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प्रभास खण्ड · अध्याय 24

श्रीसोमेश्वरवर्णने सोमवारव्रतमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 23अध्याय-सूचीअध्याय 25

श्लोक 1 (skanda.7.24.1)

देव्युवाच। कस्मिन्काले जगन्नाथ तत्र लिंगं प्रतिष्ठितम्। कथमाराधनं चक्रे कृतार्थो रोहिणीपतिः

devyuvāca| kasminkāle jagannātha tatra liṁgaṁ pratiṣṭhitam| kathamārādhanaṁ cakre kṛtārtho rohiṇīpatiḥ

देवी ने कहा—हे जगन्नाथ! वहाँ लिंग किस समय प्रतिष्ठित हुआ? कृतार्थ रोहिणीपति ने किस प्रकार आराधना की?

श्लोक 2 (skanda.7.24.2)

ईश्वर उवाच। त्रेतायुगे च दशमे मनोर्वैवस्वतस्य हि। संजातो रोहिणीनाथो युक्तो दुर्वाससा प्रिये

īśvara uvāca| tretāyuge ca daśame manorvaivasvatasya hi| saṁjāto rohiṇīnātho yukto durvāsasā priye

ईश्वर ने कहा—वैवस्वत मनु के दसवें त्रेतायुग में, हे प्रिये! रोहिणीनाथ दुर्वासा से युक्त होकर उत्पन्न हुए।

श्लोक 3 (skanda.7.24.3)

तस्मिन्काले तदा तत्र गते वर्षसहस्रके। ततः कृत्वा तपश्चायं प्रत्यक्षीकृतशंकरः

tasminkāle tadā tatra gate varṣasahasrake| tataḥ kṛtvā tapaścāyaṁ pratyakṣīkṛtaśaṁkaraḥ

उस समय, वहाँ एक सहस्र वर्ष बीत जाने पर, तब तप करके इन्होंने शंकर को साक्षात् किया।

श्लोक 4 (skanda.7.24.4)

लिंगं प्रतिष्ठयामास ब्रह्मणा लोककर्तॄणा। पुनर्वर्षसहस्रं तु पूजयामास शंकरम्

liṁgaṁ pratiṣṭhayāmāsa brahmaṇā lokakartṝṇā| punarvarṣasahasraṁ tu pūjayāmāsa śaṁkaram

लोककर्ता ब्रह्मा द्वारा लिंग प्रतिष्ठित किया गया; फिर पुनः एक सहस्र वर्ष तक उन्होंने शंकर की पूजा की।

श्लोक 5 (skanda.7.24.5)

ततः संपूज्य विधिना निजकार्यार्थसिद्धये। स्तुतिं चक्रे निशानाथः प्रत्यक्षीकृतशंकरः

tataḥ saṁpūjya vidhinā nijakāryārthasiddhaye| stutiṁ cakre niśānāthaḥ pratyakṣīkṛtaśaṁkaraḥ

तत्पश्चात् विधिपूर्वक पूजा करके, अपने कार्य की सिद्धि के लिए, शंकर को साक्षात् किए हुए निशानाथ ने स्तुति की—

श्लोक 6 (skanda.7.24.6)

चंद्र उवाच। नास्ति शर्वसमो देवो नास्ति शर्वसमा गतिः। नास्ति शर्वसमो देवो नास्ति शर्वसमा गतिः

caṁdra uvāca| nāsti śarvasamo devo nāsti śarvasamā gatiḥ| nāsti śarvasamo devo nāsti śarvasamā gatiḥ

चंद्र ने कहा—शर्व के समान कोई देव नहीं, शर्व के समान कोई गति नहीं। शर्व के समान कोई देव नहीं, शर्व के समान कोई गति नहीं।

श्लोक 7 (skanda.7.24.7)

यं पठंति सदा सांख्याश्चितयंति च योगिनः। परं प्रधानं पुरुषं तस्मै ज्ञेयात्मने नमः

yaṁ paṭhaṁti sadā sāṁkhyāścitayaṁti ca yoginaḥ| paraṁ pradhānaṁ puruṣaṁ tasmai jñeyātmane namaḥ

जिसका सांख्यवादी सदा पाठ करते हैं और योगी जिसका चिंतन करते हैं, उस परम प्रधान पुरुष को, ज्ञेयस्वरूप को नमस्कार।

श्लोक 8 (skanda.7.24.8)

उत्पत्तौ च विनाशे च कारणं यं विदुर्बुधाः। देवासुरमनुष्याणां तस्मै ज्ञानात्मने नमः

utpattau ca vināśe ca kāraṇaṁ yaṁ vidurbudhāḥ| devāsuramanuṣyāṇāṁ tasmai jñānātmane namaḥ

जिन्हें विद्वान् देव, असुर और मनुष्यों की उत्पत्ति और विनाश का कारण जानते हैं, उन ज्ञानस्वरूप को नमस्कार।

श्लोक 9 (skanda.7.24.9)

यमव्ययमनाद्यंतं यं नित्यं शाश्वतं ध्रुवम्। निष्कलं परमं ब्रह्म तस्मै योगात्मने नमः

yamavyayamanādyaṁtaṁ yaṁ nityaṁ śāśvataṁ dhruvam| niṣkalaṁ paramaṁ brahma tasmai yogātmane namaḥ

जो अव्यय, अनादि-अनंत, नित्य, शाश्वत, ध्रुव, निष्कल परब्रह्म हैं, उन योगस्वरूप को नमस्कार।

श्लोक 10 (skanda.7.24.10)

यः पवित्रं पवित्राणामादिदेवो महेश्वरः। पुनाति दर्शनादेव तस्मै तीर्थात्मने नमः

yaḥ pavitraṁ pavitrāṇāmādidevo maheśvaraḥ| punāti darśanādeva tasmai tīrthātmane namaḥ

जो पवित्रों के भी पवित्र, आदिदेव महेश्वर हैं, जो दर्शनमात्र से ही पवित्र कर देते हैं, उन तीर्थस्वरूप को नमस्कार।

श्लोक 11 (skanda.7.24.11)

यतः प्रवर्त्तते सर्वं यस्मिन्सर्वं विलीयते। पालयेद्यो जगत्सर्वं तस्मै सर्वात्मने नमः

yataḥ pravarttate sarvaṁ yasminsarvaṁ vilīyate| pālayedyo jagatsarvaṁ tasmai sarvātmane namaḥ

जिनसे सब कुछ उत्पन्न होता है, जिनमें सब कुछ विलीन होता है, जो संपूर्ण जगत् का पालन करते हैं, उन सर्वस्वरूप को नमस्कार।

श्लोक 12 (skanda.7.24.12)

अनिष्टोमादिभिर्यज्ञैर्यं यजंति द्विजातयः। संपूर्णदक्षिणैरेव तस्मै यज्ञात्मने नमः

aniṣṭomādibhiryajñairyaṁ yajaṁti dvijātayaḥ| saṁpūrṇadakṣiṇaireva tasmai yajñātmane namaḥ

जिन्हें द्विज संपूर्ण दक्षिणा सहित अग्निष्टोम आदि यज्ञों से पूजते हैं, उन यज्ञस्वरूप को नमस्कार।

श्लोक 13 (skanda.7.24.13)

ईश्वर उवाच। एवं स संस्तुते यावद्दिवारात्रौ निशाकरः। अब्रवीद्भगवान्प्रीतः प्रहसन्निव शंकरः

īśvara uvāca| evaṁ sa saṁstute yāvaddivārātrau niśākaraḥ| abravīdbhagavānprītaḥ prahasanniva śaṁkaraḥ

ईश्वर ने कहा—इस प्रकार निशाकर द्वारा दिन-रात स्तुति किए जाने पर, भगवान् शंकर प्रसन्न होकर, मानो हँसते हुए बोले—

श्लोक 14 (skanda.7.24.14)

शंकर उवाच। परितुष्टोऽस्मि ते वत्स स्तोत्रेणानेन शीतगो। वरं वरय भद्रं ते भूयो यत्ते मनोगतम्

śaṁkara uvāca| parituṣṭo'smi te vatsa stotreṇānena śītago| varaṁ varaya bhadraṁ te bhūyo yatte manogatam

शंकर ने कहा—हे वत्स! हे शीतगो! तुम्हारी इस स्तुति से मैं अत्यंत संतुष्ट हूँ। वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो, जो भी तुम्हारे मन में हो।

श्लोक 15 (skanda.7.24.15)

चंद्र उवाच। यदि देयो वरोऽस्माकं यदि तुष्टोऽसि मे प्रभो। सांनिध्यं कुरु देवेश लिंगेऽस्मिन्सर्वदा विभो

caṁdra uvāca| yadi deyo varo'smākaṁ yadi tuṣṭo'si me prabho| sāṁnidhyaṁ kuru deveśa liṁge'sminsarvadā vibho

चंद्र ने कहा—यदि हमें वर देना है, हे प्रभो! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो हे देवेश! हे विभो! इस लिंग में सदा सान्निध्य रखिए।

श्लोक 16 (skanda.7.24.16)

ये त्वां पश्यंति चात्रस्थं भक्त्या परमया युताः। तेषां तु परमा सिद्धिस्त्वत्प्रसादात्सुरेश्वर

ye tvāṁ paśyaṁti cātrasthaṁ bhaktyā paramayā yutāḥ| teṣāṁ tu paramā siddhistvatprasādātsureśvara

जो भी परम भक्ति से युक्त होकर यहाँ स्थित आपके दर्शन करते हैं, हे सुरेश्वर! आपकी कृपा से उन्हें परम सिद्धि प्राप्त हो।

श्लोक 17 (skanda.7.24.17)

शंभुरुवाच। अग्रे तु मम सांनिध्यमस्मिँल्लिंगे महाप्रभो। विशेषतोऽधुना चंद्र तव भक्त्या निरंतरम्

śaṁbhuruvāca| agre tu mama sāṁnidhyamasmĩlliṁge mahāprabho| viśeṣato'dhunā caṁdra tava bhaktyā niraṁtaram

शंभु ने कहा—हे महाप्रभो! इस लिंग में मेरा सान्निध्य पहले से ही है; परंतु अब हे चंद्र! तुम्हारी भक्ति के कारण विशेष रूप से निरंतर—

श्लोक 18 (skanda.7.24.18)

स्थातव्यमद्यप्रभृति क्षेत्रेऽस्मिन्नुमया सह। यस्मात्त्वया प्रभा लब्धा क्षेत्रेऽस्मिन्मत्प्रसादतः। तस्मात्प्रभासमित्येवं नामास्य प्रभविष्यति

sthātavyamadyaprabhṛti kṣetre'sminnumayā saha| yasmāttvayā prabhā labdhā kṣetre'sminmatprasādataḥ| tasmātprabhāsamityevaṁ nāmāsya prabhaviṣyati

—आज से इस क्षेत्र में उमा सहित मुझे स्थित रहना है। चूँकि इस क्षेत्र में मेरी कृपा से तुमने प्रभा (कांति) पुनः प्राप्त की, इसलिए इसका नाम 'प्रभास' होगा।

श्लोक 19 (skanda.7.24.19)

यस्मात्प्रतिष्ठितं लिंगं त्वया सोम शुभं मम। सोमनाथेति मे नाम तस्मात्ख्यातिं गमिष्यति

yasmātpratiṣṭhitaṁ liṁgaṁ tvayā soma śubhaṁ mama| somanātheti me nāma tasmātkhyātiṁ gamiṣyati

और चूँकि हे सोम! तुमने मेरा यह शुभ लिंग प्रतिष्ठित किया है, इसलिए मेरा नाम 'सोमनाथ' प्रसिद्धि को प्राप्त होगा।

श्लोक 20 (skanda.7.24.20)

यन्ममाग्रेतनं नामख्यातं ब्रह्मावसानिकम्। सोमनाथेति च पुनस्तदेव प्रचरिष्यति। द्रक्ष्यंति हि नरा ये मामत्रस्थं भक्तितत्पराः

yanmamāgretanaṁ nāmakhyātaṁ brahmāvasānikam| somanātheti ca punastadeva pracariṣyati| drakṣyaṁti hi narā ye māmatrasthaṁ bhaktitatparāḥ

जो मेरा पहले का नाम ब्रह्मा के जीवन-पर्यंत प्रसिद्ध रहा, वह 'सोमनाथ' नाम पुनः प्रचलित होगा। जो मनुष्य भक्तिपरायण होकर यहाँ स्थित मेरे दर्शन करेंगे—

श्लोक 21 (skanda.7.24.21)

शृणु तेषां फलं वत्स भविष्यति निशाकर। न तेषां जायते व्याधिर्न दारिद्र्यं न दुर्गतिः। न चेष्टेन वियोगश्च मम चंद्र प्रभावतः

śṛṇu teṣāṁ phalaṁ vatsa bhaviṣyati niśākara| na teṣāṁ jāyate vyādhirna dāridryaṁ na durgatiḥ| na ceṣṭena viyogaśca mama caṁdra prabhāvataḥ

—हे वत्स! हे निशाकर! सुनो उनका फल क्या होगा: न उन्हें व्याधि होगी, न दरिद्रता, न दुर्गति; और हे चंद्र! मेरे प्रभाव से इष्ट से वियोग भी नहीं होगा।

