प्रभास खण्ड · अध्याय 33
सरस्वती वृत्तांत एवं वडवानल वचन वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.33.1)
देव्युवाच। पितुर्वधामर्षसुजात मन्युना यद्यत्कृतं कर्म पुरा महर्षिणा। दधीचिपुत्रेण सुरप्रसाधिना सर्वं श्रुतं तद्धि मया समाधिना
devyuvāca| piturvadhāmarṣasujāta manyunā yadyatkṛtaṁ karma purā maharṣiṇā| dadhīciputreṇa suraprasādhinā sarvaṁ śrutaṁ taddhi mayā samādhinā
देवी ने कहा—पिता की हत्या को सहन न कर पाने से उत्पन्न क्रोध के कारण उस महर्षि दधीचि-पुत्र ने, जो देवताओं को अनुशासित करने वाला था, पूर्वकाल में जो-जो कर्म किए, वह सब मैंने समाधि द्वारा सुना है।
श्लोक 2 (skanda.7.33.2)
पुनःपुनर्वै विबुधैः समानं यद्वृत्तमासीत्किमपि प्रधानम्। कार्यं हि तत्सर्वमनुक्रमेण विज्ञातुमिच्छामि कुतूहलेन
punaḥpunarvai vibudhaiḥ samānaṁ yadvṛttamāsītkimapi pradhānam| kāryaṁ hi tatsarvamanukrameṇa vijñātumicchāmi kutūhalena
देवताओं के साथ बार-बार जो कोई प्रमुख घटना घटित हुई, उस सबको मैं क्रमशः कौतूहलवश जानना चाहती हूँ।
श्लोक 3 (skanda.7.33.3)
ईश्वर उवाच। उक्तो यदासौ विबुधैः समस्तैरापः पुरा त्वं भुवि भक्षयस्व। यतोऽमराणां प्रथमं हि जाता आपोऽग्रजाः सर्वसुरासुरेभ्यः
īśvara uvāca| ukto yadāsau vibudhaiḥ samastairāpaḥ purā tvaṁ bhuvi bhakṣayasva| yato'marāṇāṁ prathamaṁ hi jātā āpo'grajāḥ sarvasurāsurebhyaḥ
ईश्वर ने कहा—जब उस (महर्षि-पुत्र) से समस्त देवताओं ने कहा, "तुम पृथ्वी पर स्थित जलों का भक्षण करो"—क्योंकि अमरों में जल ही सबसे पहले उत्पन्न हुआ था, समस्त सुरों और असुरों से भी पहले—
श्लोक 4 (skanda.7.33.4)
तेनैवमुक्तस्तु महात्मना तदा प्रदर्शयध्वं मम ता यतः स्थिताः। पीत्वा सुराः सर्वमहं पुरस्तात्कृत्यं करिष्ये सुरभक्षणं हि
tenaivamuktastu mahātmanā tadā pradarśayadhvaṁ mama tā yataḥ sthitāḥ| pītvā surāḥ sarvamahaṁ purastātkṛtyaṁ kariṣye surabhakṣaṇaṁ hi
—उस महात्मा ने ऐसा कहे जाने पर उत्तर दिया, "मुझे दिखाओ कि वे जल कहाँ स्थित हैं। उन सबको पीकर, हे देवो! मैं पहले यह कार्य कर लूँगा, फिर देवताओं का भक्षण करूँगा।"
श्लोक 5 (skanda.7.33.5)
तत्रापि नेतुं यदि मां समर्था यत्रासते वारिचयाः समेताः। अतोऽन्यथा नाहमलीकवादी प्राणे प्रयाते मुनिवाक्यकारी
tatrāpi netuṁ yadi māṁ samarthā yatrāsate vāricayāḥ sametāḥ| ato'nyathā nāhamalīkavādī prāṇe prayāte munivākyakārī
"यदि कोई मुझे वहाँ ले जाने में समर्थ हो, जहाँ समस्त जलराशियाँ स्थित हैं—इसके अतिरिक्त मैं मिथ्याभाषी नहीं हूँ; प्राण जाने पर भी मैं मुनि (पिता) के वचन का पालन करने वाला हूँ।"
श्लोक 6 (skanda.7.33.6)
आहोक्ते पुंडरीकाक्ष और्वं हि वाडवं तदा। त्वां प्रापयिष्ये यत्रापः केन यानेन वाडव
āhokte puṁḍarīkākṣa aurvaṁ hi vāḍavaṁ tadā| tvāṁ prāpayiṣye yatrāpaḥ kena yānena vāḍava
यह सुनकर पुंडरीकाक्ष (विष्णु) ने तब और्व वाडवाग्नि से कहा—"मैं तुम्हें वहाँ पहुँचा दूँगा, जहाँ जल है। हे वाडव! किस वाहन से (चलोगे)?"
श्लोक 7 (skanda.7.33.7)
वाडव उवाच। नाहं हयादिभिर्यानैर्गंतुं तत्र समुत्सहे। कुमारीकरसंपर्कमेकं मुक्त्वा मतं हि मे
vāḍava uvāca| nāhaṁ hayādibhiryānairgaṁtuṁ tatra samutsahe| kumārīkarasaṁparkamekaṁ muktvā mataṁ hi me
वाडव ने कहा—"मैं घोड़े आदि वाहनों से वहाँ जाने का उत्साह नहीं रखता। कुमारी के हाथ के स्पर्श के अतिरिक्त और कोई साधन मुझे स्वीकार्य नहीं है।"
श्लोक 8 (skanda.7.33.8)
विष्णुरुवाच। एतत्ते सुलभं यानं तां कन्यामानयाम्यहम्। या त्वां नेतुं समर्था स्यादपां स्थानं सुनिश्चितम्
viṣṇuruvāca| etatte sulabhaṁ yānaṁ tāṁ kanyāmānayāmyaham| yā tvāṁ netuṁ samarthā syādapāṁ sthānaṁ suniścitam
विष्णु ने कहा—"यह वाहन तुम्हारे लिए सुलभ है। मैं उस कन्या को लाता हूँ, जो तुम्हें उस निश्चित जलस्थान तक ले जाने में समर्थ होगी।"
श्लोक 9 (skanda.7.33.9)
ईश्वर उवाच। सुरभीशापसंतप्ता प्रागुपात्तदशाफला। सरस्वती यानभूता तस्य सा विष्णुना कृता
īśvara uvāca| surabhīśāpasaṁtaptā prāgupāttadaśāphalā| sarasvatī yānabhūtā tasya sā viṣṇunā kṛtā
ईश्वर ने कहा—सुरभि के शाप से संतप्त, जिसने पहले उसी दशा का फल पाया था, वह सरस्वती विष्णु द्वारा उसका (वाडव का) वाहन बनाई गई।
श्लोक 10 (skanda.7.33.10)
ततोऽब्रवीद्विभुर्गंगां पार्श्वतः समुपस्थिताम्। एनं वह्निं महाभागे वेगान्नय महोदधिम्। नान्या शक्ता समानेतुं त्वां विना लोकपावनि
tato'bravīdvibhurgaṁgāṁ pārśvataḥ samupasthitām| enaṁ vahniṁ mahābhāge vegānnaya mahodadhim| nānyā śaktā samānetuṁ tvāṁ vinā lokapāvani
तब प्रभु ने समीप में उपस्थित गंगा से कहा—"हे महाभागे! इस अग्नि को वेगपूर्वक महासागर तक ले जाओ। हे लोकपावनि! तुम्हारे अतिरिक्त कोई अन्य इसे ले जाने में समर्थ नहीं है।"
श्लोक 11 (skanda.7.33.11)
गङ्गोवाच। नास्ति मे भगवञ्छक्ति रौर्वं वोढुं जगत्पते। रौद्ररूपी महानेष दहत्येवानलो भृशम्
gaṅgovāca| nāsti me bhagavañchakti raurvaṁ voḍhuṁ jagatpate| raudrarūpī mahāneṣa dahatyevānalo bhṛśam
गंगा ने कहा—"हे भगवन्, हे जगत्पते! मुझमें इस और्वाग्नि को धारण करने की शक्ति नहीं है। यह रौद्र रूप वाली महान् अग्नि अत्यंत प्रचंडता से जलाती है।"
श्लोक 12 (skanda.7.33.12)
