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प्रभास खण्ड · अध्याय 255

ऋषितीर्थ माहात्म्य वर्णन

अध्याय 254अध्याय-सूचीअध्याय 256

श्लोक 1 (skanda.7.255.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्। तस्यैव पश्चिमे भागे ऋषीणां पुण्यकर्मणाम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi tīrthaṁ trailokyaviśrutam| tasyaiva paścime bhāge ṛṣīṇāṁ puṇyakarmaṇām

ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, इसके पश्चात् उस तीर्थ के पास जाना चाहिए, जो त्रिलोक में विख्यात है, तथा उसी के पश्चिम भाग में पुण्यकर्मा ऋषियों के तीर्थ के पास भी।

श्लोक 2 (skanda.7.255.2)

तस्मिंस्त्रिनेत्रा मत्स्याश्च दृश्यंतेऽद्यापि भामिनि। अंगिरा गौतमोऽगस्त्यः सुमतिः सुसखिस्तथा

tasmiṁstrinetrā matsyāśca dṛśyaṁte'dyāpi bhāmini| aṁgirā gautamo'gastyaḥ sumatiḥ susakhistathā

हे भामिनि, उसमें आज भी तीन नेत्रों वाली मछलियाँ दिखाई देती हैं। वहाँ अंगिरा, गौतम, अगस्त्य, सुमति और सुसखि आदि ऋषि तपस्या करते थे।

श्लोक 3 (skanda.7.255.3)

विश्वामित्रः स्थूलशिराः संवर्त्तः प्रतिमर्द्दनः। रैभ्यो बृहस्पतिश्चैव च्यवनः कश्यपो भृगुः

viśvāmitraḥ sthūlaśirāḥ saṁvarttaḥ pratimarddanaḥ| raibhyo bṛhaspatiścaiva cyavanaḥ kaśyapo bhṛguḥ

विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रतिमर्दन, रैभ्य, बृहस्पति, च्यवन, कश्यप और भृगु—

श्लोक 4 (skanda.7.255.4)

दुर्वासा जामदग्न्यश्च मार्कंडेयोऽथ गालवः। उशनाऽथ भरद्वाजो यवक्रीतस्त्रितस्तथा

durvāsā jāmadagnyaśca mārkaṁḍeyo'tha gālavaḥ| uśanā'tha bharadvājo yavakrītastritastathā

दुर्वासा, जमदग्नि के पुत्र, मार्कण्डेय, गालव, उशना, भरद्वाज, यवक्रीत और त्रित—

श्लोक 5 (skanda.7.255.5)

नारदः पर्वतश्चैव वसिष्ठोऽरुंधती तथा

nāradaḥ parvataścaiva vasiṣṭho'ruṁdhatī tathā

नारद, पर्वत, वसिष्ठ तथा अरुंधती—

श्लोक 6 (skanda.7.255.6)

काण्वोऽथ गौतमो धौम्यः शतानन्दोऽकृतव्रणः। जमदग्निस्तथा रामो बकश्चेत्येवमादयः। कृष्णद्वैपायनश्चैव पुत्रशिष्यैः समन्वितः

kāṇvo'tha gautamo dhaumyaḥ śatānando'kṛtavraṇaḥ| jamadagnistathā rāmo bakaścetyevamādayaḥ| kṛṣṇadvaipāyanaścaiva putraśiṣyaiḥ samanvitaḥ

काण्व, गौतम, धौम्य, शतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्नि, राम, बक—इत्यादि ऋषिगण, तथा अपने पुत्रों और शिष्यों के साथ कृष्णद्वैपायन।

श्लोक 7 (skanda.7.255.7)

एतत्क्षेत्रं समासाद्य प्रभासं मुनिसत्तमाः। तपस्तेपुर्महात्मानो विविधं परमाद्भुतम्

etatkṣetraṁ samāsādya prabhāsaṁ munisattamāḥ| tapastepurmahātmāno vividhaṁ paramādbhutam

इस प्रभासक्षेत्र में पहुँचकर वे श्रेष्ठ महात्मा मुनि विविध प्रकार के अत्यंत अद्भुत तप करने लगे।

श्लोक 8 (skanda.7.255.8)

एवं ते नियतात्मानो दमयुक्तास्तपस्विनः। समाधिना जिगीषन्ते ब्रह्मलोकं सनातनम्

evaṁ te niyatātmāno damayuktāstapasvinaḥ| samādhinā jigīṣante brahmalokaṁ sanātanam

इस प्रकार वे संयमी और दमयुक्त तपस्वी समाधि के द्वारा सनातन ब्रह्मलोक को जीतने की इच्छा रखते थे।

श्लोक 9 (skanda.7.255.9)

अथाभवदनावृष्टिः कदाचिन्महती प्रिये। कृच्छ्रं प्राप्तो ह्यभूत्तत्र सर्वलोकः क्षुधार्दितः

athābhavadanāvṛṣṭiḥ kadācinmahatī priye| kṛcchraṁ prāpto hyabhūttatra sarvalokaḥ kṣudhārditaḥ

हे प्रिये, एक बार वहाँ भारी अनावृष्टि पड़ गई, जिससे संपूर्ण लोक भूख से पीड़ित होकर संकट में पड़ गया।