श्लोक 22 (skanda.7.24.22)

यात्रां कुर्वंति ये भक्त्या मम दर्शनकांक्षिणः। पदे पदेश्वमेधस्य तेषां फलमुदाहृतम्

yātrāṁ kurvaṁti ye bhaktyā mama darśanakāṁkṣiṇaḥ| pade padeśvamedhasya teṣāṁ phalamudāhṛtam

जो भक्तिपूर्वक मेरे दर्शन की इच्छा से यात्रा करते हैं, उनके लिए पद-पद पर अश्वमेध यज्ञ का फल कहा गया है।

श्लोक 23 (skanda.7.24.23)

किं कृतैर्बहुभिर्यज्ञैरुपवासैर्निशाकर। सकृत्पश्यंति मां येऽत्र ते सर्वे लेभिरे फलम्

kiṁ kṛtairbahubhiryajñairupavāsairniśākara| sakṛtpaśyaṁti māṁ ye'tra te sarve lebhire phalam

हे निशाकर! अनेक यज्ञों और उपवासों से किए गए से क्या लाभ? जो यहाँ एक बार भी मेरे दर्शन करते हैं, वे सब फल प्राप्त कर लेते हैं।

श्लोक 24 (skanda.7.24.24)

एकमासोपवासं तु कुरुते भक्तितत्परः। यावद्वर्षसहस्रं तु एकः पश्यंति मामिह

ekamāsopavāsaṁ tu kurute bhaktitatparaḥ| yāvadvarṣasahasraṁ tu ekaḥ paśyaṁti māmiha

जो भक्तिपरायण होकर एक मास का उपवास करता है, और जो एक सहस्र वर्ष तक तप करता है, तथा जो यहाँ एक बार मेरे दर्शन करता है—

श्लोक 25 (skanda.7.24.25)

द्वाभ्यामपि फलं तुल्यं नास्ति काचिद्विचारणा

dvābhyāmapi phalaṁ tulyaṁ nāsti kācidvicāraṇā

—दोनों के लिए फल समान है, इसमें कोई विचार-भेद नहीं है।

श्लोक 26 (skanda.7.24.26)

एको भवेद्ब्रह्मचारी यावज्जीवं निशाकर। सकृत्पश्यति मामत्र समं ताभ्यां फलं स्मृतम्

eko bhavedbrahmacārī yāvajjīvaṁ niśākara| sakṛtpaśyati māmatra samaṁ tābhyāṁ phalaṁ smṛtam

हे निशाकर! एक जीवन भर ब्रह्मचारी रहे, और दूसरा यहाँ एक बार मेरे दर्शन करे—दोनों का फल समान स्मृत है।

श्लोक 27 (skanda.7.24.27)

एको दानानि सर्वाणि प्रयच्छति द्विजातये। एकः पश्यति मामत्र समं ताभ्यां फलं स्मृतम्

eko dānāni sarvāṇi prayacchati dvijātaye| ekaḥ paśyati māmatra samaṁ tābhyāṁ phalaṁ smṛtam

एक द्विज को सभी दान दे, और दूसरा यहाँ मेरे दर्शन करे—दोनों का फल समान स्मृत है।

श्लोक 28 (skanda.7.24.28)

एको व्रतानि सर्वाणि कुरुते मृगलांछन। अन्यः पश्यति मामत्र समं ताभ्यां फलं स्मृतम्

eko vratāni sarvāṇi kurute mṛgalāṁchana| anyaḥ paśyati māmatra samaṁ tābhyāṁ phalaṁ smṛtam

हे मृगलांछन! एक सभी व्रत करे, और दूसरा यहाँ मेरे दर्शन करे—दोनों का फल समान स्मृत है।

श्लोक 29 (skanda.7.24.29)

एकस्तीर्थानि कुरुते जपजाप्यानि भूरिशः। अन्यः पश्यति मामत्र फलं ताभ्यां समं स्मृतम्

ekastīrthāni kurute japajāpyāni bhūriśaḥ| anyaḥ paśyati māmatra phalaṁ tābhyāṁ samaṁ smṛtam

एक अनेक तीर्थ करे तथा प्रचुर जप-जाप्य करे, और दूसरा यहाँ मेरे दर्शन करे—दोनों का फल समान स्मृत है।

श्लोक 30 (skanda.7.24.30)

एको ज्ञानादियोगेन मुमुक्षुर्जायते ध्रुवम्। अन्यः पश्यति मामत्र फलं ताभ्यां समं स्मृतम्

eko jñānādiyogena mumukṣurjāyate dhruvam| anyaḥ paśyati māmatra phalaṁ tābhyāṁ samaṁ smṛtam

एक ज्ञान आदि योग से निश्चय ही मुमुक्षु बने, और दूसरा यहाँ मेरे दर्शन करे—दोनों का फल समान स्मृत है।

श्लोक 31 (skanda.7.24.31)

एकस्तु भृगुपातेन याति मृत्युं निशाकर। अन्यः पश्यति मामत्र समं ताभ्यां फलं स्मृतम्

ekastu bhṛgupātena yāti mṛtyuṁ niśākara| anyaḥ paśyati māmatra samaṁ tābhyāṁ phalaṁ smṛtam

हे निशाकर! एक भृगुपतन से मृत्यु को प्राप्त हो, और दूसरा यहाँ मेरे दर्शन करे—दोनों का फल समान स्मृत है।

श्लोक 32 (skanda.7.24.32)

एकः स्नाति सदा माघं प्रयागे नरसत्तमः। अन्यः पश्यति मामत्र फलं ताभ्यां समं स्मृतम्। एकः पिण्डप्रदानं च पितृतीर्थे समाचरेत्। अन्यः पश्यति मामत्र फलं ताभ्यां समं स्मृतम्

ekaḥ snāti sadā māghaṁ prayāge narasattamaḥ| anyaḥ paśyati māmatra phalaṁ tābhyāṁ samaṁ smṛtam| ekaḥ piṇḍapradānaṁ ca pitṛtīrthe samācaret| anyaḥ paśyati māmatra phalaṁ tābhyāṁ samaṁ smṛtam

एक नरश्रेष्ठ सदा माघ मास में प्रयाग में स्नान करे, और दूसरा यहाँ मेरे दर्शन करे—दोनों का फल समान स्मृत है। एक पितृतीर्थ में पिंडदान करे, और दूसरा यहाँ मेरे दर्शन करे—दोनों का फल समान स्मृत है।

श्लोक 33 (skanda.7.24.33)

गोसहस्रप्रदो ह्येको ब्राह्मणे वेदपारगे। एकः पश्यति मामत्र फलं ताभ्यां समं स्मृतम्

gosahasraprado hyeko brāhmaṇe vedapārage| ekaḥ paśyati māmatra phalaṁ tābhyāṁ samaṁ smṛtam

एक वेदपारंगत ब्राह्मण को सहस्र गौएँ दान दे, और एक यहाँ मेरे दर्शन करे—दोनों का फल समान स्मृत है।

श्लोक 34 (skanda.7.24.34)

पञ्चाग्निं साधयेदेको ग्रीष्मकाले सुदारुणे। एकः पश्यति मामत्र फलं ताभ्यां समं स्मृतम्

pañcāgniṁ sādhayedeko grīṣmakāle sudāruṇe| ekaḥ paśyati māmatra phalaṁ tābhyāṁ samaṁ smṛtam

एक अत्यंत भीषण ग्रीष्मकाल में पंचाग्नि साधना करे, और एक यहाँ मेरे दर्शन करे—दोनों का फल समान स्मृत है।

श्लोक 35 (skanda.7.24.35)

स्नातः सोमग्रहे चन्द्र सोमवारे च भक्तितः। यो मां पश्यति सर्वेषामेतेषां लभते फलम्

snātaḥ somagrahe candra somavāre ca bhaktitaḥ| yo māṁ paśyati sarveṣāmeteṣāṁ labhate phalam

हे चंद्र! चंद्रग्रहण में तथा सोमवार को भक्तिपूर्वक स्नान करके जो मेरे दर्शन करता है, वह इन सबका फल प्राप्त करता है।

श्लोक 36 (skanda.7.24.36)

सरस्वती समुद्रश्च सोमः सोमग्रहस्तथा। दर्शनं सोमनाथस्य सकाराः पञ्च दुर्ल्लभाः

sarasvatī samudraśca somaḥ somagrahastathā| darśanaṁ somanāthasya sakārāḥ pañca durllabhāḥ

सरस्वती, समुद्र, सोम, चंद्रग्रहण, तथा सोमनाथ का दर्शन—ये पाँचों 'स' अक्षर वाले दुर्लभ हैं।

श्लोक 37 (skanda.7.24.37)

नैरंतर्येण षण्मासान्विधिना यः प्रपूजयेत्। पुण्यं तदेव सफलं लभते विषुवार्चनात्

nairaṁtaryeṇa ṣaṇmāsānvidhinā yaḥ prapūjayet| puṇyaṁ tadeva saphalaṁ labhate viṣuvārcanāt

जो विधिपूर्वक निरंतर छह मास तक पूजा करे, वही पुण्य विषुव-अर्चन से सफल होकर प्राप्त होता है।

श्लोक 38 (skanda.7.24.38)

एतदेव तु विज्ञेयं ग्रहणे चोत्तरायणे। संक्रांतिदिनच्छिद्रेषु षडशीतिमुखेषु च

etadeva tu vijñeyaṁ grahaṇe cottarāyaṇe| saṁkrāṁtidinacchidreṣu ṣaḍaśītimukheṣu ca

यही ग्रहण के समय, उत्तरायण में, संक्रांति के दिनों तथा उनके मध्यकाल में, और छियासी संक्रमण-मुखों में भी जानना चाहिए।

श्लोक 39 (skanda.7.24.39)

मासैश्चतुर्भिर्यत्पुण्यं विधिनाऽऽपूज्य शंकरम्। कार्त्तिक्यां स लभेत्पुण्यं चैत्र्यां तद्द्विगुणं स्मृतम्। पुण्यमेतत्तु फाल्गुन्यामाषाढ्यामेवमेव तु

māsaiścaturbhiryatpuṇyaṁ vidhinā''pūjya śaṁkaram| kārttikyāṁ sa labhetpuṇyaṁ caitryāṁ taddviguṇaṁ smṛtam| puṇyametattu phālgunyāmāṣāḍhyāmevameva tu

चार मासों तक विधिपूर्वक शंकर की पूजा करने से जो पुण्य मिलता है, वह कार्तिकी पूर्णिमा को प्राप्त होता है; चैत्री में वह दुगुना स्मृत है; यही पुण्य फाल्गुनी तथा आषाढ़ी में भी है।

श्लोक 40 (skanda.7.24.40)

एको दद्याद्गवां लक्षं दोग्ध्रीणां वेदपारगे। एको ममार्चयेल्लिंगं तस्य पुण्यं ततोऽधिकम्

eko dadyādgavāṁ lakṣaṁ dogdhrīṇāṁ vedapārage| eko mamārcayelliṁgaṁ tasya puṇyaṁ tato'dhikam

एक वेदपारंगत को दुधारू गौओं का एक लाख दान दे, और एक मेरे लिंग की अर्चना करे—उसका पुण्य उससे भी अधिक है।

श्लोक 41 (skanda.7.24.41)

मासेमासे च योऽश्नीयाद्यावज्जीवं सुरेश्वरि। यश्चार्च्चयेत्सकृल्लिंगं सममेतन्न संशयः

māsemāse ca yo'śnīyādyāvajjīvaṁ sureśvari| yaścārccayetsakṛlliṁgaṁ samametanna saṁśayaḥ

हे सुरेश्वरि! जो जीवन भर हर मास में (एक बार) भोजन करता है, और जो एक बार लिंग की अर्चना करता है—यह समान है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 42 (skanda.7.24.42)

तपःशीलगुणोपेते पात्रे वेदस्य पारगे। सुवर्णकोटिं यद्दत्त्वा तत्फलं कुसुमेन तु

tapaḥśīlaguṇopete pātre vedasya pārage| suvarṇakoṭiṁ yaddattvā tatphalaṁ kusumena tu

तप, शील और गुणों से युक्त, वेदपारंगत सुपात्र को एक करोड़ स्वर्ण देने से जो फल मिलता है, वही फल एक पुष्प से भी प्राप्त होता है।

श्लोक 43 (skanda.7.24.43)

अर्कपुष्पेऽपि चैकस्मिञ्छिवाय विनिवेदिते। दश दत्त्वा सुवर्णानि यत्फलं तदवाप्नुयात्

arkapuṣpe'pi caikasmiñchivāya vinivedite| daśa dattvā suvarṇāni yatphalaṁ tadavāpnuyāt

और शिव को एक अर्क-पुष्प भी अर्पित करने से, जो फल दस स्वर्ण देने से मिलता है, वही प्राप्त होता है।

श्लोक 44 (skanda.7.24.44)

अर्कपुष्पसहस्रेभ्यः करवीरं विशिष्यते। करवीर सहस्रेभ्यो द्रोणपुष्पं विशिष्यते

arkapuṣpasahasrebhyaḥ karavīraṁ viśiṣyate| karavīra sahasrebhyo droṇapuṣpaṁ viśiṣyate