ततस्तु यमुनां प्राह सिन्धुं तस्या ह्यनन्तरम्। अन्या नदीश्च विविधाः पृथक्पृथगुदारधीः
tatastu yamunāṁ prāha sindhuṁ tasyā hyanantaram| anyā nadīśca vividhāḥ pṛthakpṛthagudāradhīḥ
फिर उन्होंने यमुना से कहा, फिर सिंधु से, और फिर उदार बुद्धि वाली अन्य विविध नदियों से भी पृथक्-पृथक् कहा।
श्लोक 13 (skanda.7.33.13)
अशक्तास्ताः समानेतुं पृष्टाश्च सुरसत्तमैः। ततः सरस्वतीं प्राह देवदेवो जनार्द्दनः। त्वमेव व्रज कल्याणि प्रतीच्यां लवणोदधौ
aśaktāstāḥ samānetuṁ pṛṣṭāśca surasattamaiḥ| tataḥ sarasvatīṁ prāha devadevo janārddanaḥ| tvameva vraja kalyāṇi pratīcyāṁ lavaṇodadhau
श्रेष्ठ देवों द्वारा पूछे जाने पर वे सब भी इसे ले जाने में असमर्थ रहीं। तब देवाधिदेव जनार्दन ने सरस्वती से कहा—"हे कल्याणि! तुम्हीं पश्चिम दिशा में लवणसागर तक जाओ।"
श्लोक 14 (skanda.7.33.14)
एवं कृते सुराः सर्वे भविष्यन्ति भयोज्झिताः। अन्यथा वाडवेनैते दह्यंते स्वेन तेजसा
evaṁ kṛte surāḥ sarve bhaviṣyanti bhayojjhitāḥ| anyathā vāḍavenaite dahyaṁte svena tejasā
"ऐसा करने पर सभी देव भय से मुक्त हो जाएँगे। अन्यथा ये सब वाडवाग्नि द्वारा उसके अपने ही तेज से जला दिए जाएँगे।"
श्लोक 15 (skanda.7.33.15)
तस्मात्त्वं रक्ष विबुधाने तस्मात्तुमुलाद्भयात्। मातेव भव सुश्रोणि सुराणामभयप्रदा
tasmāttvaṁ rakṣa vibudhāne tasmāttumulādbhayāt| māteva bhava suśroṇi surāṇāmabhayapradā
"इसलिए तुम इस भीषण भय से देवगणों की रक्षा करो। हे सुश्रोणि! माता के समान बनो, देवताओं को अभय प्रदान करने वाली।"
श्लोक 16 (skanda.7.33.16)
एवमुक्ता हि सा तेन विष्णुना प्रभविष्णुना। आह नाहं स्वतन्त्रास्मि पिता मे ध्रियते चिरात्
evamuktā hi sā tena viṣṇunā prabhaviṣṇunā| āha nāhaṁ svatantrāsmi pitā me dhriyate cirāt
प्रभावशाली विष्णु द्वारा ऐसा कहे जाने पर उसने कहा—"मैं स्वतंत्र नहीं हूँ; मेरे पिता मुझे दीर्घकाल से (अपने अधीन) रखते हैं।"
श्लोक 17 (skanda.7.33.17)
तस्याहं कारिणी नित्यं कुमारी च धृतव्रता। कालत्रयेप्यस्वतन्त्रा श्रूयते विबुधैः सुता
tasyāhaṁ kāriṇī nityaṁ kumārī ca dhṛtavratā| kālatrayepyasvatantrā śrūyate vibudhaiḥ sutā
"मैं सदा उनकी आज्ञाकारिणी, दृढ़व्रता कुमारी हूँ। तीनों कालों में भी पुत्री को विद्वानों द्वारा अस्वतंत्र ही कहा जाता है।"
श्लोक 18 (skanda.7.33.18)
पित्रादेशं विना नाहं पदमेकमपि क्वचित्। गच्छामि तस्मात्कोऽप्यन्य उपायश्चिंत्यतां हरे
pitrādeśaṁ vinā nāhaṁ padamekamapi kvacit| gacchāmi tasmātko'pyanya upāyaściṁtyatāṁ hare
"पिता की आज्ञा के बिना मैं कहीं भी एक कदम भी नहीं चलती। इसलिए, हे हरे! कोई अन्य उपाय सोचा जाए।"
श्लोक 19 (skanda.7.33.19)
तत्स्वरूपं विदित्वैवं समभ्येत्य पितामहम्। तमब्रवीद्वासुदेवो देवकार्यमिदं कुरु
tatsvarūpaṁ viditvaivaṁ samabhyetya pitāmaham| tamabravīdvāsudevo devakāryamidaṁ kuru
इस स्थिति को जानकर, पितामह ब्रह्मा के पास जाकर, वासुदेव ने उनसे कहा—"यह देवकार्य आप ही संपन्न कीजिए।"
श्लोक 20 (skanda.7.33.20)
नान्यथा शक्यते नेतुं वाडवोऽग्निर्महाबलः। अदृष्टदोषां मुक्त्वेमां कुमारीं तनयां तव
nānyathā śakyate netuṁ vāḍavo'gnirmahābalaḥ| adṛṣṭadoṣāṁ muktvemāṁ kumārīṁ tanayāṁ tava
"महाबली वाडवाग्नि को अन्य किसी उपाय से नहीं ले जाया जा सकता—सिवाय आपकी इस निर्दोष कुमारी पुत्री के।"
श्लोक 21 (skanda.7.33.21)
तच्छ्रुत्वा विष्णुना प्रोक्तं कुमारीं तनयां तदा। शिरस्याधाय सस्नेहमुवाच प्रपितामहः
tacchrutvā viṣṇunā proktaṁ kumārīṁ tanayāṁ tadā| śirasyādhāya sasnehamuvāca prapitāmahaḥ
विष्णु का यह वचन सुनकर, प्रपितामह ब्रह्मा ने अपनी कुमारी पुत्री के सिर पर स्नेहपूर्वक हाथ रखते हुए उससे कहा—
श्लोक 22 (skanda.7.33.22)
याहि देवि सुरान्सर्वान्रक्ष त्वं भयमागतान्। विनिक्षिप त्वं नीत्वैनं वाडवं लवणांभसि। पितुर्वाक्यं हि सा श्रुत्वा प्रोवाच श्रुतिलक्षणा
yāhi devi surānsarvānrakṣa tvaṁ bhayamāgatān| vinikṣipa tvaṁ nītvainaṁ vāḍavaṁ lavaṇāṁbhasi| piturvākyaṁ hi sā śrutvā provāca śrutilakṣaṇā
—"हे देवि! जाओ, भय से आए हुए समस्त देवताओं की रक्षा करो। इस वाडव को लेकर लवणजल में इसे विसर्जित कर दो।" पिता का यह वचन सुनकर श्रुति-लक्षणा (वेदज्ञ) सरस्वती ने कहा—
श्लोक 23 (skanda.7.33.23)
सरस्वत्युवाच। एषास्मि प्रस्थिता तात तव वाक्या दसंशयम्। रौद्रोऽयं वाडवो वह्निस्तनुं मे भक्षयिष्यति
sarasvatyuvāca| eṣāsmi prasthitā tāta tava vākyā dasaṁśayam| raudro'yaṁ vāḍavo vahnistanuṁ me bhakṣayiṣyati
सरस्वती ने कहा—"हे तात! मैं आपके वचन से निःसंदेह प्रस्थान करती हूँ। किंतु यह भयंकर वाडवाग्नि मेरे शरीर को भस्म कर देगी—
श्लोक 24 (skanda.7.33.24)
प्राप्तं कलियुगं रौद्रं सांप्रतं पृथिवीतले। लोकः पापसमाचारः स्पर्शयिष्यति मां प्रभो
prāptaṁ kaliyugaṁ raudraṁ sāṁprataṁ pṛthivītale| lokaḥ pāpasamācāraḥ sparśayiṣyati māṁ prabho
—इसके अतिरिक्त, हे प्रभो! अब पृथ्वी पर भयंकर कलियुग आ चुका है। पापाचारी लोग मुझे स्पर्श करेंगे।"
श्लोक 25 (skanda.7.33.25)
ततो दुःखतरं किं स्याद्यत्पापैः सह संगमः
tato duḥkhataraṁ kiṁ syādyatpāpaiḥ saha saṁgamaḥ
"पापियों के साथ संगम से बढ़कर और क्या दुःखदायी हो सकता है?"
