प्रभास खण्ड · अध्याय 36
प्राची सरस्वती माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.36.1)
॥ देव्युवाच ॥ यदेतद्भवता प्रोक्तं प्राची सर्वत्र दुर्ल्लभा ॥ विशेषेण कुरुक्षेत्रे प्रभासे पुष्करे तथा
|| devyuvāca || yadetadbhavatā proktaṁ prācī sarvatra durllabhā || viśeṣeṇa kurukṣetre prabhāse puṣkare tathā
देवी ने कहा - आपने जो यह कहा कि प्राची सर्वत्र दुर्लभ है, विशेषकर कुरुक्षेत्र, प्रभास और पुष्कर में -
श्लोक 2 (skanda.7.36.2)
कथं प्रभासमासाद्य संस्थिता पापनाशिनी ॥ माहात्म्यमखिलं तस्याः प्राच्याः पातकनाशनम् ॥ कथयस्व महेशान यद्यहं ते प्रिया विभो
kathaṁ prabhāsamāsādya saṁsthitā pāpanāśinī || māhātmyamakhilaṁ tasyāḥ prācyāḥ pātakanāśanam || kathayasva maheśāna yadyahaṁ te priyā vibho
- वह पापनाशिनी देवी प्रभास पहुँचकर किस प्रकार वहाँ स्थित हुईं? हे महेश! यदि मैं आपकी प्रिय हूँ तो प्राची का सम्पूर्ण पापनाशक माहात्म्य मुझे बताइए, हे विभो!
श्लोक 3 (skanda.7.36.3)
॥ ईश्वर उवाच ॥ साधु प्रोक्तं त्वया भद्रे प्राची सर्वत्र दुर्लभा ॥ कुरुक्षेत्रे पुष्करे च तस्मात्प्राभासिकेऽधिका
|| īśvara uvāca || sādhu proktaṁ tvayā bhadre prācī sarvatra durlabhā || kurukṣetre puṣkare ca tasmātprābhāsike'dhikā
ईश्वर ने कहा - हे भद्रे! तुमने ठीक कहा है, प्राची सर्वत्र दुर्लभ है; कुरुक्षेत्र और पुष्कर में भी दुर्लभ है, परंतु प्रभास में उससे भी अधिक दुर्लभ है।
श्लोक 4 (skanda.7.36.4)
प्रभासे तु महादेवी प्राचीं पापप्रणाशिनीम् ॥ नापुण्यो वेद देवेशि कर्मनिर्मूलनक्षमाम्
prabhāse tu mahādevī prācīṁ pāpapraṇāśinīm || nāpuṇyo veda deveśi karmanirmūlanakṣamām
हे देवेशि! प्रभास में पापनाशिनी महादेवी प्राची को, जो कर्मों को जड़ से उखाड़ने में समर्थ हैं, कोई अपुण्यात्मा नहीं जान पाता।
श्लोक 5 (skanda.7.36.5)
ये पिबंति नराः पुण्यां प्राचीं देवीं सरस्वतीम् ॥ न ते मनुष्या विज्ञेयाः सत्यंसत्यं वरानने
ye pibaṁti narāḥ puṇyāṁ prācīṁ devīṁ sarasvatīm || na te manuṣyā vijñeyāḥ satyaṁsatyaṁ varānane
जो मनुष्य पुण्यदायिनी प्राची देवी सरस्वती का जल पीते हैं, वे मनुष्य नहीं माने जाने चाहिए - यह सत्य है, हे वरानने! सत्य है।
श्लोक 6 (skanda.7.36.6)
धन्यास्ते मुनयस्ते च पुण्यास्ते च तपस्विनः ॥ ये च सारस्वतं तोयं पिबंत्यहरहः सदा
dhanyāste munayaste ca puṇyāste ca tapasvinaḥ || ye ca sārasvataṁ toyaṁ pibaṁtyaharahaḥ sadā
वे मुनि धन्य हैं, वे तपस्वी पुण्यवान हैं, जो प्रतिदिन सदा सारस्वत जल का पान करते हैं।
श्लोक 7 (skanda.7.36.7)
देवास्ते न मनुष्यास्ते नदीस्तिस्र पिबंति ये ॥ चंद्रभागां च गंगां च तथा देवीं सस्स्वतीम्
devāste na manuṣyāste nadīstisra pibaṁti ye || caṁdrabhāgāṁ ca gaṁgāṁ ca tathā devīṁ sassvatīm