सहस्र अर्क-पुष्पों से एक करवीर श्रेष्ठ है; सहस्र करवीरों से एक द्रोण-पुष्प श्रेष्ठ है;

श्लोक 45 (skanda.7.24.45)

द्रोणपुष्पसहस्रेभ्यो ह्यपामार्गं विशिष्यते। अपामार्गसहस्रेभ्यः कुशपुष्पं विशिष्यते। कुशपुष्प सहस्रेभ्यः शमीपुष्पं विशिष्यते

droṇapuṣpasahasrebhyo hyapāmārgaṁ viśiṣyate| apāmārgasahasrebhyaḥ kuśapuṣpaṁ viśiṣyate| kuśapuṣpa sahasrebhyaḥ śamīpuṣpaṁ viśiṣyate

सहस्र द्रोण-पुष्पों से एक अपामार्ग श्रेष्ठ है; सहस्र अपामार्गों से एक कुश-पुष्प श्रेष्ठ है; सहस्र कुश-पुष्पों से एक शमी-पुष्प श्रेष्ठ है।

श्लोक 46 (skanda.7.24.46)

शमीपुष्पं बृहत्याश्च कुसुमं तुल्यमुच्यते। करवीरसमा ज्ञेया जातीविजयपाटलाः

śamīpuṣpaṁ bṛhatyāśca kusumaṁ tulyamucyate| karavīrasamā jñeyā jātīvijayapāṭalāḥ

शमी-पुष्प और बृहती का पुष्प समान कहे गए हैं; जाती, विजया और पाटला के पुष्प करवीर के समान जानने चाहिए।

श्लोक 47 (skanda.7.24.47)

श्वेतमंदार कुसुमं सितंपद्मसमं भवेत्। नागचंपकपुन्नागधत्तूरकुसुमं स्मृतम्

śvetamaṁdāra kusumaṁ sitaṁpadmasamaṁ bhavet| nāgacaṁpakapunnāgadhattūrakusumaṁ smṛtam

श्वेत मंदार-पुष्प श्वेत कमल के समान होता है; नाग, चंपक, पुन्नाग और धतूरे का पुष्प भी वैसे ही स्मृत है।

श्लोक 48 (skanda.7.24.48)

केतकीजातिमुक्तं च कन्दयूथीमदन्तिकाः। शिरीषसर्जजंबूककुसुमानि विवर्ज्जयेत्

ketakījātimuktaṁ ca kandayūthīmadantikāḥ| śirīṣasarjajaṁbūkakusumāni vivarjjayet

केतकी, जाती, मुक्त, कंद, यूथी, मदंतिका के पुष्प (शुभ हैं); परंतु शिरीष, सर्ज और जंबूक के पुष्पों का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 49 (skanda.7.24.49)

आकुलीकुसुमं पत्रं करंजेन्द्रसमुद्भवम्। बिभीतकानि पुष्पाणि कुसुमानि विवर्ज्जयेत्

ākulīkusumaṁ patraṁ karaṁjendrasamudbhavam| bibhītakāni puṣpāṇi kusumāni vivarjjayet

आकुली का पुष्प-पत्र, महाकरंज से उत्पन्न पुष्प, तथा बिभीतक के पुष्प—इन पुष्पों का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 50 (skanda.7.24.50)

कनकानि कदंबानि रात्रौ देयानि शंकरे। देवशेषाणि पुष्पाणि दिवा रात्रौ च मल्लिका

kanakāni kadaṁbāni rātrau deyāni śaṁkare| devaśeṣāṇi puṣpāṇi divā rātrau ca mallikā

कनक और कदंब के पुष्प रात्रि में शंकर को अर्पित करने चाहिए; देवता को चढ़ाए हुए शेष पुष्प तथा मल्लिका, दिन और रात्रि दोनों में (प्रयोज्य) हैं।

श्लोक 51 (skanda.7.24.51)

प्रहरं तिष्ठते मल्ली करवीरमहर्निशम्। कीटकेशापविद्धानि रात्रौ पर्युषितानि च

praharaṁ tiṣṭhate mallī karavīramaharniśam| kīṭakeśāpaviddhāni rātrau paryuṣitāni ca

मल्ली-पुष्प एक प्रहर तक ठीक रहता है, करवीर दिन-रात ठीक रहता है। कीड़ों और बालों से युक्त, तथा रात्रि में बासी हुए पुष्प—

श्लोक 52 (skanda.7.24.52)

स्वयं पतितपुष्पाणि त्यजेदुपहतानि च। तुलसी शतपत्रं च गन्धारी दमनस्तथा

svayaṁ patitapuṣpāṇi tyajedupahatāni ca| tulasī śatapatraṁ ca gandhārī damanastathā

—और स्वयं गिरे हुए तथा खंडित पुष्पों को त्याग देना चाहिए। तुलसी, शतपत्र, गंधारी तथा दमन—

श्लोक 53 (skanda.7.24.53)

सर्वासां पत्रजातीनां श्रेष्ठो मरुबकः स्मृतः। एतैः पुष्पविशेषैस्तु पूज्यः सोमेश्वरः सदा

sarvāsāṁ patrajātīnāṁ śreṣṭho marubakaḥ smṛtaḥ| etaiḥ puṣpaviśeṣaistu pūjyaḥ someśvaraḥ sadā

—सभी पत्र-जातियों में मरुबक (मरुआ) श्रेष्ठ स्मृत है। इन्हीं विशेष पुष्पों से सोमेश्वर की सदा पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 54 (skanda.7.24.54)

यात्रायाः फलमाप्नोति स्वर्गलोके महीयते। एतावदुक्त्वा वचनं तत्रैवान्तरधीयत

yātrāyāḥ phalamāpnoti svargaloke mahīyate| etāvaduktvā vacanaṁ tatraivāntaradhīyata

इससे यात्रा का फल प्राप्त होता है और स्वर्गलोक में महिमा प्राप्त होती है। इतना कहकर वे वहीं अंतर्धान हो गए।

श्लोक 55 (skanda.7.24.55)

चन्द्रमा यक्ष्मणा मुक्तः स्वस्थाननिरतोऽभवत्। आहूय विश्वकर्माणं प्रासादं पर्यकल्पयत्। शुद्धस्फटिकसंकाशं गोक्षीरधवलोज्ज्वलम्

candramā yakṣmaṇā muktaḥ svasthānanirato'bhavat| āhūya viśvakarmāṇaṁ prāsādaṁ paryakalpayat| śuddhasphaṭikasaṁkāśaṁ gokṣīradhavalojjvalam

यक्ष्मा से मुक्त हुए चंद्रमा अपने स्थान में रत हो गए। विश्वकर्मा को बुलाकर उन्होंने शुद्ध स्फटिक के समान, गोदुग्ध जैसे उज्ज्वल श्वेत वर्ण का एक प्रासाद बनवाया।

श्लोक 56 (skanda.7.24.56)

प्रासादं मेरुनामानं हेमप्राकारतोरणम्। चतुर्दशान्ये परितः प्रासादाः परिकल्पिताः। तेषां नामानि वक्ष्यामि प्रत्येकं तानि मे शृणु

prāsādaṁ merunāmānaṁ hemaprākāratoraṇam| caturdaśānye paritaḥ prāsādāḥ parikalpitāḥ| teṣāṁ nāmāni vakṣyāmi pratyekaṁ tāni me śṛṇu

'मेरु' नामक उस प्रासाद में सुवर्ण की प्राचीर और तोरण थे। उसके चारों ओर चौदह अन्य प्रासाद बनवाए गए। उनके नाम मैं तुम्हें बताता हूँ, प्रत्येक को सुनो।

श्लोक 57 (skanda.7.24.57)

केसरी सर्वतोभद्रो नदनो नन्दिशालकः। नन्दीशो मन्दरश्चैव श्रीवृक्षो ह्यमृतोद्भवः

kesarī sarvatobhadro nadano nandiśālakaḥ| nandīśo mandaraścaiva śrīvṛkṣo hyamṛtodbhavaḥ

केसरी, सर्वतोभद्र, नदन, नंदिशालक; नंदीश, मंदर, श्रीवृक्ष, अमृतोद्भव,

श्लोक 58 (skanda.7.24.58)

हिमवान्हेमकूटश्च कैलासः पृथिवीजयः। इन्द्रनीलो महानीलो भूधरो रत्नकूटकः

himavānhemakūṭaśca kailāsaḥ pṛthivījayaḥ| indranīlo mahānīlo bhūdharo ratnakūṭakaḥ

हिमवान्, हेमकूट, कैलास, पृथिवीजय; इंद्रनील, महानील, भूधर, रत्नकूटक,

श्लोक 59 (skanda.7.24.59)

वैडूर्यः पद्मरागश्च वज्रको मुकुटोज्ज्वलः। ऐरावतो राजहंसो गरुडो वृषभस्तथा

vaiḍūryaḥ padmarāgaśca vajrako mukuṭojjvalaḥ| airāvato rājahaṁso garuḍo vṛṣabhastathā

वैडूर्य, पद्मराग, वज्रक, मुकुटोज्ज्वल; ऐरावत, राजहंस, गरुड़ तथा वृषभ—

श्लोक 60 (skanda.7.24.60)

मेरुः प्रासादराजा च देवानामालयो हि सः। आदौ पञ्चाण्डको ज्ञेयः केसरीनामतः स्थितः

meruḥ prāsādarājā ca devānāmālayo hi saḥ| ādau pañcāṇḍako jñeyaḥ kesarīnāmataḥ sthitaḥ

—मेरु प्रासादों का राजा है, वही देवताओं का आलय है। प्रारंभ में केसरी नामक पाँच खंडों का जानना चाहिए।

श्लोक 61 (skanda.7.24.61)

चतुर्थांशा च तद्वृद्धिर्यावन्मेरुः प्रकीर्तितः

caturthāṁśā ca tadvṛddhiryāvanmeruḥ prakīrtitaḥ

और उसकी वृद्धि चतुर्थांश से होती है, जब तक कि मेरु कहलाने वाला (सबसे ऊँचा) प्राप्त न हो।

श्लोक 62 (skanda.7.24.62)

एवं पृथक्कारयित्वा प्रासादांश्च चतुर्दश। ब्रह्मादीनां देवतानां समीपस्थानवासिनाम्

evaṁ pṛthakkārayitvā prāsādāṁśca caturdaśa| brahmādīnāṁ devatānāṁ samīpasthānavāsinām

इस प्रकार चौदह प्रासाद पृथक्-पृथक् बनवाकर, ब्रह्मा आदि समीपस्थान-निवासी देवताओं के लिए—

श्लोक 63 (skanda.7.24.63)

दश चान्यान्भूधरादीन्वृषभान्तान्वरानने। आदौ कपर्द्दिनं कृत्वा प्रासादान्पर्यकल्पयत्

daśa cānyānbhūdharādīnvṛṣabhāntānvarānane| ādau kaparddinaṁ kṛtvā prāsādānparyakalpayat

—हे वरानने! तथा भूधर से वृषभ तक अन्य दस के लिए, प्रारंभ में कपर्दी (शिव) को रखकर, प्रासादों की व्यवस्था की।

श्लोक 64 (skanda.7.24.64)

मेरुः प्रासादराजो वै स तु सोमेश्वरे कृतः। त्रेतायुगे तु दशमे मनोवैर्वस्वतस्य च

meruḥ prāsādarājo vai sa tu someśvare kṛtaḥ| tretāyuge tu daśame manovairvasvatasya ca

मेरु ही प्रासादों का राजा है, और वह सोमेश्वर के लिए बनाया गया। वैवस्वत मनु के दसवें त्रेतायुग में—

श्लोक 65 (skanda.7.24.65)

कारयित्वा मंडपांश्च प्रतिष्ठाप्य यथाविधि। नदानां तु शतं कृत्वा वापीकूप सहस्रकम्

kārayitvā maṁḍapāṁśca pratiṣṭhāpya yathāvidhi| nadānāṁ tu śataṁ kṛtvā vāpīkūpa sahasrakam

—मंडप बनवाकर, विधिपूर्वक प्रतिष्ठा कर, सौ नदियाँ तथा सहस्र बावड़ी-कुएँ बनवाकर,

श्लोक 66 (skanda.7.24.66)

गृहाणां तु सहस्राणि दीनानाथाश्रयाणि च। कारयित्वा विधानेन विप्रेभ्यः प्रददौ पृथक्

gṛhāṇāṁ tu sahasrāṇi dīnānāthāśrayāṇi ca| kārayitvā vidhānena viprebhyaḥ pradadau pṛthak

तथा सहस्रों घर, दीन-अनाथों के आश्रय के रूप में, विधिपूर्वक बनवाकर, उन्होंने ब्राह्मणों को पृथक्-पृथक् दिए।

श्लोक 67 (skanda.7.24.67)

निवेश्य नगरं सोमः श्रीसोमेश्वरसन्निधौ। स्वकर्मणां प्रचारार्थमथाभ्यर्थयत द्विजान्

niveśya nagaraṁ somaḥ śrīsomeśvarasannidhau| svakarmaṇāṁ pracārārthamathābhyarthayata dvijān

श्रीसोमेश्वर के समीप एक नगर बसाकर, सोम ने अपने कार्यों के संचालन के लिए द्विजों से प्रार्थना की—

