प्रभास खण्ड · अध्याय 225
अनरकेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.225.1)
ईश्वर उवाच। ततोगच्छेन्महादेवि देवं चाऽनरकेश्वरम्। तस्मादुत्तरदिग्भागे सर्वपातकनाशनम्
īśvara uvāca| tatogacchenmahādevi devaṁ cā'narakeśvaram| tasmāduttaradigbhāge sarvapātakanāśanam
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तत्पश्चात् अनरकेश्वर देव के पास जाना चाहिए, जो उससे उत्तर दिशा में स्थित तथा समस्त पापों का नाश करने वाले हैं।
श्लोक 2 (skanda.7.225.2)
तन्माहात्म्यं प्रवक्ष्यामि शृणु ह्येकमनाः प्रिये। मथुरानाम विख्याता नगरी धरणीतले
tanmāhātmyaṁ pravakṣyāmi śṛṇu hyekamanāḥ priye| mathurānāma vikhyātā nagarī dharaṇītale
मैं उनका माहात्म्य कहता हूँ, हे प्रिये, एकाग्रचित्त होकर सुनो। पृथ्वीतल पर मथुरा नाम से विख्यात एक नगरी है।
श्लोक 3 (skanda.7.225.3)
तत्र विप्रोऽभवत्पूर्वं देवशर्मेति विश्रुतः। अगस्त्यगोत्रो विद्वान्वै स तु दारिद्र्यपीडितः
tatra vipro'bhavatpūrvaṁ devaśarmeti viśrutaḥ| agastyagotro vidvānvai sa tu dāridryapīḍitaḥ
वहाँ पूर्वकाल में देवशर्मा नामक एक विद्वान् ब्राह्मण रहते थे, जो अगस्त्य गोत्र के थे किन्तु दरिद्रता से पीड़ित थे।
श्लोक 4 (skanda.7.225.4)
अथापरोऽभवत्तत्र तादृग्रूपवयोऽन्वितः। तन्नाम गोत्रो देवेशि ब्राह्मणो वेदपारगः
athāparo'bhavattatra tādṛgrūpavayo'nvitaḥ| tannāma gotro deveśi brāhmaṇo vedapāragaḥ
हे देवेशि, वहीं एक और भी ब्राह्मण था, जो रूप और आयु में उन्हीं के समान था तथा उन्हीं के नाम और गोत्र वाला वेदपारंगत ब्राह्मण था।
श्लोक 5 (skanda.7.225.5)
अथ प्राह यमो दूतं रौद्रमूर्धशिरोरुहम्। गच्छ भो मथुरां शीघ्रं देवशर्माणमानय
atha prāha yamo dūtaṁ raudramūrdhaśiroruham| gaccha bho mathurāṁ śīghraṁ devaśarmāṇamānaya
तब यम ने भयंकर रूप और खड़े हुए केशों वाले अपने दूत से कहा—हे दूत, शीघ्र मथुरा जाओ और देवशर्मा को ले आओ।
श्लोक 6 (skanda.7.225.6)
अथागत्य ततो दूतो गृहीत्वा तत्र वै गतः। तं दृष्ट्वाथ यमो नत्वा प्राह दूतं क्रुधान्वितः
athāgatya tato dūto gṛhītvā tatra vai gataḥ| taṁ dṛṣṭvātha yamo natvā prāha dūtaṁ krudhānvitaḥ
तब वह दूत वहाँ जाकर उसे पकड़कर ले आया। उस ब्राह्मण को देखकर यम ने आदरपूर्वक प्रणाम करके क्रोधित होकर दूत से कहा—
श्लोक 7 (skanda.7.225.7)
नायमानेतुमादिष्टो देवशर्मां मया तव। अन्योस्ति देवशर्मा यस्त मानय गतायुषम्
nāyamānetumādiṣṭo devaśarmāṁ mayā tava| anyosti devaśarmā yasta mānaya gatāyuṣam
'मैंने तुम्हें इस देवशर्मा को लाने का आदेश नहीं दिया था; इससे भिन्न एक और देवशर्मा है जिसकी आयु समाप्त हो चुकी है—उसी को लाओ।'
श्लोक 8 (skanda.7.225.8)
एनं विप्रं च दीर्घायुं नय तत्राविलंबितम्
enaṁ vipraṁ ca dīrghāyuṁ naya tatrāvilaṁbitam
'और इस दीर्घायु ब्राह्मण को बिना विलम्ब किए वहीं वापस ले जाओ।'
श्लोक 9 (skanda.7.225.9)
ईश्वर उवाच। अथाब्रवीद्ब्राह्मणो वै नाहं यास्ये गृहं विभो। दारिद्र्येणातिनिर्विण्णो यावज्जीवं सुरेश्वर
īśvara uvāca| athābravīdbrāhmaṇo vai nāhaṁ yāsye gṛhaṁ vibho| dāridryeṇātinirviṇṇo yāvajjīvaṁ sureśvara
