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प्रभास खण्ड · अध्याय 39

रुद्रेश्वर (केदार) एवं राजा शशबिंदु माहात्म्य वर्णन

अध्याय 38अध्याय-सूचीअध्याय 40

श्लोक 1 (skanda.7.39.1)

॥ ईश्वर उवाच ॥ अथ संपूज्य विधिना देवदेवं कपर्द्दिनम् ॥ ततो गच्छेन्महादेवि लिगं केदारसंस्थितम्

|| īśvara uvāca || atha saṁpūjya vidhinā devadevaṁ kaparddinam || tato gacchenmahādevi ligaṁ kedārasaṁsthitam

ईश्वर ने कहा - इसके बाद देवाधिदेव कपर्दी की विधिपूर्वक पूजा करके, हे महादेवि! केदार में स्थित लिंग के पास जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.7.39.2)

तस्यैवाग्नेयभागस्थं भीमेश्वरसमीपगम्॥ स्वयंभूतं महादेवि कल्पलिंगं मम प्रियम्

tasyaivāgneyabhāgasthaṁ bhīmeśvarasamīpagam|| svayaṁbhūtaṁ mahādevi kalpaliṁgaṁ mama priyam

उसके ही अग्नि कोण में, भीमेश्वर के समीप, स्वयंभू कल्पलिंग है, जो मुझे प्रिय है, हे महादेवि!

श्लोक 3 (skanda.7.39.3)

मया संपूजितं देवि वृद्धिलिंग महाप्रभम्॥ निराहारस्तु यस्तत्र करोत्येकं प्रजागरम्

mayā saṁpūjitaṁ devi vṛddhiliṁga mahāprabham|| nirāhārastu yastatra karotyekaṁ prajāgaram

हे देवि! मेरे द्वारा पूजित महातेजस्वी वृद्धिलिंग है; जो वहाँ निराहार रहकर एक रात्रि-जागरण करता है -

श्लोक 4 (skanda.7.39.4)

चतुर्दश्यां विशेषेण तस्य लोकाः सनातनाः ॥ रुद्रेश्वरेति देवस्य त्वासीन्नाम पुरा युगे

caturdaśyāṁ viśeṣeṇa tasya lokāḥ sanātanāḥ || rudreśvareti devasya tvāsīnnāma purā yuge

- विशेषकर चतुर्दशी को, उसके लिए सनातन लोक प्राप्त होते हैं। पूर्वयुग में इस देव का नाम रुद्रेश्वर था।

श्लोक 5 (skanda.7.39.5)

तिष्येस्मिंस्तु पुनः प्राप्ते म्लेच्छस्पर्शभयातुरः ॥ अस्मिँल्लिंगे लयं यातः केदारश्चाब्धिसंनिधौ

tiṣyesmiṁstu punaḥ prāpte mlecchasparśabhayāturaḥ || asmim̐lliṁge layaṁ yātaḥ kedāraścābdhisaṁnidhau

परंतु जब यह तिष्य (कलियुग) पुनः आया, तब म्लेच्छस्पर्श के भय से आतुर होकर केदार इस लिंग में, सागर के समीप, विलीन हो गए।

श्लोक 6 (skanda.7.39.6)

तेन केदारनामेति तस्य ख्यातं धरातले ॥ माघे मासि यताहारः स्नात्वा तु लवणोदधौ

tena kedāranāmeti tasya khyātaṁ dharātale || māghe māsi yatāhāraḥ snātvā tu lavaṇodadhau

उसी से इसका नाम केदार पृथ्वी पर प्रसिद्ध हुआ। माघ मास में संयमित आहार रखकर, लवण-समुद्र में स्नान करके -

श्लोक 7 (skanda.7.39.7)

पद्मके तु महाकुंडे मध्येस्य लवणांभसः ॥ रुद्रेशाद्दक्षिणे भागे धनुषां दशके स्थिते

padmake tu mahākuṁḍe madhyesya lavaṇāṁbhasaḥ || rudreśāddakṣiṇe bhāge dhanuṣāṁ daśake sthite

- उस लवण-जल के मध्य स्थित महाकुंड पद्मक में, जो रुद्रेश से दस धनुष दूर दक्षिण भाग में स्थित है -

श्लोक 8 (skanda.7.39.8)