श्लोक 10 (skanda.7.255.10)

ततो निरन्ने लोकेऽस्मिन्नात्मानं ते परीप्सवः। मृतं कुमारमादाय कृच्छ्रं प्राप्तास्तदाऽपचन्

tato niranne loke'sminnātmānaṁ te parīpsavaḥ| mṛtaṁ kumāramādāya kṛcchraṁ prāptāstadā'pacan

तब उस अन्नरहित संसार में, अपने प्राणों की रक्षा की इच्छा से, संकट में पड़े हुए उन ऋषियों ने एक मृत बालक को लेकर उसे पकाना आरंभ किया।

श्लोक 11 (skanda.7.255.11)

अथोपरिचरस्तत्र क्लिश्यमानान्हि तानृषीन्। दृष्ट्वा राजा वृषादर्भिः प्रोवाचेदं वचस्तदा

athoparicarastatra kliśyamānānhi tānṛṣīn| dṛṣṭvā rājā vṛṣādarbhiḥ provācedaṁ vacastadā

उस समय राजा उपरिचर वृषादर्भि ने उन संकटग्रस्त ऋषियों को देखकर उनसे यह वचन कहा—

श्लोक 12 (skanda.7.255.12)

राजोवाच। प्रतिग्रहो ब्राह्मणानां दृष्टा वृत्तिरनिंदिता। तस्मात्प्रतिग्रहं मत्त गृह्णीध्वं मुनिपुंगवाः

rājovāca| pratigraho brāhmaṇānāṁ dṛṣṭā vṛttiraniṁditā| tasmātpratigrahaṁ matta gṛhṇīdhvaṁ munipuṅgavāḥ

राजा ने कहा—ब्राह्मणों के लिए प्रतिग्रह (दान ग्रहण करना) एक निर्दोष आजीविका मानी गई है। इसलिए, हे श्रेष्ठ मुनियो, मुझसे प्रतिग्रह ग्रहण करो।

श्लोक 13 (skanda.7.255.13)

मुद्गान्माषांश्च व्रीहींश्च तथा रत्नानि कांचनम्। युष्माकं संप्रदास्यामि यच्चान्यदपि दुर्ल्लभम्। निवर्त्तध्वमतः सर्वे ह्येतस्मात्पातकात्परम्

mudgānmāṣāṁśca vrīhīṁśca tathā ratnāni kāṁcanam| yuṣmākaṁ saṁpradāsyāmi yaccānyadapi durllabham| nivarttadhvamataḥ sarve hyetasmātpātakātparam

मैं तुम्हें मूँग, उड़द, धान, रत्न और सोना, तथा जो भी अन्य दुर्लभ वस्तु हो, वह सब दूँगा। अतः तुम सब इस घोर पातक से निवृत्त हो जाओ।

श्लोक 14 (skanda.7.255.14)

ऋषय ऊचुः। तज्जानंतः कथं राजन्गृह्णीमस्ते प्रतिग्रहम्

ṛṣaya ūcuḥ| tajjānaṁtaḥ kathaṁ rājangṛhṇīmaste pratigraham

ऋषियों ने कहा—हे राजन्, यह जानते हुए भी हम तुम्हारा प्रतिग्रह कैसे ग्रहण करें?

श्लोक 15 (skanda.7.255.15)

दशसूनासमश्चक्री दशचक्रिसमो ध्वजी। दशध्वजि समा वेश्या दशवेश्यासमो नृपः

daśasūnāsamaścakrī daśacakrisamo dhvajī| daśadhvajisamā veśyā daśaveśyāsamo nṛpaḥ

एक तेली दस कसाईखानों के समान होता है, एक ध्वजाधारी दस तेलियों के समान, एक वेश्या दस ध्वजाधारियों के समान, और एक राजा दस वेश्याओं के समान पापयुक्त होता है।

श्लोक 16 (skanda.7.255.16)

यो राज्ञां प्रतिगृह्णाति ब्राह्मणो लोभमोहितः। तामिस्रादिषु घोरेषु नरकेषु स पच्यते

yo rājñāṁ pratigṛhṇāti brāhmaṇo lobhamohitaḥ| tāmisrādiṣu ghoreṣu narakeṣu sa pacyate

जो ब्राह्मण लोभ में मोहित होकर राजाओं से दान ग्रहण करता है, वह तामिस्र आदि घोर नरकों में पकाया जाता है।

श्लोक 17 (skanda.7.255.17)

तद्गच्छ कुशलं तेऽस्तु सह दानेन पार्थिव। अन्येषां दीयतामेतदित्युक्त्वा ते वनं ययुः

tadgaccha kuśalaṁ te'stu saha dānena pārthiva| anyeṣāṁ dīyatāmetadityuktvā te vanaṁ yayuḥ

अतः हे राजन्, तुम अपने दान सहित यहाँ से चले जाओ, तुम्हारा कल्याण हो। यह वस्तु किसी अन्य को दे दो—यह कहकर वे ऋषि वन में चले गए।

श्लोक 18 (skanda.7.255.18)

