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प्रभास खण्ड · अध्याय 280

च्यवनेश्वर माहात्म्य वर्णन

अध्याय 279अध्याय-सूचीअध्याय 281

श्लोक 1 (skanda.7.280.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि च्यवनेश्वरमुत्तमम्। तत्रैव संस्थितं लिंगं सर्वपातकनाशनम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi cyavaneśvaramuttamam| tatraiva saṁsthitaṁ liṁgaṁ sarvapātakanāśanam

ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, फिर उस उत्तम च्यवनेश्वर तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ स्थित लिंग समस्त पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 2 (skanda.7.280.2)

यत्र शर्यातिना दत्ता सुकन्या सा महर्षये। यत्र संस्तंभितं सैन्यमानाहार्त्तमथाकरोत्

yatra śaryātinā dattā sukanyā sā maharṣaye| yatra saṁstaṁbhitaṁ sainyamānāhārttamathākarot

जहाँ राजा शर्याति ने महर्षि को सुकन्या को दान में दिया था, और जहाँ उन्होंने राजा की सेना को 'आनाह' (उदर-अफारा) के कष्ट से स्तंभित कर दिया था।

श्लोक 3 (skanda.7.280.3)

एष शर्यातियज्ञस्य देशो देवि प्रकाशते। प्रभासक्षेत्रमध्ये तु साक्षात्पातकनाशनः

eṣa śaryātiyajñasya deśo devi prakāśate| prabhāsakṣetramadhye tu sākṣātpātakanāśanaḥ

हे देवी, यह वही स्थान है जहाँ शर्याति का यज्ञ हुआ था, जो प्रभासक्षेत्र के मध्य में साक्षात् पाप का नाश करने वाला है।

श्लोक 4 (skanda.7.280.4)

साक्षात्तत्राभजत्सोममश्विभ्यां सह कौशिकः। चुकोप भार्गवश्चैव महेन्द्राय महातपाः

sākṣāttatrābhajatsomamaśvibhyāṁ saha kauśikaḥ| cukopa bhārgavaścaiva mahendrāya mahātapāḥ

वहाँ कौशिक (इन्द्र) ने अश्विनीकुमारों के साथ साक्षात् सोमपान किया, और महातपस्वी भार्गव (च्यवन) महेन्द्र पर क्रुद्ध हो गए।

श्लोक 5 (skanda.7.280.5)

संस्तंभयामास च तं वासवं च्यवनः प्रभुः। सुकन्यां चापि भार्यां स राजपुत्रीमवाप्तवान्

saṁstaṁbhayāmāsa ca taṁ vāsavaṁ cyavanaḥ prabhuḥ| sukanyāṁ cāpi bhāryāṁ sa rājaputrīmavāptavān

प्रभु च्यवन ने उस वासव (इन्द्र) को स्तंभित कर दिया, और उन्होंने राजकुमारी सुकन्या को अपनी पत्नी के रूप में प्राप्त किया।

श्लोक 6 (skanda.7.280.6)

देव्युवाच। कथं विष्टंभितस्तेन भगवान्पाकशासनः। किमर्थं भार्गवश्चापि कोपं चक्रे महातपाः

devyuvāca| kathaṁ viṣṭaṁbhitastena bhagavānpākaśāsanaḥ| kimarthaṁ bhārgavaścāpi kopaṁ cakre mahātapāḥ

देवी ने कहा—भगवान् पाकशासन (इन्द्र) उनके द्वारा किस प्रकार स्तंभित किए गए? और महातपस्वी भार्गव किस कारण क्रुद्ध हुए?