स्नात्वा विधानतो देवि रुद्रेशं चार्चयिष्यति ॥ सम्यक्केदारया त्रायाः फलं तस्य भविष्यति

snātvā vidhānato devi rudreśaṁ cārcayiṣyati || samyakkedārayā trāyāḥ phalaṁ tasya bhaviṣyati

- वहाँ विधिपूर्वक स्नान कर रुद्रेश की पूजा करने वाले को, हे देवि! केदार-यात्रा का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है।

श्लोक 9 (skanda.7.39.9)

ब्रह्महत्यादिपापानां पूजनान्नाशनं महत् ॥ अथ तस्यैव देवस्य इतिहासं पुरातनम्

brahmahatyādipāpānāṁ pūjanānnāśanaṁ mahat || atha tasyaiva devasya itihāsaṁ purātanam

इस पूजन से ब्रह्महत्या आदि पापों का महान नाश होता है। अब उसी देव का प्राचीन इतिहास -

श्लोक 10 (skanda.7.39.10)

सर्वकामप्रदं नृणां कथ्यते ते सुरप्रिये ॥ आसीद्राजा पुरा देवि शशबिंदुरिति श्रुतः

sarvakāmapradaṁ nṛṇāṁ kathyate te surapriye || āsīdrājā purā devi śaśabiṁduriti śrutaḥ

- जो मनुष्यों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है, हे सुरप्रिये! तुम्हें बताया जाता है। पूर्वकाल में, हे देवि! शशबिंदु नामक एक राजा था।

श्लोक 11 (skanda.7.39.11)

सार्वभौमो महीपालो विपक्षगणसूदनः ॥ कलिद्वापरयोः संधौ सभूतः पृथिवीपतिः

sārvabhaumo mahīpālo vipakṣagaṇasūdanaḥ || kalidvāparayoḥ saṁdhau sabhūtaḥ pṛthivīpatiḥ

सार्वभौम, महीपाल, विपक्ष-समूह का संहारक वह पृथिवीपति कलि-द्वापर की संधि में उत्पन्न हुआ था।

श्लोक 12 (skanda.7.39.12)

तस्य भार्याऽभवत्साध्वी प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ न देवी न च गन्धर्वी नासुरी न च पन्नगी

tasya bhāryā'bhavatsādhvī prāṇebhyo'pi garīyasī || na devī na ca gandharvī nāsurī na ca pannagī

उसकी पत्नी साध्वी थी, जो उसे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय थी; न देवी, न गंधर्वी, न असुरी, न नागकन्या -

श्लोक 13 (skanda.7.39.13)

तादृग्रूपा वरारोहे यथाऽस्य शुभलोचना॥ तस्य हेममयं पद्मं शतपत्रं मनोरमम्

tādṛgrūpā varārohe yathā'sya śubhalocanā|| tasya hemamayaṁ padmaṁ śatapatraṁ manoramam

- किसी की भी ऐसी रूप-सम्पदा नहीं थी जैसी उसकी उस शुभलोचना रानी की थी। उसके पास एक सुवर्णमय, शतपत्र, मनोहर कमल था -

श्लोक 14 (skanda.7.39.14)

खेचरं वेगि नित्यं च तस्य राज्ञो महात्मनः॥ स तेन पर्यटँल्लोकान्सर्वान्देवि स्वकामतः

khecaraṁ vegi nityaṁ ca tasya rājño mahātmanaḥ|| sa tena paryaṭam̐llokānsarvāndevi svakāmataḥ

- वह आकाशगामी, सदा वेगवान, उस महात्मा राजा का था। उसके द्वारा वह इच्छानुसार समस्त लोकों में विचरण करता था।

श्लोक 15 (skanda.7.39.15)

एकदा फाल्गुने मासि शुक्लपक्षे वरानने ॥ चतुर्द्दश्यां तु संप्राप्तः प्रभासक्षेत्रमुत्तमम्

ekadā phālgune māsi śuklapakṣe varānane || caturddaśyāṁ tu saṁprāptaḥ prabhāsakṣetramuttamam

हे वरानने! एक बार फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को वह उत्तम प्रभासक्षेत्र में पहुँचा।

श्लोक 16 (skanda.7.39.16)

