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प्रभास खण्ड · अध्याय 232

पांडवकूपमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 231अध्याय-सूचीअध्याय 233

श्लोक 1 (skanda.7.232.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि कूपं त्रैलोक्यपूजितम्। पश्चिमे तस्य तीर्थस्य पांडवानां महात्मनाम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi kūpaṁ trailokyapūjitam| paścime tasya tīrthasya pāṁḍavānāṁ mahātmanām

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तत्पश्चात् उस तीर्थ के पश्चिम में स्थित, त्रैलोक्य द्वारा पूजित, महात्मा पाण्डवों के उस कूप के पास जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.7.232.2)

यदाऽरण्यमनुप्राप्ताः पांडवाः पृथिवीतले। भ्रममाणा महादेवि प्रभासं क्षेत्रमागताः

yadā'raṇyamanuprāptāḥ pāṁḍavāḥ pṛthivītale| bhramamāṇā mahādevi prabhāsaṁ kṣetramāgatāḥ

हे महादेवि, जब पाण्डव वन को प्राप्त होकर पृथ्वीतल पर भ्रमण करते हुए प्रभास क्षेत्र में आए,

श्लोक 3 (skanda.7.232.3)

ततस्ते न्यवसंस्तत्र किंचित्कालं समाहिताः। गत्वा क्षेत्रं महापुण्यं ततः कृष्णाऽब्रवीदिदम्

tataste nyavasaṁstatra kiṁcitkālaṁ samāhitāḥ| gatvā kṣetraṁ mahāpuṇyaṁ tataḥ kṛṣṇā'bravīdidam

तब वे उस महापुण्य क्षेत्र में जाकर कुछ समय तक शान्तचित्त होकर वहाँ निवास करने लगे। तब कृष्णा (द्रौपदी) ने यह कहा—

श्लोक 4 (skanda.7.232.4)

ब्राह्मणानां सहस्राणि भुंजते भवतां गृहे। दूरे जलाश्रयश्चैव न तावंतश्च किंकराः

brāhmaṇānāṁ sahasrāṇi bhuṁjate bhavatāṁ gṛhe| dūre jalāśrayaścaiva na tāvaṁtaśca kiṁkarāḥ

'आपके घर में हजारों ब्राह्मण भोजन करते हैं, जबकि जलाशय दूर है और उतने सेवक भी नहीं हैं।'

श्लोक 5 (skanda.7.232.5)

तस्माज्जलाश्रयः कार्यं आश्रमस्य समीपतः। यत्र स्नानं करिष्यामि युष्माकं संप्रसादतः

tasmājjalāśrayaḥ kāryaṁ āśramasya samīpataḥ| yatra snānaṁ kariṣyāmi yuṣmākaṁ saṁprasādataḥ

'अतः आश्रम के समीप जलाशय बनाया जाना चाहिए, जहाँ मैं आप लोगों की कृपा से स्नान कर सकूँ।'

श्लोक 6 (skanda.7.232.6)

ततस्तु पांडवाः सर्वे सहितास्ते वरानने। अखनंस्तत्र ते कूपं द्रौपदीवाक्यप्रेरिताः

tatastu pāṁḍavāḥ sarve sahitāste varānane| akhanaṁstatra te kūpaṁ draupadīvākyapreritāḥ

हे वरानने, तब द्रौपदी के वचन से प्रेरित होकर सभी पाण्डवों ने मिलकर वहाँ एक कूप खोदा।

श्लोक 7 (skanda.7.232.7)

अथाजगाम तत्रैव भगवान्देवकीसुतः। श्रुत्वा समागतान्पार्थान्द्वारावत्याः सबांधवः

athājagāma tatraiva bhagavāndevakīsutaḥ| śrutvā samāgatānpārthāndvārāvatyāḥ sabāṁdhavaḥ

तब देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण, पार्थों के वहाँ आने का समाचार सुनकर, अपने बन्धु-बान्धवों सहित द्वारावती से वहाँ आए।

श्लोक 8 (skanda.7.232.8)

प्रद्युम्नेन च सांबेन गदेन निषधेन च। युयुधानेन रामेण चारुदेष्णेन धीमता

pradyumnena ca sāṁbena gadena niṣadhena ca| yuyudhānena rāmeṇa cārudeṣṇena dhīmatā

—प्रद्युम्न, साम्ब, गद, निषध, युयुधान, बलराम तथा बुद्धिमान् चारुदेष्ण के साथ,

श्लोक 9 (skanda.7.232.9)

अन्यैः परिवृतः शूरैर्यादवैर्युद्ध दुर्मदैः। ते समेत्य यथान्यायं समस्ता यदुपुंगवाः

anyaiḥ parivṛtaḥ śūrairyādavairyuddha durmadaiḥ| te sametya yathānyāyaṁ samastā yadupuṁgavāḥ

—और युद्ध में दुर्दम्य अन्य वीर यादवों से घिरे हुए। वे सभी श्रेष्ठ यादव यथोचित रीति से (पाण्डवों से) मिलकर,

श्लोक 10 (skanda.7.232.10)

ततः कथावसाने च कस्मिंश्चित्कारणांतरे। वासुदेवः पांडुसुतमिदं वचनमब्रवीत्

tataḥ kathāvasāne ca kasmiṁścitkāraṇāṁtare| vāsudevaḥ pāṁḍusutamidaṁ vacanamabravīt

तब वार्तालाप के अन्त में किसी अन्य प्रसंग में वासुदेव ने पाण्डुपुत्र (युधिष्ठिर) से यह वचन कहा—

श्लोक 11 (skanda.7.232.11)

युधिष्ठिर महाबाहो किं ते कामकरोम्यहम्। राज्यं धान्यं धनं चापि अथवा रिपुनाशनम्

yudhiṣṭhira mahābāho kiṁ te kāmakaromyaham| rājyaṁ dhānyaṁ dhanaṁ cāpi athavā ripunāśanam

'हे महाबाहो युधिष्ठिर, मैं तुम्हारी कौन-सी कामना पूर्ण करूँ? राज्य, धान्य, धन, अथवा शत्रुओं का नाश?'

