Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 256

नन्दादित्य माहात्म्य वर्णन

अध्याय 255अध्याय-सूचीअध्याय 257

श्लोक 1 (skanda.7.256.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि नन्दादित्यं समाहितः। नन्देन स्थापितं पूर्वं तत्रैवामितबुद्धिना॥

īśvara uvāca| tato gacchet mahādevi nandādityaṁ samāhitaḥ| nandena sthāpitaṁ pūrvaṁ tatraivāmitabuddhinā||

ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, इसके बाद एकाग्रचित्त होकर नन्दादित्य के दर्शन हेतु जाना चाहिए, जिसे पूर्वकाल में अपार बुद्धिमान राजा नन्द ने वहीं स्थापित किया था।

श्लोक 2 (skanda.7.256.2)

नन्दो राजा पुरा ह्यासीत्सर्वलोकसुखप्रदः। न दुर्भिक्षं न च व्याधि नाकाले मरणं नृणाम्॥

nando rājā purā hyāsīt sarvalokasukhapradaḥ| na durbhikṣaṁ na ca vyādhi nākāle maraṇaṁ nṛṇām||

प्राचीन काल में नन्द नामक राजा था, जो समस्त लोक को सुख देने वाला था; उसके राज्य में न अकाल पड़ता था, न रोग होता था, न मनुष्यों की अकाल मृत्यु होती थी।

श्लोक 3 (skanda.7.256.3)

तस्मिञ्छासति धर्मज्ञे न चावृष्टिकृतं भयम्। कस्यचित्त्वथ कालस्य पूर्वकर्मानुसारतः॥

tasmiñchāsati dharmajñe na cāvṛṣṭikṛtaṁ bhayam| kasyacit tvatha kālasya pūrvakarmānusārataḥ||

उस धर्मज्ञ राजा के शासन में अनावृष्टि का भय भी नहीं था। परन्तु किसी समय, पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार,

श्लोक 4 (skanda.7.256.4)

कुष्ठेन महता व्याप्तो वैराग्यपरमं गतः। तेन रोगाभिभूतेन देवदेवो दिवाकरः। प्रतिष्ठितो नदीतीरे स च रोगाद्विमोचितः॥

kuṣṭhena mahatā vyāpto vairāgyaparamaṁ gataḥ| tena rogābhibhūtena devadevo divākaraḥ| pratiṣṭhito nadītīre sa ca rogādvimocitaḥ||

वह राजा भीषण कुष्ठरोग से ग्रस्त होकर परम वैराग्य को प्राप्त हुआ। उस रोग से पीड़ित होकर उसने नदी के तट पर देवाधिदेव सूर्य (दिवाकर) की प्रतिष्ठा की और वह रोग से मुक्त हो गया।

श्लोक 5 (skanda.7.256.5)

देव्युवाच। किमसौ रोगवान्राजा सार्वभौमो महीपतिः। तस्य धर्मरतस्यापि कस्माद्रोगसमुद्भवः॥

devyuvāca| kimasau rogavān rājā sārvabhaumo mahīpatiḥ| tasya dharmaratasyāpi kasmād roga samudbhavaḥ||

देवी ने कहा—वह सार्वभौम राजा रोगग्रस्त कैसे हो गया? धर्मपरायण होते हुए भी उसे रोग की उत्पत्ति किस कारण से हुई?

श्लोक 6 (skanda.7.256.6)

ईश्वर उवाच। एष धर्मसदाचारो नन्दो राजा प्रतापवान्। व्यचरत्सर्वलोकान्स विमानवरमास्थितः॥

īśvara uvāca| eṣa dharmasadācāro nando rājā pratāpavān| vyacarat sarvalokān sa vimānavaramāsthitaḥ||

ईश्वर ने कहा—यह प्रतापी राजा नन्द धर्म और सदाचार से युक्त था। वह उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर सम्पूर्ण लोकों में विचरण करता था।

श्लोक 7 (skanda.7.256.7)

विमानं तस्य तुष्टेन दत्तं वै विष्णुना स्वयम्। कामगं वरवर्णेन बर्हिणेन विनादितम्॥

vimānaṁ tasya tuṣṭena dattaṁ vai viṣṇunā svayam| kāmagaṁ varavarṇena barhiṇena vināditam||

