान्ते वाक्यमब्रवीत्
pradadau vidhivacchrāddhaṁ tataḥ paryuṣitāya ca| tataḥ paryuṣito rātrau svapnānte vākyamabravīt
—पर्युषित के लिए विधिपूर्वक श्राद्ध किया। तब पर्युषित ने रात्रि में स्वप्न के अन्त में यह वचन कहा,
श्लोक 78 (skanda.7.223.78)
प्रसन्नवदनो भूत्वा दिव्यमाल्यवपुर्धरः
prasannavadano bhūtvā divyamālyavapurdharaḥ
प्रसन्न मुख होकर तथा शरीर पर दिव्य माला धारण किए हुए।
श्लोक 79 (skanda.7.223.79)
पर्युषित उवाच। मुक्तोऽहं त्वत्प्रसादेन प्रेतभावाद्द्विजोत्तम। स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि विमानं मे ह्युपस्थितम्
paryuṣita uvāca| mukto'haṁ tvatprasādena pretabhāvāddvijottama| svasti te'stu gamiṣyāmi vimānaṁ me hyupasthitam
पर्युषित ने कहा—'हे द्विजोत्तम, आपकी कृपा से मैं प्रेतभाव से मुक्त हो गया हूँ। आपका कल्याण हो; अब मैं जाता हूँ—मेरा विमान उपस्थित है।'
श्लोक 80 (skanda.7.223.80)
देवत्वं च मया प्राप्तं समर्थोऽहं द्विजोत्तम। वरं ददामि ते विप्र गृहाण त्वं वरं शुभम्
devatvaṁ ca mayā prāptaṁ samartho'haṁ dvijottama| varaṁ dadāmi te vipra gṛhāṇa tvaṁ varaṁ śubham
'और मैंने देवत्व प्राप्त कर लिया है; हे द्विजोत्तम, मैं अब समर्थ हूँ। हे विप्र, मैं तुम्हें वर देता हूँ, तुम शुभ वर ग्रहण करो।'
श्लोक 81 (skanda.7.223.81)
ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते तथा। निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः
brahmaghne ca surāpe ca caure bhagnavrate tathā| niṣkṛtirvihitā sadbhiḥ kṛtaghne nāsti niṣkṛtiḥ
'ब्रह्महत्यारे के लिए, सुरापायी के लिए, चोर के लिए तथा व्रतभंजक के लिए भी सज्जनों ने प्रायश्चित्त बताया है; किन्तु कृतघ्न के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है।'
श्लोक 82 (skanda.7.223.82)
गौतम उवाच। यदि देयो वरोऽस्माकं समर्थोऽसि वरप्रद। यत्र स्थाने मया दृष्टाः प्रेता यूयं सुदुःखिताः
gautama uvāca| yadi deyo varo'smākaṁ samartho'si varaprada| yatra sthāne mayā dṛṣṭāḥ pretā yūyaṁ suduḥkhitāḥ
गौतम ने कहा—'हे वरप्रद, यदि आप मुझे वर देने में समर्थ हैं, तो जिस स्थान पर मैंने आप लोगों को अत्यन्त दुःखी प्रेत रूप में देखा था—'
श्लोक 83 (skanda.7.223.83)
तत्राहं चाश्रमं कृत्वा करिष्ये चोत्तमं तपः। निर्गतास्मि गृहं भूयो स्नात्वा तीर्थमिदं महत्
tatrāhaṁ cāśramaṁ kṛtvā kariṣye cottamaṁ tapaḥ| nirgatāsmi gṛhaṁ bhūyo snātvā tīrthamidaṁ mahat
'—वहीं मैं आश्रम बनाकर उत्तम तप करूँगा; मैं घर से निकल आया हूँ, इस महान् तीर्थ में पुनः स्नान करके।'
श्लोक 84 (skanda.7.223.84)
तत्र यो भानवो भक्त्या पितॄनुद्दिश्य भक्तितः। विधिवद्दास्यति श्राद्धं स्नात्वा संतर्प्य देवताः
tatra yo bhānavo bhaktyā pitṝnuddiśya bhaktitaḥ| vidhivaddāsyati śrāddhaṁ snātvā saṁtarpya devatāḥ
'वहाँ जो भी मनुष्य भक्तिपूर्वक पितरों के उद्देश्य से, स्नान करके तथा देवताओं का तर्पण करके, विधिपूर्वक श्राद्ध करेगा—'
श्लोक 85 (skanda.7.223.85)
युष्मत्प्रसादतस्तस्य ह्यन्वयेऽपि कदाचन। मा भूयात्प्रेतभावो हि अपि पापान्वितस्य भोः
yuṣmatprasādatastasya hyanvaye'pi kadācana| mā bhūyātpretabhāvo hi api pāpānvitasya bhoḥ
'—हे भगवन्, आपकी कृपा से उसके वंश में कभी भी प्रेतभाव न हो, चाहे वह पापयुक्त ही क्यों न हो।'
श्लोक 86 (skanda.7.223.86)