अथ राज्ञः समादेशात्तत्र गत्वा च मंत्रिणः। ऊदुम्बराणि व्यकिरन्हेमगर्भाणि भूतले

atha rājñaḥ samādeśāttatra gatvā ca maṁtriṇaḥ| ūdumbarāṇi vyakiranhemagarbhāṇi bhūtale

तब राजा के आदेश से वहाँ जाकर मंत्रियों ने सोने से भरे हुए गूलर के फल भूमि पर बिखेर दिए।

श्लोक 19 (skanda.7.255.19)

अथ तानि व्यचिन्वंश्च ऋषयो वरवर्णिनि। गुरूणीति विदित्वा तु न ग्राह्याण्यंगिराऽब्रवीत्

atha tāni vyacinvaṁśca ṛṣayo varavarṇini| gurūṇīti viditvā tu na grāhyāṇyaṁgirā'bravīt

हे वरवर्णिनि, तब ऋषिगण उन फलों को बीनने लगे। परंतु अंगिरा ने कहा कि इन्हें भारी (मूल्यवान) जानकर ग्रहण नहीं करना चाहिए।

श्लोक 20 (skanda.7.255.20)

अत्रिरुवाच। नास्महेनास्महे मूढ वयमज्ञानबुद्धयः। हैमानीमानि जानीमः प्रतिबुद्धाः स्म जाड्यतः

atrirūvāca| nāsmahenāsmahe mūḍha vayamajñānabuddhayaḥ| haimānīmāni jānīmaḥ pratibuddhāḥ sma jāḍyataḥ

अत्रि ने कहा—हे मूढ़, हम अज्ञानी बुद्धि वाले नहीं हैं, न ही हम मूर्ख हैं। हम जानते हैं कि ये फल स्वर्णमय हैं; हमारी जड़ता अब जाग उठी है।

श्लोक 21 (skanda.7.255.21)

वसिष्ठ उवाच। धर्मार्थं संचयो यस्य द्रव्याणां स न शस्यते। तपःसंचयनं मन्ये वसिष्ठो धनसंचयम्

vasiṣṭha uvāca| dharmārthaṁ saṁcayo yasya dravyāṇāṁ sa na śasyate| tapaḥsaṁcayanaṁ manye vasiṣṭho dhanasaṁcayam

वसिष्ठ ने कहा—जो व्यक्ति धर्म के निमित्त भी धन का संचय करता है, वह प्रशंसनीय नहीं है। मैं, वसिष्ठ, तप के संचय को ही श्रेष्ठ मानता हूँ, धन के संचय को नहीं।

श्लोक 22 (skanda.7.255.22)

त्यजध्वं संचयान्सर्वाञ्जातीनां समुपद्रवान्। न हि संचयवान्कश्चिद्दृश्यते निरुपद्रवः

tyajadhvaṁ saṁcayānsarvāñjātīnāṁ samupadravān| na hi saṁcayavānkaścid dṛśyate nirupadravaḥ

समस्त प्रकार के संचयों का त्याग कर दो, जो हर जाति के लिए संकट का कारण बनते हैं; क्योंकि संचय रखने वाला कोई भी व्यक्ति संकट रहित नहीं देखा जाता।

श्लोक 23 (skanda.7.255.23)

यथायथा न गृह्णाति ब्राह्मणोऽसत्प्रतिग्रहम्। तथातथाऽनिशं चास्य ब्रह्मतेजस्तु वर्धते

yathāyathā na gṛhṇāti brāhmaṇo'satpratigraham| tathātathā'niśaṁ cāsya brahmatejastu vardhate

जिस-जिस मात्रा में ब्राह्मण अनुचित दान को ग्रहण नहीं करता, उतने-उतने ही अधिक उसका ब्रह्मतेज सदा बढ़ता जाता है।

श्लोक 24 (skanda.7.255.24)

अकिंचनत्वं राज्यं च तुलया समतोलयम्। अकिंचनत्वमधिकं राज्यादपि न संशयः

akiṁcanatvaṁ rājyaṁ ca tulayā samatolayam| akiṁcanatvamadhikaṁ rājyādapi na saṁśayaḥ

यदि अकिंचनता और राज्य को तराजू में तौला जाए, तो निःसंदेह अकिंचनता ही राज्य से बढ़कर सिद्ध होगी।

श्लोक 25 (skanda.7.255.25)

कश्यप उवाच। अनर्थो ब्राह्मणस्यैष यदर्थनिचयो महान्। अर्थैश्वर्यविमूढोऽपि श्रेयसो भ्रश्यते द्विजः

kaśyapa uvāca| anartho brāhmaṇasyaiṣa yadarthanicayo mahān| arthaiśvaryavimūḍho'pi śreyaso bhraśyate dvijaḥ

कश्यप ने कहा—एक ब्राह्मण के लिए बड़ी धनराशि का संचय ही सबसे बड़ी अनर्थकारी वस्तु है; धन-ऐश्वर्य से मोहित द्विज कल्याण के मार्ग से भ्रष्ट हो जाता है।

श्लोक 26 (skanda.7.255.26)

अर्थसंपद्विमोहाय बहुशोकाय चैव हि। तस्मादर्थमनर्थाख्यं श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत्

arthasaṁpadvimohāya bahuśokāya caiva hi| tasmādarthamanarthākhyaṁ śreyo'rthī dūratastyajet