वह इच्छानुसार चलने वाला विमान स्वयं प्रसन्न होकर विष्णु ने उसे दिया था, जो सुन्दर वर्ण के मोर की बोली से गुंजायमान रहता था।

श्लोक 8 (skanda.7.256.8)

स कदाचिन्नृपश्रेष्ठो विचरंस्तत्र संस्थितः। गतवान्मानसं दिव्यं सरो देवगणान्वितम्॥

sa kadācin nṛpaśreṣṭho vicaraṁs tatra saṁsthitaḥ| gatavān mānasaṁ divyaṁ saro devagaṇānvitam||

एक बार वह श्रेष्ठ राजा उस विमान में स्थित होकर विचरण करते हुए देवसमूहों से युक्त दिव्य मानसरोवर पर जा पहुँचा।

श्लोक 9 (skanda.7.256.9)

तत्रापश्यद्बृहत्पद्मं सरोमध्यगतं सितम्। तत्र चांगुष्ठमात्रं तु स्थितं पुरुषसत्तमम्॥

tatrāpaśyad bṛhatpadmaṁ saromadhyagataṁ sitam| tatra cāṅguṣṭhamātraṁ tu sthitaṁ puruṣasattamam||

वहाँ उसने सरोवर के मध्य में स्थित एक विशाल श्वेत कमल देखा, जिसमें अँगूठे के बराबर एक श्रेष्ठ पुरुष विराजमान था।

श्लोक 10 (skanda.7.256.10)

रक्तवासोभिराच्छन्नं द्विभुजं तिग्मतेजसम्। तं दृष्ट्वा सारथिं प्राह पद्ममेतत्समाहर॥

raktavāsobhirācchannaṁ dvibhujaṁ tigmatejasam| taṁ dṛṣṭvā sārathiṁ prāha padmam etat samāhara||

वह पुरुष लाल वस्त्र से आच्छादित, दो भुजाओं वाला और तीव्र तेजस्वी था। उसे देखकर राजा ने सारथी से कहा—यह कमल ले आओ।

श्लोक 11 (skanda.7.256.11)

इदं तु शिरसा बिभ्रत्सर्वलोकस्य सन्निधौ। श्लाघनीयो भविष्यामि तस्मादाहर मा चिरम्॥

idaṁ tu śirasā bibhrat sarvalokasya sannidhau| ślāghanīyo bhaviṣyāmi tasmād āhara mā ciram||

इस कमल को शिर पर धारण करके मैं सम्पूर्ण लोक के समक्ष प्रशंसनीय बनूँगा; अतः विलम्ब मत करो, इसे शीघ्र ले आओ।

श्लोक 12 (skanda.7.256.12)

एवमुक्तस्ततस्तेन सारथिः प्रविवेश ह। ग्रहीतुमुपचक्राम तत्पद्मं वरवर्णिनि। स्पृष्टमात्रे तदा पद्मे हुंकारः समपद्यत॥

evamuktas tatas tena sārathiḥ praviveśa ha| grahītum upacakrāma tat padmaṁ varavarṇini| spṛṣṭamātre tadā padme huṁkāraḥ samapadyata||

ऐसा कहे जाने पर सारथी सरोवर में उतरा और उस कमल को लेने के लिए प्रयत्न करने लगा। हे वरवर्णिनी! ज्यों ही उसने कमल को स्पर्श किया, त्यों ही एक हुंकार-ध्वनि उत्पन्न हुई।

श्लोक 13 (skanda.7.256.13)

राजा च तत्क्षणात्तेन शब्देन समजायत। कुष्ठी विगतवर्णश्च बलवीर्यविवर्जितः॥

rājā ca tatkṣaṇāt tena śabdena samajāyata| kuṣṭhī vigatavarṇaśca balavīryavivarjitaḥ||

उस ध्वनि के होते ही राजा उसी क्षण कुष्ठरोगी बन गया, उसका वर्ण फीका पड़ गया और वह बल-वीर्य से रहित हो गया।

