प्रभास खण्ड · अध्याय 230
गणपतिमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.230.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि देवं गणपतिप्रियम्। तत्रैव संस्थितं सम्यङ्मया तत्र नियोजितः
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi devaṁ gaṇapatipriyam| tatraiva saṁsthitaṁ samyaṅmayā tatra niyojitaḥ
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तत्पश्चात् प्रिय गणपति देव के पास जाना चाहिए, जो वहीं भलीभाँति स्थित हैं और मेरे द्वारा वहाँ नियुक्त किए गए हैं।
श्लोक 2 (skanda.7.230.2)
गङ्गाया दक्षिणे देवि क्षेत्ररक्षणतत्परः। माघे कृष्णचतुर्दश्यां यस्तं पूजयते नरः
gaṅgāyā dakṣiṇe devi kṣetrarakṣaṇatatparaḥ| māghe kṛṣṇacaturdaśyāṁ yastaṁ pūjayate naraḥ
हे देवि, गंगा के दक्षिण में स्थित वे क्षेत्र की रक्षा में तत्पर रहते हैं। जो मनुष्य माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी को उनकी पूजा करता है,
श्लोक 3 (skanda.7.230.3)
दिव्यमोदकनैवेद्यैः पुष्पधूपादिभिः क्रमात्। न तस्य जायते विघ्नं यावत्क्षेत्रे वसत्यसौ
divyamodakanaivedyaiḥ puṣpadhūpādibhiḥ kramāt| na tasya jāyate vighnaṁ yāvatkṣetre vasatyasau
दिव्य मोदक के नैवेद्य से तथा क्रमपूर्वक पुष्प-धूप आदि से—जब तक वह उस क्षेत्र में निवास करता है, तब तक उसे कोई विघ्न उत्पन्न नहीं होता।