प्रभास खण्ड · अध्याय 37
इन्दुमती-कंकण-प्रभाव कथा वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.37.1)
॥ देव्युवाच ॥ किमर्थं कंकणं देव क्षिप्यते लवणांभसि ॥ तस्या पुण्यं न पूर्वोक्तं यथावद्वक्तुमर्हसि
|| devyuvāca || kimarthaṁ kaṁkaṇaṁ deva kṣipyate lavaṇāṁbhasi || tasyā puṇyaṁ na pūrvoktaṁ yathāvadvaktumarhasi
देवी ने कहा - हे देव! लवण-सागर में कंकण किसलिए डाला जाता है? इसका पुण्य पूर्व में नहीं बताया गया, आप यथावत् कहने योग्य हैं।
श्लोक 2 (skanda.7.37.2)
के मंत्राः किं विधानं तत्कस्मिन्काले महत्फलम् ॥ किं पुराभूच्च तद्वृत्तं भगवन्कंकणाश्रितम्
ke maṁtrāḥ kiṁ vidhānaṁ tatkasminkāle mahatphalam || kiṁ purābhūcca tadvṛttaṁ bhagavankaṁkaṇāśritam
कौन से मंत्र हैं, क्या विधि है, किस समय इसका महाफल मिलता है? और हे भगवन्! कंकण से संबंधित वह पूर्ववृत्तांत क्या था?
श्लोक 3 (skanda.7.37.3)
॥ ईश्वर उवाच ॥ आसीत्पुरा महीपालो बृहद्रथ इति श्रुतः ॥ तस्य भार्याऽभवत्साध्वी नाम्ना चेंदुमती प्रिया
|| īśvara uvāca || āsītpurā mahīpālo bṛhadratha iti śrutaḥ || tasya bhāryā'bhavatsādhvī nāmnā ceṁdumatī priyā
ईश्वर ने कहा - पूर्वकाल में बृहद्रथ नामक एक राजा था; उसकी पत्नी साध्वी और प्रिय इन्दुमती नामक थी।
श्लोक 4 (skanda.7.37.4)
न देवी न च गन्धर्वी नासुरी न च किंनरी ॥ तादृग्रूपा महादेवि यादृशी सा सुमध्यमा
na devī na ca gandharvī nāsurī na ca kiṁnarī || tādṛgrūpā mahādevi yādṛśī sā sumadhyamā
हे महादेवि! न देवी, न गंधर्वी, न असुरी, न किन्नरी - किसी की भी वैसी रूप-सम्पदा नहीं थी जैसी उस सुमध्यमा की थी।
श्लोक 5 (skanda.7.37.5)
शीलरूपगुणोपेता नित्यं सा तु पतिवता ॥ सर्वयोषिद्गुणैर्युक्ता यथा साध्वी ह्यरुन्धती
śīlarūpaguṇopetā nityaṁ sā tu pativatā || sarvayoṣidguṇairyuktā yathā sādhvī hyarundhatī
शील, रूप और गुणों से युक्त वह सदा पतिव्रता थी, अरुंधती के समान समस्त स्त्री-गुणों से सम्पन्न थी।
श्लोक 6 (skanda.7.37.6)
प्रधान हस्रस्य सौभाग्यमदगर्विता ॥ न विना स तया रेमे मुहूर्त्तमपि पार्थिवः
pradhāna hasrasya saubhāgyamadagarvitā || na vinā sa tayā reme muhūrttamapi pārthivaḥ
वह राजा की अनेक रानियों में प्रधान थी, अपने सौभाग्य के मद से गर्विता थी; राजा उसके बिना एक क्षण भी सुख का अनुभव नहीं करता था।
श्लोक 7 (skanda.7.37.7)
एकदा तस्यराजर्षेरर्द्धासनगता सती॥ यावत्तिष्ठति राजेंद्रमृषिस्तावदुपागतः॥ कण्वो नाम महातेजास्तपस्वी वेदपारगः
ekadā tasyarājarṣerarddhāsanagatā satī|| yāvattiṣṭhati rājeṁdramṛṣistāvadupāgataḥ|| kaṇvo nāma mahātejāstapasvī vedapāragaḥ