श्लोक 14 (skanda.7.256.14)

तथागतमथात्मानं दृष्ट्वा स पुरुषर्षभः। तस्थौ तत्रैव शोकार्तः किमेतदिति चिन्तयन्॥

tathāgatam athātmānaṁ dṛṣṭvā sa puruṣarṣabhaḥ| tasthau tatraiva śokārtaḥ kim etad iti cintayan||

अपनी ऐसी दशा देखकर वह श्रेष्ठ पुरुष शोकाकुल होकर वहीं ठहर गया और सोचने लगा कि यह क्या हो गया।

श्लोक 15 (skanda.7.256.15)

तस्य चिन्तयतो धीमानाजगाम महातपाः। वसिष्ठो ब्रह्मपुत्रस्तु स तं पप्रच्छ पार्थिवः॥

tasya cintayato dhīmān ājagāma mahātapāḥ| vasiṣṭho brahmaputrastu sa taṁ papraccha pārthivaḥ||

जब वह इस प्रकार चिन्तामग्न था, तभी ब्रह्मा के पुत्र, महातपस्वी बुद्धिमान वसिष्ठ मुनि वहाँ आ पहुँचे। तब राजा ने उनसे प्रश्न किया।

श्लोक 16 (skanda.7.256.16)

एष मे भगवञ्जातो देहस्यास्य विपर्ययः। कुष्ठरोगाभिभूतात्मा नाहं जीवितुमुत्सहे॥

eṣa me bhagavañjāto dehasyāsya viparyayaḥ| kuṣṭharogābhibhūtātmā nāhaṁ jīvitum utsahe||

राजा ने कहा—हे भगवन्, मेरे इस शरीर में यह विपरीत परिवर्तन हो गया है। कुष्ठरोग से ग्रस्त होकर अब मुझमें जीने का उत्साह नहीं रहा।

श्लोक 17 (skanda.7.256.17)

उपायं ब्रूहि मे ब्रह्मन्व्याधितस्य चिकित्सितम्। उताहो व्रतमन्यद्वा दानं यज्ञमथापि वा॥

upāyaṁ brūhi me brahman vyādhitasya cikitsitam| utāho vratam anyadvā dānaṁ yajñam athāpi vā||

हे ब्रह्मन्! मुझ रोगी के लिए कोई उपचार बताइए—चाहे वह कोई व्रत हो, दान हो अथवा यज्ञ हो।

श्लोक 18 (skanda.7.256.18)

वसिष्ठ उवाच। एतद्ब्रह्मोद्भवं नाम पद्मं त्रैलोक्यविश्रुतम्। दृष्टमात्रेण चानेन दृष्टाः स्युः सर्वदेवताः॥

vasiṣṭha uvāca| etad brahmodbhavaṁ nāma padmaṁ trailokyaviśrutam| dṛṣṭamātreṇa cānena dṛṣṭāḥ syuḥ sarvadevatāḥ||

वसिष्ठ ने कहा—यह कमल 'ब्रह्मोद्भव' नाम से तीनों लोकों में विख्यात है। इसे मात्र देख लेने से समस्त देवताओं का दर्शन हो जाता है।

श्लोक 19 (skanda.7.256.19)

एतद्धि दृश्यते धन्यैः पद्मं कैः क्वापि पार्थिव। एतस्मिन्दृष्टमात्रे तु यो जलं विशते नरः॥

etaddhi dṛśyate dhanyaiḥ padmaṁ kaiḥ kvāpi pārthiva| etasmin dṛṣṭamātre tu yo jalaṁ viśate naraḥ||

हे राजन्! यह कमल कभी-कभी किन्हीं धन्य पुरुषों को ही दिखाई देता है। इसे देखते ही जो मनुष्य उस जल में प्रवेश करता है,

श्लोक 20 (skanda.7.256.20)

सर्वपापविनिर्मुक्तः पदं निर्वाणमाप्नुयात्। एष दृष्ट्वा तु ते सूतो हर्तुं तोये प्रविष्टवान्॥

sarvapāpavinirmuktaḥ padaṁ nirvāṇam āpnuyāt| eṣa dṛṣṭvā tu te sūto hartuṁ toye praviṣṭavān||