श्लोक 7 (skanda.7.280.7)

नासत्यौ च कथं ब्रह्मन्कृ तवान्सोमपायिनौ। तत्सर्वं च यथावृत्तमाख्यातु भगवान्मम

nāsatyau ca kathaṁ brahmankṛ tavānsomapāyinau| tatsarvaṁ ca yathāvṛttamākhyātu bhagavānmama

हे ब्रह्मन्, उन्होंने अश्विनीकुमारों को सोमपायी कैसे बनाया? यह सब कुछ जैसा घटित हुआ, वह कृपया मुझे बताएँ।

श्लोक 8 (skanda.7.280.8)

ईश्वर उवाच। भृगोर्महर्षेः पुत्रोऽभूच्च्यवनो नाम नामतः। स प्रभासं समासाद्य तपस्तेपे महामुनिः

īśvara uvāca| bhṛgormaharṣeḥ putro'bhūccyavano nāma nāmataḥ| sa prabhāsaṁ samāsādya tapastepe mahāmuniḥ

ईश्वर ने कहा—महर्षि भृगु के एक पुत्र थे, जो च्यवन नाम से जाने जाते थे। वे महामुनि प्रभास में आकर तपस्या करने लगे।

श्लोक 9 (skanda.7.280.9)

स्थाणुभूतो महातेजा वीरस्थाने च भामिनि। अतिष्ठत्सुचिरं कालमेकदेशे वरानने

sthāṇubhūto mahātejā vīrasthāne ca bhāmini| atiṣṭhatsuciraṁ kālamekadeśe varānane

हे भामिनी, अत्यन्त तेजस्वी वे स्तम्भ के समान स्थिर होकर वीरस्थान में, हे वरानने, बहुत लम्बे समय तक एक ही स्थान पर खड़े रहे।

श्लोक 10 (skanda.7.280.10)

स वल्मीकोऽभवत्तत्र लताभिरभिसंवृतः। कालेन महता देवि समाकीर्णः पिपीलकैः

sa valmīko'bhavattatra latābhirabhisaṁvṛtaḥ| kālena mahatā devi samākīrṇaḥ pipīlakaiḥ

वे वहाँ लताओं से आच्छादित होकर एक बाँबी बन गए; हे देवी, बहुत काल बीतने पर वे चींटियों से भी व्याप्त हो गए।

श्लोक 11 (skanda.7.280.11)

स तथा संवृतो धीमान्मृत्पिंड इव सर्वतः। तप्यते स्म तपो घोरं वल्मीकेन समावृतः

sa tathā saṁvṛto dhīmānmṛtpiṁḍa iva sarvataḥ| tapyate sma tapo ghoraṁ valmīkena samāvṛtaḥ

इस प्रकार चारों ओर से मिट्टी के ढेले के समान ढके हुए वे बुद्धिमान मुनि बाँबी से आच्छादित होकर घोर तपस्या करते रहे।

श्लोक 12 (skanda.7.280.12)

अथास्य यातकालस्य शर्यातिर्नाम पार्थिवः। तीर्थयात्राप्रसंगेन श्रीसोमेशदिदृक्षया। आजगाम महाक्षेत्रं प्रभासं पापनाशनम्

athāsya yātakālasya śaryātirnāma pārthivaḥ| tīrthayātrāprasaṁgena śrīsomeśadidṛkṣayā| ājagāma mahākṣetraṁ prabhāsaṁ pāpanāśanam

तब समय बीतते-बीतते शर्याति नामक राजा तीर्थयात्रा के प्रसंग में श्री सोमेश्वर के दर्शन की इच्छा से उस पापनाशक महाक्षेत्र प्रभास में आए।

श्लोक 13 (skanda.7.280.13)

तस्य स्त्रीणां सहस्राणि चत्वार्यासन्परिग्रहाः। एकैव तु सुता शुभ्रा सुकन्यानाम नामतः

tasya strīṇāṁ sahasrāṇi catvāryāsanparigrahāḥ| ekaiva tu sutā śubhrā sukanyānāma nāmataḥ

उनकी चार हज़ार पत्नियाँ थीं, किन्तु उनकी केवल एक ही सुन्दर पुत्री थी, जिसका नाम सुकन्या था।

श्लोक 14 (skanda.7.280.14)

सा सखीभिः परिवृता सर्वाभरणभूषिता। चंक्रम्यमाणा वल्मीकं भार्गवस्य समासदत्

sā sakhībhiḥ parivṛtā sarvābharaṇabhūṣitā| caṁkramyamāṇā valmīkaṁ bhārgavasya samāsadat

वह अपनी सखियों से घिरी हुई, सभी आभूषणों से सुसज्जित, घूमती हुई भार्गव की उस बाँबी के पास आ पहुँची।

