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प्रभास खण्ड · अध्याय 38

कपर्दी (विनायक) माहात्म्य वर्णन

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39

श्लोक 1 (skanda.7.38.1)

॥ देव्युवाच ॥ यदेतद्भवता प्रोक्तं पश्येत्पूर्वं कपर्द्दिनम् ॥ भगवन्संशयं ह्येनं यथावद्वक्तुमर्हसि

|| devyuvāca || yadetadbhavatā proktaṁ paśyetpūrvaṁ kaparddinam || bhagavansaṁśayaṁ hyenaṁ yathāvadvaktumarhasi

देवी ने कहा - हे भगवन्! आपने जो कहा कि पहले कपर्दी का दर्शन करना चाहिए, इस संशय को आप यथावत् दूर करने योग्य हैं।

श्लोक 2 (skanda.7.38.2)

स भृत्यः किल देवेश तव शम्भो महाप्रभः ॥ प्रभोरनन्तरं भृत्य एष धर्मः सनातनः

sa bhṛtyaḥ kila deveśa tava śambho mahāprabhaḥ || prabhoranantaraṁ bhṛtya eṣa dharmaḥ sanātanaḥ

हे देवेश! हे महाप्रभु शम्भो! वह तो आपका सेवक है; यह सनातन धर्म है कि स्वामी के बाद सेवक का स्थान होता है।

श्लोक 3 (skanda.7.38.3)

ईश्वर उवाच ॥ शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यथा पूज्यतमो हि सः ॥ कपर्द्दी सर्वदेवानामाद्यो विघ्नेश्वरः प्रभुः

īśvara uvāca || śṛṇu devi pravakṣyāmi yathā pūjyatamo hi saḥ || kaparddī sarvadevānāmādyo vighneśvaraḥ prabhuḥ

ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनो, मैं बताता हूँ कि वह किस प्रकार सर्वाधिक पूज्य है; कपर्दी समस्त देवताओं में आद्य, विघ्नेश्वर प्रभु हैं।

श्लोक 4 (skanda.7.38.4)

योऽसावतींद्रियग्राह्यः प्रभासक्षेत्रसंस्थितः ॥ सोमेश्वरो महादेवि लिंगरूपी सदाशिवः

yo'sāvatīṁdriyagrāhyaḥ prabhāsakṣetrasaṁsthitaḥ || someśvaro mahādevi liṁgarūpī sadāśivaḥ

हे महादेवि! जो इन्द्रियों से परे ग्राह्य है, प्रभासक्षेत्र में स्थित है, वह सोमेश्वर लिंगरूपी सदाशिव हैं।

श्लोक 5 (skanda.7.38.5)

तस्य वामे स्थितो विष्णुर्वराह इति यः स्मृतः ॥ तस्य दक्षिणभागे तु स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः ॥ कपर्द्दिरूपमास्थाय सावित्र्याः कोपकारणात्

tasya vāme sthito viṣṇurvarāha iti yaḥ smṛtaḥ || tasya dakṣiṇabhāge tu sthito brahmā prajāpatiḥ || kaparddirūpamāsthāya sāvitryāḥ kopakāraṇāt

उनके बायें भाग में विष्णु स्थित हैं, जिन्हें वराह कहा जाता है; उनके दाहिने भाग में प्रजापति ब्रह्मा स्थित हैं, जो सावित्री के कोप के कारण कपर्दी का रूप धारण किए हुए हैं।

श्लोक 6 (skanda.7.38.6)

कृते हेरंबनामा तु त्रेतायां विघ्नमर्द्दनः ॥ लंबोदरो द्वापरे तु कपर्द्दी तु कलौ स्मृतः

kṛte heraṁbanāmā tu tretāyāṁ vighnamarddanaḥ || laṁbodaro dvāpare tu kaparddī tu kalau smṛtaḥ

कृतयुग में हेरंब नाम से, त्रेतायुग में विघ्नमर्दन नाम से, द्वापर में लंबोदर नाम से, और कलियुग में कपर्दी नाम से वे स्मरण किए जाते हैं।

श्लोक 7 (skanda.7.38.7)

एवं युगेयुगे तस्य अवतारः पृथक्पृथक् ॥ यथाकार्यानुरूपेण जायते च पुनःपुनः

evaṁ yugeyuge tasya avatāraḥ pṛthakpṛthak || yathākāryānurūpeṇa jāyate ca punaḥpunaḥ

इस प्रकार युग-युग में उनके अवतार भिन्न-भिन्न हैं, जो कार्य के अनुरूप बार-बार उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 8 (skanda.7.38.8)