जो तीनों नदियों - चंद्रभागा, गंगा तथा देवी सरस्वती - का जल पीते हैं, वे मनुष्य नहीं, देवता हैं।
श्लोक 8 (skanda.7.36.8)
भुक्त्वा वा यदि वाऽभुक्त्वा दिवा वा यदि वा निशि ॥ न कालनियमस्तत्र यत्र प्राची सरस्वती
bhuktvā vā yadi vā'bhuktvā divā vā yadi vā niśi || na kālaniyamastatra yatra prācī sarasvatī
भोजन करके अथवा बिना किए, दिन में अथवा रात्रि में - जहाँ प्राची सरस्वती हैं, वहाँ काल का कोई नियम नहीं है।
श्लोक 9 (skanda.7.36.9)
प्राचीं सरस्वतीं ये तु पिबंति सततं मृगाः ॥ तेऽपि स्वर्गं गमिष्यंति यज्ञैर्द्विजवरा यथा
prācīṁ sarasvatīṁ ye tu pibaṁti satataṁ mṛgāḥ || te'pi svargaṁ gamiṣyaṁti yajñairdvijavarā yathā
जो पशु भी निरंतर प्राची सरस्वती का जल पीते हैं, वे भी स्वर्ग को जाते हैं, जैसे यज्ञों द्वारा श्रेष्ठ द्विजगण जाते हैं।
श्लोक 10 (skanda.7.36.10)
सर्वकामप्रपूर्त्यर्थं नृणां तत्क्षेत्रमुत्तमम् ॥ चिंतामणिसमा देवी यत्र प्राची सरस्वती
sarvakāmaprapūrtyarthaṁ nṛṇāṁ tatkṣetramuttamam || ciṁtāmaṇisamā devī yatra prācī sarasvatī
वह क्षेत्र मनुष्यों की समस्त कामनाओं की पूर्ति के लिए सर्वोत्तम है, जहाँ प्राची सरस्वती देवी चिंतामणि के समान हैं।
श्लोक 11 (skanda.7.36.11)
यथा कामदुघा गावः सर्वकामफलप्रदाः ॥ तथा स्वर्गापवर्गाभ्यां प्राची देवी सरस्वती
yathā kāmadughā gāvaḥ sarvakāmaphalapradāḥ || tathā svargāpavargābhyāṁ prācī devī sarasvatī
जैसे कामधेनु गौएँ सभी कामनाओं का फल देने वाली हैं, वैसे ही प्राची देवी सरस्वती स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) दोनों प्रदान करती हैं।
श्लोक 12 (skanda.7.36.12)
अष्टाशीतिसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् ॥ यत्र स्थितानि संन्यासं तस्मात्किमधिकं स्मृतम्
aṣṭāśītisahasrāṇi munīnāmūrdhvaretasām || yatra sthitāni saṁnyāsaṁ tasmātkimadhikaṁ smṛtam
जहाँ अठासी हजार ऊर्ध्वरेता मुनि संन्यासपूर्वक स्थित हैं, उससे बढ़कर और क्या स्मरण किया जा सकता है?
श्लोक 13 (skanda.7.36.13)
यत्र मंकणकः सिद्धः प्राचीने नियतात्मवान् ॥ ब्रह्महत्याव्रतं चीर्णं मया यत्र वरानने
yatra maṁkaṇakaḥ siddhaḥ prācīne niyatātmavān || brahmahatyāvrataṁ cīrṇaṁ mayā yatra varānane
हे वरानने! जहाँ संयतात्मा मंकणक ने सिद्धि प्राप्त की, और जहाँ मैंने स्वयं ब्रह्महत्या का व्रत किया, वह प्राची तीर्थ है।
श्लोक 14 (skanda.7.36.14)
वृषतीर्थे महापुण्ये प्राचीकूलसमाश्रिते ॥ निवृत्ते भारते युद्धे तस्मिंस्तीर्थे किरीटिना ॥ प्रायश्चित्तं पुरा चीर्णं विष्णुना प्रेरितात्मना
vṛṣatīrthe mahāpuṇye prācīkūlasamāśrite || nivṛtte bhārate yuddhe tasmiṁstīrthe kirīṭinā || prāyaścittaṁ purā cīrṇaṁ viṣṇunā preritātmanā
