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प्रभास खण्ड · अध्याय 34

सरस्वती अवतार महिमा वर्णन

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35

श्लोक 1 (skanda.7.34.1)

ईश्वर उवाच। सरस्वती वरं प्राप्य वरिष्ठं वडवानलात्। पुनस्तं सागरे क्षेप्तुमुद्यता सा मनस्विनी

īśvara uvāca| sarasvatī varaṁ prāpya variṣṭhaṁ vaḍavānalāt| punastaṁ sāgare kṣeptumudyatā sā manasvinī

ईश्वर ने कहा—वडवानल से उत्तम वर पाकर वह बुद्धिमती सरस्वती उसे पुनः समुद्र में फेंकने के लिए उद्यत हुई।

श्लोक 2 (skanda.7.34.2)

देवादेशात्प्रभासस्य पुरतः संस्थिता तदा। समुद्रमाहूय तदा वाडवार्पणकांक्षिणी

devādeśātprabhāsasya purataḥ saṁsthitā tadā| samudramāhūya tadā vāḍavārpaṇakāṁkṣiṇī

देवों की आज्ञा से वह उस समय प्रभास के समक्ष जा खड़ी हुई, और वाडवाग्नि को समर्पित करने की इच्छा से समुद्र का आवाहन किया।

श्लोक 3 (skanda.7.34.3)

त्वमादिः सर्वदेवानां त्वं प्राणः प्राणिनां सदा। देवादेशाद्गृहाण त्वमागत्यार्णव वाडवम्

tvamādiḥ sarvadevānāṁ tvaṁ prāṇaḥ prāṇināṁ sadā| devādeśādgṛhāṇa tvamāgatyārṇava vāḍavam

"तुम समस्त देवों के आदि हो, तुम सदा प्राणियों के प्राण हो। हे अर्णव! देवाज्ञा से आकर तुम इस वाडवाग्नि को ग्रहण करो।"

श्लोक 4 (skanda.7.34.4)

एवं संचिंतितो देव्या यदासावंभसांपतिः। तथा जलात्समुत्तीर्य समायातो महाद्युतिः

evaṁ saṁciṁtito devyā yadāsāvaṁbhasāṁpatiḥ| tathā jalātsamuttīrya samāyāto mahādyutiḥ

इस प्रकार देवी द्वारा स्मरण किए जाने पर, जब वह जलपति (समुद्र) जल से बाहर निकलकर वहाँ आया, महातेजस्वी—

श्लोक 5 (skanda.7.34.5)

तं दृष्ट्वा विस्मिता देवी दिव्यं विष्णुमिवापरम्। श्यामं कमलपत्राक्षं सागरं सुमनोरमम्

taṁ dṛṣṭvā vismitā devī divyaṁ viṣṇumivāparam| śyāmaṁ kamalapatrākṣaṁ sāgaraṁ sumanoramam

—उसे देखकर देवी विस्मित हो गईं: वह दूसरे दिव्य विष्णु के समान, श्यामवर्ण, कमलदल-नेत्र, अत्यंत मनोहर समुद्र था।

श्लोक 6 (skanda.7.34.6)

विचित्रमाल्याभरणं चित्रवस्त्रानुलेपनम्। आपगाभिः सरूपाभिः स्त्रीरूपाभिः समावृतम्

vicitramālyābharaṇaṁ citravastrānulepanam| āpagābhiḥ sarūpābhiḥ strīrūpābhiḥ samāvṛtam

विचित्र मालाओं और आभूषणों से सुशोभित, चित्र-विचित्र वस्त्रों और अनुलेपन से युक्त, तथा अपने ही समान रूप वाली नदियों के स्त्री-रूपों से घिरा हुआ।

श्लोक 7 (skanda.7.34.7)

एवंविधं समालोक्य सा देवी ब्रह्मणः सुता। सरस्वती जलनिधिमुवाचेदं शुचिस्मिता

evaṁvidhaṁ samālokya sā devī brahmaṇaḥ sutā| sarasvatī jalanidhimuvācedaṁ śucismitā

इस प्रकार के उस (समुद्र) को देखकर ब्रह्मा की पुत्री वह देवी सरस्वती, पवित्र मुस्कान के साथ, जलनिधि से यह बोलीं—

श्लोक 8 (skanda.7.34.8)

त्वमग्रजः सर्वभवोद्भवानां त्वं जीवितं जन्मवतां नराणाम्। तस्मात्सुराणां कुरु कार्यमिष्टं वह्निं गृहाण त्वमिहोपनीतम्

tvamagrajaḥ sarvabhavodbhavānāṁ tvaṁ jīvitaṁ janmavatāṁ narāṇām| tasmātsurāṇāṁ kuru kāryamiṣṭaṁ vahniṁ gṛhāṇa tvamihopanītam