अष्टाविंशतिमे तत्र देवि प्राप्ते चतुर्युगे ॥ कारणात्मा यथोत्पन्नः कपर्द्दी तत्र मे शृणु

aṣṭāviṁśatime tatra devi prāpte caturyuge || kāraṇātmā yathotpannaḥ kaparddī tatra me śṛṇu

हे देवि! जब वहाँ अट्ठाईसवाँ चतुर्युग आता है, तब कपर्दी किस प्रकार कारणस्वरूप उत्पन्न हुए, वह मुझसे सुनो।

श्लोक 9 (skanda.7.38.9)

पुरा द्वापरसंधौ तु संप्राप्ते च कलौ युगे ॥ स्त्रियो म्लेच्छाश्च शूद्राश्च ये चान्ये पापकारिणः ॥ प्रयांति स्वर्गमेवाशु दृष्ट्वा सोमेश्वरं प्रभुम्

purā dvāparasaṁdhau tu saṁprāpte ca kalau yuge || striyo mlecchāśca śūdrāśca ye cānye pāpakāriṇaḥ || prayāṁti svargamevāśu dṛṣṭvā someśvaraṁ prabhum

पूर्वकाल में द्वापर-कलि के संधिकाल में, स्त्रियाँ, म्लेच्छ, शूद्र तथा अन्य पापी जन भी सोमेश्वर प्रभु का दर्शन कर तुरंत स्वर्ग को जाने लगे।

श्लोक 10 (skanda.7.38.10)

न यज्ञा न तपो दानं न स्वाध्पायो व्रतं न च ॥ कुर्वतोपि नरा देवि सर्वे यांति शिवालयम्

na yajñā na tapo dānaṁ na svādhpāyo vrataṁ na ca || kurvatopi narā devi sarve yāṁti śivālayam

हे देवि! यज्ञ, तप, दान, स्वाध्याय अथवा व्रत किए बिना भी सभी मनुष्य शिवलोक को जाने लगे।

श्लोक 11 (skanda.7.38.11)

तं प्रभावं विदित्वैवं सोमेश्वरसमुद्भवम् ॥ अग्निष्टोमादिकाः सर्वाः क्रिया नष्टाः सुरेश्वरि

taṁ prabhāvaṁ viditvaivaṁ someśvarasamudbhavam || agniṣṭomādikāḥ sarvāḥ kriyā naṣṭāḥ sureśvari

हे सुरेश्वरि! सोमेश्वर से उत्पन्न उस प्रभाव को जानकर अग्निष्टोम आदि सभी यज्ञ-क्रियाएँ लुप्त हो गईं।

श्लोक 12 (skanda.7.38.12)

ततो बालाश्च वृद्धाश्च ऋषयो वेदपारगाः ॥ शूद्राः स्त्रियोऽपि तं दृष्ट्वा प्रयांति परमां गतिम्

tato bālāśca vṛddhāśca ṛṣayo vedapāragāḥ || śūdrāḥ striyo'pi taṁ dṛṣṭvā prayāṁti paramāṁ gatim

तब बालक, वृद्ध, वेदपारंगत ऋषि, शूद्र तथा स्त्रियाँ भी उन्हें देखकर परम गति को प्राप्त होने लगे।

श्लोक 13 (skanda.7.38.13)

नष्टयज्ञोत्सवे काले शून्ये च वसुधातले ॥ ऊर्द्ध्वबाहुभिराक्रांतं परिपूर्णं त्रिविष्टपम्

naṣṭayajñotsave kāle śūnye ca vasudhātale || ūrddhvabāhubhirākrāṁtaṁ paripūrṇaṁ triviṣṭapam

यज्ञोत्सवों के नष्ट होने पर तथा पृथ्वीतल के शून्य हो जाने पर, ऊँचे हाथ उठाए हुए मनुष्यों से स्वर्ग परिपूर्ण हो गया।

श्लोक 14 (skanda.7.38.14)

ततो देवा महेंद्राद्या दुःखेनैव समन्विताः ॥ परिभूता मनुष्यैस्ते शंकरं शरणं गताः

tato devā maheṁdrādyā duḥkhenaiva samanvitāḥ || paribhūtā manuṣyaiste śaṁkaraṁ śaraṇaṁ gatāḥ

तब महेन्द्र आदि देवता दुःख से युक्त होकर, मनुष्यों से तिरस्कृत हुए, शंकर की शरण में गए।

श्लोक 15 (skanda.7.38.15)