प्राचीतट पर स्थित महापुण्यमय वृषतीर्थ में, भारत-युद्ध की समाप्ति के बाद, उस तीर्थ में किरीटी (अर्जुन) ने विष्णु से प्रेरित होकर पूर्वकाल में प्रायश्चित्त किया था।
श्लोक 15 (skanda.7.36.15)
त्रैलोक्ये सर्वतीर्थानां तत्तीर्थं प्रवरं स्मृतम् ॥ पापघ्नं पुण्यजननं प्राणिनां पुण्यकीर्त्तिद
trailokye sarvatīrthānāṁ tattīrthaṁ pravaraṁ smṛtam || pāpaghnaṁ puṇyajananaṁ prāṇināṁ puṇyakīrttida
त्रिलोक के समस्त तीर्थों में वह तीर्थ श्रेष्ठ माना गया है - पापनाशक, पुण्यजनक और प्राणियों को पवित्र कीर्ति प्रदान करने वाला।
श्लोक 16 (skanda.7.36.16)
॥ सूत उवाच ॥ आहैवमुक्ते सा देवी शंकरं लोक शंकरम्॥ प्रायश्चित्तं कथं प्राप्तः पार्थः परपुरंजयः ॥ ज्ञातिक्षयोद्भवं पापं कथं नाशमगात्प्रभो
|| sūta uvāca || āhaivamukte sā devī śaṁkaraṁ loka śaṁkaram|| prāyaścittaṁ kathaṁ prāptaḥ pārthaḥ parapuraṁjayaḥ || jñātikṣayodbhavaṁ pāpaṁ kathaṁ nāśamagātprabho
सूत ने कहा - इस प्रकार कहे जाने पर उस देवी ने लोककल्याणकारी शंकर से पूछा - पर-पुरंजयी पार्थ को प्रायश्चित्त किस प्रकार प्राप्त हुआ? हे प्रभो! अपने ज्ञातिजनों के नाश से उत्पन्न पाप का नाश किस प्रकार हुआ?
श्लोक 17 (skanda.7.36.17)
एवमुक्तः पुनः प्राह विश्वेशो नीललोहितः ॥ प्रायश्चित्तस्य संप्राप्तः कारणं तद्यथा स्थितम्
evamuktaḥ punaḥ prāha viśveśo nīlalohitaḥ || prāyaścittasya saṁprāptaḥ kāraṇaṁ tadyathā sthitam
इस प्रकार पूछे जाने पर नीललोहित विश्वेश (शिव) ने पुनः कहा, जिस प्रकार वह प्रायश्चित्त-प्राप्ति का कारण घटित हुआ था।
श्लोक 18 (skanda.7.36.18)
॥ ईश्वर उवाच ॥ शृणुष्वावहिता भद्रे कथां पातकनाशिनीम् ॥ यां श्रुत्वा मानवो भक्त्या पवित्रात्मा प्रजायते
|| īśvara uvāca || śṛṇuṣvāvahitā bhadre kathāṁ pātakanāśinīm || yāṁ śrutvā mānavo bhaktyā pavitrātmā prajāyate
ईश्वर ने कहा - हे भद्रे! सावधान होकर इस पापनाशक कथा को सुनो, जिसे भक्तिपूर्वक सुनकर मनुष्य पवित्र आत्मा वाला हो जाता है।
श्लोक 19 (skanda.7.36.19)
योऽसौ देवि समाख्यातः किरीटी श्वेतवाहनः॥ स जित्वा कौरवान्सर्वान्संहृत्य हयकुञ्जरान्
yo'sau devi samākhyātaḥ kirīṭī śvetavāhanaḥ|| sa jitvā kauravānsarvānsaṁhṛtya hayakuñjarān
हे देवि! वह जो किरीटी, श्वेतवाहन कहा जाता है, समस्त कौरवों को जीतकर तथा अश्व-गज संग्रह करके -
श्लोक 20 (skanda.7.36.20)
पश्चात्सुयोधनं हत्वा भीमेन प्रययौ गृहान्॥ नारायणेन सहितो नरोऽसौ प्रस्थितो रणात्
paścātsuyodhanaṁ hatvā bhīmena prayayau gṛhān|| nārāyaṇena sahito naro'sau prasthito raṇāt
- और भीम द्वारा सुयोधन का वध होने के बाद, नर अर्जुन नारायण (कृष्ण) के साथ रणभूमि से प्रस्थान कर घर की ओर चले।
श्लोक 21 (skanda.7.36.21)
द्रष्टुं धर्मसुतं दृष्टः प्रणतः प्रांजलिः स्थितः॥ स विज्ञाय तदाऽऽयान्तौ नरनारायणावुभौ
