प्रभास खण्ड · अध्याय 31
वडवानल उत्पत्ति एवं दधीचि को देवताओं द्वारा शस्त्र-समर्पण वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.31.1)
देव्युवाच। सकारपंचकं प्रोक्तं यत्त्वया मम शंकर। कथं तदत्र संवृत्तमेतन्मे संशयं महत्
devyuvāca| sakārapaṁcakaṁ proktaṁ yattvayā mama śaṁkara| kathaṁ tadatra saṁvṛttametanme saṁśayaṁ mahat
देवी ने कहा—हे शंकर! आपने मुझसे जो 'स' अक्षर से युक्त पंचक (पाँच नामों/तीर्थों का समूह) कहा था, वह यहाँ किस प्रकार सिद्ध हुआ? यह मेरे लिए महान् संशय है।
श्लोक 2 (skanda.7.31.2)
कथं वात्र समायाता कुतश्चापि सरस्वती। कथं स वाडवो जातः कस्मिन्काले कथं ह्यभूत्। तत्सर्वं विस्तरेणेदं यथावद्वक्तुमर्हसि
kathaṁ vātra samāyātā kutaścāpi sarasvatī| kathaṁ sa vāḍavo jātaḥ kasminkāle kathaṁ hyabhūt| tatsarvaṁ vistareṇedaṁ yathāvadvaktumarhasi
और सरस्वती यहाँ किस प्रकार, कहाँ से आईं? वह वाडवाग्नि (समुद्री अग्नि) किस प्रकार, किस काल में उत्पन्न हुई? यह सब मुझे विस्तारपूर्वक यथावत् कहने योग्य हैं।
श्लोक 3 (skanda.7.31.3)
ईश्वर उवाच। शृणु देवि यथा जाता तस्मिन्क्षेत्रे सरस्वती। यतश्चैव समुद्भूता सर्वपापप्रणाशिनी
īśvara uvāca| śṛṇu devi yathā jātā tasminkṣetre sarasvatī| yataścaiva samudbhūtā sarvapāpapraṇāśinī
ईश्वर ने कहा—हे देवी! सुनो, उस क्षेत्र में सर्वपापनाशिनी सरस्वती किस प्रकार प्रकट हुईं और किस कारण से उत्पन्न हुईं।
श्लोक 4 (skanda.7.31.4)
हिरण्या वज्रिणी न्यंकुः कपिला च सरस्वती
hiraṇyā vajriṇī nyaṁkuḥ kapilā ca sarasvatī
हिरण्या, वज्रिणी, न्यंकु और कपिला — ये सब सरस्वती के ही नाम हैं।
श्लोक 5 (skanda.7.31.5)
ऋषिभिः पञ्चभिश्चात्र समाहूता यथा पुरा। वाडवेनाग्निना युक्ता यथा जाता शृणुष्व तत्
ṛṣibhiḥ pañcabhiścātra samāhūtā yathā purā| vāḍavenāgninā yuktā yathā jātā śṛṇuṣva tat
पूर्वकाल में जिस प्रकार पाँच ऋषियों द्वारा यहाँ उनका आवाहन किया गया, और जिस प्रकार वे वाडवाग्नि से युक्त हुईं, वह सुनो।
श्लोक 6 (skanda.7.31.6)
पुरा देवासुरे युद्धे निवृत्ते सोमकारणात्। पितामहस्य वचनात्तारां चन्द्रः समर्पयत्
purā devāsure yuddhe nivṛtte somakāraṇāt| pitāmahasya vacanāttārāṁ candraḥ samarpayat
पूर्वकाल में देवासुर-संग्राम सोम के कारण उत्पन्न होकर जब शांत हुआ, तब पितामह ब्रह्मा के वचन से चन्द्रमा ने तारा को (बृहस्पति को) लौटा दिया।
श्लोक 7 (skanda.7.31.7)
ततो याताः सुराः स्वर्गं पश्यन्तोऽधोमुखा महीम्। ददृशुस्ते ततो देवा भूम्यां स्वर्गमिवापरम्
tato yātāḥ surāḥ svargaṁ paśyanto'dhomukhā mahīm| dadṛśuste tato devā bhūmyāṁ svargamivāparam
फिर देवगण स्वर्ग की ओर गए, और नीचे मुख करके पृथ्वी को देखते हुए, उन देवों ने भूमि पर मानो एक और स्वर्ग को देखा।
श्लोक 8 (skanda.7.31.8)
आश्रमं मुनिमुख्यस्य दधीचेर्लोक विश्रुतम्। सर्वर्त्तुकुसुमोपेतं पादपैरुपशोभितम्। केतकीकुटजोद्भूत बकुलामोदमोदितम्
āśramaṁ munimukhyasya dadhīcerloka viśrutam| sarvarttukusumopetaṁ pādapairupaśobhitam| ketakīkuṭajodbhūta bakulāmodamoditam
वह लोकविख्यात मुनिश्रेष्ठ दधीचि का आश्रम था, जो सभी ऋतुओं के पुष्पों से युक्त, वृक्षों से सुशोभित तथा केतकी, कुटज और बकुल के पुष्पों की सुगंध से आमोदित था।
श्लोक 9 (skanda.7.31.9)
एवंविधं समासाद्य तदाश्रमपदं गुरु। कौतुकाद्द्रष्टुमारब्धाः सर्वे देवा मनोरमम्
evaṁvidhaṁ samāsādya tadāśramapadaṁ guru| kautukāddraṣṭumārabdhāḥ sarve devā manoramam
इस प्रकार के उस महान् मनोरम आश्रम-स्थान में पहुँचकर, सभी देवगण कौतूहलवश उसे देखने लगे।
श्लोक 10 (skanda.7.31.10)