अथापश्यदृषीन्सर्वाञ्छ्रीसोमेशपुरःस्थितान् ॥ रात्रौ जागरणार्थाय जपहोमपरायणान्

athāpaśyadṛṣīnsarvāñchrīsomeśapuraḥsthitān || rātrau jāgaraṇārthāya japahomaparāyaṇān

तब उसने श्रीसोमेश के सम्मुख स्थित समस्त ऋषियों को देखा, जो रात्रि-जागरण के लिए जप-होम में निरत थे।

श्लोक 17 (skanda.7.39.17)

स दृष्ट्वा सोमनाथं तु प्रणिपत्य विधानतः ॥ पूजयामास सर्वां स्तान्यथार्हं भक्तिसंयुतः

sa dṛṣṭvā somanāthaṁ tu praṇipatya vidhānataḥ || pūjayāmāsa sarvāṁ stānyathārhaṁ bhaktisaṁyutaḥ

सोमनाथ का दर्शन कर उसने विधिपूर्वक प्रणाम किया और भक्तिपूर्वक सभी की यथोचित पूजा की।

श्लोक 18 (skanda.7.39.18)

ततः केदारमासाद्य संस्नाप्य विधिवत्प्रिये ॥ पूजयित्वा विचित्राभिः पुष्पमालाभिरीश्वरम्

tataḥ kedāramāsādya saṁsnāpya vidhivatpriye || pūjayitvā vicitrābhiḥ puṣpamālābhirīśvaram

हे प्रिये! फिर केदार में पहुँचकर विधिपूर्वक स्नान कराकर, विचित्र पुष्पमालाओं से ईश्वर की पूजा करके -

श्लोक 19 (skanda.7.39.19)

नैवेद्यैर्विविधैर्वस्त्रैर्भूषणैश्च मनोहरैः ॥ ततोऽत्र कारयामास जागरं सुसमाहितः

naivedyairvividhairvastrairbhūṣaṇaiśca manoharaiḥ || tato'tra kārayāmāsa jāgaraṁ susamāhitaḥ

- विभिन्न नैवेद्यों, वस्त्रों तथा मनोहर आभूषणों से पूजा कर, फिर वहाँ उसने एकाग्रचित्त होकर जागरण किया।

श्लोक 20 (skanda.7.39.20)

ततस्ते मुनयः सर्वे कुतूहलसमन्विताः ॥ च्यवनो याज्ञवल्क्यश्च शांडिल्यः शाकटायनः

tataste munayaḥ sarve kutūhalasamanvitāḥ || cyavano yājñavalkyaśca śāṁḍilyaḥ śākaṭāyanaḥ

तब सभी मुनि - च्यवन, याज्ञवल्क्य, शांडिल्य, शाकटायन - कुतूहलपूर्वक -

श्लोक 21 (skanda.7.39.21)

रैभ्योऽथ जैमिनिः क्रौंचो नारदः पर्वतः शिलः ॥ मार्कंडं पुरतः कृत्वा जग्मुस्तस्य समीपतः

raibhyo'tha jaiminiḥ krauṁco nāradaḥ parvataḥ śilaḥ || mārkaṁḍaṁ purataḥ kṛtvā jagmustasya samīpataḥ

- रैभ्य, जैमिनि, क्रौंच, नारद, पर्वत, शिल - मार्कंड को आगे कर उसके समीप गए।

श्लोक 22 (skanda.7.39.22)

चक्रुः कथाः सुविचित्रा इतिहासानि भूरिशः ॥ कीर्त्तयंतः स्थितास्तत्र पप्रच्छू राजसत्तमम्

cakruḥ kathāḥ suvicitrā itihāsāni bhūriśaḥ || kīrttayaṁtaḥ sthitāstatra papracchū rājasattamam

वे अनेक विचित्र कथाएँ और इतिहास सुनाते हुए वहाँ खड़े होकर उस श्रेष्ठ राजा से पूछने लगे।

श्लोक 23 (skanda.7.39.23)

॥ ऋषय ऊचुः ॥ कस्मात्सोमेश्वरं देवं परित्यज्य नराधिप ॥ केदारस्य पुरोऽकार्षीर्जागरं तद्ब्रवीहि नः ॥ नूनं वेत्सि फलं चास्य लिंगस्य त्वं महोदयम्

|| ṛṣaya ūcuḥ || kasmātsomeśvaraṁ devaṁ parityajya narādhipa || kedārasya puro'kārṣīrjāgaraṁ tadbravīhi naḥ || nūnaṁ vetsi phalaṁ cāsya liṁgasya tvaṁ mahodayam