एक बार वह राजर्षि की पत्नी उनके आसन के आधे भाग में बैठी हुई थी; जब वह राजेंद्र के साथ बैठी थी, तभी महातेजस्वी, तपस्वी, वेदपारंगत कण्व नामक मुनि वहाँ पधारे।
श्लोक 8 (skanda.7.37.8)
तमागतमथो दृष्ट्वा सहसोत्थाय पार्थिवः॥ पूजां कृत्वा यथान्यायं दत्त्वा चार्घ्यमनुत्तमम्
tamāgatamatho dṛṣṭvā sahasotthāya pārthivaḥ|| pūjāṁ kṛtvā yathānyāyaṁ dattvā cārghyamanuttamam
उन्हें आया हुआ देखकर राजा तुरंत उठ खड़ा हुआ और विधिपूर्वक पूजा कर उत्तम अर्घ्य प्रदान किया।
श्लोक 9 (skanda.7.37.9)
सुखासीनं ततो मत्वा विश्रांतं मुनिपुंगवम्॥ आपृच्छत्कुशलं राजा स सर्वं चान्वमोदयत्
sukhāsīnaṁ tato matvā viśrāṁtaṁ munipuṁgavam|| āpṛcchatkuśalaṁ rājā sa sarvaṁ cānvamodayat
तब उस मुनिश्रेष्ठ को सुखपूर्वक बैठा और विश्राम करते हुए जानकर राजा ने उनकी कुशलता पूछी, और मुनि ने सब कुछ स्वीकार किया।
श्लोक 10 (skanda.7.37.10)
ततो धर्मकथां चक्रे स ऋषिर्नृपसन्निधौ
tato dharmakathāṁ cakre sa ṛṣirnṛpasannidhau
तब उस ऋषि ने राजा के समीप धर्मकथा कही।
श्लोक 11 (skanda.7.37.11)
ततः कथावसाने सा भार्या तस्य महीपतेः ॥ अब्रवीदमृतं वाक्यं कृतांजलिपुटा सती
tataḥ kathāvasāne sā bhāryā tasya mahīpateḥ || abravīdamṛtaṁ vākyaṁ kṛtāṁjalipuṭā satī
तब कथा की समाप्ति पर उस राजा की भार्या, साध्वी, हाथ जोड़कर यह अमृततुल्य वचन बोली।
श्लोक 12 (skanda.7.37.12)
॥ इन्दुमत्युवाच ॥ त्वं वेत्सि भगवन्सर्वमतीतानागतं विभो ॥ पृच्छे त्वां कौतुकाविष्टा तस्मात्त्वं क्षंतुमर्हसि ॥
|| indumatyuvāca || tvaṁ vetsi bhagavansarvamatītānāgataṁ vibho || pṛcche tvāṁ kautukāviṣṭā tasmāttvaṁ kṣaṁtumarhasi ||
इन्दुमती ने कहा - हे भगवन्! हे विभो! आप भूत और भविष्य सब कुछ जानते हैं; कौतूहलवश मैं आपसे पूछती हूँ, अतः आप क्षमा करने योग्य हैं।
श्लोक 13 (skanda.7.37.13)
अन्यदेहोद्भवं कर्म मम सर्वं प्रकीर्त्तय ॥ ईदृशं मम सौभाग्यं पतिर्देवसुतोपमः
anyadehodbhavaṁ karma mama sarvaṁ prakīrttaya || īdṛśaṁ mama saubhāgyaṁ patirdevasutopamaḥ
मेरे पूर्व शरीर में हुए कर्मों को आप मुझे सब बताइए; मेरा ऐसा सौभाग्य क्यों है और मेरे पति देवपुत्र के समान क्यों हैं?
श्लोक 14 (skanda.7.37.14)
सौभाग्यं पतिदेवत्वं शीलं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ किं प्रभावो व्रतस्यैष उताहोपोषितस्य वा
saubhāgyaṁ patidevatvaṁ śīlaṁ trailokyaviśrutam|| kiṁ prabhāvo vratasyaiṣa utāhopoṣitasya vā
यह सौभाग्य, पति को देवता मानना, त्रिलोक में विख्यात शील - क्या यह किसी व्रत का प्रभाव है, या किसी उपवास का?
