प्रभास खण्ड · अध्याय 35
सरस्वती-अब्धि-समागम अग्नितीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.35.1)
॥ देव्युवाच ॥ भगवन्भार्गवे वंशे यस्त्वौर्वः कथितस्त्वया ॥ वैवस्वतेंऽतरे चास्मिंस्तस्योत्पत्तिं वद प्रभो
|| devyuvāca || bhagavanbhārgave vaṁśe yastvaurvaḥ kathitastvayā || vaivasvateṁ'tare cāsmiṁstasyotpattiṁ vada prabho
देवी ने कहा - हे भगवन्! भृगुवंश में जिस और्व का आपने वर्णन किया था, हे प्रभो! इस वैवस्वत मन्वन्तर में उसकी उत्पत्ति के विषय में मुझे बताइए।
श्लोक 2 (skanda.7.35.2)
॥ ईश्वर उवाच ॥ ब्राह्मणा निहता ये तु क्षत्रियैर्वित्तकारणात् ॥ क्षयं नीतास्तु ते सर्वे सपुत्राश्च सगर्भतः
|| īśvara uvāca || brāhmaṇā nihatā ye tu kṣatriyairvittakāraṇāt || kṣayaṁ nītāstu te sarve saputrāśca sagarbhataḥ
ईश्वर ने कहा - जिन ब्राह्मणों का धन के लोभ में क्षत्रियों ने वध किया था, वे सभी अपने पुत्रों तथा गर्भस्थ शिशुओं सहित नष्ट कर दिए गए।
श्लोक 3 (skanda.7.35.3)
म्रियमाणेषु सर्वेषु एका स्त्री समतिष्ठत ॥ तया तु रक्षितो गर्भ ऊर्वोर्देशे निधाय च
mriyamāṇeṣu sarveṣu ekā strī samatiṣṭhata || tayā tu rakṣito garbha ūrvordeśe nidhāya ca
जब सब मारे जा रहे थे, तब एक स्त्री बच गई; उसने गर्भ को अपनी जाँघों के बीच छिपाकर सुरक्षित रखा।
श्लोक 4 (skanda.7.35.4)
अन्यासां चैव नारीणां सर्वासामपि भामिनि ॥ गर्भानि पातितास्तैस्तु द्रव्यार्थं क्षत्रियाधमैः
anyāsāṁ caiva nārīṇāṁ sarvāsāmapi bhāmini || garbhāni pātitāstaistu dravyārthaṁ kṣatriyādhamaiḥ
हे भामिनि! अन्य सभी स्त्रियों के गर्भ भी उन नीच क्षत्रियों ने धन के लिए गिरा दिए थे।
श्लोक 5 (skanda.7.35.5)
कालांतरे ततो भित्त्वा कुरुदेशं महाप्रभः ॥ निर्गतोत्तंभितशिरा ज्वलदास्योतिभीषणः
kālāṁtare tato bhittvā kurudeśaṁ mahāprabhaḥ || nirgatottaṁbhitaśirā jvaladāsyotibhīṣaṇaḥ
कुछ काल बाद वह महातेजस्वी बालक कुरुदेश को भेदकर बाहर निकला - सिर ऊँचा उठाए, मुख से अग्नि प्रज्वलित करता हुआ, अत्यंत भयंकर रूप में।
श्लोक 6 (skanda.7.35.6)
तद्वैरं हृदि चाधाय ददाह वसुधातलम् ॥ उत्पाद्य वह्निं तपसा रौद्रमौर्वं जलाशनम्
tadvairaṁ hṛdi cādhāya dadāha vasudhātalam || utpādya vahniṁ tapasā raudramaurvaṁ jalāśanam
उस वैर को हृदय में धारण कर उसने पृथ्वीतल को जला डाला, अपनी तपस्या से जल को भी भस्म करने वाली भयंकर और्व अग्नि उत्पन्न करके।
श्लोक 7 (skanda.7.35.7)
तमिन्द्रः प्लावयामास वृष्ट्यौघैर्वरवर्णिनि ॥ न शशाक यदा नेतुं तदा स यतवाक्स्थितः
tamindraḥ plāvayāmāsa vṛṣṭyaughairvaravarṇini || na śaśāka yadā netuṁ tadā sa yatavāksthitaḥ
हे वरवर्णिनि! इन्द्र ने वर्षा की धाराओं से उसे बुझाने का प्रयत्न किया; जब वह उसे शांत न कर सका, तब वह मौन होकर खड़ा रह गया।
श्लोक 8 (skanda.7.35.8)
ततो देवाः सगंधर्वा ब्रह्माणं शरणं गताः ॥ अभवन्भयसंत्रस्ताः सर्वे प्रांजलयः स्थिताः
tato devāḥ sagaṁdharvā brahmāṇaṁ śaraṇaṁ gatāḥ || abhavanbhayasaṁtrastāḥ sarve prāṁjalayaḥ sthitāḥ
तब गन्धर्वों सहित देवगण ब्रह्मा की शरण में गए; भय से त्रस्त होकर सब हाथ जोड़े खड़े हो गए।
श्लोक 9 (skanda.7.35.9)
॥ देवा ऊचुः ॥ भगवन्भार्गवे वंशे जातः कोऽपि महाद्युतिः ॥ अग्निरूपेण सर्वं स ददाह वसुधातलम् ॥ कृतो यत्नः पुराऽस्माभिस्तद्विनाशाय सत्तम ॥ जलेन वृद्धिमायाति ततो नो भयमागतम्
|| devā ūcuḥ || bhagavanbhārgave vaṁśe jātaḥ ko'pi mahādyutiḥ || agnirūpeṇa sarvaṁ sa dadāha vasudhātalam || kṛto yatnaḥ purā'smābhistadvināśāya sattama || jalena vṛddhimāyāti tato no bhayamāgatam
देवों ने कहा - हे भगवन्! भृगुवंश में महातेजस्वी कोई उत्पन्न हुआ है, जिसने अग्निरूप होकर सम्पूर्ण पृथ्वीतल को जला डाला है। हे सत्तम! हमने पहले उसे नष्ट करने का प्रयत्न किया, किंतु वह जल से और भी बढ़ता जाता है, अतः हमें भय उत्पन्न हो गया है।
श्लोक 10 (skanda.7.35.10)
विनष्टे भूतले देव अग्निष्टोमादिकाः क्रियाः॥ उच्छिद्यते ततोऽस्माकं नाशो नूनं भविष्यति
vinaṣṭe bhūtale deva agniṣṭomādikāḥ kriyāḥ|| ucchidyate tato'smākaṁ nāśo nūnaṁ bhaviṣyati
हे देव! यदि पृथ्वी नष्ट हो गई तो अग्निष्टोम आदि यज्ञ-क्रियाएँ भी नष्ट हो जाएँगी, और इस प्रकार निश्चय ही हमारा विनाश हो जाएगा।
श्लोक 11 (skanda.7.35.11)
तस्माद्यत्नं कुरु विभो त्रैलोक्यहितकाम्यया
tasmādyatnaṁ kuru vibho trailokyahitakāmyayā
अतः हे विभो! त्रिलोक के हित की कामना से आप प्रयत्न कीजिए।
श्लोक 12 (skanda.7.35.12)
ततो ब्रह्मा सुरैः सार्द्धं भार्गवैश्च महर्षिभिः ॥ आगत्य चाब्रवीदौर्वं किमर्थं दहसि क्षितिम्
tato brahmā suraiḥ sārddhaṁ bhārgavaiśca maharṣibhiḥ || āgatya cābravīdaurvaṁ kimarthaṁ dahasi kṣitim
तब ब्रह्मा देवताओं तथा भृगुवंशी महर्षियों के साथ आकर और्व से बोले - तुम पृथ्वी को क्यों जला रहे हो?