धन-संपदा केवल मोह और अनेक शोकों का कारण बनती है; अतः कल्याण चाहने वाले पुरुष को इस अनर्थ-स्वरूप धन को दूर से ही त्याग देना चाहिए।

श्लोक 27 (skanda.7.255.27)

यस्य धर्मार्थमप्यर्थास्तस्यापि न हि दृश्यते। प्रक्षालनाद्धि पंकस्य दूरादस्पर्शनं वरम्

yasya dharmārthamapyarthāstasyāpi na hi dṛśyate| prakṣālanāddhi paṁkasya dūrādasparśanaṁ varam

यहाँ तक कि जो धन केवल धर्म के लिए संचित होता है, उसमें भी सुख दिखाई नहीं देता। कीचड़ को बाद में धोने की अपेक्षा उससे दूर रहकर उसे कभी न छूना ही श्रेष्ठ है।

श्लोक 28 (skanda.7.255.28)

भरद्वाज उवाच। जीर्यंति जीर्यतः केशा दंता जीर्यंति जीर्यतः। चक्षुः श्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका न तु जीर्यते

bharadvāja uvāca| jīryaṁti jīryataḥ keśā daṁtā jīryaṁti jīryataḥ| cakṣuḥ śrotre ca jīryete tṛṣṇaikā na tu jīryate

भरद्वाज ने कहा—मनुष्य के बूढ़े होने पर केश जीर्ण हो जाते हैं, दाँत जीर्ण हो जाते हैं, आँखें और कान भी जीर्ण हो जाते हैं—किंतु एक तृष्णा ही ऐसी है जो कभी जीर्ण नहीं होती।

श्लोक 29 (skanda.7.255.29)

सूची सूत्र तथा वस्त्रे समानयति सूचिका। तद्वत्संसारसूत्रस्य तृष्णा सूची विधीयते

sūcī sūtra tathā vastre samānayati sūcikā| tadvatsaṁsārasūtrasya tṛṣṇā sūcī vidhīyate

जैसे सुई धागे को वस्त्र में पिरो देती है, वैसे ही तृष्णा उस सुई के समान है जो संसाररूपी सूत्र को जीव के साथ जोड़ती रहती है।

श्लोक 30 (skanda.7.255.30)

यथा शृंगं रुरोः काये वर्द्धमाने हि वर्द्धते। अनंतपारा दुर्वारा तृष्णा दुःखप्रदा सदा। अधर्मबहुला चैव तस्मात्तां परिवर्जयेत्

yathā śṛṅgaṁ ruroḥ kāye vardhamāne hi vardhate| anaṁtapārā durvārā tṛṣṇā duḥkhapradā sadā| adharmabahulā caiva tasmāttāṁ parivarjayet

जैसे हिरण के शरीर के बढ़ने के साथ उसका सींग भी बढ़ता जाता है, वैसे ही तृष्णा अनंत, अपार, अनिवार्य, सदा दुःखदायी और अधर्म से परिपूर्ण है; अतः उसका सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।

श्लोक 31 (skanda.7.255.31)

गौतम उवाच। संतुष्टः को न शक्नोति फलैश्चापि हि वर्त्तितुम्। सर्वोऽपींद्रियलोभेन संकटान्यभिगाहते

gautama uvāca| saṁtuṣṭaḥ ko na śaknoti phalaiścāpi hi varttitum| sarvo'pīndriyalobhena saṁkaṭānyabhigāhate

गौतम ने कहा—कौन ऐसा है जो संतुष्ट होकर केवल फलों पर जीवन-निर्वाह न कर सके? किन्तु सभी इंद्रियों के लोभ के कारण ही संकटों में फँस जाते हैं।

श्लोक 32 (skanda.7.255.32)

सर्वत्र संपदस्तस्य संतुष्टं यस्य मानसम्। उपानद्गूढपादस्य ननु चर्मावृतेव भूः

sarvatra saṁpadastasya saṁtuṣṭaṁ yasya mānasam| upānadgūḍhapādasya nanu carmāvṛteva bhūḥ

जिसका मन संतुष्ट है, उसके लिए सर्वत्र संपत्ति ही संपत्ति है। जैसे जूता पहने हुए व्यक्ति के लिए मानो सारी पृथ्वी ही चमड़े से ढकी हुई हो।

श्लोक 33 (skanda.7.255.33)

संतोषामृततृप्तानां यत्सुखं शांतचेतसाम्। कुतस्तद्धनलुब्धानां सुखं चाशांतचेतसाम्

saṁtoṣāmṛtatṛptānāṁ yatsukhaṁ śāntacetasām| kutastaddhanalubdhānāṁ sukhaṁ cāśāntacetasām

जो सुख संतोषरूपी अमृत से तृप्त शांतचित्त लोगों को प्राप्त होता है, वह धनलोभी और अशांतचित्त लोगों को कहाँ प्राप्त हो सकता है?