श्लोक 15 (skanda.7.37.15)
दानस्य वा मुनिश्रेष्ठ यन्मे सौभाग्यमुत्तमम्॥ वशो राजा महाबाहुर्मम वाक्यानुगः सदा ॥
dānasya vā muniśreṣṭha yanme saubhāgyamuttamam|| vaśo rājā mahābāhurmama vākyānugaḥ sadā ||
या किसी दान का प्रभाव है, हे मुनिश्रेष्ठ, जिससे मेरा यह उत्तम सौभाग्य है और महाबाहु राजा सदा मेरे वश में रहकर मेरी बात मानते हैं?
श्लोक 16 (skanda.7.37.16)
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व परं कौतूहलं हि मे
etanme sarvamācakṣva paraṁ kautūhalaṁ hi me
यह सब मुझे बताइए, क्योंकि मुझे इसकी अत्यंत उत्सुकता है।
श्लोक 17 (skanda.7.37.17)
॥ सूत उवाच ॥ तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा ध्यात्वा च सुचिरं मुनिः ॥ अब्रवीत्प्रहसन्वाक्यं कण्वो वेदविदां वरः
|| sūta uvāca || tasyāstadvacanaṁ śrutvā dhyātvā ca suciraṁ muniḥ || abravītprahasanvākyaṁ kaṇvo vedavidāṁ varaḥ
सूत ने कहा - उसका वह वचन सुनकर तथा चिरकाल तक ध्यान करके, वेदविदों में श्रेष्ठ कण्व मुनि ने मुस्कुराते हुए यह वचन कहा।
श्लोक 18 (skanda.7.37.18)
॥ कण्व उवाच ॥ शृणु राज्ञि प्रवक्ष्यामि अन्यदेहोद्भवं तव ॥ न रोषश्च त्वया कार्यो लज्जा वापि सुमध्यमे
|| kaṇva uvāca || śṛṇu rājñi pravakṣyāmi anyadehodbhavaṁ tava || na roṣaśca tvayā kāryo lajjā vāpi sumadhyame
कण्व ने कहा - हे रानी! सुनो, मैं तुम्हारे पूर्व शरीर की बात बताता हूँ; हे सुमध्यमे! तुम्हें न क्रोध करना चाहिए, न लज्जा।
श्लोक 19 (skanda.7.37.19)
त्वमासीदन्यदेहे तु आभीरी पंचभर्तृका ॥ सौराष्ट्रविषये हीना देवं सोमेश्वरं गता
tvamāsīdanyadehe tu ābhīrī paṁcabhartṛkā || saurāṣṭraviṣaye hīnā devaṁ someśvaraṁ gatā
तुम पूर्व शरीर में सौराष्ट्र देश की एक नीच कुल की पंचपतिवाली आभीर स्त्री थी, जो सोमेश्वर देव के दर्शन को गई थी।
श्लोक 20 (skanda.7.37.20)
ततः स्नातुं प्रविष्टा च सागरे लवणांभसि ॥ हता कल्लोलमालाभिर्विह्वलत्वमुपागता
tataḥ snātuṁ praviṣṭā ca sāgare lavaṇāṁbhasi || hatā kallolamālābhirvihvalatvamupāgatā
तब तुम स्नान के लिए लवण-सागर में प्रविष्ट हुई; लहरों की मालाओं से आहत होकर तुम व्याकुल हो गई।
श्लोक 21 (skanda.7.37.21)
तव हस्ताच्च्युतं तत्र हैमं कंकणमेव च ॥ नष्टं समुद्रसलिले पश्चात्तापस्तु ते स्थितः
tava hastāccyutaṁ tatra haimaṁ kaṁkaṇameva ca || naṣṭaṁ samudrasalile paścāttāpastu te sthitaḥ
वहाँ तुम्हारे हाथ से एक सुवर्ण कंकण छूट गया और समुद्र के जल में खो गया; उसके बाद तुम्हें पश्चाताप हुआ था।
श्लोक 22 (skanda.7.37.22)