draṣṭuṁ dharmasutaṁ dṛṣṭaḥ praṇataḥ prāṁjaliḥ sthitaḥ|| sa vijñāya tadā''yāntau naranārāyaṇāvubhau
धर्मपुत्र युधिष्ठिर को देखने के लिए आते हुए वे दिखे और प्रणाम करके हाथ जोड़े खड़े हो गए; तब नर और नारायण दोनों को आते हुए जानकर -
श्लोक 22 (skanda.7.36.22)
राजा युधिष्ठिरः प्राह द्वारस्थान्द्वारपालकान् ॥ भवद्भिरेतावायांतौ निषेध्यौ द्वारसंस्थितौ
rājā yudhiṣṭhiraḥ prāha dvārasthāndvārapālakān || bhavadbhiretāvāyāṁtau niṣedhyau dvārasaṁsthitau
राजा युधिष्ठिर ने द्वार पर खड़े द्वारपालों से कहा - तुम लोग इन दोनों आगंतुकों को द्वार पर ही रोक देना, इन्हें भीतर न आने देना।
श्लोक 23 (skanda.7.36.23)
नर नारायणौ क्रूरौ पापपंकानुलेपिनौ ॥ एवमेतदिति प्रोक्तौ तौ तदा द्वारमागतौ
nara nārāyaṇau krūrau pāpapaṁkānulepinau || evametaditi proktau tau tadā dvāramāgatau
नर और नारायण क्रूर हैं, पाप के कीचड़ से लिप्त हैं। "ऐसा ही है" कहकर वे दोनों तब द्वार पर आए।
श्लोक 24 (skanda.7.36.24)
भवन्तौ नेच्छति द्रष्टुं राजा दुर्नयकारिणौ ॥ तत्रस्थः पृष्टवान्भूयः प्रतीहारं नरः स्वयम्
bhavantau necchati draṣṭuṁ rājā durnayakāriṇau || tatrasthaḥ pṛṣṭavānbhūyaḥ pratīhāraṁ naraḥ svayam
राजा दुर्नयकारी आप दोनों को देखना नहीं चाहते। वहीं खड़े नर ने स्वयं द्वारपाल से पुनः पूछा।
श्लोक 25 (skanda.7.36.25)
आवां किं कारणं राजा नेक्षते वशवर्तिनौ ॥ प्रोवाच प्रणतो राजा ततो द्वाःस्थं पुरःस्थितम्
āvāṁ kiṁ kāraṇaṁ rājā nekṣate vaśavartinau || provāca praṇato rājā tato dvāḥsthaṁ puraḥsthitam
हमें वशवर्ती होते हुए भी राजा किस कारण नहीं देखना चाहते? तब झुके हुए राजा ने सामने खड़े द्वारपाल से कहा।
श्लोक 26 (skanda.7.36.26)
नारायणेन सहितं नरं नरकनिर्भयम् ॥ दुर्योधनेन सहिता बांधवास्ते यतो हताः ॥ पितृतुल्याश्च राजानस्तेन वै पापभाजनम्
nārāyaṇena sahitaṁ naraṁ narakanirbhayam || duryodhanena sahitā bāṁdhavāste yato hatāḥ || pitṛtulyāśca rājānastena vai pāpabhājanam
नारायण सहित नर नरक से निर्भय है, परंतु उसके द्वारा दुर्योधन सहित हमारे बंधुजन तथा पितातुल्य राजागण मारे गए हैं, इसलिए वह पापभागी है।
श्लोक 27 (skanda.7.36.27)
एवमुक्ते तु तेनाथ मुखमालोकितं हरेः ॥ तेन प्रोक्तमिदं तथ्यं यत्ते राज्ञा प्रभाषितम्
evamukte tu tenātha mukhamālokitaṁ hareḥ || tena proktamidaṁ tathyaṁ yatte rājñā prabhāṣitam
यह कहे जाने पर उसने हरि के मुख की ओर देखा; उन्होंने कहा कि राजा ने जो कहा है, वह सत्य है।
श्लोक 28 (skanda.7.36.28)
एवमुक्ते नरः प्राह पुनरेव जनार्द्दनम् ॥ कथयस्व कथं पापात्कृष्ण शुद्ध्यामहे वयम्
evamukte naraḥ prāha punareva janārddanam || kathayasva kathaṁ pāpātkṛṣṇa śuddhyāmahe vayam
यह कहे जाने पर नर ने पुनः जनार्दन से कहा - हे कृष्ण! बताइए, हम इस पाप से किस प्रकार शुद्ध हो सकते हैं?