ऊचुः प्रांजलयः सर्व इन्द्राद्याः सुरसत्तमाः ॥ व्याप्तोयं मानुषैः स्वर्गः प्रसादात्तव शंकर

ūcuḥ prāṁjalayaḥ sarva indrādyāḥ surasattamāḥ || vyāptoyaṁ mānuṣaiḥ svargaḥ prasādāttava śaṁkara

हाथ जोड़े हुए इन्द्र आदि समस्त श्रेष्ठ देवताओं ने कहा - हे शंकर! आपकी कृपा से यह स्वर्ग मनुष्यों से व्याप्त हो गया है।

श्लोक 16 (skanda.7.38.16)

निवासाय प्रभोऽस्माकं स्थानं किंचित्समादिश ॥ अहं श्रेष्ठो ह्यहं श्रेष्ठ इत्येवं ते परस्परम्॥ जल्पंतः सर्वतो देव पर्यटंति यथेच्छया

nivāsāya prabho'smākaṁ sthānaṁ kiṁcitsamādiśa || ahaṁ śreṣṭho hyahaṁ śreṣṭha ityevaṁ te parasparam|| jalpaṁtaḥ sarvato deva paryaṭaṁti yathecchayā

हे प्रभो! हमारे निवास के लिए कोई स्थान बताइए। वे आपस में 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' कहते हुए, हे देव! सर्वत्र अपनी इच्छानुसार विचरण करते हैं।

श्लोक 17 (skanda.7.38.17)

धर्मराजः सुधर्मात्मा तेषां कर्म शुभाशुभम्॥ स्वयं लिखितमालोक्य तूष्णीमास्ते सुविस्मितः

dharmarājaḥ sudharmātmā teṣāṁ karma śubhāśubham|| svayaṁ likhitamālokya tūṣṇīmāste suvismitaḥ

शुद्ध धर्मात्मा धर्मराज उनके शुभ-अशुभ कर्मों को, जो स्वयं लिखे हुए हैं, देखकर अत्यंत विस्मित हो मौन बैठे रहते हैं।

श्लोक 18 (skanda.7.38.18)

येषामथ कृतं सज्जं कुम्भीपाकं सुदारुणम् ॥ रौरवः शाल्मलिर्देव दृष्ट्वा तान्दिवि संस्थितान् ॥ वैलक्ष्यं परमं गत्वा व्यापारं त्यक्तवानसौ ॥

yeṣāmatha kṛtaṁ sajjaṁ kumbhīpākaṁ sudāruṇam || rauravaḥ śālmalirdeva dṛṣṭvā tāndivi saṁsthitān || vailakṣyaṁ paramaṁ gatvā vyāpāraṁ tyaktavānasau ||

जिनके लिए भयंकर कुम्भीपाक नरक सज्जित किया गया था, हे देव! उन्हें स्वर्ग में स्थित देखकर रौरव और शाल्मलि नरक भी अत्यंत विस्मित होकर अपना कार्य त्याग बैठे।

श्लोक 19 (skanda.7.38.19)

॥ श्रीभगवानुवाच ॥ प्रतिज्ञातं मया सर्वं भक्त्या तुष्टेन वै सुराः ॥ सोमाय मम सांनिध्यमस्मिन्क्षेत्रे भविष्यति

|| śrībhagavānuvāca || pratijñātaṁ mayā sarvaṁ bhaktyā tuṣṭena vai surāḥ || somāya mama sāṁnidhyamasminkṣetre bhaviṣyati

श्रीभगवान् ने कहा - हे सुरगण! भक्ति से संतुष्ट होकर मैंने यह सब प्रतिज्ञा की है कि सोम के लिए मेरी सांनिध्यता इस क्षेत्र में रहेगी।

श्लोक 20 (skanda.7.38.20)

न शक्यमन्यथाकर्तुमात्मनो यदुदीरितम्॥ एवं यास्यंति ते स्वर्गं ये मां द्रक्ष्यंति तत्र वै

na śakyamanyathākartumātmano yadudīritam|| evaṁ yāsyaṁti te svargaṁ ye māṁ drakṣyaṁti tatra vai

मैंने स्वयं जो घोषित किया है, वह अन्यथा नहीं किया जा सकता; इस प्रकार जो कोई वहाँ मेरा दर्शन करेगा, वह स्वर्ग को जाएगा।

श्लोक 21 (skanda.7.38.21)