अथ कालेन महता पंचत्वं त्वमुपागता ॥ दशार्णाधिपतेर्गेहे ततो जातासि सुन्दरि
atha kālena mahatā paṁcatvaṁ tvamupāgatā || daśārṇādhipatergehe tato jātāsi sundari
फिर बहुत काल बीतने पर तुम्हारी मृत्यु हुई; हे सुन्दरी! तत्पश्चात् तुम दशार्ण के राजा के घर में उत्पन्न हुई।
श्लोक 23 (skanda.7.37.23)
बृहद्रथेन चोढासि कंकणस्य प्रभा वतः॥ न व्रतं न तपो दानं त्वया चीर्णं पुरा शुभे
bṛhadrathena coḍhāsi kaṁkaṇasya prabhā vataḥ|| na vrataṁ na tapo dānaṁ tvayā cīrṇaṁ purā śubhe
उसी कंकण के प्रभाव से तुम्हारा विवाह बृहद्रथ से हुआ; हे शुभे! तुमने पूर्वकाल में न कोई व्रत किया था, न तप, न दान।
श्लोक 24 (skanda.7.37.24)
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ तच्छ्रुत्वा सा विशालाक्षी त्रपयाऽधो मुखी तथा ॥ आसीत्तूष्णीं तदा देवी श्रुत्वा वाक्यं च तादृशम्
etatte sarvamākhyātaṁ yanmāṁ tvaṁ paripṛcchasi || tacchrutvā sā viśālākṣī trapayā'dho mukhī tathā || āsīttūṣṇīṁ tadā devī śrutvā vākyaṁ ca tādṛśam
यह सब वह है जो तुमने मुझसे पूछा। यह सुनकर वह विशालाक्षी रानी लज्जा से मुख नीचा करके ऐसे वचन सुनकर मौन हो गई।
श्लोक 25 (skanda.7.37.25)
एवं निवेद्य स मुनी राजपत्नीं वरानने ॥ जगाम भवनं स्वं च आमंत्र्य वसुधाधिपम्
evaṁ nivedya sa munī rājapatnīṁ varānane || jagāma bhavanaṁ svaṁ ca āmaṁtrya vasudhādhipam
हे वरानने! इस प्रकार राजपत्नी को बताकर वह मुनि राजा से विदा लेकर अपने आश्रम को चले गए।
श्लोक 26 (skanda.7.37.26)
ज्ञात्वा फलं कंकणस्य मुनेस्तस्य प्रभावतः ॥ गत्वा सोमेश्वरं देवं स्नात्वा च लवणांभसि
jñātvā phalaṁ kaṁkaṇasya munestasya prabhāvataḥ || gatvā someśvaraṁ devaṁ snātvā ca lavaṇāṁbhasi
उस मुनि के प्रभाव से कंकण का फल जानकर, वह सोमेश्वर देव के पास जाकर, लवण-सागर में स्नान करके -
श्लोक 27 (skanda.7.37.27)
प्राक्षिपत्कंकणं तत्र प्रतिवर्षं महाप्रभे ॥ ततो देवत्वमापन्ना प्रभावात्तस्य भामिनि
prākṣipatkaṁkaṇaṁ tatra prativarṣaṁ mahāprabhe || tato devatvamāpannā prabhāvāttasya bhāmini
- वहाँ हर वर्ष कंकण अर्पित करती रही, हे महाप्रभे! और उसके प्रभाव से, हे भामिनि! वह देवत्व को प्राप्त हुई।
श्लोक 28 (skanda.7.37.28)
ईश्वर उवाच ॥ एष प्रभावः सुमहान्कंकणस्य प्रकीर्तितः ॥ सर्वकामप्रदो देवि सर्वपापप्रणाशनः
īśvara uvāca || eṣa prabhāvaḥ sumahānkaṁkaṇasya prakīrtitaḥ || sarvakāmaprado devi sarvapāpapraṇāśanaḥ
ईश्वर ने कहा - हे देवि! यह कंकण का महान प्रभाव कहा गया है, जो सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला तथा सभी पापों का नाश करने वाला है।