श्लोक 68 (skanda.7.24.68)

सोमोऽस्मि भवतां राजा प्रसादात्परमेष्ठिनः। तथापि विनयेनैव भक्त्या विज्ञापयामि वः

somo'smi bhavatāṁ rājā prasādātparameṣṭhinaḥ| tathāpi vinayenaiva bhaktyā vijñāpayāmi vaḥ

"मैं परमेष्ठी की कृपा से आपका राजा सोम हूँ; तथापि विनयपूर्वक ही भक्ति से आपसे निवेदन करता हूँ।

श्लोक 69 (skanda.7.24.69)

धनं हिरण्यरत्नादि धान्यं व्रीहियवादिकम्। गोमहिष्यादिपशवो वस्त्राणि विविधानि च

dhanaṁ hiraṇyaratnādi dhānyaṁ vrīhiyavādikam| gomahiṣyādipaśavo vastrāṇi vividhāni ca

स्वर्ण-रत्नादि धन, धान्य, चावल-जौ आदि, गौ-भैंस आदि पशु, तथा नाना प्रकार के वस्त्र;

श्लोक 70 (skanda.7.24.70)

कदलीनालिकेराणि तांबूलीपूगमालिनः। मनोऽभिरामचरमा आरामाः परितः स्थिताः

kadalīnālikerāṇi tāṁbūlīpūgamālinaḥ| mano'bhirāmacaramā ārāmāḥ paritaḥ sthitāḥ

केले, नारियल, तांबूल तथा सुपारी की मालाएँ—मनोहर सीमाओं वाले उद्यान चारों ओर स्थित हैं।

श्लोक 71 (skanda.7.24.71)

जंबूद्वीपाधिपाः सर्वे भवतामत्रवासि नाम्। आदेशं च करिष्यंति शिरस्याधाय शोभनम्

jaṁbūdvīpādhipāḥ sarve bhavatāmatravāsi nām| ādeśaṁ ca kariṣyaṁti śirasyādhāya śobhanam

जंबूद्वीप के सभी अधिपति आपके यहाँ निवास के निमित्त आपके आदेश को शिर पर धारण करेंगे।

श्लोक 72 (skanda.7.24.72)

द्वीपांतरादागतैश्च कर्पूरागुरुचंदनैः। अन्यैश्च विविधैर्द्रव्यैः संपूर्णा भवतां गृहाः

dvīpāṁtarādāgataiśca karpūrāgurucaṁdanaiḥ| anyaiśca vividhairdravyaiḥ saṁpūrṇā bhavatāṁ gṛhāḥ

अन्य द्वीपों से आए हुए कर्पूर, अगुरु, चंदन तथा अन्य नाना द्रव्यों से आपके घर पूर्ण होंगे।

श्लोक 73 (skanda.7.24.73)

पण्यानां शतसंख्यानां व्यवहारनिदर्शिनः। ब्रह्मोत्तराणि तन्वंति वणिजो लाभकांक्षिणः

paṇyānāṁ śatasaṁkhyānāṁ vyavahāranidarśinaḥ| brahmottarāṇi tanvaṁti vaṇijo lābhakāṁkṣiṇaḥ

सैकड़ों प्रकार की वस्तुओं के व्यापार में निपुण, लाभ चाहने वाले वणिक् ब्राह्मणों को भेंट देंगे।

श्लोक 74 (skanda.7.24.74)

भवत्सु भृत्यभावेन वर्त्तमाना हितैषिणः। ते चान्ये च तथा पौरा नावसीदंति कर्हिचित्

bhavatsu bhṛtyabhāvena varttamānā hitaiṣiṇaḥ| te cānye ca tathā paurā nāvasīdaṁti karhicit

आपके प्रति सेवक-भाव रखने वाले, हितैषी वे और अन्य नागरिक भी कभी संकट में नहीं पड़ेंगे।

श्लोक 75 (skanda.7.24.75)

एवं संपूर्णविभवैर्भवद्भिः श्रेयसे मम। क्रतुक्रिया वितन्यंतां विधिवद्भूरिदक्षिणाः

evaṁ saṁpūrṇavibhavairbhavadbhiḥ śreyase mama| kratukriyā vitanyaṁtāṁ vidhivadbhūridakṣiṇāḥ

इस प्रकार संपूर्ण वैभव से युक्त होकर, मेरे कल्याण के लिए, आप विधिपूर्वक प्रचुर दक्षिणा सहित यज्ञ-कर्म का विस्तार करें।

श्लोक 76 (skanda.7.24.76)

ब्रह्मादीनि च सर्वाणि प्रवर्तंतामहर्निशम्। दीनांधकृपणादीनां क्रियतामार्तिनाशनम्

brahmādīni ca sarvāṇi pravartaṁtāmaharniśam| dīnāṁdhakṛpaṇādīnāṁ kriyatāmārtināśanam

ब्रह्मादि सभी कर्म दिन-रात चलते रहें; दीन, अंध, कृपण आदि के दुःख का नाश किया जाए।

श्लोक 77 (skanda.7.24.77)

अभ्यागतानामौचित्यादातिथ्यं च विधीयताम्। तीर्थयात्राप्रसंगेन समेतानां महात्मनाम्

abhyāgatānāmaucityādātithyaṁ ca vidhīyatām| tīrthayātrāprasaṁgena sametānāṁ mahātmanām

तीर्थयात्रा के प्रसंग से यहाँ एकत्र हुए महात्माओं का उचित रूप से अतिथ्य किया जाए।

श्लोक 78 (skanda.7.24.78)

ब्रह्मर्षीणामाश्रमेषु दीयतामाश्रयाः सदा। मयात्र स्थापितं लिंगं सर्वकालं दृढव्रताः

brahmarṣīṇāmāśrameṣu dīyatāmāśrayāḥ sadā| mayātra sthāpitaṁ liṁgaṁ sarvakālaṁ dṛḍhavratāḥ

ब्रह्मर्षियों के आश्रमों में सदा आश्रय दिया जाए। हे दृढ़व्रतो! मेरे द्वारा यहाँ सदा के लिए स्थापित इस लिंग की—

श्लोक 79 (skanda.7.24.79)

पवित्रैरुपचारैश्च पूजयंतु द्विजोत्तमाः। अष्टौ प्रमाणपुरुषाः पौराणां कार्यदर्शिनः

pavitrairupacāraiśca pūjayaṁtu dvijottamāḥ| aṣṭau pramāṇapuruṣāḥ paurāṇāṁ kāryadarśinaḥ

—श्रेष्ठ द्विज पवित्र उपचारों से पूजा करें। नागरिकों के कार्य देखने वाले आठ प्रमाण-पुरुष—

श्लोक 80 (skanda.7.24.80)

व्यवहारानवेक्षध्वं स्मृत्याचारविशारदाः। व्यवस्थां मत्कृतामेतां भवंतोऽत्र द्विजोत्तमाः

vyavahārānavekṣadhvaṁ smṛtyācāraviśāradāḥ| vyavasthāṁ matkṛtāmetāṁ bhavaṁto'tra dvijottamāḥ

—स्मृति और आचार में निपुण, व्यवहारों का निरीक्षण करें। हे श्रेष्ठ द्विजो! आप लोग मेरी बनाई इस व्यवस्था को—

श्लोक 81 (skanda.7.24.81)

धारयंतु महात्मानो दिग्गजा इव मेदिनीम्। एवं प्रभुत्वमास्थाय स्थानेऽस्मिञ्छिवशालिनि

dhārayaṁtu mahātmāno diggajā iva medinīm| evaṁ prabhutvamāsthāya sthāne'smiñchivaśālini

—दिग्गजों के समान पृथ्वी को धारण करें।" इस प्रकार इस शिवशाली स्थान में अपना प्रभुत्व स्थापित करके—

श्लोक 82 (skanda.7.24.82)

श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तान्धर्मानाचरत द्विजाः। निशम्य सोमस्य वचो विनीतमिति ते द्विजाः

śrutismṛtipurāṇoktāndharmānācarata dvijāḥ| niśamya somasya vaco vinītamiti te dvijāḥ

"हे द्विजो! श्रुति, स्मृति और पुराणों में कहे गए धर्मों का आचरण करो।" सोम का यह वचन सुनकर वे द्विज विनम्रतापूर्वक—

श्लोक 83 (skanda.7.24.83)

उवाच कौशिकस्तेषु गोत्राणां प्रथमो द्विजः। साधूपदिष्टमस्माकं द्विजराजेन सर्वथा

uvāca kauśikasteṣu gotrāṇāṁ prathamo dvijaḥ| sādhūpadiṣṭamasmākaṁ dvijarājena sarvathā

—उन गोत्रों में प्रथम द्विज कौशिक ने कहा—"हमारे द्विजराज (सोम) ने सर्वथा उत्तम उपदेश दिया है।

श्लोक 84 (skanda.7.24.84)

सर्वमेतत्करिष्यामः किंतु किंचिन्निशामय। नियोगतः पूजयतां शिवनिर्माल्यसेविनाम्

sarvametatkariṣyāmaḥ kiṁtu kiṁcinniśāmaya| niyogataḥ pūjayatāṁ śivanirmālyasevinām

हम यह सब करेंगे, परंतु कुछ सुनिए। नियोगपूर्वक पूजा करने वाले, शिव-निर्माल्य का सेवन करने वालों के लिए—

श्लोक 85 (skanda.7.24.85)

पातित्यं जायतेऽस्माकं श्रुतिस्मृतिविगर्हितम्। श्रुतिस्मृती हि रुद्रस्य यस्मादाज्ञाद्वयं महत्

pātityaṁ jāyate'smākaṁ śrutismṛtivigarhitam| śrutismṛtī hi rudrasya yasmādājñādvayaṁ mahat

—हमें पतन प्राप्त होता है, जो श्रुति-स्मृति द्वारा निंदित है। क्योंकि श्रुति और स्मृति रुद्र की ही दो महान् आज्ञाएँ हैं;

श्लोक 86 (skanda.7.24.86)

कस्तदुल्लंघयेन्मूढः प्राणैः कंठग तैरपि

kastadullaṁghayenmūḍhaḥ prāṇaiḥ kaṁṭhaga tairapi

—इसका उल्लंघन कौन-सा मूढ़ करेगा, चाहे प्राण कंठ में ही क्यों न आ जाएँ?

श्लोक 87 (skanda.7.24.87)

अष्टमूर्तेः पुनर्मूर्त्तावग्नौ देवमुखे मखान्। कुर्वाणाः श्रुतिमार्गेण प्रीणयामोऽखिलं जगत्

aṣṭamūrteḥ punarmūrttāvagnau devamukhe makhān| kurvāṇāḥ śrutimārgeṇa prīṇayāmo'khilaṁ jagat

बल्कि अष्टमूर्ति के देव-मुखरूप अग्नि में यज्ञ करके, श्रुति-मार्ग से हम संपूर्ण जगत् को प्रसन्न करते हैं।

श्लोक 88 (skanda.7.24.88)

जगद्भगवतो रूपं व्यक्तमेत त्पुरद्विषः। मिथो विभिन्नमित्येतदभिन्नं पुनरीश्वरात्

jagadbhagavato rūpaṁ vyaktameta tpuradviṣaḥ| mitho vibhinnamityetadabhinnaṁ punarīśvarāt

यह जगत् त्रिपुरारि भगवान् का ही व्यक्त रूप है; यह परस्पर भिन्न प्रतीत होते हुए भी ईश्वर से अभिन्न ही है।

श्लोक 89 (skanda.7.24.89)

अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः

agnau prāstāhutiḥ samyagādityamupatiṣṭhate| ādityājjāyate vṛṣṭirvṛṣṭerannaṁ tataḥ prajāḥ

अग्नि में सम्यक् डाली गई आहुति सूर्य तक पहुँचती है; सूर्य से वृष्टि होती है, वृष्टि से अन्न, और अन्न से प्रजा।

श्लोक 90 (skanda.7.24.90)

श्रुतिस्मृतिपुराणादिसदभ्यासप्रसंगिनाम्। तत्तदर्थेषु पुण्यार्थं प्रवृत्ताखिलकर्मणाम्

śrutismṛtipurāṇādisadabhyāsaprasaṁginām| tattadartheṣu puṇyārthaṁ pravṛttākhilakarmaṇām

श्रुति-स्मृति-पुराण आदि के सत्-अभ्यास में लगे हुए, उन-उन अर्थों में पुण्य के लिए संपूर्ण कर्मों में प्रवृत्त होने वालों के लिए—

श्लोक 91 (skanda.7.24.91)

अस्माकमवकाशोऽपि विरलो लिंग पूजने। रुद्रजाप्यैर्महायज्ञैर्यजानाश्चैवमीश्वरम्

asmākamavakāśo'pi viralo liṁga pūjane| rudrajāpyairmahāyajñairyajānāścaivamīśvaram

—लिंग-पूजा के लिए हमारे पास अवसर ही विरल है, क्योंकि हम रुद्र-जप और महायज्ञों द्वारा इस प्रकार ईश्वर की उपासना करते हैं।

श्लोक 92 (skanda.7.24.92)