श्लोक 29 (skanda.7.36.29)
तीर्थस्नानेन मे शुद्धिर्यथा स्यात्तद्वद स्फुटम् ॥ तच्च गंगादिकं कृष्ण यथाऽस्याघस्य नाशनम्
tīrthasnānena me śuddhiryathā syāttadvada sphuṭam || tacca gaṁgādikaṁ kṛṣṇa yathā'syāghasya nāśanam
तीर्थस्नान से मेरी शुद्धि किस प्रकार हो सकती है, यह स्पष्ट रूप से बताइए; तथा हे कृष्ण! गंगा आदि तीर्थ इस पाप का नाश करने में समर्थ हैं या नहीं, यह भी बताइए।
श्लोक 30 (skanda.7.36.30)
॥ कृष्ण उवाच ॥ मा गयां गच्छ कौंतेय मा गंगां मा च पुष्करम् ॥ तत्र गच्छ कुरुश्रेष्ठ यत्र प्राची सरस्वती
|| kṛṣṇa uvāca || mā gayāṁ gaccha kauṁteya mā gaṁgāṁ mā ca puṣkaram || tatra gaccha kuruśreṣṭha yatra prācī sarasvatī
कृष्ण ने कहा - हे कौंतेय! गया मत जाओ, न गंगा को, न पुष्कर को। हे कुरुश्रेष्ठ! वहाँ जाओ जहाँ प्राची सरस्वती है।
श्लोक 31 (skanda.7.36.31)
ब्रह्मघ्नाश्च सुरा पाश्च ये चान्ये पापकारिणः ॥ तत्र स्नात्वा विमुच्यंते यत्र प्राची सरस्वती
brahmaghnāśca surā pāśca ye cānye pāpakāriṇaḥ || tatra snātvā vimucyaṁte yatra prācī sarasvatī
ब्रह्महत्या करने वाले, मदिरापान करने वाले तथा अन्य पापी जन भी वहाँ स्नान करके मुक्त हो जाते हैं, जहाँ प्राची सरस्वती है।
श्लोक 32 (skanda.7.36.32)
नारायणेन प्रोक्तोऽसौ नरस्तद्वचनाद्द्रुतम् ॥ सहितस्तेन संप्राप्तः प्राचीनं तीर्थमुत्तमम्
nārāyaṇena prokto'sau narastadvacanāddrutam || sahitastena saṁprāptaḥ prācīnaṁ tīrthamuttamam
नारायण द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर नर उनके वचन से शीघ्र ही उनके साथ उस उत्तम प्राचीन तीर्थ में पहुँचे।
श्लोक 33 (skanda.7.36.33)
त्रिरात्रोपोषितः स्नातस्त्रिकालं नियतात्मवान् ॥ तेन तस्माद्विनिर्मुक्तः पातकात्पूर्वसंचितात्
trirātropoṣitaḥ snātastrikālaṁ niyatātmavān || tena tasmādvinirmuktaḥ pātakātpūrvasaṁcitāt
तीन रात्रि उपवास कर, संयमपूर्वक तीनों समय स्नान करके, वे उस पूर्वसंचित पाप से मुक्त हो गए।
श्लोक 34 (skanda.7.36.34)
विज्ञाय शुद्धमेनं तु राजा धर्मसुतो द्रुतम् ॥ भ्रातृभिः सहितः प्राप्तस्तं द्रष्टुं नरपुंगवम्
vijñāya śuddhamenaṁ tu rājā dharmasuto drutam || bhrātṛbhiḥ sahitaḥ prāptastaṁ draṣṭuṁ narapuṁgavam
उसे शुद्ध हुआ जानकर धर्मसुत राजा युधिष्ठिर भाइयों सहित शीघ्र उस नरश्रेष्ठ को देखने के लिए आए।
श्लोक 35 (skanda.7.36.35)
ततस्तं प्रणतं दृष्ट्वा धर्मपुत्रः पुरःस्थितम् ॥ आलिलिंग प्रहृष्टात्मा पृष्टवांश्चाप्यनामयम्
tatastaṁ praṇataṁ dṛṣṭvā dharmaputraḥ puraḥsthitam || āliliṁga prahṛṣṭātmā pṛṣṭavāṁścāpyanāmayam
तब सामने खड़े हुए प्रणत उस पुरुष को देखकर धर्मपुत्र ने हर्षित मन से उसका आलिंगन किया और उसकी कुशलता भी पूछी।
श्लोक 36 (skanda.7.36.36)
भीमादिभिर्भ्रातृभिश्च तदा गुरुगणैर्वृतः ॥ आलिंगितः प्रहृष्टैस्तु नरो गुणगणैर्वृतः