भयोद्विग्नास्ततो देवाः पार्वतीं प्रेक्ष्य विश्वतः ॥ ऊचुः प्रांजलयः सर्वे त्वमस्माकं गतिर्भव

bhayodvignāstato devāḥ pārvatīṁ prekṣya viśvataḥ || ūcuḥ prāṁjalayaḥ sarve tvamasmākaṁ gatirbhava

तब भय से व्याकुल देवता सब ओर से पार्वती की ओर देखकर हाथ जोड़कर बोले - आप ही हमारी गति बनिए।

श्लोक 22 (skanda.7.38.22)

एवमुक्त्वाऽस्तुवन्देवाः स्तोत्रेणानेन सत्तम ॥ जानुभ्यां धरणीं गत्वा शिरस्याधाय चांजलिम् ॥

evamuktvā'stuvandevāḥ stotreṇānena sattama || jānubhyāṁ dharaṇīṁ gatvā śirasyādhāya cāṁjalim ||

यह कहकर देवताओं ने, हे सत्तम! घुटनों को धरती पर टेककर और मस्तक पर अंजलि रखकर इस स्तोत्र से उनकी स्तुति की।

श्लोक 23 (skanda.7.38.23)

॥ देवा ऊचुः ॥ नमस्ते देवदेवेशि नमस्ते विश्वधात्रिके ॥ नमस्ते पद्मपत्राक्षि नमस्ते कांचनद्युते

|| devā ūcuḥ || namaste devadeveśi namaste viśvadhātrike || namaste padmapatrākṣi namaste kāṁcanadyute

देवों ने कहा - हे देवदेवेशी! तुम्हें नमस्कार है। हे विश्वधात्रिके! तुम्हें नमस्कार है। हे पद्मपत्राक्षि! तुम्हें नमस्कार है। हे कांचनद्युते! तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 24 (skanda.7.38.24)

नमस्ते संहर्त्रि कर्त्रि नमस्ते शंकरप्रिये ॥ कालरात्रि नमस्तुभ्यं नमस्ते गिरिपुत्रिके

namaste saṁhartri kartri namaste śaṁkarapriye || kālarātri namastubhyaṁ namaste giriputrike

हे संहर्त्री-कर्त्री! तुम्हें नमस्कार है। हे शंकरप्रिये! तुम्हें नमस्कार है। हे कालरात्रि! तुम्हें नमस्कार है। हे गिरिपुत्रिके! तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 25 (skanda.7.38.25)

आर्ये भद्रे विशालाक्षि नमस्ते लोकसुन्दरि॥ त्वं रतिस्त्वं धृतिस्त्वं श्रीस्त्वं स्वाहा त्वं सुधा सती

ārye bhadre viśālākṣi namaste lokasundari|| tvaṁ ratistvaṁ dhṛtistvaṁ śrīstvaṁ svāhā tvaṁ sudhā satī

हे आर्ये! हे भद्रे! हे विशालाक्षि! हे लोकसुन्दरि! तुम्हें नमस्कार है। तुम ही रति हो, तुम धृति हो, तुम श्री हो, तुम स्वाहा हो, तुम सती सुधा हो।

श्लोक 26 (skanda.7.38.26)

त्वं दुर्गा त्वं मनिर्मेधा त्वं सर्वं त्वं वसुन्धरा ॥ त्वया सर्वमिदं व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम्

tvaṁ durgā tvaṁ manirmedhā tvaṁ sarvaṁ tvaṁ vasundharā || tvayā sarvamidaṁ vyāptaṁ trailokyaṁ sacarācaram

तुम दुर्गा हो, तुम मेधा हो, तुम सब कुछ हो, तुम वसुन्धरा हो; तुमसे ही यह चराचर त्रैलोक्य समस्त व्याप्त है।

श्लोक 27 (skanda.7.38.27)

नदीषु पर्वताग्रेषु सागरेषु गुहासु च ॥ अरण्येषु च चैत्येषु संग्रामेष्वाश्रमेषु च

nadīṣu parvatāgreṣu sāgareṣu guhāsu ca || araṇyeṣu ca caityeṣu saṁgrāmeṣvāśrameṣu ca

नदियों में, पर्वत-शिखरों में, सागरों में, गुफाओं में, वनों में, चैत्यों में, संग्रामों में तथा आश्रमों में -

श्लोक 28 (skanda.7.38.28)

त्रैलोक्ये तत्र पश्यामो यत्र त्वं देवि न स्थिता ॥ एतज्ज्ञात्वा विशालाक्षि त्राहि नो महतो भयात्

trailokye tatra paśyāmo yatra tvaṁ devi na sthitā || etajjñātvā viśālākṣi trāhi no mahato bhayāt