श्लोक 34 (skanda.7.255.34)

विश्वामित्र उवाच। कामं कामयमानस्य यदि कामः स सिद्ध्यति। तथैनमपरः कामो भूयो विध्यति बाणवत्

viśvāmitra uvāca| kāmaṁ kāmayamānasya yadi kāmaḥ sa sidhyati| tathainamaparaḥ kāmo bhūyo vidhyati bāṇavat

विश्वामित्र ने कहा—किसी इच्छा करने वाले की इच्छा यदि पूर्ण भी हो जाए, तो भी दूसरी इच्छा तुरंत उसे बाण के समान बींध देती है।

श्लोक 35 (skanda.7.255.35)

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते

na jātu kāmaḥ kāmānāmupabhogena śāmyati| haviṣā kṛṣṇavartmeva bhūya evābhivarddhate

भोग करने से कभी भी कामनाओं की तृप्ति नहीं होती, जैसे घी डालने से अग्नि और भी अधिक भड़क उठती है।

श्लोक 36 (skanda.7.255.36)

कामानभिलषन्लोभान्न नरः सुखमेधते। समालभ्य तरुच्छायां भवनं वाञ्छो नरः

kāmānabhilaṣanlobhānna naraḥ sukhamedhate| samālabhya taruchāyāṁ bhavanaṁ vāṁcho naraḥ

लोभवश कामनाओं की इच्छा करता हुआ मनुष्य कभी सुखी नहीं होता, जैसे वृक्ष की छाया को पाकर भी भवन की इच्छा रखने वाला मनुष्य कभी संतुष्ट नहीं होता।

श्लोक 37 (skanda.7.255.37)

चतुःसागरसंयुक्तां यो भुंक्ते पृथिवीमिमाम्। एकस्तु वनवासी च स कृतार्थो न पार्थिवः

catuḥsāgarasaṁyuktāṁ yo bhuṁkte pṛthivīmimām| ekastu vanavāsī ca sa kṛtārtho na pārthivaḥ

चार समुद्रों से घिरी हुई इस पृथ्वी का भोग करने वाला राजा नहीं, बल्कि अकेला वनवासी ही सचमुच कृतार्थ है।

श्लोक 38 (skanda.7.255.38)

जमदग्निरुवाच। प्रतिग्रहसमर्थो यस्तपो वर्द्धयते महान्। न करोति तपस्तस्य जायते च सहस्रधा

jamadagnirūvāca| pratigrahasamartho yastapo varddhayate mahān| na karoti tapastasya jāyate ca sahasradhā

जमदग्नि ने कहा—जो प्रतिग्रह ग्रहण करने में समर्थ होकर भी अपने महान तप को बढ़ाता है और उसे ग्रहण नहीं करता, उसका तप सहस्र गुना बढ़ जाता है।

श्लोक 39 (skanda.7.255.39)

प्रतिग्रहसमर्थानां निवृत्तानां प्रतिग्रहात्। य एव ददतां लोकास्त एवाप्रतिगृह्णताम्

pratigrahasamarthānāṁ nivṛttānāṁ pratigrahāt| ya eva dadatāṁ lokāsta evāpratigṛhṇatām

जो प्रतिग्रह ग्रहण करने में समर्थ होते हुए भी उससे निवृत्त रहते हैं, दान देने वालों को जो लोक प्राप्त होते हैं, वे ही लोक ग्रहण न करने वालों को भी प्राप्त होते हैं।

श्लोक 40 (skanda.7.255.40)

अरुंधत्युवाच। बिसतंतुर्यथा नित्यं समंतान्नालसंस्थितः। तृष्णा चैवमनाद्यंता तथा देहाश्रिता सदा

aruṁdhatyuvāca| bisataṁturyathā nityaṁ samaṁtānnālasaṁsthitaḥ| tṛṣṇā caivamanādyaṁtā tathā dehāśritā sadā

अरुंधती ने कहा—जैसे कमल-नाल में तंतु सदा उसके चारों ओर व्याप्त रहता है, वैसे ही अनादि और अनंत तृष्णा सदा शरीर का आश्रय लिए रहती है।

श्लोक 41 (skanda.7.255.41)

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः। योऽसौ प्राणांतिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्

yā dustyajā durmatibhiryā na jīryati jīryataḥ| yo'sau prāṇāṁtiko rogastāṁ tṛṣṇāṁ tyajataḥ sukham

जो दुर्बुद्धि लोगों के लिए त्यागना कठिन है, जो बूढ़ा होने पर भी स्वयं जीर्ण नहीं होती, और जो प्राणघातक रोग के समान है, उस तृष्णा को त्यागने वाले को ही सुख प्राप्त होता है।

श्लोक 42 (skanda.7.255.42)

चंडोवाच। उग्रात्प्रतिग्रहाद्यस्माद्बिभ्यत्येते महेश्वराः। बलीयांसो दुर्बलवत्तथा चैव बिभेम्यहम्

caṁḍovāca| ugrātpratigrahādyasmādbibhyatyete maheśvarāḥ| balīyāṁso durbalavattathā caiva bibhemyaham

चण्ड ने कहा—जिस भयंकर प्रतिग्रह से ये महान् और बलवान् ऋषि भी दुर्बल के समान भयभीत रहते हैं, मैं भी उसी से भयभीत रहता हूँ।

श्लोक 43 (skanda.7.255.43)