यथाक्षणं यथाकालं लिंगं वेदमुपास्महे। यत्तु तेऽभिमतं सोम श्रीसोमेश्वरपूजनम्। तच्च संपादयिष्यामः सविशेषं महामते

yathākṣaṇaṁ yathākālaṁ liṁgaṁ vedamupāsmahe| yattu te'bhimataṁ soma śrīsomeśvarapūjanam| tacca saṁpādayiṣyāmaḥ saviśeṣaṁ mahāmate

जितना क्षण और समय मिलता है, हम वेदानुसार लिंग की उपासना करते हैं। परंतु हे सोम! जो आपको अभीष्ट श्रीसोमेश्वर की पूजा है, हे महामते! उसे भी हम विशेष रूप से संपन्न करेंगे।

श्लोक 93 (skanda.7.24.93)

येन त्वदीप्सितं सिध्येत्तमुपायं निशामय। गौरीशंकरसंवादं श्रुत्वा भगवतो मुखात्

yena tvadīpsitaṁ sidhyettamupāyaṁ niśāmaya| gaurīśaṁkarasaṁvādaṁ śrutvā bhagavato mukhāt

जिस उपाय से आपकी इच्छा सिद्ध हो, वह सुनिए—भगवान् के मुख से सुनी गई गौरी-शंकर की संवाद को [सुनाते हैं]।

श्लोक 94 (skanda.7.24.94)

नारदः प्राह नः पूर्वं कथयामस्तमेव ते। ब्रह्मदेवद्विषः पूर्वं शतशो दैत्यदानवाः। तपोभिरुग्रैर्विविधैः शंकरं प्रतिपेदिरे

nāradaḥ prāha naḥ pūrvaṁ kathayāmastameva te| brahmadevadviṣaḥ pūrvaṁ śataśo daityadānavāḥ| tapobhirugrairvividhaiḥ śaṁkaraṁ pratipedire

नारद ने हमें पूर्व में यह कहा था, हम वही आपको बताते हैं। पूर्वकाल में सैकड़ों ब्रह्म-देवद्वेषी दैत्य-दानव, नाना उग्र तपों द्वारा शंकर को प्राप्त हुए थे।

श्लोक 95 (skanda.7.24.95)

तेषामत्युग्रतपसामनन्यासक्तचेतसाम्। प्रसादमीश्वरश्चक्रे कारुण्यामृतसागरः

teṣāmatyugratapasāmananyāsaktacetasām| prasādamīśvaraścakre kāruṇyāmṛtasāgaraḥ

उन अत्यंत उग्र तप करने वालों, अनन्य-चित्त वालों पर करुणा के अमृत-सागर ईश्वर ने प्रसन्नता प्रकट की।

श्लोक 96 (skanda.7.24.96)

स हि त्रिभुवनस्वामी देवदेवो महेश्वरः। अपेक्षते वरं दातुं भक्तिमेवानपायिनीम्

sa hi tribhuvanasvāmī devadevo maheśvaraḥ| apekṣate varaṁ dātuṁ bhaktimevānapāyinīm

वे त्रिभुवन के स्वामी, देवाधिदेव महेश्वर, वर देने के लिए केवल अनपायिनी भक्ति की अपेक्षा रखते हैं।

श्लोक 97 (skanda.7.24.97)

ददौ स भुवनैश्वर्य्यप्रायानभिमतान्वरान्। तेषां भक्त्यैव संतुष्टो देवब्रह्मद्विषामपि

dadau sa bhuvanaiśvaryyaprāyānabhimatānvarān| teṣāṁ bhaktyaiva saṁtuṣṭo devabrahmadviṣāmapi

उन्होंने भुवन-ऐश्वर्य के समान अभीष्ट वर दिए; देव-ब्रह्मद्वेषियों की भी भक्ति से ही वे संतुष्ट हुए।

श्लोक 98 (skanda.7.24.98)

ब्रह्मणा विष्णुना चापि यस्यांतो नाधिगम्यते। तस्यातर्क्यप्रभावस्य को नु वेदाशयं प्रभोः

brahmaṇā viṣṇunā cāpi yasyāṁto nādhigamyate| tasyātarkyaprabhāvasya ko nu vedāśayaṁ prabhoḥ

जिनका अंत ब्रह्मा और विष्णु द्वारा भी नहीं पाया जाता, उन अतर्क्य-प्रभाव वाले प्रभु का अभिप्राय कौन जान सकता है?

श्लोक 99 (skanda.7.24.99)

दुर्वृत्तेभ्योऽपि दैत्येभ्यस्तपोभिर्वरदायिनम्। पप्रच्छ स्वच्छ्हृदया पार्वती परमेश्वरम्

durvṛttebhyo'pi daityebhyastapobhirvaradāyinam| papraccha svacchhṛdayā pārvatī parameśvaram

दुराचारी दैत्यों को भी तप से वरदान देने वाले परमेश्वर से, निर्मल हृदय वाली पार्वती ने पूछा—

श्लोक 100 (skanda.7.24.100)

पार्वत्युवाच। भगवन्प्रसादं ते प्राप्य धृष्यंतो भुवनत्रयम्। उपद्रवंतींद्रमुखान्देवान्संक्षोभयंति च

pārvatyuvāca| bhagavanprasādaṁ te prāpya dhṛṣyaṁto bhuvanatrayam| upadravaṁtīṁdramukhāndevānsaṁkṣobhayaṁti ca

पार्वती ने कहा—हे भगवन्! आपकी कृपा प्राप्त कर वे अहंकारी त्रिभुवन को पीड़ित करते हैं, इंद्र आदि देवताओं को उपद्रवित तथा क्षुब्ध करते हैं—

श्लोक 101 (skanda.7.24.101)

वरं ददासि किं तेषां तादृशानां दुरात्मनाम्। जगतः स्वस्तये येषां न मनागपि चेष्टितम्

varaṁ dadāsi kiṁ teṣāṁ tādṛśānāṁ durātmanām| jagataḥ svastaye yeṣāṁ na manāgapi ceṣṭitam

—आप ऐसे दुरात्माओं को वर क्यों देते हैं, जिनका जगत् के कल्याण के लिए तनिक भी प्रयत्न नहीं है?

श्लोक 102 (skanda.7.24.102)

त्वया दत्तवरानेतान्दिव्यान्भोगोपभोगिनः। अवधीर्य तवैश्वर्यं कथं विष्णुर्निहंति च

tvayā dattavarānetāndivyānbhogopabhoginaḥ| avadhīrya tavaiśvaryaṁ kathaṁ viṣṇurnihaṁti ca

आपके दिए वरों से दिव्य भोगों का उपभोग करने वाले इनको, आपके ऐश्वर्य की अवहेलना करके, विष्णु किस प्रकार नष्ट कर देते हैं?

श्लोक 103 (skanda.7.24.103)

हतानां च पुनस्तेषां का गतिः स्याद्वद प्रभो

hatānāṁ ca punasteṣāṁ kā gatiḥ syādvada prabho

और उनके मारे जाने पर उनकी क्या गति होती है? हे प्रभो! बताइए।

श्लोक 104 (skanda.7.24.104)

ईश्वर उवाच। सात्त्विका राजसाश्चैव तामसाश्चेति वै त्रिधा। भवंति लोकास्तेष्वेते तमःप्राया दुरासदाः

īśvara uvāca| sāttvikā rājasāścaiva tāmasāśceti vai tridhā| bhavaṁti lokāsteṣvete tamaḥprāyā durāsadāḥ

ईश्वर ने कहा—सात्त्विक, राजस तथा तामस—इस प्रकार लोक तीन प्रकार के होते हैं। इनमें ये (दैत्य) प्रायः तामस और दुर्गम्य होते हैं।

श्लोक 105 (skanda.7.24.105)

सुरैः सह स्पर्धमानास्तपोभिरपि तामसैः। मां भजंते मुहुर्मोहाज्जगदुत्सादनोद्यताः

suraiḥ saha spardhamānāstapobhirapi tāmasaiḥ| māṁ bhajaṁte muhurmohājjagadutsādanodyatāḥ

देवताओं से स्पर्धा करते हुए, तामसी तपों द्वारा भी, वे मोहवश बार-बार मेरा भजन करते हैं, जगत् के विनाश के लिए तत्पर होते हुए भी।

श्लोक 106 (skanda.7.24.106)

वरं ददामि यत्तेषां भक्तिस्तत्र तु कारणम्। अहं हि भक्त्या सुग्राह्यो नात्र कार्या विचारणा

varaṁ dadāmi yatteṣāṁ bhaktistatra tu kāraṇam| ahaṁ hi bhaktyā sugrāhyo nātra kāryā vicāraṇā

मैं जो उन्हें वर देता हूँ, उसका कारण भक्ति ही है; क्योंकि मैं भक्ति से ही सुगम्य हूँ, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिए।

श्लोक 107 (skanda.7.24.107)

तपोनुरूपानासाद्य वरांस्ते पापकारिणः। विष्णुना यन्निहन्यते तच्च देवि निबोध मे

taponurūpānāsādya varāṁste pāpakāriṇaḥ| viṣṇunā yannihanyate tacca devi nibodha me

तप के अनुरूप वर प्राप्त कर वे पापकारी, विष्णु द्वारा जो नष्ट किए जाते हैं, हे देवी! वह भी मुझसे जानो—

श्लोक 108 (skanda.7.24.108)

अहं हरिश्च यद्भिन्नौ गुणभागोऽत्र कारणम्। परमार्थादभिन्नौ च रहस्यं परमं ह्यदः

ahaṁ hariśca yadbhinnau guṇabhāgo'tra kāraṇam| paramārthādabhinnau ca rahasyaṁ paramaṁ hyadaḥ

—मैं और हरि जो भिन्न प्रतीत होते हैं, उसका कारण गुण-विभाग है; परमार्थतः हम अभिन्न ही हैं—यही परम रहस्य है।

श्लोक 109 (skanda.7.24.109)

आराध्याराधकादिश्च भेदः सामान्य एव नौ। तथा ह्यहमिमां गंगां विष्णोः पादाग्रनिःसृताम्

ārādhyārādhakādiśca bhedaḥ sāmānya eva nau| tathā hyahamimāṁ gaṁgāṁ viṣṇoḥ pādāgraniḥsṛtām

आराध्य-आराधक आदि का भेद हम दोनों में सामान्य मात्र है। इसी प्रकार मैं विष्णु के चरणाग्र से निकली इस गंगा को—

श्लोक 110 (skanda.7.24.110)

वहामि शिरसा भक्त्या त्वदीक्षाशंकितोऽपि सन्। अपि विष्णुस्त्रिभुवनं परित्रातुं व्यवस्थया

vahāmi śirasā bhaktyā tvadīkṣāśaṁkito'pi san| api viṣṇustribhuvanaṁ paritrātuṁ vyavasthayā

—भक्तिपूर्वक शिर पर धारण करता हूँ, यद्यपि तुम्हारी दृष्टि से शंकित भी रहता हूँ। और विष्णु भी त्रिभुवन की रक्षा के लिए व्यवस्थापूर्वक—

श्लोक 111 (skanda.7.24.111)

मामुपास्य चिरं लेभे चक्रं दुष्टनिबर्हणम्। त्वां च तस्य महामायामप्रमेयात्मनो हरेः

māmupāsya ciraṁ lebhe cakraṁ duṣṭanibarhaṇam| tvāṁ ca tasya mahāmāyāmaprameyātmano hareḥ

—मेरी चिरकाल आराधना करके दुष्टों का नाश करने वाला चक्र प्राप्त करता है। और उस अप्रमेय हरि की महामाया तुम्हें—

श्लोक 112 (skanda.7.24.112)

आराधयामि तद्भक्त्या त्रिजगजन्मकारणम्। शिरस्याधाय चान्यां मे शक्तिरूपां तथा हरिः

ārādhayāmi tadbhaktyā trijagajanmakāraṇam| śirasyādhāya cānyāṁ me śaktirūpāṁ tathā hariḥ

—मैं त्रिजगत् की उत्पत्ति का कारण मानकर भक्तिपूर्वक आराधता हूँ। और हरि भी अपने शिर पर मेरी ही शक्ति-रूपा दूसरी मूर्ति धारण करते हैं।

श्लोक 113 (skanda.7.24.113)

अजोऽपि जन्मान्यासाद्य लोकरक्षां करोति वै। हंतुं हिरण्यकशिपुं नरसिंहवपुश्च सः

ajo'pi janmānyāsādya lokarakṣāṁ karoti vai| haṁtuṁ hiraṇyakaśipuṁ narasiṁhavapuśca saḥ

अजन्मा होते हुए भी वे नाना जन्म लेकर लोक-रक्षा करते हैं; हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए वे नृसिंह-रूप हुए—

श्लोक 114 (skanda.7.24.114)

जगज्जिघांसुः शमितो मया शरभ रूपिणा। मां च बाणपरित्राणे त्रिशूलोद्यमकारिणम्

jagajjighāṁsuḥ śamito mayā śarabha rūpiṇā| māṁ ca bāṇaparitrāṇe triśūlodyamakāriṇam

—जगत् के विनाश पर उतारू उस नृसिंह को मैंने शरभ-रूप धारण कर शांत किया। और मुझे भी, बाण की रक्षा में त्रिशूल उठाने वाले को—

श्लोक 115 (skanda.7.24.115)

