प्रभास खण्ड · अध्याय 281
च्यवनेश्वर माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.281.1)
ईश्वर उवाच। कस्यचित्त्वथ कालस्य त्रिदशावश्विनौ प्रिये। कृताभिषेकां विवृतां सुकन्यां तामपश्यताम्
īśvara uvāca| kasyacittvatha kālasya tridaśāvaśvinau priye| kṛtābhiṣekāṁ vivṛtāṁ sukanyāṁ tāmapaśyatām
ईश्वर ने कहा—हे प्रिये, कुछ समय पश्चात् अश्विनीकुमार दोनों देवताओं ने स्नान करके वस्त्ररहित उस सुकन्या को देखा।
श्लोक 2 (skanda.7.281.2)
तां दृष्ट्वा दर्शनीयांगीं देवराजसुतामिव। ऊचतुः समभिद्रुत्य नासत्यावश्विनावथ
tāṁ dṛṣṭvā darśanīyāṁgīṁ devarājasutāmiva| ūcatuḥ samabhidrutya nāsatyāvaśvināvatha
देवराज की पुत्री के समान सुन्दर अंगों वाली उसे देखकर वे दोनों नासत्य अश्विनीकुमार दौड़कर पास आए और बोले।
श्लोक 3 (skanda.7.281.3)
कस्य त्वमसि वामोरु किं वनेऽस्मिंश्चिकीर्षसि। इच्छावस्त्वां च विज्ञातुं तत्त्वमाख्याहि शोभने
kasya tvamasi vāmoru kiṁ vane'smiṁścikīrṣasi| icchāvastvāṁ ca vijñātuṁ tattvamākhyāhi śobhane
'हे वामोरु, तुम किसकी हो? इस वन में क्या करना चाहती हो? हम तुम्हारे विषय में जानना चाहते हैं, हे शोभने, सच बताओ।'
श्लोक 4 (skanda.7.281.4)
ततः सुकन्या संवीता तावुवाच सुरोत्तमौ। शर्यातितनयां वित्तं भार्यां च च्यवनस्य माम्
tataḥ sukanyā saṁvītā tāvuvāca surottamau| śaryātitanayāṁ vittaṁ bhāryāṁ ca cyavanasya mām
तब वस्त्र से अपने को ढँककर सुकन्या ने उन दोनों श्रेष्ठ देवताओं से कहा—'मुझे शर्याति की पुत्री और च्यवन की पत्नी जानिए।'
श्लोक 5 (skanda.7.281.5)
ततोऽश्विनौ प्रहस्यैनामब्रूतां पुनरेव तु। कथं त्वं च विदित्वा तु पित्रा दत्ताऽऽगता वने
tato'śvinau prahasyaināmabrūtāṁ punareva tu| kathaṁ tvaṁ ca viditvā tu pitrā dattā''gatā vane
तब अश्विनीकुमार हँसते हुए उससे पुनः बोले—'यह कैसे हुआ कि जानते हुए भी तुम्हारे पिता ने तुम्हें देकर वन में भेज दिया?'
श्लोक 6 (skanda.7.281.6)
भ्राजसे गगनोद्देशे विद्युत्सौदामनी यथा। न देवेष्वपि तुल्यां हि तव पश्याव भामिनि
bhrājase gaganoddeśe vidyutsaudāmanī yathā| na deveṣvapi tulyāṁ hi tava paśyāva bhāmini
'तुम आकाश में बिजली की चमक के समान दमकती हो; हे भामिनी, देवताओं में भी हम तुम्हारे समान किसी को नहीं देखते।'
श्लोक 7 (skanda.7.281.7)
सर्वाभरणसंपन्ना परमांबरधारिणी। मामैवमनवद्यांगि त्यजैनमविवेकिनम्
sarvābharaṇasaṁpannā paramāṁbaradhāriṇī| māmaivamanavadyāṁgi tyajainamavivekinam
'सब आभूषणों से सुसज्जित, उत्तम वस्त्र धारण करने वाली, हे निर्दोष अंगों वाली, इस विवेकहीन पुरुष को त्यागकर मुझे ही चुनो।'
श्लोक 8 (skanda.7.281.8)
कस्मादेवंविधा भूत्वा जराजर्जरितं भुवि। त्वमुपास्ये हि कल्याणि कामभावबहिष्कृतम्
kasmādevaṁvidhā bhūtvā jarājarjaritaṁ bhuvi| tvamupāsye hi kalyāṇi kāmabhāvabahiṣkṛtam
'हे कल्याणी, ऐसी होकर तुम पृथ्वी पर वृद्धावस्था से जर्जर, कामभाव से रहित इस पुरुष की सेवा क्यों करती हो,
श्लोक 9 (skanda.7.281.9)
असमर्थं परित्राणे पोषणे वा शुचिस्मिते। सा त्वं च्यवनमुत्सृज्य वरयस्वैकमावयोः
asamarthaṁ paritrāṇe poṣaṇe vā śucismite| sā tvaṁ cyavanamutsṛjya varayasvaikamāvayoḥ