वह समस्त पापों से मुक्त होकर निर्वाण पद को प्राप्त करता है। इसी को देखकर तुम्हारे सारथी ने उसे लेने के लिए जल में प्रवेश किया।

श्लोक 21 (skanda.7.256.21)

तव वाक्येन राजेन्द्र मृतोऽसौ रोगवान्भवेत्। ब्रह्मपुत्रोऽप्यहं तेन पश्यामि परमेश्वरम्॥

tava vākyena rājendra mṛto'sau rogavān bhavet| brahmaputro'py ahaṁ tena paśyāmi parameśvaram||

हे राजेन्द्र! तुम्हारे वचन से प्रेरित होकर वह मरणासन्न होकर रोगग्रस्त हो गया। मैं भी, ब्रह्मा का पुत्र होते हुए भी, उसी के प्रभाव से परमेश्वर का दर्शन कर पाता हूँ।

श्लोक 22 (skanda.7.256.22)

अहन्यहनि चागच्छंस्त्वं पुनर्दृष्टवानसि। वांछंति देवता नित्यममुं हृदि मनोरथम्॥

ahanyahani cāgacchaṁs tvaṁ punardṛṣṭavān asi| vāṁchaṁti devatā nityam amuṁ hṛdi manoratham||

दिन-प्रतिदिन आते हुए तुमने इसे बार-बार देखा है। देवता भी सदैव अपने हृदय में इसी अभिलाषा को संजोए रहते हैं।

श्लोक 23 (skanda.7.256.23)

मानसे ब्रह्मपद्मं तु दृष्ट्वा स्नात्वा कदा वयम्। प्राप्स्यामः परमं ब्रह्म यद्गत्वा न पुनर्भवेत्॥

mānase brahmapadmaṁ tu dṛṣṭvā snātvā kadā vayam| prāpsyāmaḥ paramaṁ brahma yad gatvā na punarbhavet||

"मानसरोवर में इस ब्रह्मकमल को देखकर और स्नान करके हम कब उस परब्रह्म को प्राप्त करेंगे, जिसे पाकर पुनर्जन्म नहीं होता?"—यही देवताओं की कामना है।

श्लोक 24 (skanda.7.256.24)

इदं च कारणं भूयो द्वितीयं शृणु पार्थिव। कुष्ठस्य यत्त्वया प्राप्तं हर्तुकामेन पंकजम्॥

idaṁ ca kāraṇaṁ bhūyo dvitīyaṁ śṛṇu pārthiva| kuṣṭhasya yat tvayā prāptaṁ hartukāmena paṅkajam||

हे राजन्! अब दूसरा कारण भी सुनिए, जिससे तुम्हें कुष्ठरोग प्राप्त हुआ, क्योंकि तुमने उस कमल को हरने की इच्छा की थी।

श्लोक 25 (skanda.7.256.25)

प्रद्योतनस्तु गर्भेऽस्मिन्स्वयमेव व्यवस्थितः। तवैषा बुद्धिरभवद्दृष्ट्वेदं वरपंकजम्॥

pradyotanastu garbhe'smin svayameva vyavasthitaḥ| tavaiṣā buddhir abhavad dṛṣṭvedaṁ varapaṅkajam||

उस कमल के मध्य में स्वयं सूर्य (प्रद्योतन) विराजमान हैं। इस उत्तम कमल को देखकर तुम्हारे मन में यह विचार उत्पन्न हुआ था—

श्लोक 26 (skanda.7.256.26)

धारयामि शिरस्येनं लोकमध्ये विभूषणम्। इदं चिन्तयतः पापमेवं देवेन दर्शितम्॥

dhārayāmi śirasy enaṁ lokamadhye vibhūṣaṇam| idaṁ cintayataḥ pāpam evaṁ devena darśitam||

"मैं इसे अपने सिर पर आभूषण के रूप में धारण करूँगा, जिससे मैं लोगों के बीच शोभायमान होऊँगा।" इस पापपूर्ण विचार का परिणाम भगवान ने इस प्रकार तुम्हें दिखाया।