"तुम समस्त उत्पन्न प्राणियों में अग्रज हो, तुम जन्म लेने वाले मनुष्यों का जीवन हो। अतः देवों का यह अभीष्ट कार्य करो—यहाँ लाई गई इस अग्नि को ग्रहण करो।"

श्लोक 9 (skanda.7.34.9)

अत्रांतरे सोऽपि विमृश्य सर्वं कार्यं स्वबुद्ध्या किमिहोपपन्नम्। कृत्वाऽनलस्य ग्रहणं मयेदं कार्यं सुराणां विहितं भवेच्च

atrāṁtare so'pi vimṛśya sarvaṁ kāryaṁ svabuddhyā kimihopapannam| kṛtvā'nalasya grahaṇaṁ mayedaṁ kāryaṁ surāṇāṁ vihitaṁ bhavecca

इसी बीच उसने भी अपनी बुद्धि से इस समस्त कार्य पर विचार किया—"यहाँ यह क्या घटित हुआ है? इस अग्नि को ग्रहण करके देवों का यह विहित कार्य मेरे द्वारा सम्पन्न हो जाएगा।"

श्लोक 10 (skanda.7.34.10)

एवं चिंतयतस्तस्य ग्रहणं रुचितं ततः। वाडवाग्नेः समुद्रस्य सुरपीडाकृते यदा

evaṁ ciṁtayatastasya grahaṇaṁ rucitaṁ tataḥ| vāḍavāgneḥ samudrasya surapīḍākṛte yadā

इस प्रकार विचार करते हुए उसे वह ग्रहण रुचिकर लगा—जब देवों की पीड़ा दूर करने के लिए समुद्र द्वारा वाडवाग्नि का यह कार्य किया गया।

श्लोक 11 (skanda.7.34.11)

तदा तेन पुरःस्थेन देवी साभिहिता भृशम्। वाडवं संप्रयच्छैनं सुरशत्रुं सरस्वति

tadā tena puraḥsthena devī sābhihitā bhṛśam| vāḍavaṁ saṁprayacchainaṁ suraśatruṁ sarasvati

तब उसने सामने खड़े होकर देवी से दृढ़तापूर्वक कहा—"हे सरस्वति! देवों की शत्रु इस वाडवाग्नि को मुझे सौंप दो।"

श्लोक 12 (skanda.7.34.12)

ततस्तया प्रणम्याशु पितामहपुरःसरान्। चारणांश्चारुचित्रांग्या सरस्वत्या दिवि स्थितान्

tatastayā praṇamyāśu pitāmahapuraḥsarān| cāraṇāṁścārucitrāṁgyā sarasvatyā divi sthitān

तब चारु-चित्रांगी सरस्वती ने शीघ्र ही पितामह ब्रह्मा तथा उनके अग्रगामी, स्वर्ग में स्थित चारणों को प्रणाम किया।

श्लोक 13 (skanda.7.34.13)

पुनश्च करसंस्थोऽसौ वाडवोऽभिहितस्तया। त्वमपो भक्षयस्वेति सुरैरुक्त इमा इति

punaśca karasaṁstho'sau vāḍavo'bhihitastayā| tvamapo bhakṣayasveti surairukta imā iti

और पुनः, अपने हाथ में स्थित उस वाडवाग्नि को संबोधित करते हुए उसने कहा—"देवों ने आज्ञा दी है कि तुम इन जलों को ग्रस लो।"

श्लोक 14 (skanda.7.34.14)

एवमुक्त्वा समुद्रस्य तदा देव्या समर्प्पितः। वाडवोऽग्निः सरस्वत्या सुरादेशान्महाबलः

evamuktvā samudrasya tadā devyā samarppitaḥ| vāḍavo'gniḥ sarasvatyā surādeśānmahābalaḥ

ऐसा कहकर, देवों की आज्ञा से देवी सरस्वती ने तब वह महाबली वाडवाग्नि समुद्र को समर्पित कर दिया।

श्लोक 15 (skanda.7.34.15)

तं समर्प्य ततस्तस्मि न्नदी भूत्वा सरस्वती। प्रविष्टा सागरं देवी नारदेश्वरमार्गतः

taṁ samarpya tatastasmi nnadī bhūtvā sarasvatī| praviṣṭā sāgaraṁ devī nāradeśvaramārgataḥ