पशुमुख उवाच। यदाचरंति विद्वांसः सदा धर्मपरायणाः। तदेव विदुषा कार्यमात्मनो हितमिच्छता

paśumukha uvāca| yadācaraṁti vidvāṁsaḥ sadā dharmaparāyaṇāḥ| tadeva viduṣā kāryamātmano hitamicchatā

पशुमुख ने कहा—विद्वान् और सदा धर्मपरायण पुरुष जो आचरण करते हैं, अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान् को भी वही आचरण करना चाहिए।

श्लोक 44 (skanda.7.255.44)

ईश्वर उवाच। इत्युक्त्वा हेमगर्भाणि त्यक्त्वा तानि फलानि च। ऋषयो जग्मुरन्यत्र सर्व एव दृढव्रताः

īśvara uvāca| ityuktvā hemagarbhāṇi tyaktvā tāni phalāni ca| ṛṣayo jagmuranyatra sarva eva dṛḍhavratāḥ

ईश्वर ने कहा—ऐसा कहकर, स्वर्ण से भरे उन फलों को त्यागकर, वे सभी दृढ़व्रती ऋषि अन्यत्र चले गए।

श्लोक 45 (skanda.7.255.45)

ततस्ते विचरंतो वै ददृशुः सुमहत्सरः। पद्मिनीभिः समाकीर्णं सर्वतो वरवर्णिनि

tataste vicaraṁto vai dadṛśuḥ sumahatsaraḥ| padminībhiḥ samākīrṇaṁ sarvato varavarṇini

फिर विचरण करते हुए उन्होंने एक विशाल सरोवर देखा, हे वरवर्णिनि, जो चारों ओर कमलिनियों से भरा हुआ था।

श्लोक 46 (skanda.7.255.46)

तस्मिन्देशे तदा प्राप्तः परिव्राजः शुनोमुखः। तेनैव सहितास्तत्र स्नाताः सर्वे महर्षयः

tasmindeśe tadā prāptaḥ parivrājaḥ śunomukhaḥ| tenaiva sahitāstatra snātāḥ sarve maharṣayaḥ

उस स्थान पर उसी समय शुनोमुख नामक एक परिव्राजक आ पहुँचा; उसी के साथ सभी महर्षियों ने वहाँ स्नान किया।

श्लोक 47 (skanda.7.255.47)

तत्रावतारं कृत्वा तैर्गृहीतानि बिसानि तु। निक्षिप्य सरसस्तीरे चक्रुः पुण्यां जलक्रियाम्

tatrāvatāraṁ kṛtvā tairgṛhītāni bisāni tu| nikṣipya sarasastīre cakruḥ puṇyāṁ jalakriyām

वहाँ उतरकर उन्होंने पहले से लिए हुए कमल-नालों को सरोवर के तट पर रखकर पवित्र जल-क्रिया की।

श्लोक 48 (skanda.7.255.48)

अथोत्तीर्य जलात्तस्मात्ते समेत्य परस्परम्। बिसानि तान्यपश्यंत इदं वचनमब्रुवन्

athottīrya jalāttasmāt te sametya parasparam| bisāni tānyapaśyaṁta idaṁ vacanamabruvan

फिर उस जल से बाहर निकलकर, आपस में मिलकर, जब उन्होंने वे कमल-नाल न पाए, तब वे यह वचन बोले—

श्लोक 49 (skanda.7.255.49)

ऋषय ऊचुः। केन क्षुधाभितप्तानामस्माकं पापकर्मणा। बिसानि तानि सर्वाणि हृतानि च मुनीश्वराः

ṛṣaya ūcuḥ| kena kṣudhābhitaptānāmasmākaṁ pāpakarmaṇā| bisāni tāni sarvāṇi hṛtāni ca munīśvarāḥ

ऋषियों ने कहा—हे मुनीश्वरो, भूख से पीड़ित हम लोगों के वे सभी कमल-नाल किस पापी ने चुरा लिए?

श्लोक 50 (skanda.7.255.50)

ते शंकमानास्त्वन्योन्यं पर्यपृच्छन्द्विजोत्तमाः। चक्रुस्ते शपथान्सर्वे यथान्यायं च भामिनि

te śaṁkamānāstvanyonyaṁ paryapṛcchandvijottamāḥ| cakruste śapathānsarve yathānyāyaṁ ca bhāmini

हे भामिनि, संदेह करते हुए वे श्रेष्ठ द्विज एक-दूसरे से पूछताछ करने लगे, और सबने न्यायपूर्वक यथोचित शपथें लीं।

श्लोक 51 (skanda.7.255.51)

कश्यप उवाच। सर्वभक्षः स भवतु न्यासलोपं करोतु सः। कूटसाक्षित्वमभ्येतु बिसस्तैन्यं करोति यः

kaśyapa uvāca| sarvabhakṣaḥ sa bhavatu nyāsalopaṁ karotu saḥ| kūṭasākṣitvamabhyetu bisastainyaṁ karoti yaḥ

कश्यप ने कहा—जो भी कमल-नाल की चोरी करे, वह सर्वभक्षी हो जाए, वह धरोहर का लोप करने वाला हो, और वह झूठी गवाही देने वाला बने।