श्लोक 13 (skanda.7.35.13)
विरामः क्रियतां सद्यो ममार्थं च द्विजोत्तम
virāmaḥ kriyatāṁ sadyo mamārthaṁ ca dvijottama
हे द्विजोत्तम! मेरे निमित्त भी इसे तत्काल रोक दो।
श्लोक 14 (skanda.7.35.14)
॥ और्व उवाच ॥ एष एव निवृत्तोऽहं तव वाक्येन सत्तम ॥ एष वह्निर्मयोत्सृष्टः स विभो तव शासनात्
|| aurva uvāca || eṣa eva nivṛtto'haṁ tava vākyena sattama || eṣa vahnirmayotsṛṣṭaḥ sa vibho tava śāsanāt
और्व ने कहा - हे सत्तम! आपके वचन से ही मैं निवृत्त हो गया हूँ; हे विभो! यह अग्नि जो मैंने उत्पन्न की है, अब आपकी आज्ञा के अधीन है।
श्लोक 15 (skanda.7.35.15)
यथा गच्छेत्समुद्रांतं तथा नीतिर्विधीय ताम्
yathā gacchetsamudrāṁtaṁ tathā nītirvidhīya tām
ऐसी युक्ति की जाए कि यह समुद्र के भीतर चली जाए।
श्लोक 16 (skanda.7.35.16)
समाहूय ततो देवीं स्वां सुतां पद्मसंभवः ॥ उवाच पुत्रि गच्छ त्वं गृहीत्वाग्निं महोदधिम् ॥ मद्वाक्यं नान्यथा कार्यं गच्छ शीघ्रं महाप्रभे
samāhūya tato devīṁ svāṁ sutāṁ padmasaṁbhavaḥ || uvāca putri gaccha tvaṁ gṛhītvāgniṁ mahodadhim || madvākyaṁ nānyathā kāryaṁ gaccha śīghraṁ mahāprabhe
तब कमलजन्मा ब्रह्मा ने अपनी पुत्री देवी को बुलाकर कहा - हे पुत्री! तुम इस अग्नि को लेकर महासागर को जाओ; मेरी आज्ञा का उल्लंघन मत करो, हे महाप्रभे! शीघ्र जाओ।
श्लोक 17 (skanda.7.35.17)
॥ सरस्वत्युवाच ॥ एषास्मि प्रस्थिता देव तव वाक्यादसंशयम् ॥ इत्युक्ते साधु साध्वीति ब्रह्मणा समुदाहृता ॥
|| sarasvatyuvāca || eṣāsmi prasthitā deva tava vākyādasaṁśayam || ityukte sādhu sādhvīti brahmaṇā samudāhṛtā ||
सरस्वती ने कहा - हे देव! आपके वचन से मैं निःसंदेह प्रस्थान करती हूँ। ऐसा कहने पर ब्रह्मा ने "साधु, साधु हे साध्वी" कहकर उसकी प्रशंसा की।
श्लोक 18 (skanda.7.35.18)
ततोभिमंत्रितं वह्निं क्षिप्त्वा कुंभे हिरण्मये ॥ प्रायच्छत सरस्वत्यै स्वयं ब्रह्मा पितामहः ॥ आशिषो विविधा दत्त्वा प्रोवाचेदं पुनः पुनः
tatobhimaṁtritaṁ vahniṁ kṣiptvā kuṁbhe hiraṇmaye || prāyacchata sarasvatyai svayaṁ brahmā pitāmahaḥ || āśiṣo vividhā dattvā provācedaṁ punaḥ punaḥ
तब मंत्रों से अभिमंत्रित अग्नि को स्वर्णकलश में रखकर पितामह ब्रह्मा ने स्वयं उसे सरस्वती को सौंपा; अनेक आशीर्वाद देते हुए वे बार-बार यह कहने लगे।
श्लोक 19 (skanda.7.35.19)
गच्छ पुत्रि न संतापस्त्वया कार्यः कथंचन ॥ अरिष्टं व्रज पंथानं मा संतु परिपन्थिनः
gaccha putri na saṁtāpastvayā kāryaḥ kathaṁcana || ariṣṭaṁ vraja paṁthānaṁ mā saṁtu paripanthinaḥ
हे पुत्री! जाओ, तुम्हें किसी प्रकार का दुःख नहीं करना चाहिए; निर्विघ्न मार्ग से जाओ, तुम्हारे पथ में कोई विघ्न न हो।
श्लोक 20 (skanda.7.35.20)
॥ ईश्वर उवाच ॥ एवमुक्ता तदा तेन ब्रह्मणा च सरस्वती ॥ हिमवंतं गिरिं प्राप्य पिप्पलादाश्रमात्तदा
|| īśvara uvāca || evamuktā tadā tena brahmaṇā ca sarasvatī || himavaṁtaṁ giriṁ prāpya pippalādāśramāttadā
ईश्वर ने कहा - ब्रह्मा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर सरस्वती हिमालय पर्वत पर पिप्पलाद के आश्रम में पहुँचीं।
श्लोक 21 (skanda.7.35.21)
उद्भूता सा तदा देवी अधस्ताद्वृक्षमूलतः ॥ तत्कोटर कुटीकोटिप्रविष्टानां द्विजन्मनाम्
udbhūtā sā tadā devī adhastādvṛkṣamūlataḥ || tatkoṭara kuṭīkoṭipraviṣṭānāṁ dvijanmanām
वहाँ वृक्ष की जड़ के नीचे से देवी प्रकट हुईं, जहाँ असंख्य द्विजगण वृक्षों की कोटरों और कुटियों में निवास करते थे।
श्लोक 22 (skanda.7.35.22)
श्रूयन्ते वेदनिर्घोषा सरसारक्तचेतसाम् ॥ विष्णुरास्ते तत्र देवो देवानां प्रवरो गुरुः
śrūyante vedanirghoṣā sarasāraktacetasām || viṣṇurāste tatra devo devānāṁ pravaro guruḥ
वहाँ भक्तिरस में रँगे हुए मनों वाले द्विजों की वेदध्वनि सुनाई पड़ती है; वहाँ देवताओं के श्रेष्ठ गुरु भगवान विष्णु निवास करते हैं।
श्लोक 23 (skanda.7.35.23)
तस्मात्स्थानात्ततो देवी प्रतीच्यभिमुखं ययौ ॥ अन्तर्द्धानेन सा प्राप्ता केदारं हिममध्यगम्
tasmātsthānāttato devī pratīcyabhimukhaṁ yayau || antarddhānena sā prāptā kedāraṁ himamadhyagam
उस स्थान से देवी पश्चिम दिशा की ओर गईं; अंतर्धान होकर वे हिम के बीच स्थित केदार तीर्थ में पहुँचीं।
श्लोक 24 (skanda.7.35.24)
तत्संप्लाव्य गिरेः शृंगं केदारस्य पुरः स्थिता ॥ तेनाग्निना करस्थेन दह्यमाना सरस्वती
tatsaṁplāvya gireḥ śṛṁgaṁ kedārasya puraḥ sthitā || tenāgninā karasthena dahyamānā sarasvatī
उस पर्वत-शिखर को आप्लावित करती हुई वे केदार के सम्मुख खड़ी हुईं - सरस्वती अपने हाथ में धारण की हुई अग्नि से जलती हुई।
श्लोक 25 (skanda.7.35.25)
भूमिं विदार्य तस्याधः प्रविष्टा गजगामिनी ॥ तदंतर्द्धानमार्गेण प्रवृत्ता पश्चिमामुखी
bhūmiṁ vidārya tasyādhaḥ praviṣṭā gajagāminī || tadaṁtarddhānamārgeṇa pravṛttā paścimāmukhī
गजगामिनी देवी ने भूमि को विदीर्ण कर उसके नीचे प्रवेश किया और उसी अंतर्धान-मार्ग से पश्चिम दिशा की ओर बढ़ीं।
श्लोक 26 (skanda.7.35.26)
पापभूमिमतिक्रम्य भूमिं भित्त्वा विनिगता ॥ तत्र कूपः समभवन्नाम्ना गन्धर्वसंज्ञितः
pāpabhūmimatikramya bhūmiṁ bhittvā vinigatā || tatra kūpaḥ samabhavannāmnā gandharvasaṁjñitaḥ
पापभूमि को पार करके भूमि को भेदकर वे बाहर निकलीं; वहाँ गन्धर्व नामक एक कूप बन गया।
श्लोक 27 (skanda.7.35.27)
तस्मात्कूपात्पुनर्दृश्या सा बभूव महानदी ॥ मतिः स्मृतिस्तथा प्रज्ञा मेधा बुद्धिर्गिराधरा
tasmātkūpātpunardṛśyā sā babhūva mahānadī || matiḥ smṛtistathā prajñā medhā buddhirgirādharā
उस कूप से वे पुनः महानदी के रूप में प्रकट हुईं; मति, स्मृति, प्रज्ञा, मेधा, बुद्धि तथा गिराधरा (वाग्धारिणी) - ये छह रूप उनके साथ थे।
श्लोक 28 (skanda.7.35.28)
उपासिकाः सरस्वत्याः षडेताः प्रस्थितास्तदा ॥ पुनः प्रवृत्ता सा तस्मादुद्भेदात्पश्चिमामुखी
