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प्रभास खण्ड · अध्याय 30

सोमेश्वर पूजा माहात्म्य वर्णन

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31

श्लोक 1 (skanda.7.30.1)

देव्युवाच। स्नात्वा तत्राग्नितीर्थेषु कं देवं पूर्वमर्च्चयेत्। निर्विघ्ना जायते येन यात्रा नृणां सुरेश्वर। तन्मे यात्राविधानं तु यथावद्वक्तुमर्हसि

devyuvāca| snātvā tatrāgnitīrtheṣu kaṁ devaṁ pūrvamarccayet| nirvighnā jāyate yena yātrā nṛṇāṁ sureśvara| tanme yātrāvidhānaṁ tu yathāvadvaktumarhasi

देवी ने कहा—हे सुरेश्वर! वहाँ अग्नितीर्थों में स्नान करके मनुष्य को सबसे पहले किस देवता की पूजा करनी चाहिए, जिससे मनुष्यों की यात्रा निर्विघ्न हो जाए? वह यात्रा-विधान मुझे यथावत् कहिए।

श्लोक 2 (skanda.7.30.2)

ईश्वर उवाच। एवं स्नात्वा विधानेन दत्त्वार्घ्यं च महोदधौ। संपूज्य गंधपुष्पैश्च वस्त्रैः पुष्पावलेपनैः

īśvara uvāca| evaṁ snātvā vidhānena dattvārghyaṁ ca mahodadhau| saṁpūjya gaṁdhapuṣpaiśca vastraiḥ puṣpāvalepanaiḥ

ईश्वर ने कहा—इस प्रकार विधिपूर्वक स्नान करके, महासागर में अर्घ्य देकर, गंध-पुष्पों से, वस्त्रों से तथा पुष्पों के लेपन से भलीभाँति पूजा करके—

श्लोक 3 (skanda.7.30.3)

हिरण्मयं यथाशक्त्या प्रक्षिपेत्तत्र कंकणम्। ततः पितॄंस्तर्पयित्वा गच्छेद्देवं कपर्दिनम्

hiraṇmayaṁ yathāśaktyā prakṣipettatra kaṁkaṇam| tataḥ pitṝṁstarpayitvā gaccheddevaṁ kapardinam

—यथाशक्ति एक सुवर्णमय कंकण वहाँ (सागर में) अर्पित करे। फिर पितरों का तर्पण करके जटाधारी देव (शिव) के पास जाए।

श्लोक 4 (skanda.7.30.4)

पुष्पैर्धूपैस्तथा गन्धैर्वस्त्रैः संपूज्य भक्तितः। गणानां त्वेति मन्त्रेण अर्घ्यं चास्मै निवेदयेत्

puṣpairdhūpaistathā gandhairvastraiḥ saṁpūjya bhaktitaḥ| gaṇānāṁ tveti mantreṇa arghyaṁ cāsmai nivedayet

पुष्पों, धूप, गंध और वस्त्रों से भक्तिपूर्वक पूजा करके 'गणानां त्वा' इस मंत्र से उन्हें अर्घ्य निवेदित करे।

श्लोक 5 (skanda.7.30.5)

शूद्राणामथ देवेशि मंत्रश्चाष्टाक्षरः स्मृतः। तत्र सोमेश्वरं गच्छेद्देवं पापहरं परम्

śūdrāṇāmatha deveśi maṁtraścāṣṭākṣaraḥ smṛtaḥ| tatra someśvaraṁ gaccheddevaṁ pāpaharaṁ param

हे देवेशि! शूद्रों के लिए आठ अक्षरों वाला मंत्र स्मृत है। वहाँ मनुष्य परम पापहारी देव सोमेश्वर के पास जाए।

श्लोक 6 (skanda.7.30.6)

स्नापयित्वा विधानेन जपेच्च शतरुद्रियम्। तथा रुद्रान्सपञ्चांगास्तथान्या रुद्रसंहिताः

snāpayitvā vidhānena japecca śatarudriyam| tathā rudrānsapañcāṁgāstathānyā rudrasaṁhitāḥ

विधिपूर्वक स्नान कराकर शतरुद्रिय का जप करे, तथा पंचांगों सहित रुद्रमंत्रों का और अन्य रुद्रसंहिताओं का भी पाठ करे।

श्लोक 7 (skanda.7.30.7)

