प्रभास खण्ड · अध्याय 254
घण्टेश्वर माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.254.1)
ईश्वर उवाच। तत्रैव संस्थितं पश्येत्सर्वपातकनाशनम्। घण्टेश्वरमिति ख्यातं देवदानववन्दितम्। पूजितं ह्यृषिभिः सिद्धैर्वांछितार्थफलप्रदम्
īśvara uvāca| tatraiva saṁsthitaṁ paśyetsarvapātakanāśanam| ghaṇṭeśvaramiti khyātaṁ devadānavavanditam| pūjitaṁ hyṛṣibhiḥ siddhairvāṁchitārthaphalapradam
ईश्वर ने कहा—वहीं स्थित उस समस्त पापों के नाशक लिंग का दर्शन करना चाहिए, जो 'घण्टेश्वर' नाम से प्रसिद्ध है और देवताओं तथा दानवों दोनों द्वारा वंदित है। यह ऋषियों और सिद्धों द्वारा पूजित है और इच्छित अर्थ का फल देने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.7.254.2)
वारे सोमस्य चाष्टम्यां यस्तं पूजयते नरः। स लभेद्वांछितान्कामान्मुक्तः स्यात्पातकेन हि
vāre somasya cāṣṭamyāṁ yastaṁ pūjayate naraḥ| sa labhedvāṁchitānkāmānmuktaḥ syātpātakena hi
जो मनुष्य सोमवार को पड़ने वाली अष्टमी को उसकी पूजा करता है, वह अपनी इच्छित कामनाओं को प्राप्त करता है और पाप से मुक्त हो जाता है।