ईश्वर ने कहा—तब उस ब्राह्मण ने कहा—'हे विभो, मैं घर नहीं जाऊँगा; हे सुरेश्वर, दरिद्रता से अत्यन्त उद्विग्न होकर मैं जीवनभर,'
श्लोक 10 (skanda.7.225.10)
इहैव क्षपयिष्यामि शेषमायुस्तवांतिके
ihaiva kṣapayiṣyāmi śeṣamāyustavāṁtike
'यहीं तुम्हारे समीप अपनी शेष आयु व्यतीत कर दूँगा।'
श्लोक 11 (skanda.7.225.11)
यम उवाच। अकाले नात्र चायाति कश्चिद्ब्राह्मणसत्तम। मुहूर्तमपि नो जीवेत्पूर्णकालेन वै भुवि
yama uvāca| akāle nātra cāyāti kaścidbrāhmaṇasattama| muhūrtamapi no jīvetpūrṇakālena vai bhuvi
यम ने कहा—'हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, यहाँ कोई भी असमय नहीं आता; पृथ्वी पर पूर्ण आयु होने से पहले कोई भी एक क्षण भी अधिक जीवित नहीं रह सकता,'
श्लोक 12 (skanda.7.225.12)
अत एव हि मे नाम धर्मराजेति विश्रुतम्। न मे सुहृन्न मे द्वेष्यः कश्चिदस्ति धरातले
ata eva hi me nāma dharmarājeti viśrutam| na me suhṛnna me dveṣyaḥ kaścidasti dharātale
'और इसीलिए मेरा नाम धर्मराज के रूप में विख्यात है; पृथ्वी पर मेरा न कोई मित्र है और न कोई शत्रु।'
श्लोक 13 (skanda.7.225.13)
विद्धः शरशतेनापि नाऽकाले म्रियते यतः। कुशाग्रेणापि विद्धः सन्काले पूर्णे न जीवति
viddhaḥ śaraśatenāpi nā'kāle mriyate yataḥ| kuśāgreṇāpi viddhaḥ sankāle pūrṇe na jīvati
'सौ बाणों से बिंधा हुआ मनुष्य भी असमय नहीं मरता, और कुश की नोक मात्र से बिंधा हुआ भी काल पूर्ण होने पर जीवित नहीं रहता।'
श्लोक 14 (skanda.7.225.14)
तस्माद्गच्छ द्विजश्रेष्ठ यावद्गात्रं न दह्यते। अथाब्रवीद्ब्राह्मणोऽसौ यदि प्रेषयसे प्रभो
tasmādgaccha dvijaśreṣṭha yāvadgātraṁ na dahyate| athābravīdbrāhmaṇo'sau yadi preṣayase prabho
'अतः हे द्विजश्रेष्ठ, जाओ, इससे पहले कि तुम्हारा शरीर दाह-संस्कार को प्राप्त हो।' तब उस ब्राह्मण ने कहा—'हे प्रभो, यदि आप मुझे भेजते हैं,'
श्लोक 15 (skanda.7.225.15)
प्रश्नमेकं मया पृष्टो यथावद्वक्तुमर्हसि। न वृथा जायते देव साधूनां दर्शनं क्वचित्
praśnamekaṁ mayā pṛṣṭo yathāvadvaktumarhasi| na vṛthā jāyate deva sādhūnāṁ darśanaṁ kvacit
'तो मेरे द्वारा पूछे गए एक प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए; क्योंकि हे देव, सज्जनों का दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता,'
श्लोक 16 (skanda.7.225.16)
युष्माकं च विशेषेण तस्मादेतद्ब्रवीम्यहम्। एते ये नरका रौद्रा दृश्यन्ते च सुदारुणाः
yuṣmākaṁ ca viśeṣeṇa tasmādetadbravīmyaham| ete ye narakā raudrā dṛśyante ca sudāruṇāḥ
'और विशेषतः आप जैसों का दर्शन तो और भी फलदायी होता है; इसलिए मैं यह कहता हूँ—ये जो भयंकर और अत्यन्त दारुण नरक दिखाई दे रहे हैं,'
श्लोक 17 (skanda.7.225.17)
कर्मणा केन कं गच्छेन्मानवो नरकं यम। कति संख्याः स्युरेते च नरकाः किंप्रमाणतः
karmaṇā kena kaṁ gacchenmānavo narakaṁ yama| kati saṁkhyāḥ syurete ca narakāḥ kiṁpramāṇataḥ
'हे यम, किस कर्म से मनुष्य किस नरक में जाता है? और ये नरक संख्या में कितने हैं तथा किस परिमाण के हैं?'