श्लोक 27 (skanda.7.256.27)

ततः सर्वप्रयत्नेन तमाराधय भास्करम्। प्रसादाद्देवदेवस्य मोक्ष्यसे नात्र संशयः॥

tataḥ sarvaprayatnena tam ārādhaya bhāskaram| prasādād devadevasya mokṣyase nātra saṁśayaḥ||

अतः अब तुम सम्पूर्ण प्रयत्न से उस सूर्यदेव की आराधना करो। देवाधिदेव की कृपा से तुम अवश्य ही मुक्त हो जाओगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 28 (skanda.7.256.28)

प्रभासं गच्छ राजेन्द्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्। तत्र सिद्धिर्भवेच्छीघ्रमार्त्तानां प्राणिनां भुवि॥

prabhāsaṁ gaccha rājendra tīrthaṁ trailokyaviśrutam| tatra siddhir bhavec chīghram ārttānāṁ prāṇināṁ bhuvi||

हे राजेन्द्र! तुम प्रभास तीर्थ को जाओ, जो तीनों लोकों में विख्यात है। वहाँ पृथ्वी पर पीड़ित प्राणियों को शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है।

श्लोक 29 (skanda.7.256.29)

ईश्वर उवाच। तस्य तद्वचनं श्रुत्वा वसिष्ठस्य महात्मनः। प्रभासं क्षेत्रमासाद्य माहेश्वर्यास्तटे शुभे॥

īśvara uvāca| tasya tadvacanaṁ śrutvā vasiṣṭhasya mahātmanaḥ| prabhāsaṁ kṣetram āsādya māheśvaryās taṭe śubhe||

ईश्वर ने कहा—महात्मा वसिष्ठ के ये वचन सुनकर राजा प्रभासक्षेत्र में पहुँचा और माहेश्वरी नदी के शुभ तट पर पहुँचा।

श्लोक 30 (skanda.7.256.30)

नन्दादित्यं प्रतिष्ठाप्य गन्धधूपानुलेपनैः। पूजयामास तं देवि पुष्पैरुच्चावचैस्तथा॥

nandādityaṁ pratiṣṭhāpya gandhadhūpānulepanaiḥ| pūjayāmāsa taṁ devi puṣpair uccāvacais tathā||

वहाँ उसने नन्दादित्य की प्रतिष्ठा की और हे देवी! उन्हें गन्ध, धूप, अनुलेपन तथा विविध प्रकार के पुष्पों से पूजा किया।

श्लोक 31 (skanda.7.256.31)

तस्य तुष्टो दिवानाथो वरदोऽहमथाब्रवीत्॥

tasya tuṣṭo divānātho varado'ham athābravīt||

राजा की भक्ति से प्रसन्न होकर दिन के स्वामी सूर्यदेव ने कहा—"मैं वरदाता हूँ, बोलो क्या चाहते हो?"

श्लोक 32 (skanda.7.256.32)

नन्द उवाच। कुष्ठेन महता व्याप्तं पश्य मां सुरसत्तम। यथाऽयं नाशमायाति तथा कुरु दिवाकर॥

nanda uvāca| kuṣṭhena mahatā vyāptaṁ paśya māṁ surasattama| yathā'yaṁ nāśam āyāti tathā kuru divākara||

नन्द ने कहा—हे देवश्रेष्ठ! देखिए, मैं भीषण कुष्ठरोग से ग्रस्त हूँ। हे दिवाकर! ऐसा कीजिए कि यह रोग नष्ट हो जाए।

श्लोक 33 (skanda.7.256.33)

सान्निध्यं कुरु देवेश स्थानेऽस्मिन्नित्यदा विभो॥

sānnidhyaṁ kuru deveśa sthāne'sminnityadā vibho||

हे देवेश! हे प्रभो! आप इस स्थान पर सदा अपनी सन्निधि बनाए रखें।

श्लोक 34 (skanda.7.256.34)

सूर्य उवाच। नीरोगस्त्वं महाराज सद्य एव भविष्यसि। अत्र ये मां समागत्य द्रक्ष्यंति च नरा भुवि॥

sūrya uvāca| nīrogas tvaṁ mahārāja sadya eva bhaviṣyasi| atra ye māṁ samāgatya drakṣyaṁti ca narā bhuvi||