upāsikāḥ sarasvatyāḥ ṣaḍetāḥ prasthitāstadā || punaḥ pravṛttā sā tasmādudbhedātpaścimāmukhī
सरस्वती की ये छह उपासिकाएँ उस समय चल पड़ीं; और वे स्वयं उस उद्गम-स्थान से पुनः पश्चिम दिशा की ओर प्रवृत्त हुईं।
श्लोक 29 (skanda.7.35.29)
भूतीश्वरं समायाता सिद्धो यत्र महामुनिः ॥ भूतीश्वरे समीपस्थं तत्र प्राप्ता मनोरमम्
bhūtīśvaraṁ samāyātā siddho yatra mahāmuniḥ || bhūtīśvare samīpasthaṁ tatra prāptā manoramam
वे भूतीश्वर तीर्थ में पहुँचीं, जहाँ एक महामुनि सिद्ध हुए थे; भूतीश्वर के समीप ही वे एक मनोरम स्थान में पहुँचीं।
श्लोक 30 (skanda.7.35.30)
तस्य दक्षिणदिक्संस्थं रुद्रकोट्युपलक्षितम् ॥ श्रीकंठ देशं विख्यातं गता सर्वौषधीयुतम्
tasya dakṣiṇadiksaṁsthaṁ rudrakoṭyupalakṣitam || śrīkaṁṭha deśaṁ vikhyātaṁ gatā sarvauṣadhīyutam
उसके दक्षिण भाग में स्थित, करोड़ों रुद्र-लिंगों से चिह्नित, सभी औषधियों से युक्त श्रीकंठ नामक प्रसिद्ध देश में वे गईं।
श्लोक 31 (skanda.7.35.31)
तस्मात्पुण्यतमाद्देशाच्छ्रीकण्ठात्सा मनस्विनी ॥ संप्राप्ता वह्निना सार्द्धं कुरुक्षेत्रं सरस्वती
tasmātpuṇyatamāddeśācchrīkaṇṭhātsā manasvinī || saṁprāptā vahninā sārddhaṁ kurukṣetraṁ sarasvatī
उस अत्यंत पवित्र श्रीकंठ देश से वे मनस्विनी सरस्वती अग्नि सहित कुरुक्षेत्र पहुँचीं।
श्लोक 32 (skanda.7.35.32)
पुनस्तस्मात्कुरुक्षेत्राद्विराटनगरस्य सा ॥ समुद्भूता समीपस्था अन्तर्द्धानान्मनोरमा ॥ गोपायनो गिरिर्यत्र तत्र सा पुनरुद्गता
punastasmātkurukṣetrādvirāṭanagarasya sā || samudbhūtā samīpasthā antarddhānānmanoramā || gopāyano giriryatra tatra sā punarudgatā
पुनः उस कुरुक्षेत्र से वे मनोरमा देवी अंतर्धान से निकलकर विराटनगर के समीप प्रकट हुईं, और वहीं गोपायन नामक पर्वत पर पुनः प्रकट हुईं।
श्लोक 33 (skanda.7.35.33)
गोपायिता केशवेन यत्र ते पाण्डुनन्दनाः ॥ कुर्वंतः स्वानि कर्माणि न कैश्चिदुपलक्षिता
gopāyitā keśavena yatra te pāṇḍunandanāḥ || kurvaṁtaḥ svāni karmāṇi na kaiścidupalakṣitā
यह वही स्थान है जहाँ केशव द्वारा रक्षित पांडुनंदन अपने-अपने कार्य करते हुए किसी के द्वारा पहचाने नहीं गए थे।
श्लोक 34 (skanda.7.35.34)
तत्र कुंडे स्थिता देवी महापातकनाशिनी ॥ पुन र्गोपायनाद्देवी क्षेत्रं प्राप्तातिशोभनम्
tatra kuṁḍe sthitā devī mahāpātakanāśinī || puna rgopāyanāddevī kṣetraṁ prāptātiśobhanam
वहाँ कुंड में महापातकनाशिनी देवी विराजमान हैं; गोपायन से पुनः देवी अत्यंत सुंदर क्षेत्र में पहुँचीं।
श्लोक 35 (skanda.7.35.35)
खर्जुरीवनमापन्ना नन्दानाम्नीति तत्र सा ॥ सरस्वती पुनस्तस्माद्वनात्खर्जूरसंज्ञितात्
kharjurīvanamāpannā nandānāmnīti tatra sā || sarasvatī punastasmādvanātkharjūrasaṁjñitāt
वे खर्जूरी वन में पहुँचीं, जहाँ वे नन्दा नाम से जानी जाती हैं; उस खर्जूर वन से सरस्वती पुनः आगे बढ़ीं।
श्लोक 36 (skanda.7.35.36)
मेरुपादं समासाद्य मार्कंडाश्रममागता ॥ यत्र मार्कंडकं तीर्थं मेरुपादे समाश्रितम्
merupādaṁ samāsādya mārkaṁḍāśramamāgatā || yatra mārkaṁḍakaṁ tīrthaṁ merupāde samāśritam
मेरु पर्वत के पादमूल में पहुँचकर वे मार्कण्डाश्रम में आईं, जहाँ मेरु के पादमूल में मार्कण्डक तीर्थ स्थित है।
श्लोक 37 (skanda.7.35.37)
सरस्वती पुनस्तस्मादर्बुदारण्यमाश्रिता ॥ गता वटवनं रम्यं मार्कंडेयाश्रमाच्छुभात्
sarasvatī punastasmādarbudāraṇyamāśritā || gatā vaṭavanaṁ ramyaṁ mārkaṁḍeyāśramācchubhāt
सरस्वती वहाँ से अर्बुद वन में गईं, और मार्कण्डेय के पवित्र आश्रम से रमणीय वटवन को गईं।
श्लोक 38 (skanda.7.35.38)
तपस्तप्तं पुरा यत्र वसिष्ठेन समाश्रितात् ॥ तस्माद्वटवनात्पुण्यादुदुम्बरवनं गता ॥ मेरुपादे च तत्रैव तण्डिर्यत्रा तपत्तपः
tapastaptaṁ purā yatra vasiṣṭhena samāśritāt || tasmādvaṭavanātpuṇyādudumbaravanaṁ gatā || merupāde ca tatraiva taṇḍiryatrā tapattapaḥ
यह वही स्थान है जहाँ वसिष्ठ ने पूर्वकाल में निवास कर तपस्या की थी। उस पुण्य वटवन से वे उदुम्बर वन को गईं, जो मेरु के पादमूल में ही है, जहाँ तण्डि मुनि ने तप किया था।
श्लोक 39 (skanda.7.35.39)
ऊदुंबरवनात्तस्मात्पुनर्देवी सरस्वती ॥ अन्तर्द्धानेन शिखरमन्यत्प्राप्ता महानदी
ūduṁbaravanāttasmātpunardevī sarasvatī || antarddhānena śikharamanyatprāptā mahānadī
उस उदुम्बर वन से देवी सरस्वती पुनः अंतर्धान होकर किसी अन्य शिखर पर महानदी के रूप में प्रकट हुईं।
श्लोक 40 (skanda.7.35.40)
मेरुपादं तु सुमहत्सुरसिद्धनिषेवितम् ॥ भिन्नांजनचयाकारं गोलांगूलमिति स्मृतम्
merupādaṁ tu sumahatsurasiddhaniṣevitam || bhinnāṁjanacayākāraṁ golāṁgūlamiti smṛtam
वह मेरु का विशाल पादमूल देवताओं और सिद्धों द्वारा सेवित था, जो भिन्न अंजन-राशि के समान आकार का था, जिसे गोलांगूल कहा जाता है।
श्लोक 41 (skanda.7.35.41)
स्थानं मनोरमं तस्मादुद्गता सा सुमध्यमा ॥ वंशस्तंबात्सुविपुला प्रवृत्ता दक्षिणामुखी
sthānaṁ manoramaṁ tasmādudgatā sā sumadhyamā || vaṁśastaṁbātsuvipulā pravṛttā dakṣiṇāmukhī
उस मनोरम स्थान से वह सुमध्यमा देवी बाँस के झुरमुट से विशाल रूप धारणकर दक्षिण दिशा की ओर प्रवृत्त हुईं।
श्लोक 42 (skanda.7.35.42)
तत्रोद्गमवटस्तस्यास्तत्समाख्यो व्यवस्थितः ॥ ततः प्रभृति सा देवी सुप्रभं प्रकटा स्थिता
tatrodgamavaṭastasyāstatsamākhyo vyavasthitaḥ || tataḥ prabhṛti sā devī suprabhaṁ prakaṭā sthitā
वहाँ उनका उद्गम-वट उसी नाम से विख्यात होकर स्थित है; उसके बाद से वे देवी प्रकट रूप में, उज्ज्वल कांति से युक्त होकर स्थित रहीं।
श्लोक 43 (skanda.7.35.43)
अंतर्द्धानं परित्यज्य प्राणिनामनुकम्पया ॥ तस्यास्तटेषु रम्येषु संति तीर्थानि कोटिशः
aṁtarddhānaṁ parityajya prāṇināmanukampayā || tasyāstaṭeṣu ramyeṣu saṁti tīrthāni koṭiśaḥ