श्लोक 26 (skanda.7.33.26)
ब्रह्मोवाच। यदि पापजनाकीर्णं न वांछसि धरातलम्। पातालतलसंस्था त्वं नय वह्निं महोदधौ
brahmovāca| yadi pāpajanākīrṇaṁ na vāṁchasi dharātalam| pātālatalasaṁsthā tvaṁ naya vahniṁ mahodadhau
ब्रह्मा ने कहा—"यदि तुम पापी जनों से भरे धरातल को नहीं चाहतीं, तो पाताल के तल में रहते हुए ही इस अग्नि को महासागर तक ले जाओ।"
श्लोक 27 (skanda.7.33.27)
यदातिश्रमसंयुक्ता वह्निना दह्यसे भृशम्। तदा विभिद्य वसुधां प्रत्यक्षा भव पुत्रिके
yadātiśramasaṁyuktā vahninā dahyase bhṛśam| tadā vibhidya vasudhāṁ pratyakṣā bhava putrike
"जब अत्यंत श्रम से युक्त होकर तुम इस अग्नि से भीषण रूप से जलने लगो, तब, हे पुत्रि! पृथ्वी को भेदकर प्रत्यक्ष हो जाना।"
श्लोक 28 (skanda.7.33.28)
कृत्वा वक्त्रं विशालाक्षि प्राची भव सुमध्यमे। ततो यास्यंति तीर्थानि त्वां श्रांतां चारुहासिनीम्
kṛtvā vaktraṁ viśālākṣi prācī bhava sumadhyame| tato yāsyaṁti tīrthāni tvāṁ śrāṁtāṁ cāruhāsinīm
"हे विशालाक्षि, सुमध्यमे! अपना मुख (पूर्व की ओर) करके प्राची (पूर्वगामिनी नदी) बन जाना। तब थकी हुई, मधुर हास्य वाली तुम्हारे पास तीर्थ स्वयं आ जाएँगे।"
श्लोक 29 (skanda.7.33.29)
तानि सर्वाणि चागत्य साहाय्यं ते वरानने। करिष्यंति त्रयस्त्रिंशत्कोट्यो वै मम शासनात्
tāni sarvāṇi cāgatya sāhāyyaṁ te varānane| kariṣyaṁti trayastriṁśatkoṭyo vai mama śāsanāt
"हे वरानने! वे सब आकर मेरी आज्ञा से तुम्हारी सहायता करेंगे—तैंतीस करोड़ (तीर्थ-देवता)।"
श्लोक 30 (skanda.7.33.30)
गच्छ पुत्रि न संतापस्त्वया कार्यः कथंचन। अरिष्टं व्रज पंथानं मा सन्तु परिपंथिनः
gaccha putri na saṁtāpastvayā kāryaḥ kathaṁcana| ariṣṭaṁ vraja paṁthānaṁ mā santu paripaṁthinaḥ
"जाओ, पुत्रि! तुम्हें किसी प्रकार का संताप नहीं करना चाहिए। अरिष्ट-रहित मार्ग पर चलो; मार्ग में कोई विघ्नकारी न हों।"
श्लोक 31 (skanda.7.33.31)
ईश्वर उवाच। एवमुक्ता तदा तेन ब्रह्मणाथ सरस्वती। त्यक्त्वा भयं हृष्टमनाः प्रयातुं समुपस्थिता
īśvara uvāca| evamuktā tadā tena brahmaṇātha sarasvatī| tyaktvā bhayaṁ hṛṣṭamanāḥ prayātuṁ samupasthitā
ईश्वर ने कहा—ब्रह्मा द्वारा ऐसा कहे जाने पर सरस्वती ने भय त्यागकर, प्रसन्न मन से प्रस्थान करने की तैयारी की।
श्लोक 32 (skanda.7.33.32)
तस्याः प्रयाणसमये शंखदुंदुभिनिःस्वनैः। मंगलानां च निर्घोषैर्जगदापूरितं शुभैः
tasyāḥ prayāṇasamaye śaṁkhaduṁdubhiniḥsvanaiḥ| maṁgalānāṁ ca nirghoṣairjagadāpūritaṁ śubhaiḥ
उसके प्रस्थान के समय शंख और दुंदुभि की ध्वनियों से, तथा शुभ मंगल-घोषों से समस्त जगत् भर गया।
श्लोक 33 (skanda.7.33.33)
सितांबरधरा देवी सितचंदनगुंठिता। शारदांबुदसंकाशा तारहारविभूषिता
sitāṁbaradharā devī sitacaṁdanaguṁṭhitā| śāradāṁbudasaṁkāśā tārahāravibhūṣitā
श्वेत वस्त्र धारण किए हुए वह देवी, श्वेत चंदन से अनुलिप्त, शरद्-ऋतु के मेघ के समान, मोतियों के हार से विभूषित—
श्लोक 34 (skanda.7.33.34)
संपूर्णचंद्रवदना पद्मपत्रायतेक्षणा। कीर्तिर्यथा महेंद्रस्य पूरयन्ती दिशो दश
saṁpūrṇacaṁdravadanā padmapatrāyatekṣaṇā| kīrtiryathā maheṁdrasya pūrayantī diśo daśa
—पूर्णचंद्र के समान मुख वाली, कमल-दल के समान विशाल नेत्रों वाली, महेंद्र की कीर्ति के समान दसों दिशाओं को भरती हुई—
श्लोक 35 (skanda.7.33.35)
स्वतेजसा द्योतयंती सर्वमाभासयज्जगत्। अनुव्रजंती गंगा वै तयोक्ता वरवर्णिनि
svatejasā dyotayaṁtī sarvamābhāsayajjagat| anuvrajaṁtī gaṁgā vai tayoktā varavarṇini
—अपने ही तेज से प्रकाशित होती हुई, समस्त जगत् को आलोकित करती हुई, गंगा उसके साथ जा रही थी। सरस्वती ने उससे कहा, हे वरवर्णिनि—
श्लोक 36 (skanda.7.33.36)
द्रक्ष्यामि त्वां पुनरहं कुत्र वै वसतीं सखि। एवमुक्ता तया गंगा प्रोवाच स्निग्धया गिरा
drakṣyāmi tvāṁ punarahaṁ kutra vai vasatīṁ sakhi| evamuktā tayā gaṁgā provāca snigdhayā girā
—"हे सखि! मैं तुम्हें फिर कहाँ, किस स्थान पर देखूँगी?" ऐसा कहे जाने पर गंगा ने स्नेहयुक्त वाणी में उससे कहा—
श्लोक 37 (skanda.7.33.37)
यदैव वीक्षसे प्राचीदिशि प्राप्स्यसि मां तदा। सुरैः परिवृता सर्वैस्तत्राहं तव सुवृते
yadaiva vīkṣase prācīdiśi prāpsyasi māṁ tadā| suraiḥ parivṛtā sarvaistatrāhaṁ tava suvṛte
—"जब भी तुम पूर्व दिशा की ओर देखोगी, वहीं तुम मुझे प्राप्त करोगी। हे सुव्रते! वहाँ मैं सभी देवताओं से घिरी हुई रहूँगी।"
श्लोक 38 (skanda.7.33.38)