bhīmādibhirbhrātṛbhiśca tadā gurugaṇairvṛtaḥ || āliṁgitaḥ prahṛṣṭaistu naro guṇagaṇairvṛtaḥ
तब भीम आदि भाइयों तथा गुरुजनों से घिरे हुए, गुणसमूह से युक्त नर का हर्षित जनों ने आलिंगन किया।
श्लोक 37 (skanda.7.36.37)
एतद्धि तन्महातीर्थं प्राचीनेति च शब्दितम् ॥ स्नानक्रमेण मर्त्त्यानामन्येषामपि पावकम्
etaddhi tanmahātīrthaṁ prācīneti ca śabditam || snānakrameṇa marttyānāmanyeṣāmapi pāvakam
यह वही महातीर्थ है, जो प्राचीन कहलाता है; इसमें स्नान-विधि से अन्य मनुष्य भी पवित्र हो जाते हैं।
श्लोक 38 (skanda.7.36.38)
त्रिरात्रोपोषितः स्नातस्तीर्थेऽस्मिन्ब्रह्महाऽपि यः ॥ विमुक्तः पातकात्तस्मान्मोदते दिवि रुद्रवत्
trirātropoṣitaḥ snātastīrthe'sminbrahmahā'pi yaḥ || vimuktaḥ pātakāttasmānmodate divi rudravat
तीन रात्रि उपवासकर जो इस तीर्थ में स्नान करता है, वह ब्रह्महत्यारा भी उस पाप से मुक्त होकर रुद्र के समान स्वर्ग में आनंदित होता है।
श्लोक 39 (skanda.7.36.39)
प्राचीने देव्यहं नित्यं वसामि सहितस्त्वया ॥ प्रभासे तु महाक्षेत्रे विशेषात्तत्र भामिनि ॥
prācīne devyahaṁ nityaṁ vasāmi sahitastvayā || prabhāse tu mahākṣetre viśeṣāttatra bhāmini ||
हे देवि! मैं प्राची में तुम्हारे साथ सदा निवास करता हूँ; हे भामिनि! विशेषकर प्रभास के उस महाक्षेत्र में।
श्लोक 40 (skanda.7.36.40)
सरस्वत्युत्तरे तीरे यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् ॥ प्राचीने तु वरारोहे न चेहागच्छते पुनः
sarasvatyuttare tīre yastyajedātmanastanum || prācīne tu varārohe na cehāgacchate punaḥ
हे वरारोहे! जो सरस्वती के उत्तरी तट पर, प्राची में अपने शरीर का त्याग करता है, वह पुनः इस संसार में नहीं लौटता।
श्लोक 41 (skanda.7.36.41)
आप्लुतो वाजिमेधस्य फलं प्राप्स्यति पुष्कलम् ॥ नियमैश्चोपवासैश्च शोषयेद्देहमात्मनः
āpluto vājimedhasya phalaṁ prāpsyati puṣkalam || niyamaiścopavāsaiśca śoṣayeddehamātmanaḥ
वहाँ स्नान करने वाला अश्वमेध यज्ञ का प्रचुर फल प्राप्त करता है। नियमों और उपवासों से अपने शरीर को शुष्क कर देना चाहिए।
श्लोक 42 (skanda.7.36.42)
जलाहारा वायुभक्षाः पर्णाहाराश्च तापसाः ॥ यथा स्थंडिलगा नित्यं ये चान्यनियमाः पृथक्
jalāhārā vāyubhakṣāḥ parṇāhārāśca tāpasāḥ || yathā sthaṁḍilagā nityaṁ ye cānyaniyamāḥ pṛthak
जल पर जीने वाले, वायुभक्षी, पत्तों पर आहार करने वाले तपस्वी - जो नित्य भूमि पर सोते हैं तथा अन्य अलग-अलग नियमों का पालन करते हैं -
श्लोक 43 (skanda.7.36.43)
एवं मंक्याश्रमे येषां वसतां मृत्युरागतः ॥ न ते मनुष्या देवास्ते सत्यमेतद्ब्रवीमि ते
evaṁ maṁkyāśrame yeṣāṁ vasatāṁ mṛtyurāgataḥ || na te manuṣyā devāste satyametadbravīmi te
- इस प्रकार जिन लोगों की मंकि (मंकणक) के आश्रम में रहते हुए मृत्यु होती है, वे मनुष्य नहीं, देवता हैं - यह सत्य मैं तुमसे कहता हूँ।