ऋषियों ने कहा - हे नराधिप! सोमेश्वर देव को छोड़कर आपने केदार के सम्मुख जागरण क्यों किया? यह हमें बताइए। निश्चय ही आप इस लिंग का महाफल जानते होंगे।

श्लोक 24 (skanda.7.39.24)

॥ राजोवाच ॥ शृण्वंतु ब्राह्मणाः सर्वे अन्यदेहोद्भवं मम ॥ पुराऽहं शूद्रजातीय आसं ब्राह्मणपूजकः

|| rājovāca || śṛṇvaṁtu brāhmaṇāḥ sarve anyadehodbhavaṁ mama || purā'haṁ śūdrajātīya āsaṁ brāhmaṇapūjakaḥ

राजा ने कहा - सभी ब्राह्मण सुनें मेरे पूर्व शरीर की बात: पूर्वकाल में मैं शूद्रजाति का था, परंतु ब्राह्मणपूजक था।

श्लोक 25 (skanda.7.39.25)

सौराष्ट्रविषये शुभ्रे धनधान्यसमाकुले ॥ अथ कालांतरे तत्र अनावृष्टिरभूद्द्विजाः

saurāṣṭraviṣaye śubhre dhanadhānyasamākule || atha kālāṁtare tatra anāvṛṣṭirabhūddvijāḥ

सौराष्ट्र देश, जो पवित्र तथा धन-धान्य से परिपूर्ण था, वहाँ कुछ समय बाद, हे द्विजो! अनावृष्टि हो गई।

श्लोक 26 (skanda.7.39.26)

ततोऽहं क्षुधयाविष्टः प्रभासं क्षेत्रमास्थितः ॥ अथापश्यं सरः शुभ्रं हरिणीमूलसंस्थितम्

tato'haṁ kṣudhayāviṣṭaḥ prabhāsaṁ kṣetramāsthitaḥ || athāpaśyaṁ saraḥ śubhraṁ hariṇīmūlasaṁsthitam

तब भूख से पीड़ित होकर मैं प्रभास क्षेत्र में पहुँचा; वहाँ मैंने हरिणीमूल में स्थित एक स्वच्छ सरोवर देखा।

श्लोक 27 (skanda.7.39.27)

तच्च रामसरोनाम पद्मिनीषण्डमंडितम् ॥ क्षीरोदांबुधिसंकाशं दृष्ट्वा स्नातः क्लमान्वितः

tacca rāmasaronāma padminīṣaṇḍamaṁḍitam || kṣīrodāṁbudhisaṁkāśaṁ dṛṣṭvā snātaḥ klamānvitaḥ

वह रामसर नामक सरोवर था, जो कमलिनी-समूह से सुशोभित तथा क्षीरसागर के समान था; उसे देखकर, थका हुआ, मैंने स्नान किया।

श्लोक 28 (skanda.7.39.28)

संतर्प्य च पितॄन्देवान्पीत्वा स्वच्छमथोदकम् ॥ ततोऽहं भार्यया प्रोक्तो गृहाणेमान्सरोरुहान्

saṁtarpya ca pitṝndevānpītvā svacchamathodakam || tato'haṁ bhāryayā prokto gṛhāṇemānsaroruhān

पितरों और देवताओं को तर्पण देकर तथा स्वच्छ जल पीकर, तब मेरी पत्नी ने मुझसे कहा - इन कमलों को ले लो।

श्लोक 29 (skanda.7.39.29)

एतत्समीपतो रम्यं दृश्यते स्थानमुत्तमम् ॥ विक्रीणीमोऽत्र गत्वा तु येन स्याद्भोजनं विभो

etatsamīpato ramyaṁ dṛśyate sthānamuttamam || vikrīṇīmo'tra gatvā tu yena syādbhojanaṁ vibho

इसके समीप एक रमणीय उत्तम स्थान दिखाई देता है; हे विभो! वहाँ जाकर इन्हें बेचें, जिससे भोजन मिल सके।

श्लोक 30 (skanda.7.39.30)