श्लोक 12 (skanda.7.232.12)

युधिष्ठिर उवाच। शक्तस्त्वं यादवश्रेष्ठ सर्वकर्मस्वसंशयः। प्रतिज्ञातं त्वया पूर्वं वर्षैर्द्वादशभिः प्रियम्

yudhiṣṭhira uvāca| śaktastvaṁ yādavaśreṣṭha sarvakarmasvasaṁśayaḥ| pratijñātaṁ tvayā pūrvaṁ varṣairdvādaśabhiḥ priyam

युधिष्ठिर ने कहा—'हे यादवश्रेष्ठ, आप निःसंदेह सभी कार्यों में समर्थ हैं। आपने पूर्व में बारह वर्षों में प्रिय वस्तु देने की प्रतिज्ञा की थी...'

श्लोक 13 (skanda.7.232.13)

तन्नास्ति त्रिषु लोकेषु यन्न सिद्ध्यति भूतले। त्वयि तुष्टे जगन्नाथ सर्वदेवनमस्कृते

tannāsti triṣu lokeṣu yanna siddhyati bhūtale| tvayi tuṣṭe jagannātha sarvadevanamaskṛte

'हे जगन्नाथ, हे सर्वदेवनमस्कृत, आपके प्रसन्न होने पर तीनों लोकों में ऐसा कुछ भी नहीं है जो पृथ्वी पर सिद्ध न हो जाए।'

श्लोक 14 (skanda.7.232.14)

अवश्यं यदि तुष्टोऽसि मम सर्वजगत्पते। अत्र सांनिध्यमागच्छ कूपे नित्यं जनार्दन

avaśyaṁ yadi tuṣṭo'si mama sarvajagatpate| atra sāṁnidhyamāgaccha kūpe nityaṁ janārdana

'हे सर्वजगत्पते, यदि आप वास्तव में मुझसे प्रसन्न हैं, तो हे जनार्दन, इस कूप में सदा के लिए सान्निध्य ग्रहण कीजिए।'

श्लोक 15 (skanda.7.232.15)

अत्रागत्य नरो यस्तु भक्त्या स्नानं समाचरेत्। स यातु वैष्णवं स्थानं प्रसादात्तव केशव

atrāgatya naro yastu bhaktyā snānaṁ samācaret| sa yātu vaiṣṇavaṁ sthānaṁ prasādāttava keśava

'हे केशव, जो मनुष्य यहाँ आकर भक्तिपूर्वक स्नान करे, वह आपकी कृपा से वैष्णव धाम को प्राप्त हो।'

श्लोक 16 (skanda.7.232.16)

ईश्वर उवाच। एवं भविष्यतीत्युक्त्वा तदाऽमन्त्र्य युधिष्ठिरम्। प्रययौ द्वारकां कृष्णः सर्वलोकनमस्कृतः

īśvara uvāca| evaṁ bhaviṣyatītyuktvā tadā'mantrya yudhiṣṭhiram| prayayau dvārakāṁ kṛṣṇaḥ sarvalokanamaskṛtaḥ

ईश्वर ने कहा—'ऐसा ही होगा' यह कहकर तब युधिष्ठिर से विदा लेकर, सर्वलोकनमस्कृत श्रीकृष्ण द्वारका के लिए प्रस्थान कर गए।

श्लोक 17 (skanda.7.232.17)

तस्मिञ्छ्राद्धं नरः कृत्वा वाजिमेधफलं लभेत्। प्रसादाद्देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः

tasmiñchrāddhaṁ naraḥ kṛtvā vājimedhaphalaṁ labhet| prasādāddevadevasya viṣṇoramitatejasaḥ

वहाँ श्राद्ध करने वाला मनुष्य, अमित तेजस्वी देवाधिदेव विष्णु की कृपा से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 18 (skanda.7.232.18)

तदर्धं तर्पणेनैव स्नानात्पादमवाप्नुयात्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तत्र श्राद्धं समाचरेत्

tadardhaṁ tarpaṇenaiva snānātpādamavāpnuyāt| tasmātsarvaprayatnena tatra śrāddhaṁ samācaret

उसका आधा फल केवल तर्पण करने से तथा चौथाई फल केवल स्नान करने से प्राप्त होता है। अतः सम्पूर्ण प्रयत्न से वहाँ श्राद्ध करना चाहिए।

श्लोक 19 (skanda.7.232.19)

ज्येष्ठस्य पौर्णमास्यां यः स्नानं श्राद्धं करिष्यति। सावित्रीं चैव संपूज्य स यास्यति परमं पदम्

jyeṣṭhasya paurṇamāsyāṁ yaḥ snānaṁ śrāddhaṁ kariṣyati| sāvitrīṁ caiva saṁpūjya sa yāsyati paramaṁ padam

जो ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को स्नान और श्राद्ध करता है तथा सावित्री की भलीभाँति पूजा करता है, वह परम पद को प्राप्त होता है।

श्लोक 20 (skanda.7.232.20)

गोदानं तत्र देयं तु सम्यग्यात्राफलेप्सुभिः

godānaṁ tatra deyaṁ tu samyagyātrāphalepsubhiḥ

जो लोग यात्रा का पूर्ण फल चाहते हैं, उन्हें वहाँ गोदान करना चाहिए।

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