प्राणियों पर अनुकम्पा करके उन्होंने अंतर्धान होना त्याग दिया; उनके रमणीय तटों पर करोड़ों तीर्थ स्थित हैं।
श्लोक 44 (skanda.7.35.44)
तेषु तीर्थेषु सर्वेषु धर्महेतुः सरस्वती ॥ रुद्रावतारमार्गेऽस्मिन्प्रवरं प्रथमं स्मृतम्
teṣu tīrtheṣu sarveṣu dharmahetuḥ sarasvatī || rudrāvatāramārge'sminpravaraṁ prathamaṁ smṛtam
उन सभी तीर्थों में सरस्वती धर्म का कारण हैं; इस रुद्रावतार-मार्ग में जो प्रथम व श्रेष्ठ तीर्थ माना गया है, वह इस प्रकार है।
श्लोक 45 (skanda.7.35.45)
तरत्तरंगनामाढ्यं काकतीर्थं महाप्रभम् ॥ तत्र तीर्थं पुनस्त्वन्यत्तीर्थं धारेश्वरं स्मृतम्
tarattaraṁganāmāḍhyaṁ kākatīrthaṁ mahāprabham || tatra tīrthaṁ punastvanyattīrthaṁ dhāreśvaraṁ smṛtam
वह उछलती हुई तरंगों से युक्त, अत्यंत तेजस्वी काकतीर्थ है; वहाँ पुनः धारेश्वर नामक एक और तीर्थ स्मरण किया गया है।
श्लोक 46 (skanda.7.35.46)
धारेश्वरात्पुनश्चान्यद्गंगोद्भेदमिति स्मृतम् ॥ सारस्वतं तथा गांगं यत्रैकं संस्थितं जलम् ॥ तस्मादन्यत्परं तीर्थं पुंडरीकं ततः परम् ॥
dhāreśvarātpunaścānyadgaṁgodbhedamiti smṛtam || sārasvataṁ tathā gāṁgaṁ yatraikaṁ saṁsthitaṁ jalam || tasmādanyatparaṁ tīrthaṁ puṁḍarīkaṁ tataḥ param ||
धारेश्वर से आगे गंगोद्भेद नामक एक और तीर्थ स्मरण किया गया है, जहाँ सारस्वत और गंगा का जल एक साथ स्थित है; उससे आगे पुंडरीक नामक श्रेष्ठ तीर्थ है।
श्लोक 47 (skanda.7.35.47)
मातृतीर्थं महापुण्यं सर्वातंकहरं परम् ॥ मातृतीर्थात्पुनस्तस्मान्नातिदूरे व्यवस्थितम्
mātṛtīrthaṁ mahāpuṇyaṁ sarvātaṁkaharaṁ param || mātṛtīrthātpunastasmānnātidūre vyavasthitam
महापुण्यमय मातृतीर्थ सभी कष्टों को दूर करने वाला श्रेष्ठ तीर्थ है; उस मातृतीर्थ से न अधिक दूर स्थित है -
श्लोक 48 (skanda.7.35.48)
तीर्थं त्वनरकंनाम नरकार्ति भयापहम् ॥ ततस्तस्मादनरकात्तीर्थमन्यत्पुनः स्थितम्
tīrthaṁ tvanarakaṁnāma narakārti bhayāpaham || tatastasmādanarakāttīrthamanyatpunaḥ sthitam
- अनरक नामक तीर्थ, जो नरक की पीड़ा के भय को दूर करता है; उस अनरक से आगे एक और तीर्थ स्थित है -
श्लोक 49 (skanda.7.35.49)
संगमेश्वरनामाढ्यं प्रसिद्धं तन्महीतले ॥ ततस्तस्मात्पुनश्चान्यत्तीर्थं कोटीश्वराह्वयम्
saṁgameśvaranāmāḍhyaṁ prasiddhaṁ tanmahītale || tatastasmātpunaścānyattīrthaṁ koṭīśvarāhvayam
- जो संगमेश्वर नाम से पृथ्वी पर प्रसिद्ध है; उससे आगे पुनः कोटीश्वर नामक एक और तीर्थ है -
श्लोक 50 (skanda.7.35.50)
ततस्तस्मान्महादेवि शंभुकुण्डेश्वरं स्मृतम् ॥ तीर्थे सरस्वतीतीरे तस्मिन्सिद्धेश्वरं स्मृतम्
tatastasmānmahādevi śaṁbhukuṇḍeśvaraṁ smṛtam || tīrthe sarasvatītīre tasminsiddheśvaraṁ smṛtam
- उससे आगे, हे महादेवि! शम्भुकुण्डेश्वर तीर्थ स्मरण किया गया है; सरस्वती के उस तट पर सिद्धेश्वर तीर्थ भी स्मरण किया गया है।
श्लोक 51 (skanda.7.35.51)
सिद्धेश्वरात्पुनस्तस्मात्प्रवृत्ता पश्चिमामुखी ॥ पश्चिमं सागरं गंतुं सखीं स्मृत्वा रुरोद सा
siddheśvarātpunastasmātpravṛttā paścimāmukhī || paścimaṁ sāgaraṁ gaṁtuṁ sakhīṁ smṛtvā ruroda sā
सिद्धेश्वर से आगे वे पुनः पश्चिम दिशा की ओर बढ़ीं; पश्चिम सागर को जाते हुए अपनी सखी का स्मरण कर वे रो पड़ीं।
श्लोक 52 (skanda.7.35.52)
स्थित्वा पूर्वमुखा देवी हा गंगेति विना त्वया॥ एकाकिनी मंदभाग्या क्व गमिष्याम्यबांधवा
sthitvā pūrvamukhā devī hā gaṁgeti vinā tvayā|| ekākinī maṁdabhāgyā kva gamiṣyāmyabāṁdhavā
पूर्व की ओर मुख करके रुककर देवी ने कहा - हाय गंगे! तुम्हारे बिना मैं अकेली, अभागिनी, बंधुहीन कहाँ जाऊँगी?
श्लोक 53 (skanda.7.35.53)
तां विज्ञाय ततो गंगा रुदतीं शोककर्शिताम् ॥ शीघ्रं स्वर्गात्समायाता तीर्थानां कोटिभिः सह
tāṁ vijñāya tato gaṁgā rudatīṁ śokakarśitām || śīghraṁ svargātsamāyātā tīrthānāṁ koṭibhiḥ saha
शोक से क्षीण होकर रोती हुई सरस्वती को जानकर गंगा करोड़ों तीर्थों के साथ शीघ्र ही स्वर्ग से उतर आईं।
श्लोक 54 (skanda.7.35.54)
ततो दुःखं परित्यज्य तत्र प्राची सरस्वती ॥ सर्वदेवगुणैयुक्ता एवं तत्र स्थिताऽभवत्
tato duḥkhaṁ parityajya tatra prācī sarasvatī || sarvadevaguṇaiyuktā evaṁ tatra sthitā'bhavat
तब दुःख त्यागकर सरस्वती वहाँ प्राची (पूर्वाभिमुखी) रूप में समस्त दिव्य गुणों से युक्त होकर स्थित हो गईं।
श्लोक 55 (skanda.7.35.55)
तत्र सिद्धवटंनाम तीर्थं पैतामहं स्मृतम् ॥ वटेश्वरस्य पुरतः सर्वपापक्षयंकरम्
tatra siddhavaṭaṁnāma tīrthaṁ paitāmahaṁ smṛtam || vaṭeśvarasya purataḥ sarvapāpakṣayaṁkaram
वहाँ सिद्धवट नामक तीर्थ ब्रह्मा से संबंधित माना गया है, जो वटेश्वर के समक्ष स्थित होकर सभी पापों का नाश करता है।
श्लोक 56 (skanda.7.35.56)
त्रिकालं यत्र रुद्रस्तु समागत्य व्यवस्थितः ॥ तन्महालयमित्युक्तं स्थानं तस्य महात्मनः ॥
trikālaṁ yatra rudrastu samāgatya vyavasthitaḥ || tanmahālayamityuktaṁ sthānaṁ tasya mahātmanaḥ ||
यहाँ रुद्र स्वयं तीनों समय आकर विराजमान होते हैं; उस महात्मा का वह स्थान महालय कहलाता है।
श्लोक 57 (skanda.7.35.57)
पिंडतारकमित्येतत्प्राचीनं तीर्थमुत्तमम् ॥ कुम्भकुक्षिगिरिस्थं तत्पित्र्ये कर्मणि सिद्धिदम्
piṁḍatārakamityetatprācīnaṁ tīrthamuttamam || kumbhakukṣigiristhaṁ tatpitrye karmaṇi siddhidam
यह प्राचीन उत्तम तीर्थ पिंडतारक कहलाता है, जो कुम्भकुक्षि पर्वत पर स्थित है और पितृकार्य में सिद्धि प्रदान करता है।
श्लोक 58 (skanda.7.35.58)
प्राचीनेश्वरदेवस्य पुरोभूतं प्रति ष्ठितम्॥ प्राची सरस्वती यत्र तत्र किं मृग्यते परम्
prācīneśvaradevasya purobhūtaṁ prati ṣṭhitam|| prācī sarasvatī yatra tatra kiṁ mṛgyate param
यह प्राचीनेश्वर देव के समक्ष स्थित है; जहाँ प्राची सरस्वती हैं, वहाँ और क्या खोजना शेष रह जाता है?