श्लोक 52 (skanda.7.255.52)

वसिष्ठ उवाच। अनृतौ मैथुनं यातु पर नारीं विशेषतः। अतिथिः स्यात्तथान्योन्यं बिसस्तैन्यं करोति यः

vasiṣṭha uvāca| anṛtau maithunaṁ yātu para nārīṁ viśeṣataḥ| atithiḥ syāttathānyonyaṁ bisastainyaṁ karoti yaḥ

वसिष्ठ ने कहा—जो कमल-नाल की चोरी करे, वह अनृतुकाल में मैथुन करने वाला हो, विशेषतः पराई स्त्री के साथ, और वह अतिथियों के प्रति उदासीन रहने वाला बने।

श्लोक 53 (skanda.7.255.53)

भरद्वाज उवाच। नृशंसो वै स भवतु समृद्ध्या चाप्यहंकृतः। मत्सरी पिशुनश्चैव बिसस्तैन्यं करोति यः

bharadvāja uvāca| nṛśaṁso vai sa bhavatu samṛddhyā cāpyahaṁkṛtaḥ| matsarī piśunaścaiva bisastainyaṁ karoti yaḥ

भरद्वाज ने कहा—जो कमल-नाल की चोरी करे, वह क्रूर हो, समृद्धि के मद से अहंकारी हो, तथा ईर्ष्यालु और चुगलखोर बने।

श्लोक 54 (skanda.7.255.54)

विश्वामित्र उवाच। नित्यं कामरतः सोस्तु दिवा सेवतु मैथुनम्। नीचकर्मरतश्चैव बिसस्तैन्यं करोति यः

viśvāmitra uvāca| nityaṁ kāmaratas so'stu divā sevatu maithunam| nīcakarmarataścaiva bisastainyaṁ karoti yaḥ

विश्वामित्र ने कहा—जो कमल-नाल की चोरी करे, वह सदा काम में आसक्त रहे, दिन में मैथुन का सेवन करे, और नीच कर्मों में रत रहने वाला बने।

श्लोक 55 (skanda.7.255.55)

जमदग्निरुवाच। कन्यां यच्छतु वृद्धाय स भूयाद्वृषलीपतिः। अस्तु वार्द्धुषिको नित्यं बिसस्तैन्यं करोति यः

jamadagnirūvāca| kanyāṁ yacchatu vṛddhāya sa bhūyādvṛṣalīpatiḥ| astu vārddhuṣiko nityaṁ bisastainyaṁ karoti yaḥ

जमदग्नि ने कहा—जो कमल-नाल की चोरी करे, वह अपनी कन्या को किसी वृद्ध को दे दे, वह शूद्र स्त्री का पति बने, और वह सदा सूदखोर बना रहे।

श्लोक 56 (skanda.7.255.56)

गौतम उवाच। स गृह्णात्वविकादानं करोतु हयविक्रयम्। प्रकरोतु गुरोर्निंदां बिसस्तैन्यं करोति यः

gautama uvāca| sa gṛhṇātvavikādānaṁ karotu hayavikrayam| prakarotu gurornindāṁ bisastainyaṁ karoti yaḥ

गौतम ने कहा—जो कमल-नाल की चोरी करे, वह भेड़-बकरी के दान को ग्रहण करने वाला बने, घोड़ों का व्यापार करे, और अपने गुरु की निंदा करने वाला बने।

श्लोक 57 (skanda.7.255.57)

अत्रिरुवाच। मातरं पितरं नित्यं दुर्मतिः सोऽवमन्यताम्। शूद्रं पृच्छतु धर्मार्थं बिसस्तैन्यं करोति यः

atrirūvāca| mātaraṁ pitaraṁ nityaṁ durmatiḥ so'vamanyatām| śūdraṁ pṛcchatu dharmārthaṁ bisastainyaṁ karoti yaḥ

अत्रि ने कहा—जो कमल-नाल की चोरी करे, वह दुर्बुद्धि होकर सदा अपने माता-पिता का अपमान करने वाला बने, और धर्म के विषय में शूद्र से पूछने वाला बने।

श्लोक 58 (skanda.7.255.58)

अरुन्धत्युवाच। करोतु पत्युः पूर्वं सा भोजनं शयनं तथा। नारी दुष्टसमाचारा बिसस्तैन्यं करोति या

arundhatyuvāca| karotu patyuḥ pūrvaṁ sā bhojanaṁ śayanaṁ tathā| nārī duṣṭasamācārā bisastainyaṁ karoti yā

अरुंधती ने कहा—जो स्त्री कमल-नाल की चोरी करे, वह दुराचारिणी होकर अपने पति से पहले ही भोजन और शयन करने वाली बने।

श्लोक 59 (skanda.7.255.59)

चण्डोवाच। स्वामिनः प्रतिकूलास्तु धर्मद्वेषं करोतु च। साधुद्वेषपरा चैव बिसस्तैन्यं करोति या

caṇḍovāca| svāminaḥ pratikūlāstu dharmadveṣaṁ karotu ca| sādhudveṣaparā caiva bisastainyaṁ karoti yā