- त्रिलोक में कहाँ ऐसा स्थान है जहाँ तुम, हे देवि! स्थित न हो? यह जानकर, हे विशालाक्षि! हमें इस महान भय से बचाओ।

श्लोक 29 (skanda.7.38.29)

॥ ईश्वर उवाच ॥ एवमुक्ता तु सा देवी देवैरिंद्रपुरोगमैः ॥ कारुण्यान्निजदेहं त्वं तदा मर्द्दितवत्यसि

|| īśvara uvāca || evamuktā tu sā devī devairiṁdrapurogamaiḥ || kāruṇyānnijadehaṁ tvaṁ tadā mardditavatyasi

ईश्वर ने कहा - इस प्रकार इन्द्र आदि देवों द्वारा प्रार्थना किए जाने पर उस देवी ने करुणावश तब अपने शरीर को मला।

श्लोक 30 (skanda.7.38.30)

मर्दयंत्यास्तव तदा संजातं च महन्मलम् ॥ तत्र जज्ञे गजेंद्रास्यश्चतुर्बाहुर्मनोहरः

mardayaṁtyāstava tadā saṁjātaṁ ca mahanmalam || tatra jajñe gajeṁdrāsyaścaturbāhurmanoharaḥ

उस मलते समय एक महान मल उत्पन्न हुआ; उससे गजेन्द्र के समान मुखवाला, चतुर्भुज, मनोहर बालक उत्पन्न हुआ।

श्लोक 31 (skanda.7.38.31)

ततोब्रवीत्सुरान्सर्वान्भवती करुणात्मिका ॥ एष एव मया सृष्टो युष्माकं हितकाम्यया

tatobravītsurānsarvānbhavatī karuṇātmikā || eṣa eva mayā sṛṣṭo yuṣmākaṁ hitakāmyayā

तब उस करुणामयी देवी ने सभी देवताओं से कहा - तुम्हारे कल्याण की कामना से मैंने इसी को उत्पन्न किया है।

श्लोक 32 (skanda.7.38.32)

एष विघ्नानि सर्वाणि प्राणिनां संविधास्यति

eṣa vighnāni sarvāṇi prāṇināṁ saṁvidhāsyati

यह समस्त प्राणियों के लिए सभी विघ्नों का विधान करेगा।

श्लोक 33 (skanda.7.38.33)

मोहेन महताऽऽविष्टाः कामोपहतबुद्धयः ॥ सोमनाथमपश्यंतो यास्यंति नरकं नराः

mohena mahatā''viṣṭāḥ kāmopahatabuddhayaḥ || somanāthamapaśyaṁto yāsyaṁti narakaṁ narāḥ

महामोह से आविष्ट, कामवासना से नष्ट बुद्धि वाले मनुष्य सोमनाथ का दर्शन न करके नरक में जाएँगे।

श्लोक 34 (skanda.7.38.34)

एवं ते वचनं श्रुत्वा सर्वे ते हृष्टमानसाः ॥ स्वस्थानं भेजिरे देवास्त्यक्त्वा मानुषजं भयम्

evaṁ te vacanaṁ śrutvā sarve te hṛṣṭamānasāḥ || svasthānaṁ bhejire devāstyaktvā mānuṣajaṁ bhayam

यह वचन सुनकर वे सभी हर्षित मन से, मनुष्यों से उत्पन्न भय को त्यागकर अपने-अपने स्थान को चले गए।

श्लोक 35 (skanda.7.38.35)

अथे भवदनः प्राह त्वां देवि विनयान्वितः ॥ किं करोमि विशालाक्षि आदेशो दीयतां मम

athe bhavadanaḥ prāha tvāṁ devi vinayānvitaḥ || kiṁ karomi viśālākṣi ādeśo dīyatāṁ mama

तब भव के उस पुत्र ने विनयपूर्वक आपसे कहा - हे विशालाक्षि! मैं क्या करूँ? मुझे आदेश दीजिए।

श्लोक 36 (skanda.7.38.36)

॥ श्रीभगवत्युवाच ॥ गच्छ प्राभासिकं क्षेत्रं यत्र संनिहितो हरः ॥ तद्रक्ष मानुषाणां च यथा नायाति गोचरम्

|| śrībhagavatyuvāca || gaccha prābhāsikaṁ kṣetraṁ yatra saṁnihito haraḥ || tadrakṣa mānuṣāṇāṁ ca yathā nāyāti gocaram