श्लोक 59 (skanda.7.35.59)
निवृत्ते भारते युद्धे तत्र तीर्थे किरीटिना ॥ प्रायश्चित्तं पुरा चीर्णं विष्णुना प्रेरितात्मना
nivṛtte bhārate yuddhe tatra tīrthe kirīṭinā || prāyaścittaṁ purā cīrṇaṁ viṣṇunā preritātmanā
भारत-युद्ध की समाप्ति के बाद उस तीर्थ में किरीटी (अर्जुन) ने विष्णु से प्रेरित होकर पूर्वकाल में प्रायश्चित्त किया था।
श्लोक 60 (skanda.7.35.60)
तेन तस्माद्विनिर्मुक्तः पातकात्पूर्वसंचितात् ॥ नरतीर्थं ततः ख्यातं तत्र पापभयापहम्
tena tasmādvinirmuktaḥ pātakātpūrvasaṁcitāt || naratīrthaṁ tataḥ khyātaṁ tatra pāpabhayāpaham
उससे वे पूर्वसंचित पाप से मुक्त हो गए; इसलिए वहाँ वह तीर्थ नरतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो पाप-भय का नाश करता है।
श्लोक 61 (skanda.7.35.61)
नरतीर्थादन्यतीर्थं पुंडरीकमिति स्मृतम् ॥ अर्जुनेन सहागत्य यत्र स्नातो हरिः प्रिये
naratīrthādanyatīrthaṁ puṁḍarīkamiti smṛtam || arjunena sahāgatya yatra snāto hariḥ priye
नरतीर्थ से आगे पुंडरीक नामक तीर्थ स्मरण किया गया है, हे प्रिये! जहाँ अर्जुन के साथ आकर हरि ने स्नान किया था।
श्लोक 62 (skanda.7.35.62)
प्राचीनेशात्परं तीर्थं वालखिल्येश्वरं महत् ॥ तत्र तस्मान्महातीर्थात्तीर्थमन्यन्महोदयम्
prācīneśātparaṁ tīrthaṁ vālakhilyeśvaraṁ mahat || tatra tasmānmahātīrthāttīrthamanyanmahodayam
प्राचीनेश से आगे वालखिल्येश्वर नामक महान तीर्थ है; उस महातीर्थ से आगे एक और महान तीर्थ है -
श्लोक 63 (skanda.7.35.63)
गंगासमागमंनाम तीर्थमन्यन्महोदयम् ॥ तत्रालोक्य पुनर्देवीं दीनास्यां दीनमानसाम्
gaṁgāsamāgamaṁnāma tīrthamanyanmahodayam || tatrālokya punardevīṁ dīnāsyāṁ dīnamānasām
- जो गंगासमागम नाम से जाना जाता है; वहाँ पुनः दीन मुख और दुःखी मन वाली देवी को देखकर -
श्लोक 64 (skanda.7.35.64)
ब्रह्मासृजत्सखीं तस्याः कपिलां विपुलेक्षणाम् ॥ हरिणीं हरिरप्याशु वज्रिणीमपि देवराट् ॥ न्यंकुं विनोदनार्थं च सरस्वत्या ददौ हरः
brahmāsṛjatsakhīṁ tasyāḥ kapilāṁ vipulekṣaṇām || hariṇīṁ harirapyāśu vajriṇīmapi devarāṭ || nyaṁkuṁ vinodanārthaṁ ca sarasvatyā dadau haraḥ
- ब्रह्मा ने उनकी सखी के रूप में विशाल नेत्रों वाली कपिला को रचा; हरि ने तुरंत हरिणी को, देवराज इन्द्र ने वज्रिणी को रचा; और हर (शिव) ने सरस्वती को मनोरंजन के लिए न्यंकु प्रदान किया।
श्लोक 65 (skanda.7.35.65)
ततः प्रहृष्टा सा देवी देवादेशात्सरस्वती ॥ तस्माद्गन्तुं समारब्धा प्राचीना पापनाशिनी
tataḥ prahṛṣṭā sā devī devādeśātsarasvatī || tasmādgantuṁ samārabdhā prācīnā pāpanāśinī
तब देवताओं की आज्ञा से प्रसन्न होकर पापनाशिनी प्राची सरस्वती ने वहाँ से आगे बढ़ना आरंभ किया।
श्लोक 66 (skanda.7.35.66)
॥ ईश्वर उवाच ॥ दक्षिणां दिशमास्थाय पुनः पश्चान्मुखी तदा ॥ सरस्वती महादेवी वडवानलधारिणी ॥ तदुत्तरे तटे तीर्थमेकद्वारमिति स्मृतम्
|| īśvara uvāca || dakṣiṇāṁ diśamāsthāya punaḥ paścānmukhī tadā || sarasvatī mahādevī vaḍavānaladhāriṇī || taduttare taṭe tīrthamekadvāramiti smṛtam
ईश्वर ने कहा - दक्षिण दिशा का सहारा लेकर फिर पश्चिमाभिमुखी हुई महादेवी वडवानलधारिणी सरस्वती के उत्तरी तट पर एकद्वार नामक तीर्थ स्मरण किया गया है।
श्लोक 67 (skanda.7.35.67)
एकद्वारेण यत्सेना स्वर्गं प्राप्ता ततो वरात् ॥ तस्मात्तीर्थात्पुनश्चान्यत्तीर्थं यत्र गुहेश्वरः
ekadvāreṇa yatsenā svargaṁ prāptā tato varāt || tasmāttīrthātpunaścānyattīrthaṁ yatra guheśvaraḥ
उस वर से एकद्वार तीर्थ के द्वारा एक सेना स्वर्ग को प्राप्त हुई थी; उस तीर्थ से आगे एक और तीर्थ है, जहाँ गुहेश्वर विराजमान हैं।
श्लोक 68 (skanda.7.35.68)
गुहेन स्थापितः पूर्वं यत्र देवो महेश्वरः ॥ गुहेश्वरान्नातिदूरे वटेश्वरमिति स्मृतम्
guhena sthāpitaḥ pūrvaṁ yatra devo maheśvaraḥ || guheśvarānnātidūre vaṭeśvaramiti smṛtam
- जहाँ पूर्वकाल में गुह (कार्तिकेय) ने महेश्वर की स्थापना की थी; गुहेश्वर से अधिक दूर नहीं वटेश्वर तीर्थ स्मरण किया गया है -
श्लोक 69 (skanda.7.35.69)
दिव्यं सरस्वतीतीरे व्यासेनाराधितं पुरा ॥ आमर्द्दकी नदी यत्र सरस्वत्या सहैकताम्
divyaṁ sarasvatītīre vyāsenārādhitaṁ purā || āmarddakī nadī yatra sarasvatyā sahaikatām
- जो सरस्वती के तट पर दिव्य रूप में स्थित है और जिसकी पूर्वकाल में व्यास ने आराधना की थी; जहाँ आमर्दकी नदी सरस्वती के साथ एकत्व को प्राप्त होती है -
श्लोक 70 (skanda.7.35.70)
संप्राप्ता तन्महातीर्थं फलदं सर्वदेहिनाम् ॥ आमर्दकी संगमं तं नापुण्यो वेद कश्चन ॥ संगमेश्वरनामेति तत्र लिंगं प्रतिष्ठितम्
saṁprāptā tanmahātīrthaṁ phaladaṁ sarvadehinām || āmardakī saṁgamaṁ taṁ nāpuṇyo veda kaścana || saṁgameśvaranāmeti tatra liṁgaṁ pratiṣṭhitam
- वह महातीर्थ सभी प्राणियों को फल देने वाला है; उस आमर्दकी-संगम को कोई अपुण्यात्मा नहीं जान पाता; वहाँ संगमेश्वर नामक शिवलिंग प्रतिष्ठित है।
श्लोक 71 (skanda.7.35.71)
मुण्डीश्वरेति च तथा प्रसिद्धिमगमत्क्षितौ ॥ मुंडीश्वरसमीपस्थं सरस्वत्यां महोदयम्
muṇḍīśvareti ca tathā prasiddhimagamatkṣitau || muṁḍīśvarasamīpasthaṁ sarasvatyāṁ mahodayam
यह पृथ्वी पर मुण्डीश्वर नाम से भी प्रसिद्ध हुआ; मुण्डीश्वर के समीप सरस्वती पर एक महान तीर्थ है -
श्लोक 72 (skanda.7.35.72)
नाम्ना यत्प्राङ्मुखं तीर्थं सरस्वत्यास्तटे स्थितम् ॥ मांडव्येश्वरनाम्ना वै यत्रेशः संप्रतिष्ठितः
nāmnā yatprāṅmukhaṁ tīrthaṁ sarasvatyāstaṭe sthitam || māṁḍavyeśvaranāmnā vai yatreśaḥ saṁpratiṣṭhitaḥ
- जो प्राङ्मुख नाम से सरस्वती के तट पर स्थित है, जहाँ ईश्वर मांडव्येश्वर नाम से प्रतिष्ठित हैं।
श्लोक 73 (skanda.7.35.73)
पीलुकर्णिकसंज्ञं तु तीर्थमन्यत्पुनस्ततः ॥ सरस्वतीतीरगतमृषिणा सेवितं महत्
pīlukarṇikasaṁjñaṁ tu tīrthamanyatpunastataḥ || sarasvatītīragatamṛṣiṇā sevitaṁ mahat
उससे आगे पीलुकर्णिक नामक एक और महान तीर्थ है, जो सरस्वती के तट पर स्थित है और किसी ऋषि द्वारा सेवित है।
श्लोक 74 (skanda.7.35.74)