पर्युषित उवाच। गच्छ त्वं चाश्रमं तत्र कुरु ब्राह्मणसत्तम। गमिष्यसि परां सिद्धिं लोके ख्यातिं गमिष्यसि
paryuṣita uvāca| gaccha tvaṁ cāśramaṁ tatra kuru brāhmaṇasattama| gamiṣyasi parāṁ siddhiṁ loke khyātiṁ gamiṣyasi
पर्युषित ने कहा—'हे ब्राह्मणसत्तम, जाओ और वहाँ आश्रम बनाओ; तुम परम सिद्धि को प्राप्त होगे और लोक में ख्याति को प्राप्त होगे।'
श्लोक 87 (skanda.7.223.87)
तत्र ये मानवा भक्त्या श्राद्धं दास्यंति सत्तमाः। पितॄणां ते विमानस्था यास्यंति त्रिदिवालयम्
tatra ye mānavā bhaktyā śrāddhaṁ dāsyaṁti sattamāḥ| pitṝṇāṁ te vimānasthā yāsyaṁti tridivālayam
'वहाँ जो श्रेष्ठ मनुष्य भक्तिपूर्वक श्राद्ध करेंगे, उनके पितर विमानों में बैठकर स्वर्गलोक को जाएँगे।'
श्लोक 88 (skanda.7.223.88)
न तेषां वंशजः कश्चित्प्रेतत्वं च गमिष्यति। प्राहुः सप्तपदीं मैत्रीं पंडिताः स्थिरबुद्धयः
na teṣāṁ vaṁśajaḥ kaścitpretatvaṁ ca gamiṣyati| prāhuḥ saptapadīṁ maitrīṁ paṁḍitāḥ sthirabuddhayaḥ
'उनके वंश में उत्पन्न कोई भी व्यक्ति प्रेतत्व को प्राप्त नहीं होगा। स्थिरबुद्धि विद्वान लोग कहते हैं कि सात पग साथ चलना ही मैत्री है।'
श्लोक 89 (skanda.7.223.89)
मित्रतां तु पुरस्कृत्य किं तद्वक्ष्यामि तच्छृणु। तवाश्रमपदं पुण्यं भविष्यति महीतले
mitratāṁ tu puraskṛtya kiṁ tadvakṣyāmi tacchṛṇu| tavāśramapadaṁ puṇyaṁ bhaviṣyati mahītale
'अतः उस मित्रता का सम्मान करते हुए मैं जो कहूँगा, वह सुनो: पृथ्वी पर तुम्हारा यह आश्रम-स्थल पुण्यमय होगा,'
श्लोक 90 (skanda.7.223.90)
सर्वपापप्रशमनं सर्वदुःखवि नाशनम्। मन्नाम्ना ख्यातिमायातु प्रेततीर्थमिति प्रभो
sarvapāpapraśamanaṁ sarvaduḥkhavi nāśanam| mannāmnā khyātimāyātu pretatīrthamiti prabho
'—यह समस्त पापों को शान्त करने वाला तथा समस्त दुःखों का नाश करने वाला होगा; हे प्रभो, यह मेरे नाम से प्रेततीर्थ के नाम से विख्यात हो।'
श्लोक 91 (skanda.7.223.91)
ईश्वर उवाच। तं तथेति प्रतिज्ञाय गतस्तत्र द्विजोत्तमः। यथा वेदोक्तमार्गेंण सर्वं कृत्यं चकार सः
īśvara uvāca| taṁ tatheti pratijñāya gatastatra dvijottamaḥ| yathā vedoktamārgeṁṇa sarvaṁ kṛtyaṁ cakāra saḥ
ईश्वर ने कहा—'ऐसा ही हो' यह प्रतिज्ञा करके वह श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ गया और वेदोक्त मार्ग के अनुसार सम्पूर्ण कर्तव्य का पालन किया।
श्लोक 92 (skanda.7.223.92)
सोऽपि स्वर्गमनुप्राप्तो हृष्टः पर्युषितः प्रिये। एतत्सर्वं पुरावृत्तं स्थानेऽस्मिन्गात्रमोचने
so'pi svargamanuprāpto hṛṣṭaḥ paryuṣitaḥ priye| etatsarvaṁ purāvṛttaṁ sthāne'smingātramocane
हे प्रिये, वह पर्युषित भी प्रसन्नतापूर्वक स्वर्ग को प्राप्त हुआ। यह सब पूर्ववृत्तान्त इसी गात्रमोचन स्थान में घटित हुआ था।
श्लोक 93 (skanda.7.223.93)
यः शृणोति नरः सम्यक्सर्वपापैः स मुच्यते। शयनोत्थापने योगे यः पश्येत्पुरुषोत्तमम्
yaḥ śṛṇoti naraḥ samyaksarvapāpaiḥ sa mucyate| śayanotthāpane yoge yaḥ paśyetpuruṣottamam
जो मनुष्य इसे भलीभाँति सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। जो शयन और उत्थान के योग (देवशयनी और देवोत्थान एकादशी) में पुरुषोत्तम का दर्शन करता है,
श्लोक 94 (skanda.7.223.94)
गात्रोत्सर्गे तु गत्वाऽसौ यज्ञायुतफलं लभेत्
gātrotsarge tu gatvā'sau yajñāyutaphalaṁ labhet
—तथा गात्रोत्सर्ग में जाकर, वह दस हजार यज्ञों का फल प्राप्त करता है।