श्लोक 44 (skanda.7.36.44)
अस्मिंस्तीर्थे तु यो दद्यात्त्रुटिमात्रं तु कांचनम्॥ श्रद्धया द्विजमुख्याय मेरुतुल्यं फलं लभेत्
asmiṁstīrthe tu yo dadyāttruṭimātraṁ tu kāṁcanam|| śraddhayā dvijamukhyāya merutulyaṁ phalaṁ labhet
इस तीर्थ में जो कोई श्रद्धापूर्वक एक कण मात्र भी सोना किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को देता है, वह मेरु पर्वत के समान फल प्राप्त करता है।
श्लोक 45 (skanda.7.36.45)
अस्मिंस्तीर्थे तु ये श्राद्धं करिष्यंति च मानवाः ॥ एकविंशत्कुलोपेताः स्वर्गं यास्यंति ते ध्रुवम्
asmiṁstīrthe tu ye śrāddhaṁ kariṣyaṁti ca mānavāḥ || ekaviṁśatkulopetāḥ svargaṁ yāsyaṁti te dhruvam
जो मनुष्य इस तीर्थ में श्राद्ध करते हैं, वे अपने इक्कीस पीढ़ियों के कुल सहित निश्चय ही स्वर्ग को जाते हैं।
श्लोक 46 (skanda.7.36.46)
पितॄणां वल्लभे तीर्थे पिण्डेनैकेन तर्प्पिताः ॥ ब्रह्मलोकं गमिष्यंति गयाश्राद्धकृतो यथा ॥
pitṝṇāṁ vallabhe tīrthe piṇḍenaikena tarppitāḥ || brahmalokaṁ gamiṣyaṁti gayāśrāddhakṛto yathā ||
पितरों के प्रिय इस तीर्थ में एक ही पिंड से तृप्त होकर वे गया-श्राद्धकर्ता के समान ब्रह्मलोक को जाते हैं।
श्लोक 47 (skanda.7.36.47)
कृष्णपक्षे चतुर्द्दश्यां स्नानं च विहितं सदा ॥ पिण्याकैंगुदकेनापि पिंडं तत्र ददाति यः ॥ पितॄणामक्षया तृप्तिः पितृलोकं स गच्छति
kṛṣṇapakṣe caturddaśyāṁ snānaṁ ca vihitaṁ sadā || piṇyākaiṁgudakenāpi piṁḍaṁ tatra dadāti yaḥ || pitṝṇāmakṣayā tṛptiḥ pitṛlokaṁ sa gacchati
कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को सदा स्नान करना विहित है; जो वहाँ पिण्याक और इंगुदी के आटे से भी पिंडदान करता है, उससे पितरों को अक्षय तृप्ति मिलती है और वह पितृलोक को जाता है।
श्लोक 48 (skanda.7.36.48)
भूयश्चान्नं प्रयच्छंति मोक्षमार्गं व्रजंति ते
bhūyaścānnaṁ prayacchaṁti mokṣamārgaṁ vrajaṁti te
और जो वहाँ अन्नदान करते हैं, वे मोक्षमार्ग पर अग्रसर होते हैं।
श्लोक 49 (skanda.7.36.49)
दधि दद्याद्योऽपि तत्र ब्राह्मणाय मनोरमम् ॥ सोऽग्निलोकं समासाद्य भुंक्ते भोगान्सुशोभनान्
dadhi dadyādyo'pi tatra brāhmaṇāya manoramam || so'gnilokaṁ samāsādya bhuṁkte bhogānsuśobhanān
जो वहाँ किसी ब्राह्मण को मनोरम दही भी देता है, वह अग्निलोक को प्राप्त कर सुंदर भोगों का उपभोग करता है।
श्लोक 50 (skanda.7.36.50)
ऊर्णां प्रावरणं योऽपि भक्त्या दद्याद्द्विजोत्तमे ॥ सोऽपि याति परां सिद्धिं मर्त्यैरन्यैः सुदुर्ल्लभाम्
ūrṇāṁ prāvaraṇaṁ yo'pi bhaktyā dadyāddvijottame || so'pi yāti parāṁ siddhiṁ martyairanyaiḥ sudurllabhām
जो भी वहाँ भक्तिपूर्वक किसी श्रेष्ठ द्विज को ऊनी वस्त्र देता है, वह भी अन्य मनुष्यों के लिए अत्यंत दुर्लभ परम सिद्धि को प्राप्त करता है।
श्लोक 51 (skanda.7.36.51)