तस्मादन्यत्सरस्वत्यां तीर्थं द्वारवती स्मृतम् ॥ तीर्थानां प्रवरं देवि यत्र संनिहितो हरिः
tasmādanyatsarasvatyāṁ tīrthaṁ dvāravatī smṛtam || tīrthānāṁ pravaraṁ devi yatra saṁnihito hariḥ
उससे आगे सरस्वती पर द्वारवती नामक तीर्थ स्मरण किया गया है, हे देवि! यह तीर्थों में श्रेष्ठ है, जहाँ हरि निकट ही विराजमान हैं।
श्लोक 75 (skanda.7.35.75)
ततस्तस्य समीपस्थं तीर्थं गोवत्ससंज्ञितम् ॥ यत्रावतीर्य गोवत्सस्वरूपेणांबिकापतिः
tatastasya samīpasthaṁ tīrthaṁ govatsasaṁjñitam || yatrāvatīrya govatsasvarūpeṇāṁbikāpatiḥ
उसके समीप गोवत्स नामक तीर्थ है, जहाँ अम्बिकापति (शिव) ने गोवत्स के रूप में अवतार लेकर -
श्लोक 76 (skanda.7.35.76)
स्वयं भूलिंगरूपेण संस्थितस्तेजसां निधिः ॥ गोवत्सान्नैर्ऋते भागे दृश्यते लोहयष्टिका
svayaṁ bhūliṁgarūpeṇa saṁsthitastejasāṁ nidhiḥ || govatsānnairṛte bhāge dṛśyate lohayaṣṭikā
- स्वयं तेजोनिधि शिव स्वयंभू लिंग रूप में स्थित हैं; गोवत्स से नैर्ऋत्य दिशा में एक लौह-यष्टि दिखाई देती है।
श्लोक 77 (skanda.7.35.77)
स्वयंभूलिंगरूपेण रुद्रस्तत्र स्वयं स्थितः ॥ एकविंशति वारस्य भक्त्या पिंडस्य यत्फलम्
svayaṁbhūliṁgarūpeṇa rudrastatra svayaṁ sthitaḥ || ekaviṁśati vārasya bhaktyā piṁḍasya yatphalam
वहाँ रुद्र स्वयं स्वयंभू लिंग रूप में स्थित हैं; भक्तिपूर्वक इक्कीस बार पिंडदान करने से जो फल मिलता है -
श्लोक 78 (skanda.7.35.78)
गंगायां प्राप्यते पुंसां श्राद्धेनैकेन तत्र तत् ॥ ततस्तस्मान्महातीर्थाद्बालक्रीडनकी यथा
gaṁgāyāṁ prāpyate puṁsāṁ śrāddhenaikena tatra tat || tatastasmānmahātīrthādbālakrīḍanakī yathā
- वह गंगा में मनुष्यों को एक ही श्राद्ध से वहाँ प्राप्त हो जाता है। उस महातीर्थ से आगे बालक्रीड़नकी नामक स्थान है -
श्लोक 79 (skanda.7.35.79)
सखीभिः सहिता तत्र क्रीडताऽसौ यथेच्छया ॥ आनुलोम्यविलोम्येन दक्षिणेनोत्तरेण च
sakhībhiḥ sahitā tatra krīḍatā'sau yathecchayā || ānulomyavilomyena dakṣiṇenottareṇa ca
- जहाँ वे सखियों के साथ इच्छानुसार अनुलोम-विलोम, दक्षिण-उत्तर दिशाओं में क्रीड़ा करती हैं।
श्लोक 80 (skanda.7.35.80)
रुल्लं प्राप्य पुनर्देवी समुद्भूता मनोरमा ॥ रुल्लं नाम पुरं यत्र सृष्टं देवेन शंभुना
rullaṁ prāpya punardevī samudbhūtā manoramā || rullaṁ nāma puraṁ yatra sṛṣṭaṁ devena śaṁbhunā
रुल्ल में पहुँचकर मनोरमा देवी पुनः प्रकट हुईं; रुल्ल नामक नगर वहाँ शम्भु देव द्वारा रचा गया है।
श्लोक 81 (skanda.7.35.81)
सह देवैस्तु पार्वत्या धारायंत्रप्रयोगकैः ॥ एकं वर्षसहस्रं तु शंभुना तत्र रुल्लितम्
saha devaistu pārvatyā dhārāyaṁtraprayogakaiḥ || ekaṁ varṣasahasraṁ tu śaṁbhunā tatra rullitam
वहाँ देवताओं और पार्वती के साथ जलधारा-यंत्रों के प्रयोग से शम्भु ने एक हजार वर्ष तक उसे "रुल्लित" (आन्दोलित) किया।
श्लोक 82 (skanda.7.35.82)
रुल्लं तत्र ह्रदं नाम सरस्वत्यां महोदयम् ॥ साक्षात्तत्र महादेव आनंदेश्वरसंज्ञितः
rullaṁ tatra hradaṁ nāma sarasvatyāṁ mahodayam || sākṣāttatra mahādeva ānaṁdeśvarasaṁjñitaḥ
वहाँ सरस्वती पर रुल्ल नामक एक महाप्रसिद्ध ह्रद है; वहाँ स्वयं महादेव आनन्देश्वर नाम से विराजमान हैं।
श्लोक 83 (skanda.7.35.83)
पश्चिमेन स्थितं तत्र शम्भोरायतनस्य तु ॥ स मेरोर्दक्षिणे पादे नखस्तु परिकीर्तितः
paścimena sthitaṁ tatra śambhorāyatanasya tu || sa merordakṣiṇe pāde nakhastu parikīrtitaḥ
यह शम्भु के मंदिर के पश्चिम में स्थित है; इसे मेरु के दक्षिण पादमूल में नख नाम से कहा गया है।
श्लोक 84 (skanda.7.35.84)
पश्यंति ये नराः सम्यक्तेऽपि पापविवर्जिताः ॥ अश्वमेधसहस्रस्य प्राप्नुवंति फलं ध्रुवम्
paśyaṁti ye narāḥ samyakte'pi pāpavivarjitāḥ || aśvamedhasahasrasya prāpnuvaṁti phalaṁ dhruvam
जो मनुष्य इसे भलीभाँति देखते हैं वे पाप से मुक्त हो जाते हैं; उन्हें निश्चय ही सहस्र अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 85 (skanda.7.35.85)
परतस्तस्य कूष्मांडमुनेस्तत्राश्रमं महत् ॥ कूष्मांडेश्वरसंज्ञं तु तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्
paratastasya kūṣmāṁḍamunestatrāśramaṁ mahat || kūṣmāṁḍeśvarasaṁjñaṁ tu tīrthaṁ trailokyaviśrutam
उससे आगे कूष्मांड मुनि का महान आश्रम है; कूष्मांडेश्वर नामक तीर्थ त्रिलोक में विख्यात है।
श्लोक 86 (skanda.7.35.86)
कोल्लादेवी स्थिता तत्र सर्वपापभयापहा ॥ अन्तर्द्धानेन तां कोल्लां संप्राप्ता सा महानदी
kollādevī sthitā tatra sarvapāpabhayāpahā || antarddhānena tāṁ kollāṁ saṁprāptā sā mahānadī
वहाँ सर्वपापभय को दूर करने वाली कोल्ला देवी विराजमान हैं; अंतर्धान होकर वह महानदी उस कोल्ला स्थान में पहुँचीं।
श्लोक 87 (skanda.7.35.87)
ततोऽप्यंतर्हिता भूत्वा संप्राप्ता तु मनोरमम् ॥ सानुं मदनसंज्ञं तु क्षेत्रं सिद्धनिषेवितम्
tato'pyaṁtarhitā bhūtvā saṁprāptā tu manoramam || sānuṁ madanasaṁjñaṁ tu kṣetraṁ siddhaniṣevitam
वहाँ से भी अंतर्हित होकर वे मदन नामक सिद्धसेवित रमणीय पर्वतशिखर पर पहुँचीं।
श्लोक 88 (skanda.7.35.88)
ततोऽप्यंतर्हिता भूत्वा पुनः प्राप्ता हिमाचलम् ॥ खादिरामोदनामानं सर्वर्तुकुसुमोज्ज्वलम्
tato'pyaṁtarhitā bhūtvā punaḥ prāptā himācalam || khādirāmodanāmānaṁ sarvartukusumojjvalam
वहाँ से भी अंतर्हित होकर वे पुनः हिमाचल के खादिरामोद नामक स्थान पर पहुँचीं, जो सभी ऋतुओं के फूलों से उज्ज्वल था।
श्लोक 89 (skanda.7.35.89)
तत्रारुह्य विलोक्याथ ददर्श सुमनोरमम ॥ क्षारोदं पश्चिमाशास्थं घनवृंदमिवोन्नतम्
tatrāruhya vilokyātha dadarśa sumanoramama || kṣārodaṁ paścimāśāsthaṁ ghanavṛṁdamivonnatam
वहाँ चढ़कर चारों ओर देखते हुए उन्होंने पश्चिम दिशा में स्थित, मेघसमूह के समान ऊँचे उठे हुए अत्यंत मनोरम क्षारसागर को देखा।
श्लोक 90 (skanda.7.35.90)
एवंविधं च तं तत्र सा विलोक्य महाप्रभा ॥ हर्षात्पंचानना भूत्वा देवकार्यार्थमुद्यता
evaṁvidhaṁ ca taṁ tatra sā vilokya mahāprabhā || harṣātpaṁcānanā bhūtvā devakāryārthamudyatā
इस प्रकार उसे देखकर वह महातेजस्विनी देवी हर्षपूर्वक पंचरूपा होकर देवकार्य के लिए उद्यत हुईं।