मानुष्येऽप्यवतारेऽसौ स्तंभयित्वा स लीलया। प्रभावं महिमानं च वर्द्धयन्मामकं हरिः। वरिवस्यति मां नित्यमंतरात्मापि मे विभुः

mānuṣye'pyavatāre'sau staṁbhayitvā sa līlayā| prabhāvaṁ mahimānaṁ ca varddhayanmāmakaṁ hariḥ| varivasyati māṁ nityamaṁtarātmāpi me vibhuḥ

—मानव अवतारों में भी लीलापूर्वक स्तंभित करके, मेरा प्रभाव और महिमा बढ़ाते हुए हरि सदा मेरी सेवा करते हैं; वे विभु मेरी ही अंतरात्मा हैं।

श्लोक 116 (skanda.7.24.116)

अथाहं परमात्मानमेनमाद्यंतवर्जितम्। ध्यानयोगैः समाधौ च भावयामि निरंतरम्

athāhaṁ paramātmānamenamādyaṁtavarjitam| dhyānayogaiḥ samādhau ca bhāvayāmi niraṁtaram

और मैं भी आदि-अंत रहित इस परमात्मा का ध्यान-योग तथा समाधि द्वारा निरंतर भावन करता हूँ।

श्लोक 117 (skanda.7.24.117)

तदेवं नावयोर्भेदो विद्यते पारमार्थिकः। भेदं च तारतम्यं च मूढा एव वितन्वते

tadevaṁ nāvayorbhedo vidyate pāramārthikaḥ| bhedaṁ ca tāratamyaṁ ca mūḍhā eva vitanvate

इस प्रकार हम दोनों में वस्तुतः कोई भेद नहीं है; भेद और तारतम्य तो मूढ़ ही रचते हैं।

श्लोक 118 (skanda.7.24.118)

वैष्णवं रूपमास्थाय दुर्वृत्तान्हन्मि तानहम्। गतिं च तेषामधुना महेश्वरि निशामय

vaiṣṇavaṁ rūpamāsthāya durvṛttānhanmi tānaham| gatiṁ ca teṣāmadhunā maheśvari niśāmaya

वैष्णव रूप धारण करके मैं स्वयं उन दुष्टों का वध करता हूँ। हे महेश्वरि! अब उनकी गति सुनो।

श्लोक 119 (skanda.7.24.119)

मयि भक्त्यवसाने तु हरेः संदर्शनेन च। क्रोधदर्पाभिभूतत्वान्न मुक्तिं प्राप्नुवंति ते

mayi bhaktyavasāne tu hareḥ saṁdarśanena ca| krodhadarpābhibhūtatvānna muktiṁ prāpnuvaṁti te

मुझ पर की भक्ति की समाप्ति पर, हरि के दर्शन से क्रोध और दर्प से अभिभूत होने के कारण, वे मुक्ति नहीं पाते—

श्लोक 120 (skanda.7.24.120)

आवयोस्तु प्रभावेन ते पुनर्द्धौतकल्मषाः। ब्रह्मर्षीणां कुले जन्म संप्राप्ता मुक्तिहेतुकम्

āvayostu prabhāvena te punarddhautakalmaṣāḥ| brahmarṣīṇāṁ kule janma saṁprāptā muktihetukam

—परंतु हम दोनों के प्रभाव से वे पुनः पापमुक्त होकर, मुक्ति के हेतुभूत ब्रह्मर्षियों के कुल में जन्म पाते हैं।

श्लोक 121 (skanda.7.24.121)

ब्रह्मचारिव्रता दूर्ध्वं योगं पाशुपतं श्रिताः। प्राचीनकर्मसंस्कारात्ते पुनर्मामुपासते

brahmacārivratā dūrdhvaṁ yogaṁ pāśupataṁ śritāḥ| prācīnakarmasaṁskārātte punarmāmupāsate

ब्रह्मचर्य-व्रत धारण कर, ऊर्ध्व पाशुपत योग का आश्रय लेकर, पूर्व-कर्म के संस्कार से वे पुनः मेरी उपासना करते हैं।

श्लोक 122 (skanda.7.24.122)

भक्तियोगेन चास्थाय व्रतं पाशुपतादिकम्। श्मशानवासिनो नग्ना अपरे चैकवाससः

bhaktiyogena cāsthāya vrataṁ pāśupatādikam| śmaśānavāsino nagnā apare caikavāsasaḥ

भक्तियोग से पाशुपत आदि व्रत धारण कर, श्मशानवासी, नग्न, अथवा एक वस्त्र धारण करने वाले—

श्लोक 123 (skanda.7.24.123)

भिक्षाभुजो भूतिभृतो मल्लिंगान्यर्च्चयंति ते। तथा मदेकाग्रधियो मद्ध्यानैकदृढव्रताः

bhikṣābhujo bhūtibhṛto malliṁgānyarccayaṁti te| tathā madekāgradhiyo maddhyānaikadṛḍhavratāḥ

भिक्षा से जीविका करने वाले, भस्म धारण करने वाले, वे मेरे लिंगों की अर्चना करते हैं; तथा मेरे ही ध्यान में एकाग्रचित्त, दृढ़ व्रत वाले होते हैं।

श्लोक 124 (skanda.7.24.124)

ये त्वामपि नमस्यंति जगतां मम चेश्वरीम्। देहावसानयोगेन मुक्तिं तेषां ददाम्यहम्

ye tvāmapi namasyaṁti jagatāṁ mama ceśvarīm| dehāvasānayogena muktiṁ teṣāṁ dadāmyaham

जो जगत् की तथा मेरी भी ईश्वरी रूप तुम्हें भी नमस्कार करते हैं, उन्हें मैं देह के अंत में योग द्वारा मुक्ति देता हूँ।

श्लोक 125 (skanda.7.24.125)

सारूप्यसालोक्यमयीं मय्यावेशितचेतसाम्। सायुज्यमुक्तये नायं योगः पाशुपतो यतः। स्मृत्याचारेण मुनिभिः स सद्भिस्तेन गर्हितः

sārūpyasālokyamayīṁ mayyāveśitacetasām| sāyujyamuktaye nāyaṁ yogaḥ pāśupato yataḥ| smṛtyācāreṇa munibhiḥ sa sadbhistena garhitaḥ

जिनका चित्त मुझमें लीन है, उनके लिए यह सारूप्य और सालोक्य रूपी योग है; सायुज्य-मुक्ति के लिए यह पाशुपत योग नहीं है, क्योंकि स्मृति और आचार के अनुसार मुनियों तथा सज्जनों द्वारा उसे उस प्रयोजन के लिए निंदित माना गया है।

श्लोक 126 (skanda.7.24.126)

द्विजा ऊचुः। तीर्थयात्राप्रसंगेन तानि होपगतान्द्विजान्। स्वमानमुपनेष्यामो भक्त्यावर्ज्जितमानसान्

dvijā ūcuḥ| tīrthayātrāprasaṁgena tāni hopagatāndvijān| svamānamupaneṣyāmo bhaktyāvarjjitamānasān

द्विजों ने कहा—तीर्थयात्रा के प्रसंग से यहाँ आने वाले उन द्विजों को, भक्ति से आकृष्ट-चित्त वालों को, हम अपना मान प्रदान करेंगे।

श्लोक 127 (skanda.7.24.127)

शुचिभिक्षान्नकौपीनकमण्डल्वादिसत्कृताः। अनन्यकार्य्याः सततमिहागत्य तपस्विनः

śucibhikṣānnakaupīnakamaṇḍalvādisatkṛtāḥ| ananyakāryyāḥ satatamihāgatya tapasvinaḥ

शुद्ध भिक्षान्न, कौपीन, कमंडलु आदि से युक्त, अन्य किसी कार्य में न लगे तपस्वी, जो सतत यहाँ आते हैं,

श्लोक 128 (skanda.7.24.128)

भवत्प्रदत्तैर्विविधैरुपहारैरतंद्रिताः। तत्त्वतस्तत्त्वसंख्यास्ते शिवधर्मैकतत्पराः

bhavatpradattairvividhairupahārairataṁdritāḥ| tattvatastattvasaṁkhyāste śivadharmaikatatparāḥ

आपके द्वारा दिए गए नाना उपहारों से अथक, वस्तुतः तत्त्व-संख्या से युक्त, शिव-धर्म में एकमात्र तत्पर—

श्लोक 129 (skanda.7.24.129)

श्रीसोमेश्वरमभ्यर्च्य तव श्रेयोऽभिवर्द्धकाः। मुक्तिमंते गमिष्यंति देवस्यातिसुदुर्ल्लभाम्

śrīsomeśvaramabhyarcya tava śreyo'bhivarddhakāḥ| muktimaṁte gamiṣyaṁti devasyātisudurllabhām

—श्रीसोमेश्वर की अर्चना करके, आपके कल्याण को बढ़ाते हुए, अंत में देव की अत्यंत दुर्लभ मुक्ति को प्राप्त करेंगे।

श्लोक 130 (skanda.7.24.130)

ततोऽन्येऽथ ततोऽप्यन्ये ततश्चान्ये तपोधना। परीक्षितास्तु तेऽस्माभिर्भवितारो निशापते

tato'nye'tha tato'pyanye tataścānye tapodhanā| parīkṣitāstu te'smābhirbhavitāro niśāpate

हे निशापते! उसके बाद अन्य, फिर उनके भी बाद अन्य, फिर और भी अन्य तपोधन—वे हमारे द्वारा परीक्षित होकर ऐसे ही होते रहेंगे।

श्लोक 131 (skanda.7.24.131)

द्विजा ऊचुः। इत्याह भगवान्देव्या पृष्टः स च त्रिलोचनः। तत्रैव नारदः सर्वं संवादं शिवयेरितम्

dvijā ūcuḥ| ityāha bhagavāndevyā pṛṣṭaḥ sa ca trilocanaḥ| tatraiva nāradaḥ sarvaṁ saṁvādaṁ śivayeritam

द्विजों ने कहा—देवी द्वारा पूछे जाने पर त्रिलोचन भगवान् ने ऐसा कहा; वहीं नारद ने शिव द्वारा कहा गया संपूर्ण संवाद सुना।

श्लोक 132 (skanda.7.24.132)

श्रुत्वा नः कथयामास कथां गोष्ठीषु पृच्छताम्। तव चास्माभिरधुना सर्वमेतदुदीरितम्

śrutvā naḥ kathayāmāsa kathāṁ goṣṭhīṣu pṛcchatām| tava cāsmābhiradhunā sarvametadudīritam

उसे सुनकर उन्होंने पूछने वालों की सभाओं में हमें यह कथा सुनाई; वही सब अब हमने आपको बताया।

श्लोक 133 (skanda.7.24.133)

एवमुक्तस्तु तैः प्रीतः सोमः स्वभवनं ययौ। तदाज्ञया च तत्सर्वं यथोक्तं तेऽपि कुर्वते

evamuktastu taiḥ prītaḥ somaḥ svabhavanaṁ yayau| tadājñayā ca tatsarvaṁ yathoktaṁ te'pi kurvate

इस प्रकार उनके द्वारा कहे जाने पर प्रसन्न होकर सोम अपने भवन को गए; और उनकी आज्ञा से वे सब कुछ जैसा कहा गया था वैसा ही करने लगे।

श्लोक 134 (skanda.7.24.134)

देव्युवाच। एवं प्रभावो देवेशः सोमेशः पापनाशनः। केनोपायेन तुष्येत व्रतेन नियमेन वा

devyuvāca| evaṁ prabhāvo deveśaḥ someśaḥ pāpanāśanaḥ| kenopāyena tuṣyeta vratena niyamena vā

देवी ने कहा—इस प्रकार महाप्रभावशाली, पापनाशक देवेश सोमेश किस उपाय से, किस व्रत या नियम से प्रसन्न होते हैं?

श्लोक 135 (skanda.7.24.135)

ईश्वर उवाच। कथयामि स्फुटं धर्म्मं मानुषाणां हिताय वै। स येन तुष्यते देवः शृणु त्वं सुरसुन्दरि

īśvara uvāca| kathayāmi sphuṭaṁ dharmmaṁ mānuṣāṇāṁ hitāya vai| sa yena tuṣyate devaḥ śṛṇu tvaṁ surasundari

ईश्वर ने कहा—मनुष्यों के हित के लिए मैं स्पष्ट धर्म बताता हूँ। हे सुरसुंदरि! सुनो, वह देव किससे प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 136 (skanda.7.24.136)

नित्योपवासनक्तानि व्रतानि विविधानि च। तीर्थे दानानि सर्वाणि पात्रे दत्तान्यशेषतः

nityopavāsanaktāni vratāni vividhāni ca| tīrthe dānāni sarvāṇi pātre dattānyaśeṣataḥ

नित्य उपवास, नक्त-व्रत तथा नाना प्रकार के व्रत; तीर्थ में सुपात्र को दिए गए संपूर्ण दान—

श्लोक 137 (skanda.7.24.137)

तपश्च तप्तं तेनैव स्नातं तेनैव पुष्करे। केदारे तु जलं तेन गत्वा पीतं तु निश्चितम्

tapaśca taptaṁ tenaiva snātaṁ tenaiva puṣkare| kedāre tu jalaṁ tena gatvā pītaṁ tu niścitam

—उसी से किया गया तप, उसी से पुष्कर में किया गया स्नान, केदार जाकर निश्चय ही वहाँ का जल पिया गया—

श्लोक 138 (skanda.7.24.138)

तेन दृष्टं वरारोहे ज्योतिर्लिंगं महाप्रभम्। सोमवारव्रतं दिव्यं येन चीर्णं तु संश्रये

tena dṛṣṭaṁ varārohe jyotirliṁgaṁ mahāprabham| somavāravrataṁ divyaṁ yena cīrṇaṁ tu saṁśraye

—उसी से, हे वरारोहे! महाप्रभावशाली ज्योतिर्लिंग का दर्शन भी किया गया—जिसने दिव्य सोमवार-व्रत का पालन किया, उसने यह सब प्राप्त किया।

श्लोक 139 (skanda.7.24.139)

किमन्यैर्बहुभिर्दानैर्दत्तैः पात्रेषु सुन्दरि

kimanyairbahubhirdānairdattaiḥ pātreṣu sundari

हे सुंदरि! सुपात्रों को दिए गए अन्य अनेक दानों से क्या लाभ?