चण्ड ने कहा—जो स्त्री कमल-नाल की चोरी करे, वह अपने स्वामी के प्रतिकूल आचरण करने वाली बने, धर्म से द्वेष रखने वाली हो, और साधुओं से द्वेष रखने वाली बने।

श्लोक 60 (skanda.7.255.60)

पशुमुख उवाच। परस्य प्रेष्यतां यातु सदा जन्मनिजन्मनि। सर्वधर्मक्रियाहीनो बिसस्तैन्यं करोति यः

paśumukha uvāca| parasya preṣyatāṁ yātu sadā janmanijanmani| sarvadharmakriyāhīno bisastainyaṁ karoti yaḥ

पशुमुख ने कहा—जो कमल-नाल की चोरी करे, वह जन्म-जन्म में सदा दूसरों की सेवकाई करने वाला बने, और समस्त धार्मिक क्रियाओं से रहित हो।

श्लोक 61 (skanda.7.255.61)

शुनोमुख उवाच। वेदान्स पठतु न्यायाद्गृहस्थः स्यात्प्रियातिथिः। सत्यं वदतु चाजस्रं बिसस्तैन्यं करोति यः

śunomukha uvāca| vedānsa paṭhatu nyāyādgṛhasthaḥ syātpriyātithiḥ| satyaṁ vadatu cājasraṁ bisastainyaṁ karoti yaḥ

शुनोमुख ने कहा—जो कमल-नाल की चोरी करे, वह विधिपूर्वक वेदों का अध्ययन करने वाला हो, गृहस्थ होकर अतिथियों का प्रिय बने, और सदा सत्य बोलने वाला बने।

श्लोक 62 (skanda.7.255.62)

ऋषय ऊचुः। इष्टमेतद्द्विजातीनां यस्त्वया शपथः कृतः। त्वया कृतं बिसस्तैन्यं सर्वेषां नः शुनोमुख

ṛṣaya ūcuḥ| iṣṭametaddvijātīnāṁ yastvayā śapathaḥ kṛtaḥ| tvayā kṛtaṁ bisastainyaṁ sarveṣāṁ naḥ śunomukha

ऋषियों ने कहा—हे शुनोमुख, तुमने जो शपथ ली है, वह द्विजातियों को अत्यंत प्रिय है। ऐसा लगता है कि हम सबके कमल-नाल की चोरी तुमने ही की है।

श्लोक 63 (skanda.7.255.63)

शुनोमुख उवाच। मया हृतानि सर्वेषां बिसानीमानि वै द्विजाः। धर्मं वै श्रोतुकामेन जानीध्वं मां पुरंदरम्

śunomukha uvāca| mayā hṛtāni sarveṣāṁ bisānīmāni vai dvijāḥ| dharmaṁ vai śrotukāmena jānīdhvaṁ māṁ puraṁdaram

शुनोमुख ने कहा—हे द्विजो, तुम सभी के कमल-नाल मैंने ही चुराए हैं। धर्म सुनने की इच्छा से ऐसा किया; मुझे तुम इंद्र ही जानो।

श्लोक 64 (skanda.7.255.64)

अलोभादक्षया लोका जिता वै मुनिसत्तमाः। प्रार्थयध्वं वरं शुभ्रं सर्वमेव ह्यसंशयम्

alobhādakṣayā lokā jitā vai munisattamāḥ| prārthayadhvaṁ varaṁ śubhraṁ sarvameva hyasaṁśayam

हे श्रेष्ठ मुनियो, तुमने निर्लोभता के द्वारा अक्षय लोकों को जीत लिया है। अब तुम निःसंदेह कोई भी उत्तम वर माँग सकते हो।

श्लोक 65 (skanda.7.255.65)

ऋषय ऊचुः। इहागत्य नरो यस्तु त्रिरात्रोपोषितः शुचिः। कृत्वा स्नानं पितॄंस्तर्प्य श्राद्धं कुर्यात्समाहितः

ṛṣaya ūcuḥ| ihāgatya naro yastu trirātropoṣitaḥ śuciḥ| kṛtvā snānaṁ pitṝṁstarpya śrāddhaṁ kuryātsamāhitaḥ

ऋषियों ने कहा—यहाँ आकर जो मनुष्य तीन रात्रि उपवास करके, पवित्र होकर, स्नान करके, पितरों को तर्पण देकर, समाहित चित्त से श्राद्ध करे—

श्लोक 66 (skanda.7.255.66)

सर्वतीर्थोद्भवं तस्य पुण्यं भूयात्पुरंदर। नाधोगतिमवाप्नोति विबुधैस्सह मोदताम्। तथेत्युक्त्वा ततः शक्रस्तत्रैवान्तर्हितोऽभवत्

sarvatīrthodbhavaṁ tasya puṇyaṁ bhūyātpuraṁdara| nādhogatimavāpnoti vibudhaissaha modatām| tathetyuktvā tataḥ śakrastatraivāntarhito'bhavat

—हे पुरंदर, ऐसा करने वाले को समस्त तीर्थों में उत्पन्न होने वाला पुण्य प्राप्त हो, वह अधोगति को प्राप्त न हो, और देवताओं के साथ आनंद मनाए। 'तथास्तु' कहकर तब इंद्र वहीं अंतर्धान हो गए।

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