दर्शनं संप्रदास्यामि त्यज शोकं शुचिस्मिते। तामापृच्छ्य ततो गंगां पुनर्दर्शनमस्तु ते
darśanaṁ saṁpradāsyāmi tyaja śokaṁ śucismite| tāmāpṛcchya tato gaṁgāṁ punardarśanamastu te
—"मैं तुम्हें दर्शन दूँगी; शोक त्याग दो, हे शुचिस्मिते!" फिर गंगा से विदा लेकर, 'पुनर्दर्शन हो' ऐसा कहकर—
श्लोक 39 (skanda.7.33.39)
गच्छ स्वमालयं भद्रे स्मर्त्तव्याऽहं त्वयाऽनघे। यमुनापि तथा चैवं गायत्री सुमनोरमा
gaccha svamālayaṁ bhadre smarttavyā'haṁ tvayā'naghe| yamunāpi tathā caivaṁ gāyatrī sumanoramā
—"हे भद्रे! अपने आलय को जाओ; तुम्हें मेरा स्मरण करना, हे अनघे!" यमुना से भी, तथा अत्यंत मनोरम गायत्री से भी इसी प्रकार (विदा ली)—
श्लोक 40 (skanda.7.33.40)
सावित्रीसहिताः सर्वाः सख्यः संप्रेषितास्तदा। ततो विसृज्य तां देवी नदी भूत्वा सरस्वती
sāvitrīsahitāḥ sarvāḥ sakhyaḥ saṁpreṣitāstadā| tato visṛjya tāṁ devī nadī bhūtvā sarasvatī
—सावित्री सहित समस्त सखियों को तब विदा दे दी गई। फिर उन्हें विदा करके, नदी बनकर, देवी सरस्वती—
श्लोक 41 (skanda.7.33.41)
हिमवंतं गिरिं प्राप्य प्लक्षात्तत्र विनिर्गता। अवतीर्णा धरापृष्ठे मत्स्यकच्छपसंकुला
himavaṁtaṁ giriṁ prāpya plakṣāttatra vinirgatā| avatīrṇā dharāpṛṣṭhe matsyakacchapasaṁkulā
—हिमालय पर्वत को प्राप्त करके, वहाँ प्लक्ष वृक्ष से निकलीं, और पृथ्वी की सतह पर, मछलियों और कछुओं से भरी हुई, अवतीर्ण हुईं।
श्लोक 42 (skanda.7.33.42)
ग्राहडिंडिमसंपूर्णा तिमिनक्रगणैर्युता। हसंती च महादेवी फेनौघैः सर्वतो दिशम्
grāhaḍiṁḍimasaṁpūrṇā timinakragaṇairyutā| hasaṁtī ca mahādevī phenaughaiḥ sarvato diśam
मगरमच्छों की दुंदुभि-समान ध्वनि से पूर्ण, तिमि-नक्र समूहों से युक्त, फेन-समूहों से मानो हँसती हुई, वह महादेवी सभी दिशाओं में (फैलती हुई)—
श्लोक 43 (skanda.7.33.43)
पुण्यतो यवहा देवीस्तूयमाना द्विजातिभिः। वाडवं वह्निमादाय हयवेगेन निःसृता
puṇyato yavahā devīstūyamānā dvijātibhiḥ| vāḍavaṁ vahnimādāya hayavegena niḥsṛtā
—पुण्य-समूह को वहन करती हुई, द्विजों द्वारा स्तुत होती हुई, वाडवाग्नि को लेकर अश्व के वेग से निकल पड़ीं।
श्लोक 44 (skanda.7.33.44)
भित्त्वा वेगाद्धरापृष्ठं प्रविष्टाथ महीतलम्। यदायदाभवच्छ्रांता दह्यते वाडवाग्निना। तदातदा मर्त्यलोके याति प्रत्यक्षतां नदी
bhittvā vegāddharāpṛṣṭhaṁ praviṣṭātha mahītalam| yadāyadābhavacchrāṁtā dahyate vāḍavāgninā| tadātadā martyaloke yāti pratyakṣatāṁ nadī
वेगपूर्वक पृथ्वी की सतह को भेदकर वे भूतल में प्रविष्ट हो गईं। जब-जब वे वाडवाग्नि से जलकर थक जातीं, तब-तब वह नदी मर्त्यलोक में प्रत्यक्ष हो जाती।
श्लोक 45 (skanda.7.33.45)
ततस्तु जायते प्राची संतप्ता वाडवेन तु। ततो वै यानि तीर्थानि कीर्त्तितानि पुरातनैः
tatastu jāyate prācī saṁtaptā vāḍavena tu| tato vai yāni tīrthāni kīrttitāni purātanaiḥ
इस प्रकार वाडवाग्नि से संतप्त होकर वे प्राची (पूर्वगामिनी) बन गईं। फिर पूर्वजों द्वारा कीर्तित जो-जो तीर्थ थे—
श्लोक 46 (skanda.7.33.46)
दिव्यांतरिक्षभौमानि सांनिध्यं यांति भामिनि। ततश्चाश्वासिता तैः सा सरस्वती पुनर्नदी। पातालतलमा साद्य जगाम मकरालयम्
divyāṁtarikṣabhaumāni sāṁnidhyaṁ yāṁti bhāmini| tataścāśvāsitā taiḥ sā sarasvatī punarnadī| pātālatalamā sādya jagāma makarālayam
—दिव्य, आंतरिक्ष और भौम—हे भामिनि! वे सब उनके सांनिध्य को प्राप्त हुए। फिर उनके द्वारा आश्वस्त होकर सरस्वती पुनः नदी बनकर, पाताल-तल को प्राप्त करके, समुद्र के आवास की ओर चलीं।
श्लोक 47 (skanda.7.33.47)
खदिरामोदमासाद्य तत्र सा वीक्ष्य सागरम्। गंतुं प्रवृत्ता तं वह्निमादाय सुरसुंदरि
khadirāmodamāsādya tatra sā vīkṣya sāgaram| gaṁtuṁ pravṛttā taṁ vahnimādāya surasuṁdari
खदिर की सुगंध वाले स्थान को पाकर, वहाँ समुद्र को देखकर, हे सुरसुंदरि! वे उस अग्नि को लेकर आगे जाने के लिए प्रवृत्त हुईं।
श्लोक 48 (skanda.7.33.48)
निरूढभारमात्मानं देवादेशाद्विचिंत्य सा। प्रहृष्टा सुमनास्तस्मात्प्रवृत्ता दक्षिणामुखी
nirūḍhabhāramātmānaṁ devādeśādviciṁtya sā| prahṛṣṭā sumanāstasmātpravṛttā dakṣiṇāmukhī
देवाज्ञा से अपने भार को पूर्ण किया हुआ मानकर, वे प्रसन्न और हर्षित मन से वहाँ से दक्षिण की ओर मुख करके चल पड़ीं।
श्लोक 49 (skanda.7.33.49)
एतस्मिन्नेव काले तु ऋषयो वेदपारगाः। चत्वारश्च महादेवि प्रभासं क्षेत्रमाश्रिताः
etasminneva kāle tu ṛṣayo vedapāragāḥ| catvāraśca mahādevi prabhāsaṁ kṣetramāśritāḥ