श्रीभगवती ने कहा - जाओ, प्रभास क्षेत्र को, जहाँ हर सांनिध्य में स्थित हैं; उसकी रक्षा करो, जिससे मनुष्य उसकी सीमा में अनुचित रूप से न आ सकें।

श्लोक 37 (skanda.7.38.37)

लिंगं तु देवदेवस्य स्थापितं शशिना स्वयम् ॥ भवत्याऽऽदेशितो नित्यं नृणां विघ्नं करोति यः

liṁgaṁ tu devadevasya sthāpitaṁ śaśinā svayam || bhavatyā''deśito nityaṁ nṛṇāṁ vighnaṁ karoti yaḥ

देवाधिदेव का लिंग तो स्वयं चंद्रमा द्वारा स्थापित है; तुम मेरे द्वारा नित्य आदेशित होकर मनुष्यों के लिए विघ्न उत्पन्न करना।

श्लोक 38 (skanda.7.38.38)

प्रस्थितं पुरुषं दृष्ट्वा सोमनाथं प्रति प्रभुम्॥ स करोति महाविघ्नं कपर्दी लोकपूजितः

prasthitaṁ puruṣaṁ dṛṣṭvā somanāthaṁ prati prabhum|| sa karoti mahāvighnaṁ kapardī lokapūjitaḥ

सोमनाथ प्रभु की ओर प्रस्थान करते हुए मनुष्य को देखकर, लोकपूजित कपर्दी उसके लिए महान विघ्न उत्पन्न करते हैं।

श्लोक 39 (skanda.7.38.39)

पुत्रदारगृहक्षेत्र धनधान्यसमुद्भवम् ॥ जनयेत्स महामोहं ततः पश्यति नो हरम्

putradāragṛhakṣetra dhanadhānyasamudbhavam || janayetsa mahāmohaṁ tataḥ paśyati no haram

वह पुत्र, पत्नी, गृह, क्षेत्र, धन-धान्य से उत्पन्न महामोह उत्पन्न करते हैं, जिससे वह मनुष्य हर का दर्शन नहीं कर पाता।

श्लोक 40 (skanda.7.38.40)

अथवा गडुगंडादि व्याधिं चैव समुत्सृजेत् ॥ तैर्ग्रस्तः पुरुषो मोहान्न पश्यति ततो हरम्

athavā gaḍugaṁḍādi vyādhiṁ caiva samutsṛjet || tairgrastaḥ puruṣo mohānna paśyati tato haram

अथवा गंडमाला आदि व्याधियाँ उत्पन्न कर देते हैं; उनसे ग्रस्त होकर मोहवश मनुष्य हर का दर्शन नहीं कर पाता।

श्लोक 41 (skanda.7.38.41)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सोमेश्वरपरीप्सया ॥ स नित्यं पूजनीयस्तु स्मर्तव्यस्तु दिवानिशम्

tasmātsarvaprayatnena someśvaraparīpsayā || sa nityaṁ pūjanīyastu smartavyastu divāniśam

अतः सोमेश्वर की प्राप्ति की इच्छा से सम्पूर्ण प्रयत्न के साथ, उनका (कपर्दी का) नित्य पूजन और दिन-रात स्मरण करना चाहिए।

श्लोक 42 (skanda.7.38.42)

स्तोत्रेणानेन देवेशि सर्वविघ्नांतकेन वै॥ समाराध्य गणाध्यक्षः प्रभासक्षेत्ररक्षकः

stotreṇānena deveśi sarvavighnāṁtakena vai|| samārādhya gaṇādhyakṣaḥ prabhāsakṣetrarakṣakaḥ

हे देवेशि! इस समस्त विघ्नों का अंत करने वाले स्तोत्र से उस गणाध्यक्ष प्रभासक्षेत्र-रक्षक की आराधना करनी चाहिए।

श्लोक 43 (skanda.7.38.43)

तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि स्तोत्रं तद्विघ्रमर्दनम्॥ कपर्दिनो महादेवि सावधानावधारय ॥

tatte'haṁ saṁpravakṣyāmi stotraṁ tadvighramardanam|| kapardino mahādevi sāvadhānāvadhāraya ||

हे महादेवि! उस कपर्दी के विघ्नमर्दक स्तोत्र को मैं तुम्हें बताता हूँ, सावधान होकर सुनो।

श्लोक 44 (skanda.7.38.44)

ॐ नमो विघ्नराजाय नमस्तेऽस्तु कपर्दिने॥ नमो महोग्रदंष्ट्राय प्रभासक्षेत्रवासिने

ॐ namo vighnarājāya namaste'stu kapardine|| namo mahogradaṁṣṭrāya prabhāsakṣetravāsine