श्लोक 18 (skanda.7.225.18)
एतत्सर्वं सुरश्रेष्ठ यथावद्वक्तुमर्हसि
etatsarvaṁ suraśreṣṭha yathāvadvaktumarhasi
'हे सुरश्रेष्ठ, यह सब यथावत् कहिए।'
श्लोक 19 (skanda.7.225.19)
यम उवाच। शृणु देव प्रवक्ष्यामि यावन्तो नरकाः स्थिताः। कर्मणा येन गच्छेत मानवो द्विजसत्तम
yama uvāca| śṛṇu deva pravakṣyāmi yāvanto narakāḥ sthitāḥ| karmaṇā yena gaccheta mānavo dvijasattama
यम ने कहा—'हे विप्रवर, सुनो, मैं बताता हूँ कि कितने नरक स्थित हैं और किस कर्म से मनुष्य उनमें जाता है, हे द्विजसत्तम।'
श्लोक 20 (skanda.7.225.20)
एकविंशत्समाख्याता नरका मम मन्दिरे। यानेतान्प्रेक्षसे विप्र यंत्र मध्ये व्यवस्थितान्
ekaviṁśatsamākhyātā narakā mama mandire| yānetānprekṣase vipra yaṁtra madhye vyavasthitān
'मेरे भवन में इक्कीस नरक बताए गए हैं। हे विप्र, जिन्हें तुम वहाँ बीच में स्थित देखते हो—'
श्लोक 21 (skanda.7.225.21)
पीड्यमानान्किंकरैर्मे कृतघ्नान्पा पसंयुतान्। लोहास्यवायसा येषां नेत्रोद्धारं प्रकुर्वते
pīḍyamānānkiṁkarairme kṛtaghnānpā pasaṁyutān| lohāsyavāyasā yeṣāṁ netroddhāraṁ prakurvate
'मेरे किंकरों द्वारा पीड़ित किए जाते हुए वे कृतघ्न और पापयुक्त लोग हैं—जिनकी आँखें लोहे की चोंच वाले कौवे नोच लेते हैं,'
श्लोक 22 (skanda.7.225.22)
एतैर्निरीक्षितान्येव कलत्राणि दुरात्मभिः। परेषां द्विजशार्दूल सरागैः पापि भिः सदा
etairnirīkṣitānyeva kalatrāṇi durātmabhiḥ| pareṣāṁ dvijaśārdūla sarāgaiḥ pāpi bhiḥ sadā
'हे द्विजश्रेष्ठ, वे वे दुरात्मा हैं जो सदा रागयुक्त होकर पापपूर्वक दूसरों की पत्नियों को कामदृष्टि से निहारते थे।'
श्लोक 23 (skanda.7.225.23)
कुम्भीपाकगतानेतानथ पश्यसि पापिनः। कूटसाक्ष्यरता ह्येते कटुवाङ्निरतास्तथा
kumbhīpākagatānetānatha paśyasi pāpinaḥ| kūṭasākṣyaratā hyete kaṭuvāṅniratāstathā
'और कुम्भीपाक नरक में गए जिन पापियों को तुम देखते हो, वे झूठी गवाही देने वाले और कटु वचन बोलने वाले हैं।'
श्लोक 24 (skanda.7.225.24)
एते लोहमयास्तम्भान्संतप्तान्पावकप्र भान्। आलिंगंति दुरात्मानः परदाररतास्तु ये
ete lohamayāstambhānsaṁtaptānpāvakapra bhān| āliṅgaṁti durātmānaḥ paradāraratāstu ye
'जो दुरात्मा अग्नि के समान तपाए हुए लोहे के खम्भों का आलिंगन करते हैं, वे परस्त्री में आसक्त रहने वाले हैं।'
श्लोक 25 (skanda.7.225.25)
एते वैतरणीमध्ये पूयशोणितसंकुले। ये तिष्ठंति द्विजश्रेष्ठ सर्वे विश्वासघातकाः
ete vaitaraṇīmadhye pūyaśoṇitasaṁkule| ye tiṣṭhaṁti dvijaśreṣṭha sarve viśvāsaghātakāḥ