हे महादेवि! इसी समय चार वेदपारंगत ऋषि प्रभास क्षेत्र में निवास कर रहे थे।
श्लोक 50 (skanda.7.33.50)
हरिणश्चाथ वज्रश्च न्यंकुः कपिल एव च। तपस्तप्यंति तत्रस्थाः स्वाध्यायासक्तमानसाः
hariṇaścātha vajraśca nyaṁkuḥ kapila eva ca| tapastapyaṁti tatrasthāḥ svādhyāyāsaktamānasāḥ
हरिण, वज्र, न्यंकु और कपिल—वहाँ रहते हुए, स्वाध्याय में मन लगाकर, वे तप कर रहे थे।
श्लोक 51 (skanda.7.33.51)
पृथक्पृथक्समाहूताः स्नानार्थं तैः सरस्वती। सागरः सम्मुखस्तस्याः सहसा सम्मुपस्थितः
pṛthakpṛthaksamāhūtāḥ snānārthaṁ taiḥ sarasvatī| sāgaraḥ sammukhastasyāḥ sahasā sammupasthitaḥ
उन सबने सरस्वती को स्नान के लिए पृथक्-पृथक् बुलाया। तभी सागर सहसा उनके सम्मुख उपस्थित हो गया।
श्लोक 52 (skanda.7.33.52)
ततः सा चिन्तयामास कथं मे सुकृतं भवेत्। शापभीता च सा साध्वी पंचस्रोतास्तदाऽभवत्
tataḥ sā cintayāmāsa kathaṁ me sukṛtaṁ bhavet| śāpabhītā ca sā sādhvī paṁcasrotāstadā'bhavat
तब उन्होंने सोचा—"मेरा कल्याण कैसे हो?" शाप के भय से भयभीत वह साध्वी तब पंचस्रोता बन गईं।
श्लोक 53 (skanda.7.33.53)
एकैकं तोषयामास तमृषिं वरवर्णिनि। ततोऽस्याः पंच नामानि जातानि पृथिवीतले
ekaikaṁ toṣayāmāsa tamṛṣiṁ varavarṇini| tato'syāḥ paṁca nāmāni jātāni pṛthivītale
हे वरवर्णिनि! उन्होंने उन ऋषियों में से एक-एक को संतुष्ट किया। तभी से पृथ्वी पर उनके पाँच नाम प्रचलित हो गए।
श्लोक 54 (skanda.7.33.54)
हरिणी वज्रिणी न्यंकुः कपिला च सरस्वती। पानावगाहनान्नृणां पंचस्रोताः सरस्वती
hariṇī vajriṇī nyaṁkuḥ kapilā ca sarasvatī| pānāvagāhanānnṛṇāṁ paṁcasrotāḥ sarasvatī
हरिणी, वज्रिणी, न्यंकु, कपिला और सरस्वती—मनुष्यों के पान और अवगाहन से सरस्वती ही पंचस्रोता बनीं।
श्लोक 55 (skanda.7.33.55)
ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वंगनागमः। एषां संयोगजं चान्यन्नराणां पंचमं हि यत्
brahmahatyā surāpānaṁ steyaṁ gurvaṁganāgamaḥ| eṣāṁ saṁyogajaṁ cānyannarāṇāṁ paṁcamaṁ hi yat
ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी, गुरु-पत्नी-गमन, और इन चारों के संयोग से उत्पन्न होने वाला जो पाँचवाँ पाप मनुष्यों में होता है—
श्लोक 56 (skanda.7.33.56)
एतत्पंचविधं पुंसां पंचधाऽवस्थिता सती। नाशयेत्पातकं घोरं सखीभिः सहिता नदी
etatpaṁcavidhaṁ puṁsāṁ paṁcadhā'vasthitā satī| nāśayetpātakaṁ ghoraṁ sakhībhiḥ sahitā nadī
—इन पाँच प्रकार के पापों को, पाँच रूपों में स्थित वह पतिव्रता नदी, अपनी सखियों सहित, घोर पातक का नाश करती है।
श्लोक 57 (skanda.7.33.57)
ब्रह्महत्यां महाघोरां प्रतिलोमा सरस्वती। पानावगाहनान्नृणां नाशयत्यखिलं हि सा
brahmahatyāṁ mahāghorāṁ pratilomā sarasvatī| pānāvagāhanānnṛṇāṁ nāśayatyakhilaṁ hi sā
प्रतिलोमा सरस्वती पान और अवगाहन से मनुष्यों की अत्यंत भयंकर ब्रह्महत्या को पूर्णतः नष्ट कर देती है।
श्लोक 58 (skanda.7.33.58)
प्रमादान्मदिरापानदोषेणोपहतात्मनाम्। तद्व्यपोहाय कपिला द्विजानां वहते नदी
pramādānmadirāpānadoṣeṇopahatātmanām| tadvyapohāya kapilā dvijānāṁ vahate nadī
प्रमाद से मदिरापान के दोष से आत्मा को हानि पहुँचाने वालों के उस पाप को दूर करने के लिए द्विजों के निमित्त कपिला नदी बहती है।
श्लोक 59 (skanda.7.33.59)
उपवासाज्जपाद्धोमात्स्नानात्पानाद्द्विजन्मनाम्। सप्ताहान्नाशयेत्पापं तत्तद्भावेन चेतसा
upavāsājjapāddhomātsnānātpānāddvijanmanām| saptāhānnāśayetpāpaṁ tattadbhāvena cetasā
उपवास, जप, होम, स्नान और पान से, सात दिनों में, द्विजन्मा उस-उस भाव से चित्त को युक्त करके अपने पाप का नाश करते हैं।
श्लोक 60 (skanda.7.33.60)
स्वयं तेऽपि विशुध्यंति यथोक्तविधिकारिणः। न्यंकुं नदीं समासाद्य महतः पातकात्कृतात्
svayaṁ te'pi viśudhyaṁti yathoktavidhikāriṇaḥ| nyaṁkuṁ nadīṁ samāsādya mahataḥ pātakātkṛtāt
यथोक्त विधि का पालन करने वाले वे स्वयं भी शुद्ध हो जाते हैं—यहाँ तक कि किए गए महान् पाप से भी—न्यंकु नदी का आश्रय लेकर।
श्लोक 61 (skanda.7.33.61)
स्नानोपासनपानेन वज्रिणी गुरुतल्पगम्। नाशयत्यखिलं पुंसां पापं भूरिभयंकरम्
snānopāsanapānena vajriṇī gurutalpagam| nāśayatyakhilaṁ puṁsāṁ pāpaṁ bhūribhayaṁkaram
स्नान, उपासना और पान से वज्रिणी नदी गुरु-शय्यागमन के अत्यंत भयंकर पाप को पूर्णतः नष्ट कर देती है।
श्लोक 62 (skanda.7.33.62)
संयोगजस्य पापस्य हरणाद्धरिणी स्मृता। नदी पुण्यजलोपेता सप्ताहमवगाहनात्
saṁyogajasya pāpasya haraṇāddhariṇī smṛtā| nadī puṇyajalopetā saptāhamavagāhanāt