स्नापयेत्पयसा चैव दध्ना घृतयुतेन च। मधुनेक्षुरसेनैव कुंकुमेन विलेपयेत्

snāpayetpayasā caiva dadhnā ghṛtayutena ca| madhunekṣurasenaiva kuṁkumena vilepayet

दूध से, घृतयुक्त दही से स्नान कराए; मधु और ईख के रस से भी, तथा कुंकुम से लेपन करे।

श्लोक 8 (skanda.7.30.8)

कर्पूरोशीरमिश्रेण मृगनाभियुतेन च। चन्दनेन सुगन्धेन पूज्यं संपूजयेत्ततः

karpūrośīramiśreṇa mṛganābhiyutena ca| candanena sugandhena pūjyaṁ saṁpūjayettataḥ

कर्पूर और उशीर से मिश्रित, कस्तूरी (मृगनाभि) से युक्त, सुगंधित चंदन से पूज्य देव की पूजा करे।

श्लोक 9 (skanda.7.30.9)

धूपैर्बहुविधैर्देवं धूपयित्वा यथाविधि। वस्त्रैः संवेष्टयेत्पश्चाद्दद्यान्नैवेद्यमुत्तमम्

dhūpairbahuvidhairdevaṁ dhūpayitvā yathāvidhi| vastraiḥ saṁveṣṭayetpaścāddadyānnaivedyamuttamam

अनेक प्रकार के धूपों से देव को विधिपूर्वक धूपित करके, फिर वस्त्रों से आवृत करे और उत्तम नैवेद्य अर्पित करे।

श्लोक 10 (skanda.7.30.10)

आरार्तिकं ततः कृत्वा नृत्यं कुर्याद्यथेच्छया

ārārtikaṁ tataḥ kṛtvā nṛtyaṁ kuryādyathecchayā

फिर आरती करके इच्छानुसार नृत्य करे।

श्लोक 11 (skanda.7.30.11)

अष्टांगं प्रणिपत्यैवं गीतवाद्यादिकं ततः

aṣṭāṁgaṁ praṇipatyaivaṁ gītavādyādikaṁ tataḥ

इस प्रकार अष्टांग प्रणाम करके, फिर गीत-वाद्य आदि (का आयोजन करे)।

श्लोक 12 (skanda.7.30.12)

धर्मश्रवणसंयुक्तं कार्यं प्रेक्षणकं विभोः। ततो दद्याद्द्विजातिभ्यस्तपस्विभ्यश्च शक्तितः

dharmaśravaṇasaṁyuktaṁ kāryaṁ prekṣaṇakaṁ vibhoḥ| tato dadyāddvijātibhyastapasvibhyaśca śaktitaḥ

प्रभु के लिए धर्मश्रवण से युक्त प्रेक्षण (दृश्य-प्रदर्शन) का आयोजन करना चाहिए। फिर द्विजों और तपस्वियों को यथाशक्ति दान दे।

श्लोक 13 (skanda.7.30.13)

दीनांधकृपणेभ्यश्च दानं कार्पटिकेषु च। वृषभस्तत्र दातव्यः प्रवृत्ते क्रूरकर्मणि। उपवासं ततः कुर्यात्तस्मिन्नहनि भामिनि

dīnāṁdhakṛpaṇebhyaśca dānaṁ kārpaṭikeṣu ca| vṛṣabhastatra dātavyaḥ pravṛtte krūrakarmaṇi| upavāsaṁ tataḥ kuryāttasminnahani bhāmini

दीन, अंध, कृपणों को तथा भिखारियों को भी दान दे। जब कोई क्रूर कर्म (अशुभ घटना) घटित हो, तब वहाँ बैल का दान करना चाहिए। हे भामिनि! फिर उस दिन उपवास करे।

श्लोक 14 (skanda.7.30.14)

यस्मिन्नहनि पश्येत देवं सोमेश्वरं नरः। सा तिथिर्वर्षमेकं तु उपोष्या भक्तितत्परैः

yasminnahani paśyeta devaṁ someśvaraṁ naraḥ| sā tithirvarṣamekaṁ tu upoṣyā bhaktitatparaiḥ

जिस दिन मनुष्य सोमेश्वर देव के दर्शन करे, भक्तिपरायण मनुष्यों को उस तिथि का एक वर्ष तक उपवास करना चाहिए।

श्लोक 15 (skanda.7.30.15)