'हे द्विजश्रेष्ठ, जो पीव और रक्त से भरी वैतरणी नदी के बीच में रहते हैं, वे सब विश्वासघाती हैं।'
श्लोक 26 (skanda.7.225.26)
असिपत्रवने घोरे भिद्यन्ते ये तु खण्डशः। ते नष्टाः स्वामिनं त्यक्त्वा संग्रामे समुपस्थिते
asipatravane ghore bhidyante ye tu khaṇḍaśaḥ| te naṣṭāḥ svāminaṁ tyaktvā saṁgrāme samupasthite
'जो घोर असिपत्रवन में खण्ड-खण्ड करके काटे जाते हैं, वे युद्ध उपस्थित होने पर अपने स्वामी को त्यागकर भाग जाने वाले नष्ट पुरुष हैं।'
श्लोक 27 (skanda.7.225.27)
अंगारराशीन्वै दीप्तान्ये गाहन्ते नराधमाः। स्वामिद्रोहरता ह्येते तथा हेतुप्रवादकाः
aṁgārarāśīnvai dīptānye gāhante narādhamāḥ| svāmidroharatā hyete tathā hetupravādakāḥ
'जो नराधम प्रज्वलित अंगारों के ढेर में डूबते हैं, वे स्वामी से द्रोह करने वाले तथा मिथ्या दोषारोपण करने वाले हैं।'
श्लोक 28 (skanda.7.225.28)
लोहशंकुभिराकीर्णमाक्रमन्ति नराधमाः। क्रन्दमाना द्विजश्रेष्ठ उपानद्दानवर्जिताः
lohaśaṁkubhirākīrṇamākramanti narādhamāḥ| krandamānā dvijaśreṣṭha upānaddānavarjitāḥ
'हे द्विजश्रेष्ठ, चिल्लाते हुए जो नराधम लोहे की कीलों से भरे मार्ग पर चलते हैं, वे पादुका-दान न करने वाले हैं।'
श्लोक 29 (skanda.7.225.29)
अधोमुखा निबद्धा ये वृक्षाग्रे पावकोपरि। ब्रह्महत्यान्विताः सर्व एते चैव नराधमाः
adhomukhā nibaddhā ye vṛkṣāgre pāvakopari| brahmahatyānvitāḥ sarva ete caiva narādhamāḥ
'जो नराधम वृक्ष की चोटी पर अग्नि के ऊपर उलटे बाँधे जाते हैं, वे सब ब्रह्महत्या के पाप से युक्त हैं।'
श्लोक 30 (skanda.7.225.30)
मशकैर्मत्कुणैः काकैर्ये भक्ष्यंते विहंगमैः। व्रतभंगरता ह्येते व्रतिना चैव हिंसकाः
maśakairmatkuṇaiḥ kākairye bhakṣyaṁte vihaṁgamaiḥ| vratabhaṁgaratā hyete vratinā caiva hiṁsakāḥ
'जो मच्छरों, खटमलों, कौवों और पक्षियों द्वारा खाए जाते हैं, वे व्रत भंग करने वाले तथा व्रतधारियों की हिंसा करने वाले हैं।'
श्लोक 31 (skanda.7.225.31)
कुठारकण्ठिता ह्येते भूयः संति तथाविधाः। गोहन्तारो दुरात्मानो देवब्राह्मणानिंदका
kuṭhārakaṇṭhitā hyete bhūyaḥ saṁti tathāvidhāḥ| gohantāro durātmāno devabrāhmaṇāniṁdakā
'इसी प्रकार अन्य भी हैं जिनके गले पर बार-बार कुठार का प्रहार होता है—वे गोहत्यारे तथा देवता व ब्राह्मणों की निन्दा करने वाले दुरात्मा हैं।'
श्लोक 32 (skanda.7.225.32)
ये भक्ष्यंते शृगालैश्च वृकैर्लोहमयैर्मुखैः। परस्वानां च हर्तारः परस्त्रीणां च हर्तृकाः
ye bhakṣyaṁte śṛgālaiśca vṛkairlohamayairmukhaiḥ| parasvānāṁ ca hartāraḥ parastrīṇāṁ ca hartṛkāḥ