संयोगजनित पाप का हरण करने के कारण वह हरिणी कहलाई—वह पुण्यजलयुक्त नदी सात दिनों के अवगाहन से (उस पाप को दूर करती है)।
श्लोक 63 (skanda.7.33.63)
एवमेतानि पापानि सर्वाणि सुरसुंदरि। नदी नाशयते तथ्यं पंचस्रोता सरस्वती
evametāni pāpāni sarvāṇi surasuṁdari| nadī nāśayate tathyaṁ paṁcasrotā sarasvatī
हे सुरसुंदरि! इस प्रकार पंचस्रोता सरस्वती नदी इन सभी पापों का सत्य ही नाश करती है।
श्लोक 64 (skanda.7.33.64)
ततोऽपश्यत्पुनश्चारु सा देवी पथि संस्थितम्। पर्वतं सागरस्यांते रोद्धुं मार्गमिव स्थितम्
tato'paśyatpunaścāru sā devī pathi saṁsthitam| parvataṁ sāgarasyāṁte roddhuṁ mārgamiva sthitam
फिर उस देवी ने पुनः मार्ग में स्थित एक सुंदर पर्वत देखा, जो समुद्र के अंत में, मानो मार्ग को रोकने के लिए खड़ा था।
श्लोक 65 (skanda.7.33.65)
ब्रह्माण्डमानदण्डोऽयं पुरतो गिरिसत्तमः। व्रजन्त्याः सुरकार्येण मम विघ्नकरः स्थितः
brahmāṇḍamānadaṇḍo'yaṁ purato girisattamaḥ| vrajantyāḥ surakāryeṇa mama vighnakaraḥ sthitaḥ
"यह ब्रह्मांड के मान-दंड के समान श्रेष्ठ पर्वत सामने खड़ा है, देवकार्य के लिए जाती हुई मेरे लिए विघ्नकारी बनकर।"
श्लोक 66 (skanda.7.33.66)
उच्चैस्तरं महाशैलमवलोक्य सरस्वती। अथ वेगेन रुद्धेन गिरिणा विस्मिता सती
uccaistaraṁ mahāśailamavalokya sarasvatī| atha vegena ruddhena giriṇā vismitā satī
उस अत्यंत ऊँचे महाशैल को देखकर, वेग के अवरुद्ध हो जाने से, साध्वी सरस्वती विस्मित हो गईं।
श्लोक 67 (skanda.7.33.67)
एवं संचिन्तयेद्यावन्मनसा तन्म हाद्भुतम्। तावन्मंगलशब्देन प्रतिबुद्धः कृतस्मरः
evaṁ saṁcintayedyāvanmanasā tanma hādbhutam| tāvanmaṁgalaśabdena pratibuddhaḥ kṛtasmaraḥ
इस महान् आश्चर्य पर वे मन में इस प्रकार विचार कर ही रही थीं कि तभी मंगल-ध्वनि से जागृत हुआ कृतस्मर (नामक पर्वत-अधिष्ठाता)—
श्लोक 68 (skanda.7.33.68)
गिरिशृंगद्वंद्वचरं ददर्श पुरुषं च सा। तामाह देवीं स नगो मार्गो नास्तीह सुव्रते
giriśṛṁgadvaṁdvacaraṁ dadarśa puruṣaṁ ca sā| tāmāha devīṁ sa nago mārgo nāstīha suvrate
—उन्होंने पर्वत के दोनों शिखरों के बीच विचरण करते हुए एक पुरुष को देखा। उस पर्वत ने देवी से कहा—"हे सुव्रते! यहाँ मार्ग नहीं है—
श्लोक 69 (skanda.7.33.69)
अन्यत्र क्वापि गच्छ त्वं यत्र तेऽभिमतं शुभे। आहैवमुक्ते सा देवी नरं नगशिरःस्थितम्
anyatra kvāpi gaccha tvaṁ yatra te'bhimataṁ śubhe| āhaivamukte sā devī naraṁ nagaśiraḥsthitam
—तुम कहीं और चली जाओ, जहाँ भी तुम्हें अभीष्ट हो, हे शुभे!" ऐसा कहे जाने पर उस देवी ने पर्वत के शिखर पर खड़े उस पुरुष से कहा—
श्लोक 70 (skanda.7.33.70)
देवादेशात्समायाता न निरोध्या गिरे त्वया। एवमुक्ते गिरिः प्राह तां देवीं सुमनोरमाम्
devādeśātsamāyātā na nirodhyā gire tvayā| evamukte giriḥ prāha tāṁ devīṁ sumanoramām
—"मैं देवाज्ञा से आई हूँ; हे पर्वत! तुम्हें मुझे रोकना नहीं चाहिए।" ऐसा कहे जाने पर उस पर्वत ने उस अत्यंत मनोरम देवी से कहा—
श्लोक 71 (skanda.7.33.71)
पर्वतोऽहं त्वया भद्रे किं न ज्ञातः कृतस्मरः। त्वत्स्पर्शनान्न दोषोस्ति कुमारी त्वं यतोऽनघे
parvato'haṁ tvayā bhadre kiṁ na jñātaḥ kṛtasmaraḥ| tvatsparśanānna doṣosti kumārī tvaṁ yato'naghe
—"हे भद्रे! क्या तुम मुझे नहीं जानतीं? मैं पर्वत कृतस्मर हूँ। तुम्हारे स्पर्श से कोई दोष नहीं है, क्योंकि तुम कुमारी हो, हे अनघे!
श्लोक 72 (skanda.7.33.72)
अतस्त्वां वरये देवि भार्या मे भव सुव्रते
atastvāṁ varaye devi bhāryā me bhava suvrate
—अतः मैं तुम्हें वरण करता हूँ, हे देवि! हे सुव्रते! मेरी पत्नी बन जाओ।"
श्लोक 73 (skanda.7.33.73)
सरस्वत्युवाच। पिता मे ध्रियते यस्मात्तेन नाहं स्वयंवरा। तव भार्या भविष्यामि मार्गं यच्छ ममाधुना
sarasvatyuvāca| pitā me dhriyate yasmāttena nāhaṁ svayaṁvarā| tava bhāryā bhaviṣyāmi mārgaṁ yaccha mamādhunā
सरस्वती ने कहा—"मेरे पिता मुझे अपने अधीन रखते हैं, इसलिए मैं स्वयंवरा नहीं हूँ। (यदि वे स्वीकृति दें तो) मैं तुम्हारी पत्नी बनूँगी; अभी मुझे मार्ग दे दो।"
श्लोक 74 (skanda.7.33.74)
एवमुक्तो गिरिः प्राह अनिच्छंतीं महाबलात्। उद्वाहयिष्ये त्वां भद्रे कस्त्राता स्ति तवाधुना
evamukto giriḥ prāha anicchaṁtīṁ mahābalāt| udvāhayiṣye tvāṁ bhadre kastrātā sti tavādhunā
ऐसा कहे जाने पर पर्वत ने, अनिच्छुक उस देवी से बलपूर्वक कहा—"हे भद्रे! मैं अभी तुमसे विवाह कर लूँगा; अब तुम्हारा रक्षक कौन है?"