उसे समर्पित करके, तत्पश्चात् नदी का रूप धारण कर देवी सरस्वती नारदेश्वर के मार्ग से समुद्र में प्रविष्ट हुईं।

श्लोक 16 (skanda.7.34.16)

दैत्यसूदनसांनिध्ये दत्त्वार्घ्यं लवणांभसि। अर्घ्येश्वरं प्रतिष्ठाप्य दैत्यसूदन पश्चिमे

daityasūdanasāṁnidhye dattvārghyaṁ lavaṇāṁbhasi| arghyeśvaraṁ pratiṣṭhāpya daityasūdana paścime

दैत्यसूदन (विष्णु) की समीपता में लवण-जल में अर्घ्य देकर, तथा दैत्यसूदन के पश्चिम में अर्घ्येश्वर की प्रतिष्ठा करके—

श्लोक 17 (skanda.7.34.17)

ततोऽब्धिं संप्रविष्टा सा पंचस्रोता महानदी। स्वरूपेणैव सा पुण्या पुनः पुण्यतमाऽभवत्

tato'bdhiṁ saṁpraviṣṭā sā paṁcasrotā mahānadī| svarūpeṇaiva sā puṇyā punaḥ puṇyatamā'bhavat

—तब वह पंचस्रोता महानदी समुद्र में प्रविष्ट हुई; वह पुण्यमयी अपने स्वरूप में ही पुनः परम पवित्र हो गई।

श्लोक 18 (skanda.7.34.18)

प्रभासक्षेत्रसंपर्कात्समुद्रस्य च संगमात्। सागरोऽपि समासाद्य सरस्वत्यास्तु वाडवम्। निर्धनो वै धनं प्राप्याचिन्तयत्क्व क्षिपाम्यहम्

prabhāsakṣetrasaṁparkātsamudrasya ca saṁgamāt| sāgaro'pi samāsādya sarasvatyāstu vāḍavam| nirdhano vai dhanaṁ prāpyācintayatkva kṣipāmyaham

प्रभासक्षेत्र के संपर्क और समुद्र के संगम से, समुद्र भी सरस्वती के वाडवाग्नि को प्राप्त कर—जैसे कोई निर्धन धन पाकर सोचे कि "मैं इसे कहाँ रखूँ"—वैसे ही चिंतित हो उठा।

श्लोक 19 (skanda.7.34.19)

स तेनैव करस्थेन दीप्य मानेन सागरः। वह्निना शिखरस्थेन भाति मेरुरिवापरः

sa tenaiva karasthena dīpya mānena sāgaraḥ| vahninā śikharasthena bhāti merurivāparaḥ

वही समुद्र, अपने ही हाथ में स्थित उस प्रज्वलित अग्नि से, जैसे शिखर पर स्थित अग्नि से एक और मेरु पर्वत हो, वैसे शोभायमान हुआ।

श्लोक 20 (skanda.7.34.20)

तं तथाविधमालोक्य तत्र ये जलचारिणः। यादोगणास्ते मुमुचुर्दाहभीता महास्वनम्

taṁ tathāvidhamālokya tatra ye jalacāriṇaḥ| yādogaṇāste mumucurdāhabhītā mahāsvanam

उसे उस अवस्था में देखकर, वहाँ रहने वाले जलचर प्राणी, जलने के भय से भयभीत होकर, बड़े स्वर में चीत्कार करने लगे।

श्लोक 21 (skanda.7.34.21)

तं श्रुत्वा भैरवं शब्दमायातो दैत्यसूदनः। आह यादोगणान्सर्वान्मा भैष्ट सुमहाबलाः

taṁ śrutvā bhairavaṁ śabdamāyāto daityasūdanaḥ| āha yādogaṇānsarvānmā bhaiṣṭa sumahābalāḥ

उस भयंकर शब्द को सुनकर दैत्यसूदन (विष्णु) वहाँ आए और समस्त जलचर-गणों से बोले—"हे महाबली प्राणियो! भयभीत मत होओ।

श्लोक 22 (skanda.7.34.22)

यस्मादनेन प्रथमा आपो भक्ष्या न तत्रगाः। प्राणिनस्तन्न भेतव्यं भवद्भिस्तु ममाज्ञया

yasmādanena prathamā āpo bhakṣyā na tatragāḥ| prāṇinastanna bhetavyaṁ bhavadbhistu mamājñayā

—क्योंकि इससे पहले केवल जल ही भक्षित होगा, उसमें रहने वाले प्राणी नहीं। मेरी आज्ञा से तुम प्राणियों को इससे भयभीत नहीं होना चाहिए।"

श्लोक 23 (skanda.7.34.23)