श्लोक 15 (skanda.7.280.15)

सा चैव सुदती तत्र पश्यमाना मनोरमान्। वनस्पतीन्विचिन्वंती विजहार सखीवृता

sā caiva sudatī tatra paśyamānā manoramān| vanaspatīnvicinvaṁtī vijahāra sakhīvṛtā

सुन्दर दाँतों वाली वह वहाँ मनोरम वृक्षों को देखती और उनसे फूल चुनती हुई, सखियों से घिरी हुई क्रीड़ा करने लगी।

श्लोक 16 (skanda.7.280.16)

रूपेण वयसा चैव सुरापानमदेन च। बभंज वनवृक्षाणां शाखाः परम पुष्पिताः

rūpeṇa vayasā caiva surāpānamadena ca| babhaṁja vanavṛkṣāṇāṁ śākhāḥ parama puṣpitāḥ

अपने रूप, यौवन और मद्यपान के नशे में, उसने वन के वृक्षों की भलीभाँति खिली हुई शाखाओं को तोड़ डाला।

श्लोक 17 (skanda.7.280.17)

तां सखीरहितामेकामेकवस्त्रामलंकृताम्। ददर्श भार्गवो धीमांश्चरंतीमिव विद्युतम्

tāṁ sakhīrahitāmekāmekavastrāmalaṁkṛtām| dadarśa bhārgavo dhīmāṁścaraṁtīmiva vidyutam

बुद्धिमान भार्गव ने उसे, जो अपनी सखियों से अलग होकर अकेली, एक ही वस्त्र में सुसज्जित थी, बिजली की भाँति विचरण करते हुए देखा।

श्लोक 18 (skanda.7.280.18)

तां पश्यमानो विजने स रेमे परमद्युतिः। क्षामकण्ठश्च ब्रह्मर्षिस्तपोबलसमन्वितः

tāṁ paśyamāno vijane sa reme paramadyutiḥ| kṣāmakaṇṭhaśca brahmarṣistapobalasamanvitaḥ

उस एकान्त स्थान में उसे देखते हुए, परम तेजस्वी वे ब्रह्मर्षि, जिनका कण्ठ तपोबल से क्षीण हो गया था, आनन्दित हुए।

श्लोक 19 (skanda.7.280.19)

तामभाषत कल्याणीं सा चास्य न शृणोति वै। ततः सुकन्या वल्मीके दृष्ट्वा भार्गवचक्षुषी

tāmabhāṣata kalyāṇīṁ sā cāsya na śṛṇoti vai| tataḥ sukanyā valmīke dṛṣṭvā bhārgavacakṣuṣī

उन्होंने उस कल्याणी से बात की, परन्तु उसने उनकी बात नहीं सुनी। तब सुकन्या ने बाँबी में भार्गव के दोनों नेत्रों को देखा,

श्लोक 20 (skanda.7.280.20)

कौतूहलात्कण्टकेन बुद्धिमोहबलात्कृता। किन्नु खल्विदमित्युक्त्वा निर्बिभेदास्य लोचने

kautūhalātkaṇṭakena buddhimohabalātkṛtā| kinnu khalvidamityuktvā nirbibhedāsya locane

और कौतूहलवश, बुद्धि के मोहित हो जाने के कारण, 'यह क्या है भला?' ऐसा कहकर उसने कांटे से उनके नेत्रों को बेध डाला।

श्लोक 21 (skanda.7.280.21)

अकुध्यत्स तया विद्धो नेत्रे परममन्युमान्। ततः शर्यातिसैन्यस्य शकृन्मूत्रे समावृणोत्

akudhyatsa tayā viddho netre paramamanyumān| tataḥ śaryātisainyasya śakṛnmūtre samāvṛṇot

नेत्रों में उसके द्वारा बींधे जाने पर वे अत्यन्त क्रोधित हो उठे। तब उन्होंने शर्याति की सेना के मल-मूत्र को अवरुद्ध कर दिया।

श्लोक 22 (skanda.7.280.22)