श्लोक 91 (skanda.7.35.91)
हरिणी वज्रिणी न्यंकुः कपिला च सरस्वती ॥ पंचस्रोताः स्थिता तत्र मुनिनोक्ता सरस्वती
hariṇī vajriṇī nyaṁkuḥ kapilā ca sarasvatī || paṁcasrotāḥ sthitā tatra muninoktā sarasvatī
हरिणी, वज्रिणी, न्यंकु, कपिला और सरस्वती - इस प्रकार मुनि द्वारा कथित पंचस्रोता सरस्वती वहाँ स्थित हुईं।
श्लोक 92 (skanda.7.35.92)
श्रमापनोदं कुर्वाणा मुनीनां यत्र संस्थिता ॥ तत्तत्पादकमित्युक्तं तीर्थं तीर्थार्थिनां नृणाम् ॥ सर्वेषां पातकानां च शोधनं तद्वरानने
śramāpanodaṁ kurvāṇā munīnāṁ yatra saṁsthitā || tattatpādakamityuktaṁ tīrthaṁ tīrthārthināṁ nṛṇām || sarveṣāṁ pātakānāṁ ca śodhanaṁ tadvarānane
जहाँ वे मुनियों की थकान दूर करती हुई स्थित रहीं, हे वरानने! वह तीर्थ तीर्थार्थी मनुष्यों के लिए तत्पादक कहलाता है और यह सभी पापों का शोधन करने वाला है।
श्लोक 93 (skanda.7.35.93)
खादिरामोदमासाद्य तत्रस्था वीक्ष्य सागरम् ॥ गन्तुं प्रवृत्ता तं वह्निमादाय सुरसुन्दरि
khādirāmodamāsādya tatrasthā vīkṣya sāgaram || gantuṁ pravṛttā taṁ vahnimādāya surasundari
खादिरामोद में पहुँचकर वहाँ खड़ी होकर सागर को देखते हुए, हे सुरसुंदरी! वे उस अग्नि को लेकर वहाँ जाने के लिए प्रवृत्त हुईं।
श्लोक 94 (skanda.7.35.94)
दग्ध्वा कृतस्मरं देवी पुनरादाय वाडवम् ॥ समुद्रस्य समीपस्था स्थिता हृष्टतनूरुहा
dagdhvā kṛtasmaraṁ devī punarādāya vāḍavam || samudrasya samīpasthā sthitā hṛṣṭatanūruhā
दृढ़ संकल्प करके देवी ने पुनः वाडव अग्नि को ग्रहण किया और हर्षित रोमांचित शरीर से समुद्र के समीप खड़ी हो गईं।
श्लोक 95 (skanda.7.35.95)
ततः प्रविष्टा सा देवी अगाधे लवणांभसि ॥ वाडवं वह्निमादाय जलमध्ये व्यसर्जयत्
tataḥ praviṣṭā sā devī agādhe lavaṇāṁbhasi || vāḍavaṁ vahnimādāya jalamadhye vyasarjayat
तब वह देवी अथाह खारे जल में प्रविष्ट हुईं और वाडव अग्नि को लेकर उसे जल के मध्य में छोड़ दिया।
श्लोक 96 (skanda.7.35.96)
ततस्तस्याः पुनः प्रीतः स्वयमेव हुताशनः ॥ तद्दृष्ट्वा दुष्करं कर्म वचनं चेदमब्रवीत्
tatastasyāḥ punaḥ prītaḥ svayameva hutāśanaḥ || taddṛṣṭvā duṣkaraṁ karma vacanaṁ cedamabravīt
तब स्वयं अग्नि उनसे प्रसन्न होकर, उस दुष्कर कार्य को देखकर, यह वचन बोला।
श्लोक 97 (skanda.7.35.97)
परितुष्टोऽस्मि ते भद्रे वरं वरय सुव्रते ॥ तत्ते दास्याम्यहं प्रीतो यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्
parituṣṭo'smi te bhadre varaṁ varaya suvrate || tatte dāsyāmyahaṁ prīto yadyapi syātsudurlabham
हे भद्रे! हे सुव्रते! मैं तुमसे संतुष्ट हूँ, वर माँगो; मैं प्रसन्न होकर तुम्हें वह दूँगा, चाहे वह कितना भी दुर्लभ क्यों न हो।
श्लोक 98 (skanda.7.35.98)
॥ ईश्वर उवाच ॥ प्रगृह्य वलयं हस्तादिदं वचनमब्रवीत् ॥ इदं मे वलयं वह्ने वक्त्रे धार्यं सदा त्वया
|| īśvara uvāca || pragṛhya valayaṁ hastādidaṁ vacanamabravīt || idaṁ me valayaṁ vahne vaktre dhāryaṁ sadā tvayā
ईश्वर ने कहा - अपने हाथ से एक कंकण उतारकर उन्होंने यह वचन कहा - हे अग्ने! मेरा यह कंकण सदा तुम्हें अपने मुख में धारण करना होगा।
श्लोक 99 (skanda.7.35.99)
अनेन शक्यते यावत्तावत्तोयं समाहर ॥ न त्वया शोषणीयोऽयं समुदः सरितांपतिः
anena śakyate yāvattāvattoyaṁ samāhara || na tvayā śoṣaṇīyo'yaṁ samudaḥ saritāṁpatiḥ
इससे जितना संभव हो उतना ही जल ग्रहण करना; इस सरितापति समुद्र को तुम्हें सुखाना नहीं है।
श्लोक 100 (skanda.7.35.100)
बाढमित्येव चोक्त्वा स प्रविष्टो निधिमंभसाम्॥ एवमेषा महादेवि प्रभासे तु सरस्वती ॥ गृहीत्वा वाडवं प्राप्ता तुष्ट्यर्थं च मनीषिणाम्
bāḍhamityeva coktvā sa praviṣṭo nidhimaṁbhasām|| evameṣā mahādevi prabhāse tu sarasvatī || gṛhītvā vāḍavaṁ prāptā tuṣṭyarthaṁ ca manīṣiṇām
"ऐसा ही हो" कहकर वह जलनिधि में प्रविष्ट हो गया। इस प्रकार, हे महादेवि! यह सरस्वती प्रभास में वाडव अग्नि को लेकर विद्वानों की तुष्टि के लिए वहाँ पहुँचीं।
श्लोक 101 (skanda.7.35.101)
सा विश्रांता कुरुक्षेत्रे भद्रावर्ते च भामिनि ॥ पुष्करे श्रीकला देवी प्रभासे च महानदी
sā viśrāṁtā kurukṣetre bhadrāvarte ca bhāmini || puṣkare śrīkalā devī prabhāse ca mahānadī
हे भामिनि! वे कुरुक्षेत्र और भद्रावर्त में विश्राम करती हैं; पुष्कर में वे श्रीकला देवी हैं और प्रभास में महानदी।
श्लोक 102 (skanda.7.35.102)
देवमातेति सा तत्र संस्थिता लवणोदधौ ॥ अस्मिन्मन्वंतरे देवि आदौ त्रेतायुगे पुरा
devamāteti sā tatra saṁsthitā lavaṇodadhau || asminmanvaṁtare devi ādau tretāyuge purā
वहाँ खारे समुद्र में वे देवमाता के रूप में स्थित हैं; इस मन्वंतर में, हे देवि! प्राचीन त्रेतायुग के प्रारंभ में -
श्लोक 103 (skanda.7.35.103)
इति वृत्तं सरस्वत्या वाडवाग्नेस्तथाभवत् ॥ मन्वन्तरे व्यतीतेऽस्मिन्भविताऽन्यस्तु वाडवः
iti vṛttaṁ sarasvatyā vāḍavāgnestathābhavat || manvantare vyatīte'sminbhavitā'nyastu vāḍavaḥ
- सरस्वती और वाडवाग्नि का यह वृत्तांत इस प्रकार घटित हुआ। इस मन्वंतर के व्यतीत होने पर एक अन्य वाडव अग्नि होगी।
श्लोक 104 (skanda.7.35.104)
ज्वालामुखेति नाम्ना वै रुद्रक्रोधाद्भविष्यति ॥ सरस्वत्यास्तथा नाम ख्यातिं ब्राह्मीति यास्यति
jvālāmukheti nāmnā vai rudrakrodhādbhaviṣyati || sarasvatyāstathā nāma khyātiṁ brāhmīti yāsyati
वह रुद्र के क्रोध से उत्पन्न होकर ज्वालामुखी नाम से जानी जाएगी; और सरस्वती का नाम भी तब "ब्राह्मी" की प्रसिद्धि को प्राप्त होगा।
श्लोक 105 (skanda.7.35.105)
सरस्वतीति वै लोके वर्तते नाम सांप्रतम् ॥ अतीतं नाम यत्तस्याः कमंडलुभवेति च ॥ रत्नाकरेति सामुद्रं सत्यं नामांतरं पुरा
sarasvatīti vai loke vartate nāma sāṁpratam || atītaṁ nāma yattasyāḥ kamaṁḍalubhaveti ca || ratnākareti sāmudraṁ satyaṁ nāmāṁtaraṁ purā
"सरस्वती" - यह उनका वर्तमान में लोक में प्रचलित नाम है; उनका भूतकालीन नाम "कमंडलुभवा" था, और पूर्वकाल में समुद्र-संबंधी उनका सत्य नाम "रत्नाकरा" था।