ये चात्र मलनाशाय विशेयुर्मानवा जलम्॥ गोप्रदानसमं तेषां सुखेन फलमादिशेत्
ye cātra malanāśāya viśeyurmānavā jalam|| gopradānasamaṁ teṣāṁ sukhena phalamādiśet
जो मनुष्य यहाँ मल के नाश हेतु जल में प्रवेश करते हैं, उन्हें सहज ही गोदान के समान फल प्राप्त होने की घोषणा करनी चाहिए।
श्लोक 52 (skanda.7.36.52)
भावेन यो नरस्तत्र कश्चित्स्नानं समाचरेत् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते
bhāvena yo narastatra kaścitsnānaṁ samācaret || sarvapāpavinirmukto brahmaloke mahīyate
जो कोई मनुष्य वहाँ भावपूर्वक स्नान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है।
श्लोक 53 (skanda.7.36.53)
तर्पणात्पिंडदानाच्च नरकेष्वपि संस्थिताः ॥ स्वर्गं प्रयांति पितरः सुपुत्रेण हि तारिताः
tarpaṇātpiṁḍadānācca narakeṣvapi saṁsthitāḥ || svargaṁ prayāṁti pitaraḥ suputreṇa hi tāritāḥ
तर्पण और पिंडदान से नरकों में स्थित पितर भी सुपुत्र द्वारा तारे जाकर स्वर्ग को जाते हैं।
श्लोक 54 (skanda.7.36.54)
प्राचीं सरस्वतीं प्राप्य याति तीर्थं हिमालयम्॥ स करस्थं समुत्सृज्य कूर्परेण समालिहेत्
prācīṁ sarasvatīṁ prāpya yāti tīrthaṁ himālayam|| sa karasthaṁ samutsṛjya kūrpareṇa samālihet
प्राची सरस्वती को प्राप्त कर मनुष्य हिमालय तीर्थ को जाता है; हाथ में जो हो उसे त्यागकर कोहनी से स्पर्श करे।
श्लोक 55 (skanda.7.36.55)
यंयं काममभिध्याय तस्मिन्प्राणान्परित्यजेत् ॥ तंतं सकलमाप्नोति तीर्थमाहात्म्ययोगतः
yaṁyaṁ kāmamabhidhyāya tasminprāṇānparityajet || taṁtaṁ sakalamāpnoti tīrthamāhātmyayogataḥ
जिस-जिस कामना का ध्यान करते हुए मनुष्य वहाँ प्राण त्यागता है, वह तीर्थ के माहात्म्य के प्रभाव से उस-उस कामना को पूर्णतः प्राप्त करता है।
श्लोक 56 (skanda.7.36.56)
अन्यद्देवि पुरा गीतं गांगेयेन युधिष्ठिरे ॥ सत्यमेव हि गंगायां वयं जाता युधिष्ठिर
anyaddevi purā gītaṁ gāṁgeyena yudhiṣṭhire || satyameva hi gaṁgāyāṁ vayaṁ jātā yudhiṣṭhira
हे देवि! पूर्वकाल में गांगेय (भीष्म) ने युधिष्ठिर से एक और बात कही थी - हे युधिष्ठिर! यद्यपि हम गंगा से उत्पन्न हुए हैं -
श्लोक 57 (skanda.7.36.57)
याः काश्चित्सरितो लोके तासां पुण्या सरस्वती
yāḥ kāścitsarito loke tāsāṁ puṇyā sarasvatī
- संसार में जो भी नदियाँ हैं, उन सबमें सरस्वती सबसे पुण्यशालिनी है।
श्लोक 58 (skanda.7.36.58)
सरस्वती सर्वनदीषु पुण्या सरस्वती लोकसुखावहा सदा ॥ सरस्वतीं प्राप्य सुदुःखिता नराः सदा न शोचन्ति परत्र चेह च
sarasvatī sarvanadīṣu puṇyā sarasvatī lokasukhāvahā sadā || sarasvatīṁ prāpya suduḥkhitā narāḥ sadā na śocanti paratra ceha ca
सरस्वती सभी नदियों में पुण्यमयी है, सरस्वती सदा लोक को सुख देने वाली है। सरस्वती को प्राप्त कर अत्यंत दुःखी मनुष्य भी फिर कभी परलोक में या इहलोक में शोक नहीं करते।