ते च तीर्थाश्रमे तस्मिन्यानान्युत्सृज्य संयताः। प्रवृत्तास्तमृषिं द्रष्टुं प्राकृताः पुरुषा यथा
te ca tīrthāśrame tasminyānānyutsṛjya saṁyatāḥ| pravṛttāstamṛṣiṁ draṣṭuṁ prākṛtāḥ puruṣā yathā
उस तीर्थाश्रम में वे अपने विमानों को त्यागकर, संयमपूर्वक, साधारण मनुष्यों के समान उस ऋषि को देखने के लिए आगे बढ़े।
श्लोक 11 (skanda.7.31.11)
दृष्टवंतः सुराः सर्वे पितामहमिवापरम्। ततस्त ऋषिणा सर्वे पाद्यार्घ्यादिभिरर्च्चिताः
dṛṣṭavaṁtaḥ surāḥ sarve pitāmahamivāparam| tatasta ṛṣiṇā sarve pādyārghyādibhirarccitāḥ
सभी देवों ने उन्हें मानो दूसरे पितामह ब्रह्मा के समान देखा। तब उस ऋषि ने पाद्य, अर्घ्य आदि से उन सबका सत्कार किया।
श्लोक 12 (skanda.7.31.12)
यथोक्तमासनं भेजुः सर्वे देवाः सवासवाः। तेषां मध्ये समुत्थाय शक्रः प्रोवाच तं मुनिम्
yathoktamāsanaṁ bhejuḥ sarve devāḥ savāsavāḥ| teṣāṁ madhye samutthāya śakraḥ provāca taṁ munim
इन्द्र सहित सभी देव यथोचित आसनों पर विराजमान हुए। उनके बीच से उठकर शक्र (इन्द्र) उस मुनि से बोले।
श्लोक 13 (skanda.7.31.13)
आयुधानि विमुच्याग्रे भवान्गृह्णात्विमानि हि। तन्निशम्य वचः प्राह दधीचिः पाकशासनम्
āyudhāni vimucyāgre bhavāngṛhṇātvimāni hi| tanniśamya vacaḥ prāha dadhīciḥ pākaśāsanam
"हमारे ये आयुध पहले यहीं छोड़े जाएँ, कृपया आप इन्हें ग्रहण करें।" इस वचन को सुनकर दधीचि ने पाकशासन (इन्द्र) से कहा—
श्लोक 14 (skanda.7.31.14)
मुक्तास्त्राणि ममाभ्याशे यूयं यात त्रिविष्टपम्। तं शक्रः प्राह चैतानि कार्यकाले ह्युपस्थिते
muktāstrāṇi mamābhyāśe yūyaṁ yāta triviṣṭapam| taṁ śakraḥ prāha caitāni kāryakāle hyupasthite
"अस्त्रों को मेरे समीप छोड़कर तुम सब स्वर्गलोक को जाओ।" शक्र ने उनसे कहा—"जब कार्य का समय उपस्थित होगा—
श्लोक 15 (skanda.7.31.15)
देयानि ते पुनः शत्रूनभिजेष्यामहे रणे। पुनःपुनस्ततः शक्रः संदिश्य मुनिसत्तमम्
deyāni te punaḥ śatrūnabhijeṣyāmahe raṇe| punaḥpunastataḥ śakraḥ saṁdiśya munisattamam
—वे हमें पुनः लौटानी होंगी, जिससे हम युद्ध में अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सकें।" फिर शक्र ने उस श्रेष्ठ मुनि को बार-बार यह आदेश देकर—
श्लोक 16 (skanda.7.31.16)
अस्माकमेव देयानि न चान्यस्य त्वया मुने। बाढमित्युदिते शक्रमुक्तवान्मुनिसत्तमः
asmākameva deyāni na cānyasya tvayā mune| bāḍhamityudite śakramuktavānmunisattamaḥ
"हे मुने! वे हमें ही दी जाएँ, किसी और को नहीं।" जब 'बहुत अच्छा' (ऐसा स्वीकार) कहा गया, तब उस श्रेष्ठ मुनि ने शक्र से कहा—
श्लोक 17 (skanda.7.31.17)
दास्यामि ते समस्तानि युद्धकाले विशेषतः। नास्य मिथ्या भवेद्वाक्यमिति मत्वा शचीपतिः। मुक्त्वास्त्राणि तदभ्याशे पुनः स्वर्गं गतस्तदा
dāsyāmi te samastāni yuddhakāle viśeṣataḥ| nāsya mithyā bhavedvākyamiti matvā śacīpatiḥ| muktvāstrāṇi tadabhyāśe punaḥ svargaṁ gatastadā
"मैं तुम्हें ये सब, विशेषतः युद्ध के समय, दूँगा।" 'इनका वचन मिथ्या नहीं होगा' ऐसा मानकर शचीपति (इन्द्र), अस्त्रों को उनके समीप छोड़कर, तब पुनः स्वर्ग को चले गए।
श्लोक 18 (skanda.7.31.18)
अस्त्रार्पणं यः प्रयतः प्रयत्नाच्छृणोति राजा भुवि भावितातात्मा। सोऽभ्येति युद्धे विजयं परं हि सुतांश्च धर्मार्थयशोभिरामाः
astrārpaṇaṁ yaḥ prayataḥ prayatnācchṛṇoti rājā bhuvi bhāvitātātmā| so'bhyeti yuddhe vijayaṁ paraṁ hi sutāṁśca dharmārthayaśobhirāmāḥ
पृथ्वी पर जो शुद्ध-अंतःकरण राजा यत्नपूर्वक, संयमी होकर इस अस्त्र-समर्पण (की कथा) को सुनता है, वह युद्ध में परम विजय प्राप्त करता है तथा धर्म, अर्थ और यश से सुशोभित पुत्रों को प्राप्त करता है।