प्रभास खण्ड · अध्याय 224
इन्द्रेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.224.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि लिंगमिंद्रप्रतिष्ठितम्। पापमोचननामाढ्यं दक्षिणे पुरुषोत्तमात्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi liṅgamiṁdrapratiṣṭhitam| pāpamocananāmāḍhyaṁ dakṣiṇe puruṣottamāt
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तत्पश्चात् इन्द्र द्वारा प्रतिष्ठित उस लिंग के पास जाना चाहिए, जो पापमोचन नाम से प्रसिद्ध है और पुरुषोत्तम के दक्षिण में स्थित है।
श्लोक 2 (skanda.7.224.2)
वृत्रं हत्वा पुरा शक्रो ब्रह्महत्यासमन्वितः। अब्रवीत्स ऋषीन्दिव्यान्कथमेषा गमिष्यति
vṛtraṁ hatvā purā śakro brahmahatyāsamanvitaḥ| abravītsa ṛṣīndivyānkathameṣā gamiṣyati
पूर्वकाल में वृत्रासुर का वध करके ब्रह्महत्या से युक्त हुए शक्र (इन्द्र) ने दिव्य ऋषियों से कहा—यह पाप किस प्रकार दूर होगा?
श्लोक 3 (skanda.7.224.3)
ब्रह्महत्या हि दुष्प्रेक्ष्या विवर्णजननी मम। दुर्गंधचारिणी चैव सर्वतेजोविनाशिनी
brahmahatyā hi duṣprekṣyā vivarṇajananī mama| durgaṁdhacāriṇī caiva sarvatejovināśinī
यह ब्रह्महत्या देखने में अत्यन्त भयंकर है, मेरे विवर्णपन को उत्पन्न करने वाली, दुर्गन्धयुक्त तथा मेरे समस्त तेज का नाश करने वाली है।
श्लोक 4 (skanda.7.224.4)
अथोचुस्तं सुरगणा नारदाद्या महर्षयः। प्रभासं गच्छ देवेश क्षेत्रं पापहरं हि तत्
athocustaṁ suragaṇā nāradādyā maharṣayaḥ| prabhāsaṁ gaccha deveśa kṣetraṁ pāpaharaṁ hi tat
तब नारद आदि महर्षियों तथा देवगणों ने उनसे कहा—हे देवेश, प्रभास क्षेत्र में जाइए, क्योंकि वह क्षेत्र पाप का नाश करने वाला है।
श्लोक 5 (skanda.7.224.5)
तत्राराध्य महादेवं मोक्ष्यसे ब्रह्महत्यया। स तथेति प्रतिज्ञाय गतस्तत्र वरानने
tatrārādhya mahādevaṁ mokṣyase brahmahatyayā| sa tatheti pratijñāya gatastatra varānane
'वहाँ महादेव की आराधना करके तुम ब्रह्महत्या से मुक्त हो जाओगे।' हे वरानने, यह सुनकर उन्होंने 'ऐसा ही हो' कहकर वहाँ जाकर,
श्लोक 6 (skanda.7.224.6)
लिंगं संस्थापयामास देवदेवस्य शूलिनः। तस्य पूजारतो नित्यं धूपगंधानुलेपनैः
liṅgaṁ saṁsthāpayāmāsa devadevasya śūlinaḥ| tasya pūjārato nityaṁ dhūpagaṁdhānulepanaiḥ
त्रिशूलधारी देवाधिदेव का लिंग स्थापित किया, तथा धूप, गन्ध और अनुलेपन आदि से नित्य उनकी पूजा में तत्पर रहे।
श्लोक 7 (skanda.7.224.7)
ततोऽस्य गात्रदौर्गंध्यं नाशमाश्वभ्यगच्छत। विवर्णत्वं गतं सर्वं वपुश्चाभूत्तथोत्तमम्
tato'sya gātradaurgaṁdhyaṁ nāśamāśvabhyagacchata| vivarṇatvaṁ gataṁ sarvaṁ vapuścābhūttathottamam
तब उनके शरीर की दुर्गन्ध शीघ्र ही नष्ट हो गई, समस्त विवर्णता जाती रही, और उनका शरीर पुनः उत्तम हो गया।
श्लोक 8 (skanda.7.224.8)
अथ हृष्टमना भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह। तत्रागत्य नरो भक्त्या यश्चैनं पूजयिष्यति
atha hṛṣṭamanā bhūtvā vākyametaduvāca ha| tatrāgatya naro bhaktyā yaścainaṁ pūjayiṣyati
तब प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने यह वचन कहा—जो मनुष्य यहाँ आकर भक्तिपूर्वक इनकी पूजा करेगा,
श्लोक 9 (skanda.7.224.9)
ब्रह्महत्यादिकं पापं नाशं तस्य प्रयास्यति। एवमुक्त्वा सहस्राक्षः प्रहृष्टस्त्रिदिवं ययौ
brahmahatyādikaṁ pāpaṁ nāśaṁ tasya prayāsyati| evamuktvā sahasrākṣaḥ prahṛṣṭastridivaṁ yayau
उसका ब्रह्महत्या आदि पाप नष्ट हो जाएगा। यह कहकर सहस्राक्ष (इन्द्र) अत्यन्त प्रसन्न होकर स्वर्गलोक को चले गए,
श्लोक 10 (skanda.7.224.10)
ब्रह्महत्याविनिर्मुक्तः पूज्यमानो दिवौकसैः। गोदानं तत्र दातव्यं ब्राह्मणे वेदपारगे
brahmahatyāvinirmuktaḥ pūjyamāno divaukasaiḥ| godānaṁ tatra dātavyaṁ brāhmaṇe vedapārage
ब्रह्महत्या से पूर्णतः मुक्त होकर वे स्वर्गवासियों द्वारा पूजित हुए। वहाँ वेदपारंगत ब्राह्मण को गोदान करना चाहिए,
श्लोक 11 (skanda.7.224.11)
ब्रह्महत्यापनोदार्थं तत्र श्राद्धं समाचरेत्
brahmahatyāpanodārthaṁ tatra śrāddhaṁ samācaret
और ब्रह्महत्या के निवारण हेतु वहाँ श्राद्ध करना चाहिए।