अथावतीर्य सलिलं गृहीतानि मया द्विजाः ॥ कमलानि सुभू रीणि प्रस्थितश्च पुरं प्रति

athāvatīrya salilaṁ gṛhītāni mayā dvijāḥ || kamalāni subhū rīṇi prasthitaśca puraṁ prati

तब हे द्विजो! जल में उतरकर मैंने बहुत से सुंदर कमल एकत्र किए और नगर की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 31 (skanda.7.39.31)

तत्र गत्वा च रथ्यासु चत्वरेषु त्रिकेषु च ॥ प्रफुल्लकमलान्येव क्रेतुं वै मुनिसत्तमाः

tatra gatvā ca rathyāsu catvareṣu trikeṣu ca || praphullakamalānyeva kretuṁ vai munisattamāḥ

वहाँ जाकर, हे मुनिसत्तमो! गलियों में, चौराहों में तथा तिराहों में उन खिले हुए कमलों को बेचने का प्रयास किया।

श्लोक 32 (skanda.7.39.32)

न कश्चित्प्रति गृह्णाति अस्तं प्राप्तो दिवाकरः ॥ प्रासादं कंचिदासाद्य सुप्तोहं सह भार्यया

na kaścitprati gṛhṇāti astaṁ prāpto divākaraḥ || prāsādaṁ kaṁcidāsādya suptohaṁ saha bhāryayā

किसी ने उन्हें नहीं खरीदा; सूर्य अस्त हो गया। किसी भवन में पहुँचकर मैं पत्नी सहित सो गया।

श्लोक 33 (skanda.7.39.33)

तत्र सुप्तस्य मे बुद्धिः श्रुत्वा गीतध्वनिं तदा ॥ समुत्पन्ना सभा र्यस्य क्षुधार्तस्य विशेषतः ॥ नूनं जागरणं ह्येतत्कस्मिंश्चिद्विबुधालये

tatra suptasya me buddhiḥ śrutvā gītadhvaniṁ tadā || samutpannā sabhā ryasya kṣudhārtasya viśeṣataḥ || nūnaṁ jāgaraṇaṁ hyetatkasmiṁścidvibudhālaye

वहाँ सोए हुए मुझे गीत-ध्वनि सुनाई पड़ी, जिससे मेरे मन में यह विचार उत्पन्न हुआ, विशेषकर भूख से पीड़ित पत्नी सहित - निश्चय ही यह किसी देवमंदिर में जागरण हो रहा है।

श्लोक 34 (skanda.7.39.34)

सरोरुहाणि चादाय व्रजाम्यत्र सुरालये ॥ यदि कश्चित्प्रगृह्णाति प्राणयात्रा ततो भवेत्

saroruhāṇi cādāya vrajāmyatra surālaye || yadi kaścitpragṛhṇāti prāṇayātrā tato bhavet

इन कमलों को लेकर मैं उस देवमंदिर में जाऊँ; यदि कोई इन्हें स्वीकार करे, तो उससे प्राणयात्रा चल सके।

श्लोक 35 (skanda.7.39.35)

अथोत्थाय समायातो ह्यत्राहं मुनिपुंगवाः ॥ अपश्यं लिंगमेतत्तु पूजितं कुसुमैः शुभैः

athotthāya samāyāto hyatrāhaṁ munipuṁgavāḥ || apaśyaṁ liṁgametattu pūjitaṁ kusumaiḥ śubhaiḥ

हे मुनिपुंगवो! तब उठकर मैं यहाँ आया और इस लिंग को शुभ पुष्पों से पूजित देखा।

श्लोक 36 (skanda.7.39.36)

रुद्रेश्वराभिधमिदं वृद्धलिंगं स्वयंभुवम् ॥ वेश्यानंगवतीनाम्नी शिवरात्रिपरायणा

rudreśvarābhidhamidaṁ vṛddhaliṁgaṁ svayaṁbhuvam || veśyānaṁgavatīnāmnī śivarātriparāyaṇā

यह रुद्रेश्वर नामक स्वयंभू वृद्धलिंग है; अनंगवती नामक एक वेश्या, जो शिवरात्रि-व्रत में परायण थी -

श्लोक 37 (skanda.7.39.37)

जागर्त्ति पुरतस्तस्य गीतनृत्योत्सवादिना ॥ ततः कश्चिन्मया दृष्टः किमेतद्रात्रिजागरम्

jāgartti puratastasya gītanṛtyotsavādinā || tataḥ kaścinmayā dṛṣṭaḥ kimetadrātrijāgaram

- उसके सामने गीत-नृत्य आदि उत्सवों से जागरण कर रही थी। तब मैंने किसी व्यक्ति को देखकर पूछा - यह रात्रि-जागरण क्या है?