श्लोक 106 (skanda.7.35.106)
अस्मिन्मन्वंतरे देवि सागरेति प्रकीर्तितम् ॥ क्षारोदेति भविष्यं तु नाम देवि प्रकीर्तितम्
asminmanvaṁtare devi sāgareti prakīrtitam || kṣārodeti bhaviṣyaṁ tu nāma devi prakīrtitam
इस मन्वंतर में, हे देवि! वे "सागरा" नाम से प्रसिद्ध हैं; और हे देवि! "क्षारोदा" उनका भविष्य का नाम कहा गया है।
श्लोक 107 (skanda.7.35.107)
एवं जानाति यः कश्चित्स तीर्थफलमश्नुते ॥ स्वर्गनिःश्रेणिसंभूता प्रभासे तु सरस्वती
evaṁ jānāti yaḥ kaścitsa tīrthaphalamaśnute || svarganiḥśreṇisaṁbhūtā prabhāse tu sarasvatī
जो कोई इस प्रकार जानता है, वह तीर्थ का फल प्राप्त करता है; प्रभास में सरस्वती स्वर्ग की सीढ़ी के रूप में प्रकट हुई हैं।
श्लोक 108 (skanda.7.35.108)
नापुण्यवद्भिः संप्राप्तुं पुंभिः शक्या महानदी ॥ प्राची सरस्वती देवि सर्वत्र च सुदुर्लभा ॥ विशेषेण कुरुक्षेत्रे प्रभासे पुष्करे तथा
nāpuṇyavadbhiḥ saṁprāptuṁ puṁbhiḥ śakyā mahānadī || prācī sarasvatī devi sarvatra ca sudurlabhā || viśeṣeṇa kurukṣetre prabhāse puṣkare tathā
यह महानदी अपुण्यवान पुरुषों द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती; हे देवि! प्राची सरस्वती सर्वत्र अत्यंत दुर्लभ हैं, विशेषकर कुरुक्षेत्र, प्रभास और पुष्कर में।
श्लोक 109 (skanda.7.35.109)
एवंप्रभावा सा देवी वडवानल धारिणी॥ अग्नितीर्थसमीपस्था स्थिता देवी सरस्वती
evaṁprabhāvā sā devī vaḍavānala dhāriṇī|| agnitīrthasamīpasthā sthitā devī sarasvatī
ऐसी प्रभावशाली हैं वे वडवानलधारिणी देवी; देवी सरस्वती अग्नितीर्थ के समीप स्थित हैं।
श्लोक 110 (skanda.7.35.110)
तामादौ पूजयेद्यस्तु स तीर्थफलमश्नुते ॥ सागरं यच्च तत्तीर्थं पापघ्नं पुण्यवर्द्धनम्
tāmādau pūjayedyastu sa tīrthaphalamaśnute || sāgaraṁ yacca tattīrthaṁ pāpaghnaṁ puṇyavarddhanam
जो पहले उनकी पूजा करता है, वह तीर्थ का फल प्राप्त करता है; और वह सागर-तीर्थ पाप का नाश करने वाला तथा पुण्य बढ़ाने वाला है।
श्लोक 111 (skanda.7.35.111)
दर्शनादेव तस्यैव महाक्रतुफलं लभेत् ॥ अग्निचित्कपिला सत्री राजा भिक्षुर्महोदधिः
darśanādeva tasyaiva mahākratuphalaṁ labhet || agnicitkapilā satrī rājā bhikṣurmahodadhiḥ
इसके दर्शनमात्र से महान यज्ञ का फल प्राप्त होता है। अग्निचित् ब्राह्मण, कपिला गाय, सती स्त्री, राजा, भिक्षु और महासागर -
श्लोक 112 (skanda.7.35.112)
दृष्टमात्राः पुनंत्येते तस्मात्पश्येद्धि भावितः ॥ अग्नितीर्थे नरः स्नात्वा पावके प्रक्षिपेत्ततः ॥ गुग्गुलं भारसहितं सोग्निलोके महीयते
dṛṣṭamātrāḥ punaṁtyete tasmātpaśyeddhi bhāvitaḥ || agnitīrthe naraḥ snātvā pāvake prakṣipettataḥ || guggulaṁ bhārasahitaṁ sogniloke mahīyate
- इन्हें देखने मात्र से ही ये पवित्र कर देते हैं, अतः श्रद्धालु को इन्हें अवश्य देखना चाहिए। अग्नितीर्थ में स्नान करके मनुष्य अग्नि में पूरे भार सहित गुग्गुल अर्पित करे, तो वह अग्निलोक में प्रतिष्ठित होता है।
श्लोक 113 (skanda.7.35.113)
एवं संक्षेपतः प्रोक्तो ह्यग्नि तीर्थमहोदयः ॥ सरस्वत्याश्च माहात्म्यं सर्वपातकनाशनम्
evaṁ saṁkṣepataḥ prokto hyagni tīrthamahodayaḥ || sarasvatyāśca māhātmyaṁ sarvapātakanāśanam
इस प्रकार संक्षेप में अग्नितीर्थ की महिमा तथा सर्वपापनाशक सरस्वती का माहात्म्य कहा गया।
श्लोक 114 (skanda.7.35.114)
स्नात्वाग्नितीर्थे विधिवत्कंकणं प्रक्षिपेततः ॥ सुवर्णस्य महादेवि यथावित्तानुसारतः
snātvāgnitīrthe vidhivatkaṁkaṇaṁ prakṣipetataḥ || suvarṇasya mahādevi yathāvittānusārataḥ
विधिपूर्वक अग्नितीर्थ में स्नान करके, हे महादेवि! अपनी सामर्थ्य के अनुसार स्वर्ण का कंकण उसमें अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 115 (skanda.7.35.115)
ततः सरस्वतीं पूज्य कपर्दिनमथार्चयेत्
tataḥ sarasvatīṁ pūjya kapardinamathārcayet
फिर सरस्वती की पूजा करके कपर्दी (शिव) की अर्चना करनी चाहिए।
श्लोक 116 (skanda.7.35.116)
ततः केदारनामानं भीमेश्वरमतःपरम् ॥ भैरवेश्वरनामानं चण्डीश्वरमतः परम्
tataḥ kedāranāmānaṁ bhīmeśvaramataḥparam || bhairaveśvaranāmānaṁ caṇḍīśvaramataḥ param
फिर केदार नामक को, उसके बाद भीमेश्वर को; फिर भैरवेश्वर नामक को, उसके बाद चंडीश्वर को अर्चना करनी चाहिए।
श्लोक 117 (skanda.7.35.117)
ततः सोमेश्वरं देवं पूजयेद्विधिवन्नरः ॥ नवग्रहेश्वरानिष्ट्वा रुद्रैकादशकं तथा
tataḥ someśvaraṁ devaṁ pūjayedvidhivannaraḥ || navagraheśvarāniṣṭvā rudraikādaśakaṁ tathā
फिर मनुष्य विधिपूर्वक सोमेश्वर देव की पूजा करे, नवग्रहेश्वरों तथा एकादश रुद्रों का पूजन करके।
श्लोक 118 (skanda.7.35.118)
ततः संपूजयेद्देवं ब्रह्माणं बालरूपिणम् ॥ एवं रौद्री समाख्याता यात्रा पातकनाशिनी
tataḥ saṁpūjayeddevaṁ brahmāṇaṁ bālarūpiṇam || evaṁ raudrī samākhyātā yātrā pātakanāśinī
फिर बालरूपधारी ब्रह्मा देव की भलीभाँति पूजा करे। इस प्रकार यह पापनाशिनी रौद्री यात्रा कही गई है।
श्लोक 119 (skanda.7.35.119)
माहात्म्यमखिलं तस्या यो जानाति नरोत्तमः॥ निवसन्क्षेत्रमध्ये तु स तीर्थफलमश्नुते
māhātmyamakhilaṁ tasyā yo jānāti narottamaḥ|| nivasankṣetramadhye tu sa tīrthaphalamaśnute
जो श्रेष्ठ मनुष्य इसकी संपूर्ण महिमा को जानता है, वह इस क्षेत्र के भीतर निवास करते हुए तीर्थ का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 120 (skanda.7.35.120)
एवं कृत्वा ततो गच्छेन्महादेवीं सरस्वतीम्
evaṁ kṛtvā tato gacchenmahādevīṁ sarasvatīm
ऐसा करके फिर महादेवी सरस्वती के दर्शन को जाना चाहिए।
श्लोक 121 (skanda.7.35.121)
सरस्वतीवाससमा कुतो गुणाः सरस्वतीवाससमा कुतो रतिः॥ सरस्वतीं प्राप्य दिवं गता नराः पुनः स्मरिष्यंति नदीं सरस्वतीम्
sarasvatīvāsasamā kuto guṇāḥ sarasvatīvāsasamā kuto ratiḥ|| sarasvatīṁ prāpya divaṁ gatā narāḥ punaḥ smariṣyaṁti nadīṁ sarasvatīm
सरस्वती के तट पर निवास के समान गुण कहाँ हैं? सरस्वती के तट पर निवास के समान रति (आनंद) कहाँ है? सरस्वती को प्राप्त कर स्वर्ग गए हुए मनुष्य भी पुनः इस सरस्वती नदी का स्मरण करेंगे।