श्लोक 140 (skanda.7.24.140)

पूजितं येन भावेन सोमवारदिनाष्ट कम्। तेन सर्वं कृतं देवि चीर्णं तत्र महाव्रतम्

pūjitaṁ yena bhāvena somavāradināṣṭa kam| tena sarvaṁ kṛtaṁ devi cīrṇaṁ tatra mahāvratam

जिसने आठ सोमवार सच्चे भाव से पूजा की, हे देवी! उसने ही वह सब किया, उसी ने वहाँ महाव्रत का पालन किया।

श्लोक 141 (skanda.7.24.141)

इतिहासमिमं पूर्वं कथयामि तव प्रिये। यथावृत्तं महादेवि सोमवारव्रतं प्रति

itihāsamimaṁ pūrvaṁ kathayāmi tava priye| yathāvṛttaṁ mahādevi somavāravrataṁ prati

हे प्रिये! हे महादेवी! सोमवार-व्रत के विषय में जो पूर्वकाल में घटित हुआ, वह इतिहास अब मैं तुम्हें सुनाता हूँ।

श्लोक 142 (skanda.7.24.142)

ईश्वर उवाच। कैलासस्य महेशानि उत्तरे च व्यवस्थिता। निषधोपरि विस्तीर्णा पुरी नाम स्वयंप्रभा

īśvara uvāca| kailāsasya maheśāni uttare ca vyavasthitā| niṣadhopari vistīrṇā purī nāma svayaṁprabhā

ईश्वर ने कहा—हे महेशानि! कैलास के उत्तर में, निषध पर्वत के ऊपर, स्वयंप्रभा नामक एक विस्तीर्ण नगरी स्थित थी।

श्लोक 143 (skanda.7.24.143)

नानारत्नसुशोभाढ्या नानागन्धर्वसंकुला। सर्वावयवसंपूर्णा शक्रस्येवामरावती

nānāratnasuśobhāḍhyā nānāgandharvasaṁkulā| sarvāvayavasaṁpūrṇā śakrasyevāmarāvatī

नाना रत्नों से सुशोभित, नाना गंधर्वों से भरी हुई, सभी अंगों से संपूर्ण, इंद्र की अमरावती के समान।

श्लोक 144 (skanda.7.24.144)

घनवाहननामा च गन्धर्वस्तत्र तिष्ठति। भुंक्ते तत्र महाभोगान्देवैरपि सुदुर्लभान्

ghanavāhananāmā ca gandharvastatra tiṣṭhati| bhuṁkte tatra mahābhogāndevairapi sudurlabhān

वहाँ घनवाहन नामक एक गंधर्व निवास करता था। वह वहाँ देवताओं के लिए भी दुर्लभ महान् भोगों का उपभोग करता था।

श्लोक 145 (skanda.7.24.145)

नवयौवनसंयुक्ता भार्या तस्य मनोहरा। प्रौढवाक्या सुशीला च पीनोन्नतपयोधरा

navayauvanasaṁyuktā bhāryā tasya manoharā| prauḍhavākyā suśīlā ca pīnonnatapayodharā

उसकी पत्नी नवयौवन से युक्त, मनोहर, प्रौढ़ वाणी वाली, सुशील तथा पुष्ट-उन्नत स्तनों वाली थी।

श्लोक 146 (skanda.7.24.146)

तया सार्द्धं तु सम्भोगान्भुंक्ते गंधर्वनायकः। उत्पन्ना तस्य कालेन पुत्री पुत्राष्टकोपरि

tayā sārddhaṁ tu sambhogānbhuṁkte gaṁdharvanāyakaḥ| utpannā tasya kālena putrī putrāṣṭakopari

उसके साथ वह गंधर्वनायक भोग-विलास का उपभोग करता था। समय आने पर उसे आठ पुत्रों के बाद एक पुत्री उत्पन्न हुई।

श्लोक 147 (skanda.7.24.147)

सर्वावयवसंपन्ना सर्वविज्ञानवेदिनी। गंधर्वसेना विख्याता नाम्ना सा परमेश्वरि

sarvāvayavasaṁpannā sarvavijñānavedinī| gaṁdharvasenā vikhyātā nāmnā sā parameśvari

सभी अंगों से संपन्न, सभी विद्याओं को जानने वाली, हे परमेश्वरि! वह गंधर्वसेना नाम से विख्यात हुई।

श्लोक 148 (skanda.7.24.148)

कन्यानां तु सहस्रेषु प्रवरा रूपशालिनी। कौतूहलेन सा पित्रा प्रोक्ता क्रीडस्व भामिनि

kanyānāṁ tu sahasreṣu pravarā rūpaśālinī| kautūhalena sā pitrā proktā krīḍasva bhāmini

सहस्रों कन्याओं में रूपशालिनी श्रेष्ठा, उसे उसके पिता ने कौतूहलवश कहा—"हे भामिनि! क्रीड़ा करो—

श्लोक 149 (skanda.7.24.149)

उद्याने रमणीयेऽत्र नानाद्रुमलताकुले। वृक्षैरनेकैः संकीर्णे फलपुष्पसमन्विते

udyāne ramaṇīye'tra nānādrumalatākule| vṛkṣairanekaiḥ saṁkīrṇe phalapuṣpasamanvite

—इस रमणीय उद्यान में, जो नाना वृक्षों और लताओं से भरा है, अनेक वृक्षों से भरपूर, फल-फूलों से युक्त है।"

श्लोक 150 (skanda.7.24.150)

एवं सा रमते नित्यं कन्यापरिवृता सदा। एवं दृष्ट्वा क्रीडमाना माता भर्तारमब्रवीत्

evaṁ sā ramate nityaṁ kanyāparivṛtā sadā| evaṁ dṛṣṭvā krīḍamānā mātā bhartāramabravīt

इस प्रकार वह सदा कन्याओं से घिरी हुई वहाँ क्रीड़ा करती थी। उसे इस प्रकार खेलते देखकर माता ने पति से कहा—

श्लोक 151 (skanda.7.24.151)

जीवितं निष्फलं स्वामिन्मम ते सह बांधवैः। यस्येदृशी गृहे कन्या तिष्ठते भर्तृवर्ज्जिता

jīvitaṁ niṣphalaṁ svāminmama te saha bāṁdhavaiḥ| yasyedṛśī gṛhe kanyā tiṣṭhate bhartṛvarjjitā

"हे स्वामिन्! मेरा और आपका बांधवों सहित जीवन व्यर्थ है, जिसके घर में ऐसी कन्या पति के बिना ही रहती है।"

श्लोक 152 (skanda.7.24.152)

इत्युक्तः स तु गंधर्वो भार्यां वचनमब्रवीत्। अन्वेषयामि भर्त्तारं पुत्र्यर्थे तु मनोहरम्

ityuktaḥ sa tu gaṁdharvo bhāryāṁ vacanamabravīt| anveṣayāmi bharttāraṁ putryarthe tu manoharam

ऐसा कहे जाने पर उस गंधर्व ने पत्नी से कहा—"मैं पुत्री के लिए एक मनोहर वर की खोज करता हूँ।"

श्लोक 153 (skanda.7.24.153)

इत्युक्त्वाऽऽह्वापयामास पुत्रीं तां घनवाहनः। आहूता पितृमातृभ्यां त्वरिताऽऽगत्य सुन्दरि

ityuktvā''hvāpayāmāsa putrīṁ tāṁ ghanavāhanaḥ| āhūtā pitṛmātṛbhyāṁ tvaritā''gatya sundari

ऐसा कहकर घनवाहन ने अपनी उस पुत्री को बुलवाया; हे सुंदरि! माता-पिता द्वारा बुलाई गई वह शीघ्र ही आ पहुँची,

श्लोक 154 (skanda.7.24.154)

अनुक्रमेण सर्वेषां पतिता पादयोः शुभा। आदेशं देहि मे तात कि नु कार्यं मयाऽऽधुना

anukrameṇa sarveṣāṁ patitā pādayoḥ śubhā| ādeśaṁ dehi me tāta ki nu kāryaṁ mayā''dhunā

और क्रमशः सभी के चरणों में गिरी, वह शुभा—"हे तात! मुझे आदेश दीजिए, अब मुझे क्या करना है?"

श्लोक 155 (skanda.7.24.155)

उक्तं च घनवाहेन हर्षितेन वचस्ततः। हे पुत्रि तव यः कश्चिद्वरः संप्रति रोचते। दिव्यं द्रक्ष्ये त्वत्सदृशं गंधर्वाणां शिरोमणिम्

uktaṁ ca ghanavāhena harṣitena vacastataḥ| he putri tava yaḥ kaścidvaraḥ saṁprati rocate| divyaṁ drakṣye tvatsadṛśaṁ gaṁdharvāṇāṁ śiromaṇim

तब घनवाहन ने हर्षित होकर कहा—"हे पुत्री! तुम्हें अभी जो भी वर पसंद हो, मैं तुम्हारे ही समान गंधर्वों में श्रेष्ठ एक दिव्य वर ढूँढ़ूँगा।"

श्लोक 156 (skanda.7.24.156)

इत्युक्ता क्रोधताम्राक्षी पितरं वाक्यमब्रवीत्। मम रूपस्य कोट्यंशे किं कोप्यस्ति जगत्त्रये। तच्छ्रुत्वा चाद्भुतं वाक्यं पिता माता च मोहितौ

ityuktā krodhatāmrākṣī pitaraṁ vākyamabravīt| mama rūpasya koṭyaṁśe kiṁ kopyasti jagattraye| tacchrutvā cādbhutaṁ vākyaṁ pitā mātā ca mohitau

ऐसा कहे जाने पर, क्रोध से लाल नेत्रों वाली उसने पिता से कहा—"क्या तीनों लोकों में मेरे रूप के करोड़वें अंश के भी समान कोई है?" यह अद्भुत वचन सुनकर पिता और माता दोनों मोहित हो गए,

श्लोक 157 (skanda.7.24.157)

सर्वे विषादमापन्ना बांधवाश्च परे जनाः। अशोभनमिदं वाक्यं कन्यया यत्प्रभाषितम्। इत्युक्त्वा तु गताः सर्वे जननीजनबांधवाः

sarve viṣādamāpannā bāṁdhavāśca pare janāḥ| aśobhanamidaṁ vākyaṁ kanyayā yatprabhāṣitam| ityuktvā tu gatāḥ sarve jananījanabāṁdhavāḥ

और सभी बांधव तथा अन्य लोग विषाद को प्राप्त हुए—"कन्या द्वारा कहा गया यह वचन अशोभनीय है," ऐसा कहकर माता, अन्य जन तथा बांधव सभी चले गए।

श्लोक 158 (skanda.7.24.158)

सा तत्रैव महोद्याने रमते सखिसंयुता। हिंडोलके समारूढा वसंते मासि भामिनि

sā tatraiva mahodyāne ramate sakhisaṁyutā| hiṁḍolake samārūḍhā vasaṁte māsi bhāmini

वह हे भामिनि! वहीं उस महान् उद्यान में सखियों सहित क्रीड़ा करती रही, वसंत मास में झूले पर सवार होकर।

श्लोक 159 (skanda.7.24.159)

तावद्दिव्यविमानस्थः शिखण्डी गणनायकः। गच्छन्खे ददृशे कन्यां रूपौदार्य्यसमाकुलाम्

tāvaddivyavimānasthaḥ śikhaṇḍī gaṇanāyakaḥ| gacchankhe dadṛśe kanyāṁ rūpaudāryyasamākulām

उसी समय दिव्य विमान में स्थित गणनायक शिखंडी आकाश में जाते हुए उस रूप और औदार्य से युक्त कन्या को देख पड़े।

श्लोक 160 (skanda.7.24.160)

गीतवाद्येन नृत्येन रमतीं दुदुभिस्वनैः। स माध्याह्निकसंध्यायामवतीर्य विमानतः

gītavādyena nṛtyena ramatīṁ dudubhisvanaiḥ| sa mādhyāhnikasaṁdhyāyāmavatīrya vimānataḥ

गीत-वाद्य और नृत्य से दुंदुभि-ध्वनि सहित क्रीड़ा करती हुई उसे देखकर, वे मध्याह्न-संध्या के समय विमान से उतरे,