'जो लोहमय मुखों वाले सियारों और भेड़ियों द्वारा खाए जाते हैं, वे दूसरों के धन का हरण करने वाले तथा पराई स्त्रियों का अपहरण करने वाले हैं।'
श्लोक 33 (skanda.7.225.33)
आत्ममांसानि ये पापा भक्षयंति बुभुक्षिताः। न दत्तमन्नमेतैस्तु कदाचिद्वै द्विजोत्तम
ātmamāṁsāni ye pāpā bhakṣayaṁti bubhukṣitāḥ| na dattamannametaistu kadācidvai dvijottama
'हे द्विजोत्तम, भूख से व्याकुल होकर जो पापी अपना ही मांस खाते हैं, वे वे हैं जिन्होंने कभी किसी को अन्नदान नहीं दिया।'
श्लोक 34 (skanda.7.225.34)
रुधिरं ये पिबंत्येते वसापूयपरिप्लुतम्। ब्राह्मणानां विनाशाय गवामेते सदा स्थिताः
rudhiraṁ ye pibaṁtyete vasāpūyapariplutam| brāhmaṇānāṁ vināśāya gavāmete sadā sthitāḥ
'जो चर्बी और पीव से लथपथ रक्त पीते हैं, वे ब्राह्मणों और गौओं के विनाश के लिए सदा तत्पर रहने वाले हैं।'
श्लोक 35 (skanda.7.225.35)
कूटशाल्मलिबद्धाश्च तीक्ष्णकण्टकपीडिताः। छिद्रान्वेषणसंयुक्ताः परेषां नित्यसंस्थिताः
kūṭaśālmalibaddhāśca tīkṣṇakaṇṭakapīḍitāḥ| chidrānveṣaṇasaṁyuktāḥ pareṣāṁ nityasaṁsthitāḥ
'जो कूट शाल्मली वृक्ष से बाँधे गए तीक्ष्ण काँटों से पीड़ित होते हैं, वे सदा दूसरों के छिद्र (दोष) ढूँढ़ने में लगे रहने वाले हैं।'
श्लोक 36 (skanda.7.225.36)
क्रकचेन तु छिद्यन्ते य इमे द्विजसत्तम। अभक्ष्यनिरता ह्येते स्वधर्मस्य विदूषकाः
krakacena tu chidyante ya ime dvijasattama| abhakṣyaniratā hyete svadharmasya vidūṣakāḥ
'हे द्विजसत्तम, जो आरे से चीरे जाते हैं, वे अभक्ष्य भोजन में रत तथा अपने धर्म को दूषित करने वाले हैं।'
श्लोक 37 (skanda.7.225.37)
कन्याविक्रयकर्त्तारः कन्यानां जीवभंजकाः। पुरीषमध्यगा ह्येते पच्यंते मम किंकरैः
kanyāvikrayakarttāraḥ kanyānāṁ jīvabhaṁjakāḥ| purīṣamadhyagā hyete pacyaṁte mama kiṁkaraiḥ
'जो कन्याओं का विक्रय करते हैं और कन्याओं के जीवन को नष्ट करते हैं, वे विष्ठा के बीच पड़े हुए मेरे किंकरों द्वारा पकाए जाते हैं।'
श्लोक 38 (skanda.7.225.38)
संदेशैर्दारुणैर्जिह्वा येषामुत्पाट्यते मुहुः। वाग्लोपनिरता ह्येते मृषावादपरायणाः
saṁdeśairdāruṇairjihvā yeṣāmutpāṭyate muhuḥ| vāglopaniratā hyete mṛṣāvādaparāyaṇāḥ
'जिनकी जीभ बार-बार क्रूर आदेशों से उखाड़ी जाती है, वे वाणी का दुरुपयोग करने वाले तथा मिथ्या भाषण में तत्पर रहने वाले हैं।'
श्लोक 39 (skanda.7.225.39)
ये शीतेन प्रबाध्यंते वेप माना मुहुर्मुहुः। देवस्वानां च हर्तारो ब्राह्मणानां विशेषतः
ye śītena prabādhyaṁte vepa mānā muhurmuhuḥ| devasvānāṁ ca hartāro brāhmaṇānāṁ viśeṣataḥ
'जो शीत से पीड़ित होकर बार-बार काँपते रहते हैं, वे देवताओं की और विशेषतः ब्राह्मणों की सम्पत्ति का हरण करने वाले हैं।'
श्लोक 40 (skanda.7.225.40)
तेषां शिरसि निक्षिप्तो भूरिभारो द्विजोत्तम। अतोऽमी ब्राह्मणश्रेष्ठ पूत्का रयन्ति भैरवम्
teṣāṁ śirasi nikṣipto bhūribhāro dvijottama| ato'mī brāhmaṇaśreṣṭha pūtkā rayanti bhairavam
'हे द्विजोत्तम, उनके सिर पर भारी बोझ रखा जाता है; इसीलिए हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, वे भयंकर चीत्कार करते हैं।'
श्लोक 41 (skanda.7.225.41)
यम उवाच। एवमेतत्समाख्यातं तव सर्वं द्विजोत्तम। नरकाणां स्वरूपं तु कर्मणां वै यथाक्रमम्
yama uvāca| evametatsamākhyātaṁ tava sarvaṁ dvijottama| narakāṇāṁ svarūpaṁ tu karmaṇāṁ vai yathākramam
यम ने कहा—'हे द्विजोत्तम, इस प्रकार तुम्हें नरकों का स्वरूप तथा कर्मों के अनुसार उनका क्रम यथावत् बता दिया गया।'
श्लोक 42 (skanda.7.225.42)
गच्छ शीघ्रं महाभाग यावत्कायो न दह्यते
gaccha śīghraṁ mahābhāga yāvatkāyo na dahyate
'हे महाभाग, अब शीघ्र जाओ, इससे पहले कि तुम्हारा शरीर दग्ध हो जाए।'
श्लोक 43 (skanda.7.225.43)
ब्राह्मण उवाच। कथय त्वं सुरश्रेष्ठ मम सर्वं समाहितः। न गच्छेत्कर्मणा येन नरकं मानवः क्वचित्
brāhmaṇa uvāca| kathaya tvaṁ suraśreṣṭha mama sarvaṁ samāhitaḥ| na gacchetkarmaṇā yena narakaṁ mānavaḥ kvacit
ब्राह्मण ने कहा—'हे सुरश्रेष्ठ, आप सावधानीपूर्वक मुझसे यह कहिए कि किस कर्म से मनुष्य कभी नरक में न जाए,'
श्लोक 44 (skanda.7.225.44)
सतां सप्तपदं मैत्रमित्याहुर्बुद्धिकोविदाः। मित्रतां च पुरस्कृत्य समासाद्वक्तुमर्हसि
satāṁ saptapadaṁ maitramityāhurbuddhikovidāḥ| mitratāṁ ca puraskṛtya samāsādvaktumarhasi
'क्योंकि बुद्धिमान लोग कहते हैं कि सात पग साथ चलना ही सज्जनों की मित्रता है; अतः उस मित्रता का मान रखते हुए संक्षेप में कहिए।'
श्लोक 45 (skanda.7.225.45)
यम उवाच। प्रभासं क्षेत्रमासाद्या नरकेश्वरमुत्तमम्। यः पश्यति नरो भक्त्या नरकं स न पश्यति
yama uvāca| prabhāsaṁ kṣetramāsādyā narakeśvaramuttamam| yaḥ paśyati naro bhaktyā narakaṁ sa na paśyati
यम ने कहा—'जो मनुष्य प्रभास क्षेत्र में पहुँचकर उत्तम नरकेश्वर का भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, वह नरक को नहीं देखता।'
श्लोक 46 (skanda.7.225.46)
स्थापितं यन्मया लिंगं शिवभक्त्या युतेन च। एतद्गुह्यं मया प्रोक्तं तव प्रीत्यै द्विजोत्तम
sthāpitaṁ yanmayā liṅgaṁ śivabhaktyā yutena ca| etadguhyaṁ mayā proktaṁ tava prītyai dvijottama
'शिवभक्ति से युक्त होकर मैंने जो लिंग स्थापित किया है—हे द्विजोत्तम, तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मैंने यह रहस्य कहा है।'
श्लोक 47 (skanda.7.225.47)
गोपनीयं प्रयत्नेन मम वाक्यादसंशयम्। एवमुक्तस्तदा विप्रः स्वयमेवावनिं ययौ
gopanīyaṁ prayatnena mama vākyādasaṁśayam| evamuktastadā vipraḥ svayamevāvaniṁ yayau
'मेरे इस कथन के अनुसार इसे निश्चय ही यत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिए।' ऐसा कहे जाने पर वह ब्राह्मण स्वयं ही पृथ्वी पर लौट आया।
श्लोक 48 (skanda.7.225.48)
लब्ध्वा कलेवरं सोऽथ विस्मयं परमं गतः। तत्स्मृत्वा वचनं सर्वं धर्मराजस्य धीमतः
labdhvā kalevaraṁ so'tha vismayaṁ paramaṁ gataḥ| tatsmṛtvā vacanaṁ sarvaṁ dharmarājasya dhīmataḥ
शरीर पुनः प्राप्त करके वह अत्यन्त आश्चर्यचकित हुआ; तथा बुद्धिमान् धर्मराज के समस्त वचनों का स्मरण करके,
श्लोक 49 (skanda.7.225.49)
गत्वा तत्र स नित्यं वै पूजयामास तं प्रभुम्। यावज्जीवं वरारोहे ततः सिद्धिं परां गतः
gatvā tatra sa nityaṁ vai pūjayāmāsa taṁ prabhum| yāvajjīvaṁ varārohe tataḥ siddhiṁ parāṁ gataḥ
वह वहाँ जाकर उस प्रभु की नित्य पूजा करने लगा; और हे वरारोहे, जीवनभर ऐसा करके अन्त में उसने परम सिद्धि प्राप्त की।
श्लोक 50 (skanda.7.225.50)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भक्त्या तमवलोकयन्। अपि पातकयुक्तोऽपि न याति नरके नरः
tasmātsarvaprayatnena bhaktyā tamavalokayan| api pātakayukto'pi na yāti narake naraḥ
इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न और भक्ति के साथ उनका दर्शन करने वाला मनुष्य, पापयुक्त होते हुए भी, नरक में नहीं जाता।
श्लोक 51 (skanda.7.225.51)
आश्वयुक्कृष्णपक्षे तु चतुर्दश्यां विधानतः। यस्तत्र कुरुते श्राद्धं सोऽश्वमेधफलं लभेत्
āśvayukkṛṣṇapakṣe tu caturdaśyāṁ vidhānataḥ| yastatra kurute śrāddhaṁ so'śvamedhaphalaṁ labhet
जो आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को विधिपूर्वक वहाँ श्राद्ध करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 52 (skanda.7.225.52)
कृष्णाजिनं तत्र देयं ब्राह्मणे वेदपारगे। यावत्तिलानां संख्यानं तावत्स्वर्गे महीयते
kṛṣṇājinaṁ tatra deyaṁ brāhmaṇe vedapārage| yāvattilānāṁ saṁkhyānaṁ tāvatsvarge mahīyate
वहाँ वेदपारंगत ब्राह्मण को कृष्णाजिन (काले मृग की खाल) का दान करना चाहिए; जितने तिल दान किए जाएँ, उतने ही समय तक स्वर्ग में महिमा प्राप्त होती है।