एवमुक्तस्तु कृष्णेन तूष्णींभूता जलेचराः

evamuktastu kṛṣṇena tūṣṇīṁbhūtā jalecarāḥ

कृष्ण के इस प्रकार कहने पर जलचर प्राणी मौन हो गए।

श्लोक 24 (skanda.7.34.24)

तूष्णींभूतेषु सर्वेषु जलजेषु जलेश्वरम्। प्राहाच्युतः प्रक्षिप त्वमपां मध्ये तु वाडवम्

tūṣṇīṁbhūteṣu sarveṣu jalajeṣu jaleśvaram| prāhācyutaḥ prakṣipa tvamapāṁ madhye tu vāḍavam

जब समस्त जलजीव मौन हो गए, तब अच्युत ने जलेश्वर (समुद्र) से कहा—"तुम वाडवाग्नि को जल के मध्य में डाल दो।"

श्लोक 25 (skanda.7.34.25)

अगाधेम्भसि तेनासौ निक्षिप्तो वाडवोऽनलः। वरुणेन पिबन्नास्ते तज्जलं सुमहाबलः

agādhembhasi tenāsau nikṣipto vāḍavo'nalaḥ| varuṇena pibannāste tajjalaṁ sumahābalaḥ

तब उसने उस वाडवाग्नि को अथाह जल में डाल दिया; वह अत्यंत बलशाली अग्नि वरुण के उस जल को पीता हुआ वहीं रहता है।

श्लोक 26 (skanda.7.34.26)

तस्योच्छ्वासानिलोद्धूतं तत्तोयं सागराद्बहिः। निर्मर्यादेव युवतिरितश्चेतश्चधावति

tasyocchvāsāniloddhūtaṁ tattoyaṁ sāgarādbahiḥ| nirmaryādeva yuvatiritaścetaścadhāvati

उसकी श्वास की वायु से उद्वेलित वह जल समुद्र से बाहर, मानो मर्यादाहीन युवती के समान, इधर-उधर दौड़ता है।

श्लोक 27 (skanda.7.34.27)

अथ काले गते देवि शुष्यत्यंबु शनैःशनैः। विदित्वा क्षीयमाणास्ता अपो जलनिधिस्ततः

atha kāle gate devi śuṣyatyaṁbu śanaiḥśanaiḥ| viditvā kṣīyamāṇāstā apo jalanidhistataḥ

हे देवि! फिर समय बीतने पर जल धीरे-धीरे सूखने लगा; जल के क्षीण होते जाने को जानकर तब समुद्र ने—

श्लोक 28 (skanda.7.34.28)

आहैवं पुंडरीकाक्षमपः कुरु त्वमक्षयाः। अन्यथा सर्वनाशेन जलानां मामिहाग्रतः। भक्षयिष्यत्यसौ वह्निर्वाडवो हि जनार्द्दन

āhaivaṁ puṁḍarīkākṣamapaḥ kuru tvamakṣayāḥ| anyathā sarvanāśena jalānāṁ māmihāgrataḥ| bhakṣayiṣyatyasau vahnirvāḍavo hi janārddana

—कमलनयन विष्णु से इस प्रकार कहा—"तुम जल को अक्षय बना दो; अन्यथा, हे जनार्दन! जल के सर्वनाश हो जाने पर यह वाडवाग्नि यहाँ मुझे ही सबसे पहले भस्म कर देगी।"

श्लोक 29 (skanda.7.34.29)

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य समुद्रस्य तु भीषणम्। कृतं तदक्षयं तोयमा त्मनो भयनाशनम्

etacchrutvā vacastasya samudrasya tu bhīṣaṇam| kṛtaṁ tadakṣayaṁ toyamā tmano bhayanāśanam

समुद्र के इस भयानक वचन को सुनकर, वह जल अक्षय बना दिया गया, जिससे उसका अपना भय दूर हो गया।

श्लोक 30 (skanda.7.34.30)

ज्ञात्वा सुराः सर्वमिदं विचेष्टितं कृत्यानलस्यास्य निबंधनं तथा। प्रलोभनं तोयपुरःसरा द्विषः पुपूजिरे केशवमत्र चारिणम्

jñātvā surāḥ sarvamidaṁ viceṣṭitaṁ kṛtyānalasyāsya nibaṁdhanaṁ tathā| pralobhanaṁ toyapuraḥsarā dviṣaḥ pupūjire keśavamatra cāriṇam