ॐ विघ्नराज को नमस्कार है, कपर्दी को नमस्कार है। महोग्रदंष्ट्र प्रभासक्षेत्रवासी को नमस्कार है।

श्लोक 45 (skanda.7.38.45)

कपर्दिनं नमस्कृत्य यात्रानिर्विघ्रहेतवे॥ स्तोष्येऽहं विघ्नराजानं सिद्धिबुद्धिप्रियं शुभम्

kapardinaṁ namaskṛtya yātrānirvighrahetave|| stoṣye'haṁ vighnarājānaṁ siddhibuddhipriyaṁ śubham

कपर्दी को नमस्कार कर, यात्रा को निर्विघ्न बनाने के लिए, सिद्धि-बुद्धि के प्रिय शुभ विघ्नराज की मैं स्तुति करता हूँ।

श्लोक 46 (skanda.7.38.46)

महागणपतिं शूरमजितं जयवर्द्धनम्॥ एकदंतं च द्विदंतं चतुर्दंतं चतुर्भुजम्

mahāgaṇapatiṁ śūramajitaṁ jayavarddhanam|| ekadaṁtaṁ ca dvidaṁtaṁ caturdaṁtaṁ caturbhujam

महान् गणपति, शूरवीर, अजेय, विजय बढ़ाने वाले; एकदंत, द्विदंत, चतुर्दंत, चतुर्भुज;

श्लोक 47 (skanda.7.38.47)

त्र्यक्षं च शूलहस्तं च रक्त नेत्रं वरप्रदम् ॥ अजेयं शंकुकर्णं च प्रचण्डं दंडनायकम्॥ आयस्कदंडिनं चैव हुतवक्त्रं हुतप्रियम्

tryakṣaṁ ca śūlahastaṁ ca rakta netraṁ varapradam || ajeyaṁ śaṁkukarṇaṁ ca pracaṇḍaṁ daṁḍanāyakam|| āyaskadaṁḍinaṁ caiva hutavaktraṁ hutapriyam

त्रिनेत्र, त्रिशूलधारी, लाल नेत्रों वाले, वरदायक; अजेय, शंकुकर्ण, प्रचंड दंडनायक; लौह-दंडधारी, अग्निमुख, हवनप्रिय;

श्लोक 48 (skanda.7.38.48)

अनर्चितो विघ्नकरः सर्वकार्येषु यो नृणाम् ॥ तं नमामि गणाध्यक्षं भीममुग्रमुमासुतम्

anarcito vighnakaraḥ sarvakāryeṣu yo nṛṇām || taṁ namāmi gaṇādhyakṣaṁ bhīmamugramumāsutam

जो पूजित न होने पर मनुष्यों के समस्त कार्यों में विघ्न उत्पन्न करते हैं, उन भीम, उग्र, उमासुत गणाध्यक्ष को मैं नमन करता हूँ।

श्लोक 49 (skanda.7.38.49)

मदवतं विरूपाक्षमिभवक्त्रसमप्रभम् ॥ ध्रुवं च निश्चलं शांतं तं नमामि विनायकम्

madavataṁ virūpākṣamibhavaktrasamaprabham || dhruvaṁ ca niścalaṁ śāṁtaṁ taṁ namāmi vināyakam

मदमत्त, विरूपाक्ष, गजमुख के समान तेजस्वी; स्थिर, अचल, शांत उस विनायक को मैं नमन करता हूँ।

श्लोक 50 (skanda.7.38.50)

त्वया पूर्वेण वपुषा देवानां कार्यसिद्धये ॥ गजरूपं समास्थाय त्रासिताः सर्वदानवाः

tvayā pūrveṇa vapuṣā devānāṁ kāryasiddhaye || gajarūpaṁ samāsthāya trāsitāḥ sarvadānavāḥ

तुमने अपने पूर्व शरीर से देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए गजरूप धारण कर समस्त दानवों को त्रस्त किया।

श्लोक 51 (skanda.7.38.51)

ऋषीणां देवतानां च नायकत्वं प्रकाशितम्

ṛṣīṇāṁ devatānāṁ ca nāyakatvaṁ prakāśitam

ऋषियों और देवताओं में तुम्हारा नायकत्व प्रकट किया गया है।

श्लोक 52 (skanda.7.38.52)