एवं कृत्वा नरो भक्त्या लभते जन्मनः फलम्। तथा च सर्वतीर्थानां सकलं लभते फलम्

evaṁ kṛtvā naro bhaktyā labhate janmanaḥ phalam| tathā ca sarvatīrthānāṁ sakalaṁ labhate phalam

इस प्रकार भक्तिपूर्वक करने से मनुष्य अपने जन्म का फल प्राप्त करता है, और इसी प्रकार समस्त तीर्थों का सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।

श्लोक 16 (skanda.7.30.16)

उद्धरेत्पितृवर्गं च मातृवर्गं च भामिनि। बाल्ये वयसि यत्पापं वार्धक्ये यौवनेऽपि वा

uddharetpitṛvargaṁ ca mātṛvargaṁ ca bhāmini| bālye vayasi yatpāpaṁ vārdhakye yauvane'pi vā

हे भामिनि! वह अपने पितृ-कुल और मातृ-कुल का भी उद्धार करता है। बाल्यावस्था में, वृद्धावस्था में अथवा यौवन में जो भी पाप किया हो—

श्लोक 17 (skanda.7.30.17)

क्षालयेच्चैव तत्सर्वं दृष्ट्वा सोमेश्वरं नरः। न दुःखितो न दारिद्रो दुर्भगो वा न जायते

kṣālayeccaiva tatsarvaṁ dṛṣṭvā someśvaraṁ naraḥ| na duḥkhito na dāridro durbhago vā na jāyate

—सोमेश्वर के दर्शन करके मनुष्य उस सबको धो डालता है। वह न दुःखी होता है, न दरिद्र होता है और न दुर्भाग्यशाली उत्पन्न होता है।

श्लोक 18 (skanda.7.30.18)

सप्तजन्मान्तरेणैव दृष्टे सोमेश्वरे विभौ। धनधान्यसमायुक्ते स्फीते सञ्जायते कुले

saptajanmāntareṇaiva dṛṣṭe someśvare vibhau| dhanadhānyasamāyukte sphīte sañjāyate kule

केवल एक बार प्रभु सोमेश्वर का दर्शन करने से मनुष्य सात जन्मों तक धन-धान्य से संपन्न, समृद्ध कुल में उत्पन्न होता है।

श्लोक 19 (skanda.7.30.19)

भक्तिर्भवति भूयोऽपि सोमनाथं प्रति प्रभुम्। क्षीरेण स्नपनं पूर्वं ततो धारासमुद्भवम्

bhaktirbhavati bhūyo'pi somanāthaṁ prati prabhum| kṣīreṇa snapanaṁ pūrvaṁ tato dhārāsamudbhavam

प्रभु सोमनाथ के प्रति भक्ति बार-बार उत्पन्न होती है। पहले दूध से स्नान कराया जाए, फिर धारा के रूप में (जल-अभिषेक) उत्पन्न किया जाए।

श्लोक 20 (skanda.7.30.20)

प्रथमे प्रथमे यामे महास्ना नमतः परम्। मध्याह्ने देवदेवस्य ये प्रपश्यन्ति मानवाः। संध्यामारार्तिकं भूयो न जायन्ते च मानुषाः

prathame prathame yāme mahāsnā namataḥ param| madhyāhne devadevasya ye prapaśyanti mānavāḥ| saṁdhyāmārārtikaṁ bhūyo na jāyante ca mānuṣāḥ

जो मनुष्य प्रत्येक प्रथम प्रहर में महास्नान के पश्चात् परम भाव से नमन करते हैं, देवाधिदेव के मध्याह्नकालीन दर्शन करते हैं और पुनः संध्याकालीन आरती के दर्शन करते हैं—वे मनुष्य फिर मनुष्य-योनि में जन्म नहीं लेते।

श्लोक 21 (skanda.7.30.21)

मत्वा कलियुगं रौद्रं बहुपापं वरानने। नान्येन तरते दुर्गां कर्मणा दुर्गतिं नरः

matvā kaliyugaṁ raudraṁ bahupāpaṁ varānane| nānyena tarate durgāṁ karmaṇā durgatiṁ naraḥ

हे वरानने! कलियुग को रौद्र और अत्यंत पापमय जानकर, मनुष्य इस दुर्गति रूपी दुर्ग को किसी अन्य कर्म से पार नहीं कर सकता।

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