श्लोक 38 (skanda.7.39.38)

केयं स्त्री दृश्यतेऽत्यर्थं गीतनृत्योत्सवे रता ॥ सोऽब्रवीच्छिवधर्मोक्ता शिवरात्रिः सुधर्मदा

keyaṁ strī dṛśyate'tyarthaṁ gītanṛtyotsave ratā || so'bravīcchivadharmoktā śivarātriḥ sudharmadā

यह स्त्री कौन है जो गीत-नृत्य के उत्सव में अत्यंत लीन दिखाई देती है? उसने कहा - यह शिवधर्म में कही गई शिवरात्रि है, जो उत्तम धर्म प्रदान करने वाली है।

श्लोक 39 (skanda.7.39.39)

तां चानंगवतीनाम्नी वेश्येयं धर्मसंयुता ॥ जागर्त्ति परमं श्रेयः शिवरात्रिव्रतं शुभम्

tāṁ cānaṁgavatīnāmnī veśyeyaṁ dharmasaṁyutā || jāgartti paramaṁ śreyaḥ śivarātrivrataṁ śubham

यह अनंगवती नामक वेश्या धर्मयुक्त होकर इस परम कल्याणकारी शुभ शिवरात्रि-व्रत का जागरण कर रही है।

श्लोक 40 (skanda.7.39.40)

शिवरात्रिव्रतं ह्येतद्यः सम्यक्कुरुते नरः ॥ न स दुःखमवाप्नोति न दारि द्र्यं न बंधनम्

śivarātrivrataṁ hyetadyaḥ samyakkurute naraḥ || na sa duḥkhamavāpnoti na dāri dryaṁ na baṁdhanam

जो मनुष्य इस शिवरात्रि-व्रत का भलीभाँति पालन करता है, उसे दुःख नहीं मिलता, न दरिद्रता, न बंधन।

श्लोक 41 (skanda.7.39.41)

दुष्टं चारिष्टयोगं वा न रोगं न भयं क्वचित् ॥ सुखसौभाग्यसंपन्नो जायते सत्कुले नरः

duṣṭaṁ cāriṣṭayogaṁ vā na rogaṁ na bhayaṁ kvacit || sukhasaubhāgyasaṁpanno jāyate satkule naraḥ

उसे न दुष्ट अरिष्टयोग होता है, न रोग, न कभी भय; वह मनुष्य सुख-सौभाग्य से संपन्न होकर सत्कुल में जन्म लेता है।

श्लोक 42 (skanda.7.39.42)

तेजस्वी च यशस्वी च सर्वकल्याणभाजनम् ॥ भवेदस्य प्रसादेन एवमाहुर्मनीषिणः

tejasvī ca yaśasvī ca sarvakalyāṇabhājanam || bhavedasya prasādena evamāhurmanīṣiṇaḥ

वह तेजस्वी और यशस्वी होकर, इसकी कृपा से समस्त कल्याण का पात्र बनता है - ऐसा विद्वान कहते हैं।

श्लोक 43 (skanda.7.39.43)

॥ राजोवाच ॥ अथ मे बुद्धिरुत्पन्ना तद्व्रतं प्रति निश्चला ॥ चिंतितं मनसा ह्येतन्मयाब्राह्मणसत्तमाः

|| rājovāca || atha me buddhirutpannā tadvrataṁ prati niścalā || ciṁtitaṁ manasā hyetanmayābrāhmaṇasattamāḥ

राजा ने कहा - तब उस व्रत के प्रति मेरे मन में दृढ़ निश्चय उत्पन्न हुआ; हे ब्राह्मणसत्तमो! मैंने मन में यह विचार किया।

श्लोक 44 (skanda.7.39.44)

अन्नाभावान्ममोत्पन्न उपवासो बलाद्यतः ॥ तदहं पद्मके तीर्थेस्नात्वा च लवणांभसि

annābhāvānmamotpanna upavāso balādyataḥ || tadahaṁ padmake tīrthesnātvā ca lavaṇāṁbhasi