ततो रुद्धे शकृन्मूत्रे सैन्यमानाहदुःखितम्। तथागतमभिभेक्ष्य पर्यतप्यत पार्थिवः

tato ruddhe śakṛnmūtre sainyamānāhaduḥkhitam| tathāgatamabhibhekṣya paryatapyata pārthivaḥ

तब मल-मूत्र रुक जाने से सेना 'आनाह' (उदर-अफारा) से दुःखी हो गई; उस दशा को देखकर राजा भी अत्यन्त संतप्त हुए।

श्लोक 23 (skanda.7.280.23)

तपोनित्यस्य वृद्धस्य रोषणस्य विशेषतः। केनापकृतमद्येह भार्गवस्य महात्मनः। ज्ञातं वा यदि वाऽज्ञातं तदिदं ब्रूत मा चिरम्

taponityasya vṛddhasya roṣaṇasya viśeṣataḥ| kenāpakṛtamadyeha bhārgavasya mahātmanaḥ| jñātaṁ vā yadi vā'jñātaṁ tadidaṁ brūta mā ciram

[राजा ने कहा]—'सदा तपस्या में लीन, वृद्ध और विशेष रूप से क्रोधी स्वभाव वाले महात्मा भार्गव के साथ आज किसने अपराध किया है? चाहे जान-बूझकर हो या अनजाने में, वह शीघ्र बताओ।'

श्लोक 24 (skanda.7.280.24)

तत्रोचुः सैनिकाः सर्वे न विद्मोऽपकृतं वयम्। सर्वोपायैर्यथाकामं भवान्समधिगच्छतु

tatrocuḥ sainikāḥ sarve na vidmo'pakṛtaṁ vayam| sarvopāyairyathākāmaṁ bhavānsamadhigacchatu

तब सभी सैनिकों ने कहा—'हमें किसी अपराध का ज्ञान नहीं है। आप सभी उपायों से, जैसी आपकी इच्छा हो, स्वयं जान लें।'

श्लोक 25 (skanda.7.280.25)

ततः स पृथिवीपालः साम्ना चोग्रेण च स्वयम्। पर्यपृच्छत्सुहृद्वर्गं प्रत्यजानन्न चैव ते

tataḥ sa pṛthivīpālaḥ sāmnā cogreṇa ca svayam| paryapṛcchatsuhṛdvargaṁ pratyajānanna caiva te

तब वे राजा स्वयं कभी सौम्यता से तो कभी कठोरता से अपने सुहृदों से पूछताछ करने लगे, किन्तु उन्होंने भी कुछ स्वीकार नहीं किया।

श्लोक 26 (skanda.7.280.26)

आनाहार्त्तं ततो दृष्ट्वा तत्सैन्यं संमुखोदितम्। पितरं दुःखितं चापि सुकन्यैवमथाब्रवीत्

ānāhārttaṁ tato dṛṣṭvā tatsainyaṁ saṁmukhoditam| pitaraṁ duḥkhitaṁ cāpi sukanyaivamathābravīt

तब उस 'आनाह' से पीड़ित सेना को सामने खड़ी देखकर, तथा अपने पिता को दुःखी देखकर सुकन्या ने इस प्रकार कहा।

श्लोक 27 (skanda.7.280.27)

मया तातेह वल्मीके दृष्टं सर्वमभिज्वलत्। उद्द्योतवदविज्ञानात्तन्मया विद्धमन्तिकात्

mayā tāteha valmīke dṛṣṭaṁ sarvamabhijvalat| uddyotavadavijñānāttanmayā viddhamantikāt

'हे तात, मैंने यहाँ बाँबी में सब कुछ प्रज्वलित-सा देखा, मानो कोई चमक हो; न समझते हुए मैंने उसे पास से बेध दिया।'

श्लोक 28 (skanda.7.280.28)

एतच्छ्रुत्वा तु शर्याति र्वल्मीकं क्षिप्रमभ्यगात्। तत्रापश्यत्तपोवृद्धं वयोवृद्धं च भार्गवम्

etacchrutvā tu śaryāti rvalmīkaṁ kṣipramabhyagāt| tatrāpaśyattapovṛddhaṁ vayovṛddhaṁ ca bhārgavam