श्लोक 161 (skanda.7.24.161)

क्रीडमानोऽप्सरोभिस्तु तत्रोद्याने स्थितस्ततः। शुश्राव वाक्यं कन्याया गंधर्वदुहितुस्तदा

krīḍamāno'psarobhistu tatrodyāne sthitastataḥ| śuśrāva vākyaṁ kanyāyā gaṁdharvaduhitustadā

और अप्सराओं सहित वहाँ उद्यान में क्रीड़ा करते हुए स्थित होकर, उन्होंने तब उस गंधर्व-पुत्री कन्या का वचन सुना—

श्लोक 162 (skanda.7.24.162)

न कोऽपि सदृशो लोके मम रूपेण दृश्यते। देवो वा दानवो वापि कोट्यंशे मम रूपतः

na ko'pi sadṛśo loke mama rūpeṇa dṛśyate| devo vā dānavo vāpi koṭyaṁśe mama rūpataḥ

"संसार में मेरे रूप के समान कोई भी दिखाई नहीं देता—न देव, न दानव—मेरे रूप के करोड़वें अंश के भी बराबर।"

श्लोक 163 (skanda.7.24.163)

इति वाक्यं ततः श्रुत्वा गणः क्रोधसमन्वितः। शशाप तां सुचार्वंगीं साहंकारां गणेश्वरः

iti vākyaṁ tataḥ śrutvā gaṇaḥ krodhasamanvitaḥ| śaśāpa tāṁ sucārvaṁgīṁ sāhaṁkārāṁ gaṇeśvaraḥ

यह वचन सुनकर वह गण क्रोध से भर गया; उस गणेश्वर ने अहंकार से युक्त उस सुंदर-अंगी को शाप दिया—

श्लोक 164 (skanda.7.24.164)

गण उवाच। मां दृष्ट्वा यद्विशालाक्षि रूपसौभाग्यगर्विता। समाक्षिपसि गंधर्वान्देवाद्यांश्चैव गर्विता

gaṇa uvāca| māṁ dṛṣṭvā yadviśālākṣi rūpasaubhāgyagarvitā| samākṣipasi gaṁdharvāndevādyāṁścaiva garvitā

गण ने कहा—"हे विशालाक्षी! मुझे देखे बिना ही, अपने रूप-सौभाग्य के अहंकार से गर्वित होकर तुम गंधर्वों, देवताओं आदि सभी की अवहेलना करती हो—

श्लोक 165 (skanda.7.24.165)

तस्मात्ते गर्वसंयुक्ते कुष्ठमंगे भविष्यति। श्रुत्वा शापं ततः कन्या भयभीता तपस्विनी

tasmātte garvasaṁyukte kuṣṭhamaṁge bhaviṣyati| śrutvā śāpaṁ tataḥ kanyā bhayabhītā tapasvinī

—इसलिए हे गर्व से युक्त! तुम्हारे शरीर पर कुष्ठ रोग होगा।" शाप सुनकर वह कन्या, तपस्विनी होकर भयभीत हो गई,

श्लोक 166 (skanda.7.24.166)

साष्टांगं प्रणिपत्याथानुग्रहार्थमयाचत। भगवन्मम दीनायाः शापस्यानुग्रहं प्रभो। प्रयच्छ त्वं महा भाग नैवं कर्त्री पुनः क्वचित्

sāṣṭāṁgaṁ praṇipatyāthānugrahārthamayācata| bhagavanmama dīnāyāḥ śāpasyānugrahaṁ prabho| prayaccha tvaṁ mahā bhāga naivaṁ kartrī punaḥ kvacit

और साष्टांग प्रणाम करके अनुग्रह के लिए याचना की—"हे भगवन्! हे प्रभो! मुझ दीना पर शाप का अनुग्रह कीजिए। हे महाभाग! मैं फिर कभी ऐसा नहीं करूँगी।"

श्लोक 167 (skanda.7.24.167)

इत्युक्तस्तव कारुण्याच्छिखण्डी गणनायकः। अनुग्रहं ददौ तस्या गंधर्वदुहितुस्तदा

ityuktastava kāruṇyācchikhaṇḍī gaṇanāyakaḥ| anugrahaṁ dadau tasyā gaṁdharvaduhitustadā

ऐसा कहे जाने पर, करुणावश गणनायक शिखंडी ने उस गंधर्व-पुत्री को अनुग्रह प्रदान किया—

श्लोक 168 (skanda.7.24.168)

शिखण्ड्युवाच। जातिरूपेण संयुक्तो विद्याहंकारसंपदा। यो येन गर्वितः प्राणी स तं प्राप्य विनश्यति

śikhaṇḍyuvāca| jātirūpeṇa saṁyukto vidyāhaṁkārasaṁpadā| yo yena garvitaḥ prāṇī sa taṁ prāpya vinaśyati

शिखंडी ने कहा—"जो भी प्राणी जाति, रूप, विद्या या अहंकारयुक्त संपदा से गर्वित होता है, वह उसी को पाकर नष्ट हो जाता है।

श्लोक 169 (skanda.7.24.169)

तस्माद्गर्वो नैव कार्यो गर्वस्यैतत्फलं स्मृतम्। शृणुष्वानुग्रहं बाले श्रुत्वा चैवावधारय

tasmādgarvo naiva kāryo garvasyaitatphalaṁ smṛtam| śṛṇuṣvānugrahaṁ bāle śrutvā caivāvadhāraya

इसलिए गर्व कभी नहीं करना चाहिए, यह गर्व का फल स्मृत है। हे बाले! अनुग्रह सुनो और सुनकर उसे धारण करो।

श्लोक 170 (skanda.7.24.170)

हिमवद्वनमध्यस्थो गोशृंग ऋषिपुंगवः। करिष्यत्युपकारं स एवमुक्त्वा गतः प्रिये

himavadvanamadhyastho gośṛṁga ṛṣipuṁgavaḥ| kariṣyatyupakāraṁ sa evamuktvā gataḥ priye

हिमालय के वन के मध्य स्थित ऋषिश्रेष्ठ गोशृंग तुम्हारी सहायता करेंगे।" ऐसा कहकर वे हे प्रिये! चले गए।

श्लोक 171 (skanda.7.24.171)

तावत्संध्या समायाता तत्क्षणाद्भुवनांतरे

tāvatsaṁdhyā samāyātā tatkṣaṇādbhuvanāṁtare

इतने में ही उस अन्य लोक में उसी क्षण संध्या हो गई।

श्लोक 172 (skanda.7.24.172)

ततो गंधर्व्वतनया भग्नोत्साहा नतानना। परित्यज्य वनं रम्यमागता पितुरंतिके

tato gaṁdharvvatanayā bhagnotsāhā natānanā| parityajya vanaṁ ramyamāgatā pituraṁtike

तब वह गंधर्व-पुत्री, उत्साहहीन और झुके मुख वाली होकर, उस रमणीय वन को छोड़कर अपने पिता के समीप आई।

श्लोक 173 (skanda.7.24.173)

कथयामास तत्सर्वं कारणं कुष्ठसंभवम्। तच्छ्रुत्वा शोकसंतप्तौ पितरौ विगतप्रभौ

kathayāmāsa tatsarvaṁ kāraṇaṁ kuṣṭhasaṁbhavam| tacchrutvā śokasaṁtaptau pitarau vigataprabhau

उसने कुष्ठ रोग होने का संपूर्ण कारण बताया। यह सुनकर शोकसंतप्त माता-पिता की कांति भी फीकी पड़ गई,

श्लोक 174 (skanda.7.24.174)

हिमवंतं गिरिं प्राप्तौ त्वरितौ सुतया सह। गोशृंगस्य ऋषेस्तत्र ददृशाते तथाश्रमम्

himavaṁtaṁ giriṁ prāptau tvaritau sutayā saha| gośṛṁgasya ṛṣestatra dadṛśāte tathāśramam

और वे शीघ्रतापूर्वक पुत्री सहित हिमालय पर्वत पर पहुँचे; वहाँ उन्होंने गोशृंग ऋषि के आश्रम को देखा।

श्लोक 175 (skanda.7.24.175)

तत्र मध्यस्थितं दृष्ट्वा गोशृंगमृषिपुंगवम्। प्रणम्य दण्डवद्भूमौ स्तुत्वा स्तोत्रैरनेकधा

tatra madhyasthitaṁ dṛṣṭvā gośṛṁgamṛṣipuṁgavam| praṇamya daṇḍavadbhūmau stutvā stotrairanekadhā

वहाँ मध्य में स्थित ऋषिश्रेष्ठ गोशृंग को देखकर, दंडवत् भूमि पर प्रणाम कर, नाना स्तोत्रों से स्तुति करके,

श्लोक 176 (skanda.7.24.176)

उपविष्टोग्रतस्तस्य प्रणिपत्य पुनःपुनः। प्रोवाच वचनं तत्र पूर्ववृत्तं यथाऽभवत्

upaviṣṭogratastasya praṇipatya punaḥpunaḥ| provāca vacanaṁ tatra pūrvavṛttaṁ yathā'bhavat

उनके सामने बैठकर, बार-बार प्रणाम करते हुए, उन्होंने वहाँ पहले घटित पूरा वृत्तांत कह सुनाया।

श्लोक 177 (skanda.7.24.177)

कथिते चैव वृत्तांते पुनः पप्रच्छ कारणम्। पृष्टे तु कारणे तत्र गंधर्वः प्रोक्तवांस्तदा

kathite caiva vṛttāṁte punaḥ papraccha kāraṇam| pṛṣṭe tu kāraṇe tatra gaṁdharvaḥ proktavāṁstadā

वृत्तांत कह दिए जाने पर, उन्होंने पुनः कारण पूछा; कारण पूछे जाने पर गंधर्व ने तब कहा—

श्लोक 178 (skanda.7.24.178)

गंधर्व उवाच। दुहितुर्मे शरीरं तु व्याधिकुष्ठेनपीडितम्। येनोपशमनं याति तत्त्वं कर्त्तुमिहार्हसि

gaṁdharva uvāca| duhiturme śarīraṁ tu vyādhikuṣṭhenapīḍitam| yenopaśamanaṁ yāti tattvaṁ karttumihārhasi

गंधर्व ने कहा—मेरी पुत्री का शरीर कुष्ठ रोग से पीड़ित है। आप ही यहाँ वह उपाय करने योग्य हैं जिससे इसका उपशमन हो।

श्लोक 179 (skanda.7.24.179)

प्रसादं कुरु विप्रर्षे मम दीनस्य सांप्रतम्। यथा कुष्ठं शमं याति मम पुत्र्यास्तु कारणम्

prasādaṁ kuru viprarṣe mama dīnasya sāṁpratam| yathā kuṣṭhaṁ śamaṁ yāti mama putryāstu kāraṇam

हे विप्रर्षे! अब मुझ दीन पर कृपा कीजिए, जिससे मेरी पुत्री का कुष्ठ शांत हो जाए, इसी हेतु से।

श्लोक 180 (skanda.7.24.180)

गोशृंग उवाच। भारते तु महातेजास्तिष्ठत्युदधिसन्निधौ। देवः सोमेश्वरोनाम सर्वदेवनमस्कृतः

gośṛṁga uvāca| bhārate tu mahātejāstiṣṭhatyudadhisannidhau| devaḥ someśvaronāma sarvadevanamaskṛtaḥ

गोशृंग ने कहा—भारत में समुद्र के समीप महातेजस्वी सोमेश्वर नामक देव स्थित हैं, जो समस्त देवताओं द्वारा नमस्कृत हैं।

श्लोक 181 (skanda.7.24.181)

क्षणं कृत्वा हि संपूज्य एकाहारेण मानवैः। सर्वव्याधिविनाशाय सर्वकार्यार्थसिद्धये

kṣaṇaṁ kṛtvā hi saṁpūjya ekāhāreṇa mānavaiḥ| sarvavyādhivināśāya sarvakāryārthasiddhaye

व्रत लेकर, एक बार ही भोजन करते हुए मनुष्यों द्वारा उनकी पूजा करके, समस्त व्याधियों के विनाश और समस्त कार्यों की सिद्धि के लिए—

श्लोक 182 (skanda.7.24.182)

सोमवारव्रतेनेशं समाराधय शंकरम्। एवं कृते व्याधिनाशस्तव पुत्र्या भविष्यति

somavāravrateneśaṁ samārādhaya śaṁkaram| evaṁ kṛte vyādhināśastava putryā bhaviṣyati

—सोमवार-व्रत द्वारा शंकर देव की आराधना करो। ऐसा करने से तुम्हारी पुत्री का रोग नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 183 (skanda.7.24.183)

ईश्वर उवाच। इति तद्वचनं श्रुत्वा महर्षेर्भावितात्मनः। तत्र गंतुं मनश्चक्रे सोमेशाराधनं प्रति

īśvara uvāca| iti tadvacanaṁ śrutvā maharṣerbhāvitātmanaḥ| tatra gaṁtuṁ manaścakre someśārādhanaṁ prati

ईश्वर ने कहा—उस भावित-आत्मा महर्षि के इस वचन को सुनकर, उसने सोमेश की आराधना के लिए वहाँ जाने का मन बना लिया।

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