चूँकि अन्न के अभाव के कारण मुझे बलपूर्वक उपवास प्राप्त हुआ है, अतः पद्मक तीर्थ में लवण-जल में स्नान कर -

श्लोक 45 (skanda.7.39.45)

एतैः सरोरुहैर्देवं पूजयामि महेश्वरम्॥ ततो मया सभार्येण रुद्रेशः संप्रपूजितः

etaiḥ saroruhairdevaṁ pūjayāmi maheśvaram|| tato mayā sabhāryeṇa rudreśaḥ saṁprapūjitaḥ

- इन कमलों से मैं महेश्वर की पूजा करूँ। तब पत्नी सहित मैंने रुद्रेश की भलीभाँति पूजा की।

श्लोक 46 (skanda.7.39.46)

पद्मैश्च भक्तियुक्तेन सभार्येण विशेषतः ॥ जाग्रत्स्थितस्तु देवाग्रे तां रात्रिं सह भार्यया

padmaiśca bhaktiyuktena sabhāryeṇa viśeṣataḥ || jāgratsthitastu devāgre tāṁ rātriṁ saha bhāryayā

भक्तियुक्त होकर पत्नी सहित कमलों से पूजाकर, उस रात्रि देव के सम्मुख पत्नी सहित मैं जागता रहा।

श्लोक 47 (skanda.7.39.47)

ततः प्रभातसमय उदिते सूर्यमण्डले ॥ सा वेश्या मामुवाचेदं कलधौतपलत्रयम्

tataḥ prabhātasamaya udite sūryamaṇḍale || sā veśyā māmuvācedaṁ kaladhautapalatrayam

तब प्रातःकाल सूर्यमंडल के उदित होने पर, उस वेश्या ने मुझसे यह कहते हुए तीन पल चाँदी मुझे दी।

श्लोक 48 (skanda.7.39.48)

गृहाणमूल्यं पद्मानां न गृहीतं मया हि तत् ॥ सात्त्विकं भावमास्थाय सभार्येण द्विजोत्तमाः

gṛhāṇamūlyaṁ padmānāṁ na gṛhītaṁ mayā hi tat || sāttvikaṁ bhāvamāsthāya sabhāryeṇa dvijottamāḥ

यह कमलों का मूल्य ले लो - परंतु हे द्विजोत्तमो! मैंने सात्त्विक भाव धारण कर पत्नी सहित उसे स्वीकार नहीं किया।

श्लोक 49 (skanda.7.39.49)

ततो भिक्षां समाहृत्य प्राणयात्रा मया कृता ॥ कालेन महता प्राप्तः कालधर्मं मुनीश्वराः

tato bhikṣāṁ samāhṛtya prāṇayātrā mayā kṛtā || kālena mahatā prāptaḥ kāladharmaṁ munīśvarāḥ

फिर भिक्षा माँगकर मैंने अपनी प्राणयात्रा चलाई। बहुत काल बीतने पर, हे मुनीश्वरो! मुझे मृत्यु प्राप्त हुई।

श्लोक 50 (skanda.7.39.50)

इयं मे दयिता साध्वी प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ मम देहं समादाय प्रविष्टा हव्यवाहनम्॥

iyaṁ me dayitā sādhvī prāṇebhyo'pi garīyasī || mama dehaṁ samādāya praviṣṭā havyavāhanam||

यह मेरी प्रिय साध्वी पत्नी, जो मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है, मेरा शरीर लेकर अग्नि में प्रविष्ट हुई।

श्लोक 51 (skanda.7.39.51)

तत्प्रभावादहं जातः सर्वभौमो महीपतिः ॥ जातिस्मरः सभार्यस्तु सत्यमेतद्द्विजोत्तमाः

tatprabhāvādahaṁ jātaḥ sarvabhaumo mahīpatiḥ || jātismaraḥ sabhāryastu satyametaddvijottamāḥ

उसी के प्रभाव से मैं पत्नी सहित जातिस्मर, सार्वभौम राजा हुआ - यह सत्य है, हे द्विजोत्तमो!

