प्रभास खण्ड · अध्याय 339
हुंकारकूप माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.339.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि कूपं त्रैलोक्यविश्रुतम्। देविकायास्तटे रम्ये हुंकारेणैव पूर्यते
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi kūpaṁ trailokyaviśrutam| devikāyāstaṭe ramye huṁkāreṇaiva pūryate
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, फिर देविका के रमणीय तट पर स्थित, त्रैलोक्य में विख्यात उस कूप में जाना चाहिए, जो केवल हुंकार करने से ही जल से भर जाता है।
श्लोक 2 (skanda.7.339.2)
ततोऽधस्तात्पुनर्याति सलिलं तत्र भामिनि। तण्डीनाम पुरा प्रोक्तो देविकातटमास्थितः
tato'dhastātpunaryāti salilaṁ tatra bhāmini| taṇḍīnāma purā prokto devikātaṭamāsthitaḥ
फिर वहाँ जल नीचे उतर जाता है, हे भामिनि। पूर्वकाल में देविका के तट पर तण्डि नामक मुनि निवास करते थे,
श्लोक 3 (skanda.7.339.3)
तपस्तेपे महादेवि शिवभक्तिपरायणः। तस्यैवं तप्यमानस्य तस्मिन्देशे वरानने
tapastepe mahādevi śivabhaktiparāyaṇaḥ| tasyaivaṁ tapyamānasya tasmindeśe varānane
जो शिवभक्तिपरायण होकर तप करते थे, हे महादेवि। इस प्रकार उस स्थान पर तप करते हुए उनके पास, हे वरानने,
श्लोक 4 (skanda.7.339.4)
आजगाम मृगो वृद्धस्तं देशमन्ध दृक्प्रिये। स पपात महागर्ते अगाधे जलवर्जिते
ājagāma mṛgo vṛddhastaṁ deśamandha dṛkpriye| sa papāta mahāgarte agādhe jalavarjite
एक वृद्ध अंधा मृग उस स्थान पर आया, हे प्रिये, और वह जल-रहित अगाध महागर्त में गिर पड़ा।
श्लोक 5 (skanda.7.339.5)
तं दृष्ट्वा कृपयाविष्टः स मुनिर्मौनमास्थितः। हुंकारं कुरुते तत्र भूयोभूयश्च भामिनि
taṁ dṛṣṭvā kṛpayāviṣṭaḥ sa munirmaunamāsthitaḥ| huṁkāraṁ kurute tatra bhūyobhūyaśca bhāmini
उसे देखकर करुणा से आविष्ट वे मुनि, मौनव्रती होते हुए भी, वहाँ बार-बार हुंकार करने लगे, हे भामिनि।
श्लोक 6 (skanda.7.339.6)
अथ हुंकारशब्देन तस्य गर्तः प्रपूरितः। ततो मृगो विनिष्क्रांतः कृच्छ्रेण सलिलात्प्रिये
atha huṁkāraśabdena tasya gartaḥ prapūritaḥ| tato mṛgo viniṣkrāṁtaḥ kṛcchreṇa salilātpriye
उस हुंकार शब्द से वह गर्त जल से भर गया; तब वह मृग बड़ी कठिनाई से उस जल में से बाहर निकला, हे प्रिये।
श्लोक 7 (skanda.7.339.7)
मानुषं रूपमाश्रित्य तमृषिं पर्यपृच्छत। विस्मयं परमं गत्वा काम्यदं कर्मणः फलम्
mānuṣaṁ rūpamāśritya tamṛṣiṁ paryapṛcchata| vismayaṁ paramaṁ gatvā kāmyadaṁ karmaṇaḥ phalam
मानव रूप धारण कर उसने उस ऋषि से, अत्यंत विस्मित होकर, उस कर्म के इच्छित फल के विषय में पूछा।
श्लोक 8 (skanda.7.339.8)
मृगत्वे पतितश्चात्र नरो भूत्वा विनिर्गतः। सोऽब्रवीत्तस्य माहात्म्यं सलिलस्य द्विजोत्तमः
mṛgatve patitaścātra naro bhūtvā vinirgataḥ| so'bravīttasya māhātmyaṁ salilasya dvijottamaḥ
"मैं मृगयोनि में पड़ा हुआ था, यहाँ से मनुष्य होकर निकला हूँ"—तब उस श्रेष्ठ द्विज ने उसे उस जल की महिमा बताई—
श्लोक 9 (skanda.7.339.9)
अतोऽहं नरतां प्राप्तो नान्यदस्तीह कारणम्। ततस्तत्सलिलं भूयः प्रविष्टं धरणीतले
ato'haṁ naratāṁ prāpto nānyadastīha kāraṇam| tatastatsalilaṁ bhūyaḥ praviṣṭaṁ dharaṇītale
"इसीलिए मुझे मनुष्यत्व प्राप्त हुआ, यहाँ अन्य कोई कारण नहीं है।" फिर वह जल पुनः पृथ्वी में समा गया।
श्लोक 10 (skanda.7.339.10)
ततो हुंकृतवान्भूयः स ऋषिः कौतुकान्वितः। आपूरितः पुनः कूपः सलिलेन पुरा यथा
tato huṁkṛtavānbhūyaