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प्रभास खण्ड · अध्याय 229

गंगामाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 228अध्याय-सूचीअध्याय 230

श्लोक 1 (skanda.7.229.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि गंगां त्रिपथगामिनीम्। अनरकेशतो देवि ऐशान्यां दिशि संस्थिताम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi gaṁgāṁ tripathagāminīm| anarakeśato devi aiśānyāṁ diśi saṁsthitām

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तत्पश्चात् त्रिपथगामिनी गंगा के पास जाना चाहिए, जो हे देवि, अनरकेश से ईशान दिशा में स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.229.2)

स्वयंभूतां धरामध्यादानीतां विष्णुना पुरा। यादवानां तु मुक्त्यर्थं सर्वपापोपशान्तये

svayaṁbhūtāṁ dharāmadhyādānītāṁ viṣṇunā purā| yādavānāṁ tu muktyarthaṁ sarvapāpopaśāntaye

यह गंगा स्वयंभू है, जिसे पूर्वकाल में विष्णु ने यादवों की मुक्ति हेतु तथा समस्त पापों की शान्ति के लिए पृथ्वी के भीतर से प्रकट किया था।

श्लोक 3 (skanda.7.229.3)

यस्तत्र कुरुते स्नानं कथंचित्पुण्यसंचयात्। श्राद्धं चैव विधानेन न स शोचेत्कृताकृते

yastatra kurute snānaṁ kathaṁcitpuṇyasaṁcayāt| śrāddhaṁ caiva vidhānena na sa śocetkṛtākṛte

जो कहीं से भी पुण्य-संचय के कारण वहाँ स्नान करता है तथा विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, उसे किए या न किए कर्म के विषय में शोक नहीं करना पड़ता।

श्लोक 4 (skanda.7.229.4)

ब्रह्माण्डं सकलं दत्त्वा यत्पुण्यफलमाप्नुयात्। तत्पुण्यं प्राप्नुयाद्देवि कार्तिक्यां जाह्नवीजले

brahmāṇḍaṁ sakalaṁ dattvā yatpuṇyaphalamāpnuyāt| tatpuṇyaṁ prāpnuyāddevi kārtikyāṁ jāhnavījale

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का दान करने से जो पुण्यफल प्राप्त होता है, हे देवि, वही पुण्य कार्तिकी पूर्णिमा को जाह्नवी जल में स्नान करने से प्राप्त होता है।

श्लोक 5 (skanda.7.229.5)

कलौ युगे तु संप्राप्ते दुर्ल्लभं तत्र दर्शनम्। किं पुनः स्नानदानं तु प्रभासे जाह्नवीजले

kalau yuge tu saṁprāpte durllabhaṁ tatra darśanam| kiṁ punaḥ snānadānaṁ tu prabhāse jāhnavījale

किन्तु कलियुग के आ जाने पर वहाँ का दर्शन भी दुर्लभ हो गया है—फिर प्रभास में जाह्नवी जल में स्नान-दान की तो बात ही क्या!

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