सूर्य ने कहा—हे महाराज! तुम इसी क्षण नीरोग हो जाओगे। इस पृथ्वी पर जो भी मनुष्य यहाँ आकर मेरा दर्शन करेंगे,

श्लोक 35 (skanda.7.256.35)

सप्तम्यां सूर्यवारेण यास्यंति परमां गतिम्। अत्र मे सूर्यवारेण सांनिध्यं सप्तमीदिने॥

saptamyāṁ sūryavāreṇa yāsyaṁti paramāṁ gatim| atra me sūryavāreṇa sānnidhyaṁ saptamīdine||

रविवार के दिन पड़ने वाली सप्तमी तिथि को वे परम गति को प्राप्त करेंगे। रविवार से युक्त सप्तमी तिथि पर यहाँ मेरी सन्निधि रहेगी।

श्लोक 36 (skanda.7.256.36)

भविष्यति न संदेहो गमिष्ये त्वं सुखी भव। एवमुक्त्वा सहस्रांशुस्तत्रैवांतरधीयत॥

bhaviṣyati na saṁdeho gamiṣye tvaṁ sukhī bhava| evam uktvā sahasrāṁśus tatraivāntaradhīyata||

इसमें कोई सन्देह नहीं। अब मैं जाता हूँ, तुम सुखी रहो। ऐसा कहकर सहस्रांशु (सूर्य) वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 37 (skanda.7.256.37)

नीरोगत्वमवाप्यासौ कृत्वा राज्यमनुत्तमम्। जगाम परमं स्थानं यत्र देवो दिवाकरः। तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा कृत्वा श्राद्धं प्रयत्नतः॥

nīrogatvam avāpyāsau kṛtvā rājyam anuttamam| jagāma paramaṁ sthānaṁ yatra devo divākaraḥ| tasmiṁs tīrthe naraḥ snātvā kṛtvā śrāddhaṁ prayatnataḥ||

वह राजा नीरोग होकर, उत्तम राज्य का शासन करके, अन्त में उस परम स्थान को प्राप्त हुआ जहाँ सूर्यदेव विराजमान हैं। उस तीर्थ में स्नान करके और यत्नपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य—

श्लोक 38 (skanda.7.256.38)

नन्दादित्यं पुनर्दृष्ट्वा न पुनर्मर्त्त्यतां व्रजेत्। प्रदद्यात्कपिलां तत्र ब्राह्मणे वेदपारगे॥

nandādityaṁ punar dṛṣṭvā na punar marttyatāṁ vrajet| pradadyāt kapilāṁ tatra brāhmaṇe vedapārage||

—और पुनः नन्दादित्य का दर्शन करके फिर मृत्युलोक में जन्म नहीं लेता। वहाँ वेदपारंगत ब्राह्मण को कपिला गाय का दान करे।

श्लोक 39 (skanda.7.256.39)

अहोरात्रोषितो भूत्वा घृतधेनुमथापि वा। न तस्य गुणितुं शक्या संख्या पुण्यस्य केनचित्॥

ahorātroṣito bhūtvā ghṛtadhenum athāpi vā| na tasya guṇituṁ śakyā saṁkhyā puṇyasya kenacit||

एक दिन-रात वहाँ निवास करके, अथवा घृत से बनी धेनु का दान करके प्राप्त पुण्य की गणना कोई नहीं कर सकता।

श्लोक 40 (skanda.7.256.40)

इत्येवं देवदेवस्य माहात्म्यं दीप्तदीधितेः। कथितं तव सुश्रोणि सर्वपापप्रणाशनम्॥

ityevaṁ devadevasya māhātmyaṁ dīptadīdhiteḥ| kathitaṁ tava suśroṇi sarvapāpapraṇāśanam||

हे सुश्रोणि! इस प्रकार तेजस्वी देवाधिदेव सूर्य का यह माहात्म्य, जो समस्त पापों का नाश करने वाला है, मैंने तुम्हें बताया।

अध्याय 255अध्याय-सूचीअध्याय 257