'जो हे शुचिस्मिते, तुम्हारी रक्षा और पालन में भी असमर्थ है? तुम च्यवन को छोड़कर हम दोनों में से किसी एक को पति रूप में वरण करो,
श्लोक 10 (skanda.7.281.10)
पत्यर्थं देवगर्भाभे मा वृथा यौवनं कृथाः। एवमुक्ता सुकन्या सा सुरौ ताविदमब्रवीत्
patyarthaṁ devagarbhābhe mā vṛthā yauvanaṁ kṛthāḥ| evamuktā sukanyā sā surau tāvidamabravīt
'हे देवकन्या के समान, व्यर्थ ही अपने यौवन को नष्ट मत करो।' इस प्रकार कहे जाने पर सुकन्या ने उन दोनों देवताओं से यह कहा।
श्लोक 11 (skanda.7.281.11)
रताऽहं च्यवने पत्यौ न चैवं परिशंकतम्। तावब्रूतां पुनश्चैतामावां देवभिषग्वरौ
ratā'haṁ cyavane patyau na caivaṁ pariśaṁkatam| tāvabrūtāṁ punaścaitāmāvāṁ devabhiṣagvarau
'मैं च्यवन को ही पति मानकर उनमें अनुरक्त हूँ, इस विषय में तनिक भी संदेह न करें।' तब देवताओं के श्रेष्ठ वैद्य उन दोनों ने पुनः उससे कहा,
श्लोक 12 (skanda.7.281.12)
युवानं रूपसंपन्नं करिष्यावः पतिं तव। ततस्तस्यावयोश्चैव पतिमेकतमं वृणु
yuvānaṁ rūpasaṁpannaṁ kariṣyāvaḥ patiṁ tava| tatastasyāvayoścaiva patimekatamaṁ vṛṇu
'हम तुम्हारे पति को युवा और रूपवान बना देंगे; तत्पश्चात् उनमें और हम दोनों में से जिसे चाहो, उसे पति रूप में चुन लेना।'
श्लोक 13 (skanda.7.281.13)
एतेन समयेनावां शमं नय सुमध्यमे। सा तयोर्वचनाद्देवि उपसंगम्य भार्गवम्। उवाच वाक्यं यत्ताभ्यामुक्तं भृगुसुतं प्रति
etena samayenāvāṁ śamaṁ naya sumadhyame| sā tayorvacanāddevi upasaṁgamya bhārgavam| uvāca vākyaṁ yattābhyāmuktaṁ bhṛgusutaṁ prati
'हे सुमध्यमे, इस शर्त पर हमें शांति प्रदान करो।' उन दोनों के इस वचन पर, हे देवी, वह भार्गव के पास जाकर वही बात कहने लगी जो उन दोनों ने भृगुपुत्र के विषय में कही थी।
श्लोक 14 (skanda.7.281.14)
तद्वाक्यं च्यवनो भार्यामुवाचाद्रियतामिति। इत्युक्ता च्यवनेनाथ सुकन्या तावुवाच वै
tadvākyaṁ cyavano bhāryāmuvācādriyatāmiti| ityuktā cyavanenātha sukanyā tāvuvāca vai
च्यवन ने अपनी पत्नी से कहा कि उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाए। च्यवन के ऐसा कहने पर सुकन्या ने उन दोनों से कहा,
श्लोक 15 (skanda.7.281.15)
एवं देवौ भवद्भ्यां यत्प्रोक्तं तत्कियतां लघु। इत्युक्तौ भिषजौ तत्र तया चैव सुकन्यया। ऊचतू राजपुत्रीं तां पतिस्तव विशत्वपः
evaṁ devau bhavadbhyāṁ yatproktaṁ tatkiyatāṁ laghu| ityuktau bhiṣajau tatra tayā caiva sukanyayā| ūcatū rājaputrīṁ tāṁ patistava viśatvapaḥ
'हे देवगण, आप दोनों ने जो कहा है, वह शीघ्र ही कर दिया जाए।' वहाँ सुकन्या के ऐसा कहने पर उन दोनों वैद्यों ने उस राजकुमारी से कहा—'तुम्हारे पति जल में प्रवेश करें।'
श्लोक 16 (skanda.7.281.16)
ततोऽपश्च्यवनः शीघ्रं रूपार्थी प्रविवेश ह। अश्विनावपि तद्देवि ततः प्राविशतां जलम्
tato'paścyavanaḥ śīghraṁ rūpārthī praviveśa ha| aśvināvapi taddevi tataḥ prāviśatāṁ jalam
तब रूप पाने की इच्छा से च्यवन तुरन्त जल में प्रविष्ट हो गए; हे देवी, फिर अश्विनीकुमार भी उसी जल में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 17 (skanda.7.281.17)
ततो मुहूर्त्तादुत्तीर्णाः सर्वे ते सरसस्ततः। दिव्यरूपधराः सर्वे युवानो मृष्टकुण्डलाः
tato muhūrttāduttīrṇāḥ sarve te sarasastataḥ| divyarūpadharāḥ sarve yuvāno mṛṣṭakuṇḍalāḥ