श्लोक 52 (skanda.7.39.52)

एतस्मात्कारणादस्य भक्तिर्लिंगस्य चोपरि ॥ मम नित्यं सभार्यस्य सत्यमेतद्ब्रवीमि वः

etasmātkāraṇādasya bhaktirliṁgasya copari || mama nityaṁ sabhāryasya satyametadbravīmi vaḥ

इसी कारण मेरी तथा मेरी पत्नी की इस लिंग के प्रति नित्य भक्ति है - यह सत्य मैं तुमसे कहता हूँ।

श्लोक 53 (skanda.7.39.53)

मया क्रियाविहीनेन भक्तिबाह्येन सत्तमाः ॥ व्रतमेतत्समाचीर्णं तस्येदं सुमहत्फ लम्

mayā kriyāvihīnena bhaktibāhyena sattamāḥ || vratametatsamācīrṇaṁ tasyedaṁ sumahatpha lam

हे सत्तमो! मुझ क्रियाविहीन और भक्तिशून्य के द्वारा भी यह व्रत किया गया, और यह उसका महान फल है।

श्लोक 54 (skanda.7.39.54)

अधुना भक्तियुक्तस्य यथोपकरणान्मम ॥ भविष्ये यत्फलं किंचिन्नो वेद्मि च मुनीश्वराः ॥ येन सोमेशमुत्सृज्य अत्राहं भक्ति तत्परः

adhunā bhaktiyuktasya yathopakaraṇānmama || bhaviṣye yatphalaṁ kiṁcinno vedmi ca munīśvarāḥ || yena someśamutsṛjya atrāhaṁ bhakti tatparaḥ

अब भक्तियुक्त होकर यथोचित उपकरणों सहित मुझे भविष्य में क्या फल मिलेगा, यह मैं नहीं जानता, हे मुनीश्वरो! इसीलिए सोमेश को छोड़कर मैं यहाँ भक्तिपरायण हूँ।

श्लोक 55 (skanda.7.39.55)

॥ ईश्वर उवाच ॥ एवं श्रुत्वा तु ते विप्रा विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ॥ साधुसाध्विति जल्पंतो राजानं संप्रशंसिरे

|| īśvara uvāca || evaṁ śrutvā tu te viprā vismayotphullalocanāḥ || sādhusādhviti jalpaṁto rājānaṁ saṁpraśaṁsire

ईश्वर ने कहा - यह सुनकर वे ब्राह्मण विस्मय से नेत्र फैलाए हुए 'साधु साधु' कहते हुए राजा की प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 56 (skanda.7.39.56)

पूजयामासुरनिशं लिंगं तत्र स्वयंभुवम् ॥ ततोऽसौ पार्थिवश्रेष्ठो लिंगस्यास्यप्रसादतः ॥ संसिद्धिं परमां प्राप्तो दुर्ल्लभां त्रिदशैरपि

pūjayāmāsuraniśaṁ liṁgaṁ tatra svayaṁbhuvam || tato'sau pārthivaśreṣṭho liṁgasyāsyaprasādataḥ || saṁsiddhiṁ paramāṁ prāpto durllabhāṁ tridaśairapi

वे उस स्वयंभू लिंग की निरंतर पूजा करने लगे। तब वह श्रेष्ठ राजा इस लिंग की कृपा से देवताओं के लिए भी दुर्लभ परम सिद्धि को प्राप्त हुआ।

श्लोक 57 (skanda.7.39.57)

सा च वेश्या भगवती शिवरात्रिप्रभावतः ॥ तस्य लिंगस्य माहात्म्याद्रंभानामाप्सराऽभवत्

sā ca veśyā bhagavatī śivarātriprabhāvataḥ || tasya liṁgasya māhātmyādraṁbhānāmāpsarā'bhavat

और वह वेश्या भगवती शिवरात्रि के प्रभाव तथा उस लिंग की महिमा से रंभा नामक अप्सरा बन गई।

श्लोक 58 (skanda.7.39.58)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तल्लिंगं पूजयेद्बुधः ॥ धर्मकामार्थमोक्षं च यो वांछत्यखिलप्रदम्

tasmātsarvaprayatnena talliṁgaṁ pūjayedbudhaḥ || dharmakāmārthamokṣaṁ ca yo vāṁchatyakhilapradam

अतः जो व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चाहता है, जिन्हें यह लिंग पूर्ण रूप से प्रदान करता है, उसे सर्वप्रयत्न से इस लिंग की पूजा करनी चाहिए।

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