इस समस्त चेष्टा को—अर्थात् इस विनाशकारी अग्नि को इस प्रकार बाँध देने तथा जल के सहारे उस शत्रु को प्रलोभित करने की युक्ति को—जानकर देवगणों ने वहाँ निवास करने वाले केशव की पूजा की।

श्लोक 31 (skanda.7.34.31)

एवं सरस्वती प्राप्ता प्रभासं क्षेत्रमुत्तमम्। ब्रह्मलोकान्महादेवि सर्वपापप्रणाशिनी

evaṁ sarasvatī prāptā prabhāsaṁ kṣetramuttamam| brahmalokānmahādevi sarvapāpapraṇāśinī

हे महादेवि! इस प्रकार सर्वपापनाशिनी सरस्वती ब्रह्मलोक से प्रभास नामक उत्तम क्षेत्र में पधारीं।

श्लोक 32 (skanda.7.34.32)

सोमेशाद्दक्षिणाग्नेये सागरस्य समी पतः। संस्थिता तु महादेवी वडवानलधारिणी

someśāddakṣiṇāgneye sāgarasya samī pataḥ| saṁsthitā tu mahādevī vaḍavānaladhāriṇī

सोमेश्वर से दक्षिण-आग्नेय दिशा में, समुद्र के समीप, वाडवाग्नि को धारण करने वाली वह महादेवी स्थित हैं।

श्लोक 33 (skanda.7.34.33)

स्नात्वाऽग्नितीर्थे पूर्वं तां पूजयेद्विधिना नरः। दंपत्योर्भोजनं तत्र परिधानं सकञ्चु कम्

snātvā'gnitīrthe pūrvaṁ tāṁ pūjayedvidhinā naraḥ| daṁpatyorbhojanaṁ tatra paridhānaṁ sakañcu kam

अग्नितीर्थ में स्नान करके पहले मनुष्य को विधिपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिए। वहाँ दम्पति को भोजन तथा कंचुक सहित वस्त्र (अर्पित करने चाहिए)।

श्लोक 34 (skanda.7.34.34)

दत्त्वा ततो महादेवं पूजयेच्च कपर्द्दिनम्। इति वृत्तं पुरा देवि चाक्षुषस्यांतरेऽभवत्

dattvā tato mahādevaṁ pūjayecca kaparddinam| iti vṛttaṁ purā devi cākṣuṣasyāṁtare'bhavat

यह अर्पित करके फिर जटाधारी महादेव की पूजा करनी चाहिए। हे देवि! यह वृत्तांत पूर्वकाल में चाक्षुष मन्वंतर में घटित हुआ था।

श्लोक 35 (skanda.7.34.35)

दधीच्यन्वयजातस्य वाडवस्य महा त्मनः। अस्मिन्पुनर्महादेवि प्राप्ते वैवस्वतेंऽतरे। और्वस्तु भार्गवे वंशे समुत्पन्नो महाद्विजः

dadhīcyanvayajātasya vāḍavasya mahā tmanaḥ| asminpunarmahādevi prāpte vaivasvateṁ'tare| aurvastu bhārgave vaṁśe samutpanno mahādvijaḥ

दधीचि के वंश में उत्पन्न उस महात्मा वाडवाग्नि से संबंधित—हे महादेवि! जब पुनः वैवस्वत मन्वंतर आया, तब भृगुवंश में महाद्विज और्व उत्पन्न हुए।

श्लोक 36 (skanda.7.34.36)

संक्षिप्तोऽसौ सरस्वत्या देवमात्रा महाप्रभः। तावत्स्थास्यत्यपां गर्भे यावन्मन्वतरावधिः

saṁkṣipto'sau sarasvatyā devamātrā mahāprabhaḥ| tāvatsthāsyatyapāṁ garbhe yāvanmanvatarāvadhiḥ

महातेजस्वी वह अग्नि सरस्वती के द्वारा दिव्य परिमाण में संकुचित कर दिया गया; वह मन्वंतर की अवधि पूरी होने तक जल के गर्भ में ही स्थित रहेगा।

श्लोक 37 (skanda.7.34.37)

इति ते कथितं देवि सरस्वत्याः समुद्भवम्। श्रुतं पापहरं नृणां कीर्त्तिदं पुण्यवर्द्धनम्

iti te kathitaṁ devi sarasvatyāḥ samudbhavam| śrutaṁ pāpaharaṁ nṛṇāṁ kīrttidaṁ puṇyavarddhanam

हे देवि! इस प्रकार मैंने तुम्हें सरस्वती के प्राकट्य की कथा कही, जो सुनने मात्र से मनुष्यों के पापों का नाश करने वाली, कीर्ति देने वाली और पुण्य बढ़ाने वाली है।

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