श्लोक 75 (skanda.7.33.75)
सा तं मनोभवाक्रान्तं मत्वा दिव्येन चक्षुषा। आह नास्ति मम त्राता त्वामेव शरणं गता
sā taṁ manobhavākrāntaṁ matvā divyena cakṣuṣā| āha nāsti mama trātā tvāmeva śaraṇaṁ gatā
अपनी दिव्य दृष्टि से यह जानकर कि वह काम से आक्रांत है, उन्होंने कहा—"मेरा कोई रक्षक नहीं है; मैं तुम्हारी ही शरण में आई हूँ—
श्लोक 76 (skanda.7.33.76)
त्वयोद्वाह्या यद्य वश्यमहमेवं महाबल। अस्नातां नोद्वह विभो स्नानं कर्त्तुं च देहि मे
tvayodvāhyā yadya vaśyamahamevaṁ mahābala| asnātāṁ nodvaha vibho snānaṁ karttuṁ ca dehi me
—यदि तुम्हारे वश में होकर मुझे तुमसे विवाह ही करना है, हे महाबल! तो मुझे अस्नात न ब्याहो; मुझे पहले स्नान करने का अवसर दो।"
श्लोक 77 (skanda.7.33.77)
तामुवाच ततः शैलः स्वसंपदभिमानवान्। सौख्यदं पश्य सुभगे मयि संपूर्णवैभवम्
tāmuvāca tataḥ śailaḥ svasaṁpadabhimānavān| saukhyadaṁ paśya subhage mayi saṁpūrṇavaibhavam
तब अपने वैभव पर गर्वित उस पर्वत ने उससे कहा—"हे सुभगे! देखो, मुझमें सम्पूर्ण वैभव है, जो सुख देने वाला है—
श्लोक 78 (skanda.7.33.78)
द्वंद्वानि यत्र गायंति किंनराणां मनोरमम्। श्रूयते च सुनिध्वानं तंत्रीवाद्यमथापरम्
dvaṁdvāni yatra gāyaṁti kiṁnarāṇāṁ manoramam| śrūyate ca sunidhvānaṁ taṁtrīvādyamathāparam
—जहाँ किन्नरों के युगल मधुर स्वर में गाते हैं, और तंत्री-वाद्य आदि की मधुर ध्वनि सुनाई देती है—
श्लोक 79 (skanda.7.33.79)
तत्र तालास्तमालाश्च पिप्पलाः पनसास्तथा। सदैव फलपुष्पाश्चा दृश्यंते सुमनोरमाः
tatra tālāstamālāśca pippalāḥ panasāstathā| sadaiva phalapuṣpāścā dṛśyaṁte sumanoramāḥ
—वहाँ ताल, तमाल, पीपल और कटहल के वृक्ष सदा फल-फूलों से युक्त, अत्यंत मनोरम दिखाई देते हैं—
श्लोक 80 (skanda.7.33.80)
कुटजैः कोविदारैश्च कदंबैः कुरबैस्तथा। मत्तालिकुलघुष्टैश्च भूधरो भाति सर्वतः
kuṭajaiḥ kovidāraiśca kadaṁbaiḥ kurabaistathā| mattālikulaghuṣṭaiśca bhūdharo bhāti sarvataḥ
—कुटज, कोविदार, कदंब और कुरब के वृक्षों से, तथा मतवाली भ्रमर-पंक्तियों की गुंजार से, यह पर्वत सब ओर से शोभायमान है—
श्लोक 81 (skanda.7.33.81)
हरांगरागवद्भाति क्वचित्कुटजकुड्मलैः। क्वचित्तु कर्णिकारैश्च विष्णोर्वासःसमप्रभः
harāṁgarāgavadbhāti kvacitkuṭajakuḍmalaiḥ| kvacittu karṇikāraiśca viṣṇorvāsaḥsamaprabhaḥ
—कहीं कुटज की कलियों से यह हर (शिव) के अंगराग के समान शोभित है, कहीं कर्णिकार के फूलों से विष्णु के वस्त्र के समान कांतिमान है—
श्लोक 82 (skanda.7.33.82)
तमालदलसंछन्नः क्वचिद्वैवस्वतद्युतिः। क्वचिद्धातुविलिप्तांगो गणाध्यक्षवपुर्नगः
tamāladalasaṁchannaḥ kvacidvaivasvatadyutiḥ| kvaciddhātuviliptāṁgo gaṇādhyakṣavapurnagaḥ
—कहीं तमाल के पत्तों से आच्छादित होकर यह वैवस्वत (यम) की कांति वाला है, कहीं धातुओं से अंग लिप्त होकर गणाध्यक्ष (गणेश) के शरीर जैसा है—
श्लोक 83 (skanda.7.33.83)
चतुर्मुख इवाभाति हरितालवपुः क्वचित्। क्वचित्सप्तच्छदैर्विष्णोर्वपुषा भात्ययं गिरिः
caturmukha ivābhāti haritālavapuḥ kvacit| kvacitsaptacchadairviṣṇorvapuṣā bhātyayaṁ giriḥ
—कहीं हरताल के रंग से चतुर्मुख (ब्रह्मा) के समान शोभित है, कहीं सप्तपर्ण वृक्षों से यह पर्वत विष्णु के शरीर जैसा शोभायमान है—
श्लोक 84 (skanda.7.33.84)
क्वचित्कात्यायनीप्रख्यः प्रियंगुसुसमाकुलः। क्वचित्केसरसंयुक्तैरनलाभो विभात्यसौ
kvacitkātyāyanīprakhyaḥ priyaṁgususamākulaḥ| kvacitkesarasaṁyuktairanalābho vibhātyasau
—कहीं प्रियंगु के फूलों से भरा हुआ यह कात्यायनी के समान प्रतीत होता है, कहीं केसर के फूलों से युक्त होकर अग्नि के समान कांतिमान है—
श्लोक 85 (skanda.7.33.85)
वृत्तैः सपुलकैः स्निग्धैः स्त्रीणामिव पयोधरैः। दुष्प्राप्यैरल्पपुण्यानां क्वचिदाभाति बिल्वकैः
vṛttaiḥ sapulakaiḥ snigdhaiḥ strīṇāmiva payodharaiḥ| duṣprāpyairalpapuṇyānāṁ kvacidābhāti bilvakaiḥ
—कहीं गोल, कँटीले, चिकने बिल्व-फलों से, स्त्रियों के स्तनों के समान, अल्प-पुण्य वालों के लिए दुर्लभ, यह शोभायमान है—
श्लोक 86 (skanda.7.33.86)
सिंहैर्व्याघ्रैर्मृगैर्नागैर्वराहैर्वानरैस्तथा। क्वचित्क्वचिदसौ भाति परस्परमनुव्रतैः
siṁhairvyāghrairmṛgairnāgairvarāhairvānaraistathā| kvacitkvacidasau bhāti parasparamanuvrataiḥ
—कहीं-कहीं सिंह, बाघ, मृग, हाथी, वराह और वानरों से, जो परस्पर मित्रता से रहते हैं, यह पर्वत शोभित है—
श्लोक 87 (skanda.7.33.87)
शूलिकोद्भिन्नमाकाशमिव कुर्वद्भिरुच्चकैः। एवमुक्ते प्रत्युवाच शारदा तं नगोत्तमम्
śūlikodbhinnamākāśamiva kurvadbhiruccakaiḥ| evamukte pratyuvāca śāradā taṁ nagottamam
—और इसके ऊँचे शिखर मानो त्रिशूलों के समान आकाश को भेदते हुए प्रतीत होते हैं।" ऐसा कहे जाने पर शारदा (सरस्वती) ने उस श्रेष्ठ पर्वत को उत्तर दिया—
श्लोक 88 (skanda.7.33.88)
यदि मां त्वं परिणये रुदंतीमेकिकां तथा। गृहाण वाडवं हस्ते यावत्स्नानं करोम्यहम्
yadi māṁ tvaṁ pariṇaye rudaṁtīmekikāṁ tathā| gṛhāṇa vāḍavaṁ haste yāvatsnānaṁ karomyaham
—"यदि तुम मुझसे विवाह करोगे, तो मैं अकेली रोती हुई हूँ; इस बीच वाडवाग्नि को अपने हाथ में ले लो, जब तक मैं स्नान कर लूँ।"
श्लोक 89 (skanda.7.33.89)
एवमुक्ते स जग्राह त नगेद्रोऽपवर्जिम्। कृतस्मरस्तत्संस्पर्शात्क्षणाद्भस्मत्वमागतः
evamukte sa jagrāha ta nagedro'pavarjim| kṛtasmarastatsaṁsparśātkṣaṇādbhasmatvamāgataḥ
ऐसा कहे जाने पर उस पर्वतराज ने बिना हिचकिचाहट के उसे ग्रहण कर लिया। कृतस्मर उसके स्पर्श मात्र से क्षणभर में भस्म हो गया।
श्लोक 90 (skanda.7.33.90)
ततः प्रभृति ते तस्य पाषाणा मृदुतां गताः। गृहदेवकुलार्थाय गृह्यंते शिल्पिभिः सह
tataḥ prabhṛti te tasya pāṣāṇā mṛdutāṁ gatāḥ| gṛhadevakulārthāya gṛhyaṁte śilpibhiḥ saha
तभी से उसके पत्थर कोमलता को प्राप्त हो गए; वे शिल्पियों द्वारा घर और देवालय बनाने के लिए ग्रहण किए जाते हैं।
श्लोक 91 (skanda.7.33.91)
दग्ध्वा कृतस्मरं देवी पुनरादाय वाडवम्। समुद्रस्य समीपे सा स्थिता हृष्टतनूरुहा
dagdhvā kṛtasmaraṁ devī punarādāya vāḍavam| samudrasya samīpe sā sthitā hṛṣṭatanūruhā
कृतस्मर को भस्म करके, देवी ने पुनः वाडवाग्नि को लेकर, प्रफुल्लित रोमांचित शरीर से समुद्र के समीप जाकर स्थित हुईं।
श्लोक 92 (skanda.7.33.92)
तत्रस्था सा महादेवी तमाह वडवानलम्। पश्य वाडव गर्जन्तं सागरं पुरतः स्थितम्
tatrasthā sā mahādevī tamāha vaḍavānalam| paśya vāḍava garjantaṁ sāgaraṁ purataḥ sthitam
वहाँ स्थित उस महादेवी ने उस वडवानल से कहा—"देखो, हे वाडव! सामने गर्जना करता हुआ समुद्र खड़ा है।"
श्लोक 93 (skanda.7.33.93)
गर्जंतं सोऽपि तं दृष्ट्वा प्रसर्पंतं च वीचिभिः। तामाह किमिदं भद्रे भीतो मे लवणोदधिः
garjaṁtaṁ so'pi taṁ dṛṣṭvā prasarpaṁtaṁ ca vīcibhiḥ| tāmāha kimidaṁ bhadre bhīto me lavaṇodadhiḥ
गर्जन करते और लहरों से रेंगते हुए उस (समुद्र) को देखकर उसने भी उससे कहा—"हे भद्रे! यह क्या है? क्या लवणसागर मुझसे भयभीत है?"