यह सुनकर शर्याति तुरंत बाँबी के पास गए; वहाँ उन्होंने तपस्या में वृद्ध और आयु में भी वृद्ध भार्गव को देखा।

श्लोक 29 (skanda.7.280.29)

अथावदत्स्वसैन्यार्थं प्रांजलिः स महीपतिः। अज्ञानाद्बालया यत्ते कृतं तत्क्षंतुमर्हसि

athāvadatsvasainyārthaṁ prāṁjaliḥ sa mahīpatiḥ| ajñānādbālayā yatte kṛtaṁ tatkṣaṁtumarhasi

तब उस राजा ने अपनी सेना के हित के लिए हाथ जोड़कर कहा—'अज्ञानवश इस बालिका ने जो आपके साथ किया है, उसे आप क्षमा करने योग्य हैं।'

श्लोक 30 (skanda.7.280.30)

ततोऽब्रवीन्महीपालं च्यवनो भार्गवस्तदा। रूपौदार्यसमायुक्तां लोभमोहसमावृताम्

tato'bravīnmahīpālaṁ cyavano bhārgavastadā| rūpaudāryasamāyuktāṁ lobhamohasamāvṛtām

तब भार्गव च्यवन ने राजा से कहा—'रूप और उदारता से युक्त, किन्तु अब लोभ और मोह से घिरे मेरे इस मन को शान्ति तभी मिलेगी,

श्लोक 31 (skanda.7.280.31)

तामेव प्रतिगृह्याहं राजन्दुहितरं तव। क्षमिष्यामि महीपाल सत्यमेतद्ब्रवीमि ते

tāmeva pratigṛhyāhaṁ rājanduhitaraṁ tava| kṣamiṣyāmi mahīpāla satyametadbravīmi te

'जब हे राजन्, मैं तुम्हारी उसी पुत्री को पत्नी रूप में स्वीकार करूँगा; तभी हे महीपाल, मैं तुम्हें क्षमा करूँगा—यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।'

श्लोक 32 (skanda.7.280.32)

ईश्वर उवाच। ऋषेर्वचनमाज्ञाय शर्यातिरविचारयन्। ददौ दुहितरं तस्मै च्यवनाय महात्मने

īśvara uvāca| ṛṣervacanamājñāya śaryātiravicārayan| dadau duhitaraṁ tasmai cyavanāya mahātmane

ईश्वर ने कहा—ऋषि के वचन को सुनकर शर्याति ने बिना किसी विचार के अपनी पुत्री उस महात्मा च्यवन को दे दी।

श्लोक 33 (skanda.7.280.33)

प्रतिगृह्य च तां कन्यां भगवान्प्रससाद ह। प्राप्ते प्रसादे राजा तु ससैन्यः पुरमाव्रजत्

pratigṛhya ca tāṁ kanyāṁ bhagavānprasasāda ha| prāpte prasāde rājā tu sasainyaḥ puramāvrajat

उस कन्या को स्वीकार करके भगवान् प्रसन्न हो गए। प्रसन्नता प्राप्त होने पर राजा अपनी सेना सहित नगर को लौट गए।

श्लोक 34 (skanda.7.280.34)

सुकन्यापि पतिं लब्ध्वा तपस्विनमनिन्दितम्। नित्यं पर्यचरत्प्रीत्या तपसा नियमेन च

sukanyāpi patiṁ labdhvā tapasvinamaninditam| nityaṁ paryacaratprītyā tapasā niyamena ca

सुकन्या भी उस निष्कलंक तपस्वी को पति रूप में पाकर तपस्या और नियम के साथ प्रेमपूर्वक सदैव उनकी सेवा करती रही।

श्लोक 35 (skanda.7.280.35)

अग्नीनामतिथीनां च शुश्रूषुरनसूयया। समाराधयत क्षिप्रं च्यवनं सा शुभानना

agnīnāmatithīnāṁ ca śuśrūṣuranasūyayā| samārādhayata kṣipraṁ cyavanaṁ sā śubhānanā

अग्नियों और अतिथियों की सेवा में तत्पर तथा ईर्ष्या से रहित उस शुभमुखी ने शीघ्र ही च्यवन को पूर्णतः संतुष्ट कर लिया।

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