इति स्तुतः सुरैरग्रे पूज्यसे त्वं भवात्मज ॥ त्वामाराध्य गणाध्यक्षमिभवक्त्रसमप्रभम्

iti stutaḥ surairagre pūjyase tvaṁ bhavātmaja || tvāmārādhya gaṇādhyakṣamibhavaktrasamaprabham

इस प्रकार देवताओं द्वारा स्तुत होकर, हे भवात्मज! तुम सबसे पहले पूजे जाते हो; तुम्हारी, गजमुख के समान तेजस्वी गणाध्यक्ष की आराधना करके -

श्लोक 53 (skanda.7.38.53)

ध्रुवं च निश्चलं शांतं परीतं वि जयश्रिया ॥ कार्यार्थं रक्तकुसुमै रक्तचंदनवारिभिः

dhruvaṁ ca niścalaṁ śāṁtaṁ parītaṁ vi jayaśriyā || kāryārthaṁ raktakusumai raktacaṁdanavāribhiḥ

- स्थिर, अचल, शांत, विजयश्री से घिरे हुए उस देवता का, कार्यसिद्धि के लिए लाल पुष्पों और लाल चंदन-जल से -

श्लोक 54 (skanda.7.38.54)

रक्तांबरधरो भूत्वा चतुर्थ्यामर्चयेत्तु यः ॥ एककालं द्विकालं वा नियतो नियताशनः

raktāṁbaradharo bhūtvā caturthyāmarcayettu yaḥ || ekakālaṁ dvikālaṁ vā niyato niyatāśanaḥ

- जो कोई लाल वस्त्र धारण कर चतुर्थी को एक अथवा दो समय, संयमपूर्वक और नियमित भोजन करते हुए उनकी पूजा करता है -

श्लोक 55 (skanda.7.38.55)

राजानं राजपुत्रं वा राजमंत्रिणमेव च ॥ राज्यं वा सर्वविघ्नेशो वशीकुर्यात्सराष्ट्रकम्

rājānaṁ rājaputraṁ vā rājamaṁtriṇameva ca || rājyaṁ vā sarvavighneśo vaśīkuryātsarāṣṭrakam

- उस सर्वविघ्नेश्वर को एक राजा, राजकुमार, राजमंत्री अथवा राष्ट्र सहित राज्य को भी वश में करने की सामर्थ्य होती है।

श्लोक 56 (skanda.7.38.56)

यत्फलं सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु यत्फलम्॥ स तत्फलमवाप्नोति स्मृत्वा देवं विनायकम्

yatphalaṁ sarvatīrtheṣu sarvayajñeṣu yatphalam|| sa tatphalamavāpnoti smṛtvā devaṁ vināyakam

जो फल समस्त तीर्थों में और समस्त यज्ञों में प्राप्त होता है, वह फल देव विनायक का स्मरण करने मात्र से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 57 (skanda.7.38.57)

विषमं न भवेत्तस्य न स गच्छेत्पराभवम् ॥ न च विघ्नं भवेत्तस्य जनो जातिस्मरो भवेत्

viṣamaṁ na bhavettasya na sa gacchetparābhavam || na ca vighnaṁ bhavettasya jano jātismaro bhavet

उसके लिए कोई विषम स्थिति नहीं होती, न वह पराजय को प्राप्त होता है; उसके लिए कोई विघ्न नहीं होता, और वह जातिस्मर हो जाता है।

श्लोक 58 (skanda.7.38.58)

य इदं पठति स्तोत्रं षड्भिर्मासैर्वरं लभेत् ॥ संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः

ya idaṁ paṭhati stotraṁ ṣaḍbhirmāsairvaraṁ labhet || saṁvatsareṇa siddhiṁ ca labhate nātra saṁśayaḥ

जो इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह छह महीनों में वरदान प्राप्त करता है और एक वर्ष में सिद्धि प्राप्त करता है - इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 59 (skanda.7.38.59)

प्रसादाद्दर्शनं याति तस्य सोमेश्वरः प्रभुः॥ कपर्दाकारमुदरं यतोऽस्य समुदाहृतम्॥ ततोऽस्य नाम जानीहि कपर्द्दीति महात्मनः

prasādāddarśanaṁ yāti tasya someśvaraḥ prabhuḥ|| kapardākāramudaraṁ yato'sya samudāhṛtam|| tato'sya nāma jānīhi kaparddīti mahātmanaḥ

उनकी कृपा से मनुष्य प्रभु सोमेश्वर के दर्शन को प्राप्त करता है। चूँकि उनका उदर कपर्द (जटा) के आकार का कहा गया है, इसीलिए उस महात्मा का नाम "कपर्दी" जानो।

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