श्लोक 94 (skanda.7.33.94)
प्रहस्योवाच सा बाला को न भीतस्तवानल। भक्ष्यस्ते विहितो यस्मात्तव देवैर्महाबल
prahasyovāca sā bālā ko na bhītastavānala| bhakṣyaste vihito yasmāttava devairmahābala
हँसकर उस बाला ने कहा—"हे अनल! तुमसे कौन भयभीत नहीं है? हे महाबल! देवताओं ने तुम्हें ही इसे खा जाने के लिए नियुक्त किया है।"
श्लोक 95 (skanda.7.33.95)
स तस्यास्तद्वचः श्रुत्वा संप्रहृष्टस्तु पावकः। दास्यामि ते वरं भद्रे यथेष्टं प्रार्थयस्व नः
sa tasyāstadvacaḥ śrutvā saṁprahṛṣṭastu pāvakaḥ| dāsyāmi te varaṁ bhadre yatheṣṭaṁ prārthayasva naḥ
उसकी यह बात सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुई अग्नि ने कहा—"हे भद्रे! मैं तुम्हें वर दूँगा; हमसे जो चाहो माँग लो।"
श्लोक 96 (skanda.7.33.96)
तेनैवमुक्ता सा देवी वाडवेनाग्निना तदा। सस्मार कारणात्मानं विष्णुं कमललोचनम्
tenaivamuktā sā devī vāḍavenāgninā tadā| sasmāra kāraṇātmānaṁ viṣṇuṁ kamalalocanam
उस वाडवाग्नि द्वारा ऐसा कहे जाने पर देवी ने सबके कारणस्वरूप, कमलनयन विष्णु का स्मरण किया।
श्लोक 97 (skanda.7.33.97)
दृष्टोसावात्महृत्संस्थस्तया देवो जनार्द्दनः। स्मृतमात्रः सरस्वत्या परस्त्रिभुवनेश्वरः
dṛṣṭosāvātmahṛtsaṁsthastayā devo janārddanaḥ| smṛtamātraḥ sarasvatyā parastribhuvaneśvaraḥ
स्मरण मात्र से ही देवाधिदेव, त्रिभुवन के परम ईश्वर जनार्दन, सरस्वती द्वारा अपने हृदय में स्थित रूप में देखे गए।
श्लोक 98 (skanda.7.33.98)
मनोदृष्ट्या विलोक्याह सा तमंतःस्थमच्युतम्। वाडवो यच्छति वरमहं तं प्रार्थयामि किम्
manodṛṣṭyā vilokyāha sā tamaṁtaḥsthamacyutam| vāḍavo yacchati varamahaṁ taṁ prārthayāmi kim
मन की दृष्टि से उस हृदयस्थ अच्युत को देखकर उसने कहा—"वाडव वर दे रहा है; मैं उससे क्या माँगूँ?"
श्लोक 99 (skanda.7.33.99)
ततस्तेन हृदिस्थेन प्रोक्ता देवी सरस्वती। प्रार्थनीयो वरो भद्रे सूचीवक्त्रत्वमादरात्
tatastena hṛdisthena proktā devī sarasvatī| prārthanīyo varo bhadre sūcīvaktratvamādarāt
तब हृदय में स्थित उस (विष्णु) ने देवी सरस्वती से कहा—"हे भद्रे! आदरपूर्वक यही वर माँगने योग्य है—उसे सूई के समान मुख वाला बनने का वर माँगो।"
श्लोक 100 (skanda.7.33.100)
ततस्त्वभिहितो देव्या यदि मे त्वं वरप्रदः। ततः सूचीमुखो भूत्वा त्वं पिबापो महाबल
tatastvabhihito devyā yadi me tvaṁ varapradaḥ| tataḥ sūcīmukho bhūtvā tvaṁ pibāpo mahābala
तब देवी ने कहा—"यदि तुम मुझे वर देने वाले हो, तो हे महाबल! सूई के समान मुख वाले बनकर जल पीना।"
श्लोक 101 (skanda.7.33.101)
एवमुक्तेन तत्तेन सूचीवेधसमं कृतम्। घटिकापूरणं यद्वत्पपौ तद्वदनं जलम्
evamuktena tattena sūcīvedhasamaṁ kṛtam| ghaṭikāpūraṇaṁ yadvatpapau tadvadanaṁ jalam
ऐसा कहे जाने पर उसने अपना मुख सूई की नोक के समान बना लिया; जिस प्रकार घड़े को (बूँद-बूँद करके) भरा जाता है, उसी प्रकार उसने उस मुख से जल पिया।
श्लोक 102 (skanda.7.33.102)
एवं स वाडवो वह्निः सुराणां भक्षणोद्यतः। वंचितो विष्णुना याति मेधामाधाय यत्नतः
evaṁ sa vāḍavo vahniḥ surāṇāṁ bhakṣaṇodyataḥ| vaṁcito viṣṇunā yāti medhāmādhāya yatnataḥ
इस प्रकार देवताओं को भक्षण करने के लिए उद्यत वह वाडवाग्नि, विष्णु द्वारा ठगा जाकर, प्रयत्नपूर्वक उस (संकुचित) उपाय को अपनाकर आगे बढ़ता है।
श्लोक 103 (skanda.7.33.103)
सर्गमेतं नरः पुण्यं वाच्यमानं शृणोति यः। स विष्णु लोकमासाद्य तेनैव सह मोदते
sargametaṁ naraḥ puṇyaṁ vācyamānaṁ śṛṇoti yaḥ| sa viṣṇu lokamāsādya tenaiva saha modate
जो मनुष्य इस पुण्यदायी वर्णन को सुनाए जाते हुए सुनता है, वह विष्णुलोक को प्राप्त करके उन्हीं के साथ आनंदित होता है।