क्षणभर बाद वे तीनों उस सरोवर से बाहर निकले—सब दिव्य रूप धारण किए हुए, युवा, चमकते कुंडलों से सुसज्जित,
श्लोक 18 (skanda.7.281.18)
दिव्यवेषधराश्चैव मनसः प्रीतिवर्द्धनाः। तेऽब्रुवन्सहिताः सर्वे वृणीष्वान्यतमं शुभे
divyaveṣadharāścaiva manasaḥ prītivarddhanāḥ| te'bruvansahitāḥ sarve vṛṇīṣvānyatamaṁ śubhe
दिव्य वेश धारण किए हुए और मन को आनन्द देने वाले—वे सब मिलकर बोले, 'हे शुभे, हम में से किसी एक को चुन लो।'
श्लोक 19 (skanda.7.281.19)
अस्माकमीप्सितं भद्रे यतस्त्वं वरवर्णिनी। यत्र वाप्यभि कामासि तं वृणीष्व सुशोभने
asmākamīpsitaṁ bhadre yatastvaṁ varavarṇinī| yatra vāpyabhi kāmāsi taṁ vṛṇīṣva suśobhane
'हे भद्रे, हम यही चाहते हैं, क्योंकि तुम उत्तम वर्ण वाली हो; हे सुशोभने, जिसे भी चाहो, उसे चुन लो।'
श्लोक 20 (skanda.7.281.20)
सा समीक्ष्य तु तान्सर्वांस्तुल्यरूपधरान्स्थितान्। निश्चित्य मनसा बुद्ध्या देवि वव्रे पतिं स्वकम्
sā samīkṣya tu tānsarvāṁstulyarūpadharānsthitān| niścitya manasā buddhyā devi vavre patiṁ svakam
वहाँ खड़े हुए समान रूप धारण किए उन सबको देखकर, हे देवी, उसने मन और बुद्धि से निश्चय करके अपने ही पति को चुन लिया।
श्लोक 21 (skanda.7.281.21)
लब्ध्वा तु च्यवनो भार्यां वयोरूपमवस्थितः। हृष्टोऽब्रवीन्महातेजास्तौ नासत्याविदं वचः
labdhvā tu cyavano bhāryāṁ vayorūpamavasthitaḥ| hṛṣṭo'bravīnmahātejāstau nāsatyāvidaṁ vacaḥ
पत्नी को पुनः पाकर और युवावस्था तथा सुन्दर रूप में स्थित होकर, महातेजस्वी च्यवन प्रसन्न होकर उन दोनों नासत्य देवताओं से बोले,
श्लोक 22 (skanda.7.281.22)
यदहं रूपसंपन्नो वयसा च समन्वितः। कृतो भवद्भ्यां वृद्धः सन्भार्यां च प्राप्तवान्निजाम्। तद्ब्रूतं वै विधास्यामि भवतोर्यदभीप्सितम्
yadahaṁ rūpasaṁpanno vayasā ca samanvitaḥ| kṛto bhavadbhyāṁ vṛddhaḥ sanbhāryāṁ ca prāptavānnijām| tadbrūtaṁ vai vidhāsyāmi bhavatoryadabhīpsitam
'चूँकि मैं वृद्ध होते हुए भी आप दोनों के द्वारा रूपवान और युवा बनाया गया, तथा अपनी पत्नी को भी पुनः प्राप्त कर लिया, इसलिए बताइए, आप दोनों जो चाहें, मैं वही करूँगा।'
श्लोक 23 (skanda.7.281.23)
अश्विनावूचतुः। आवां तु देवभिषजौ न च शक्रः करोति नौ। सोमपानार्हतां तस्मात्कुरु नौ सोमपायिनौ
aśvināvūcatuḥ| āvāṁ tu devabhiṣajau na ca śakraḥ karoti nau| somapānārhatāṁ tasmātkuru nau somapāyinau
अश्विनीकुमारों ने कहा—'हम देवताओं के वैद्य हैं, फिर भी इन्द्र हमें सोमपान का अधिकार नहीं देते। इसलिए हमें सोमपान के योग्य बना दीजिए।'
श्लोक 24 (skanda.7.281.24)
च्यवन उवाच। अहं वां यज्ञभागार्हौ करिष्ये सोमपायिनौ
cyavana uvāca| ahaṁ vāṁ yajñabhāgārhau kariṣye somapāyinau
च्यवन ने कहा—'मैं आप दोनों को यज्ञ में भाग पाने योग्य, सोमपान करने वाला बना दूँगा।'
श्लोक 25 (skanda.7.281.25)
ईश्वर उवाच। ततस्तौ हृष्टमनसौ नासत्यौ दिवि जग्मतुः। च्यवनोऽपि सुकन्या च सुराविव विजह्रतुः
īśvara uvāca| tatastau hṛṣṭamanasau nāsatyau divi jagmatuḥ| cyavano'pi sukanyā ca surāviva vijahratuḥ
ईश्वर ने कहा—तब वे दोनों नासत्य प्रसन्न मन से स्वर्गलोक को चले गए; और च्यवन तथा सुकन्या भी देवताओं के समान आनन्दपूर्वक विहार करने लगे।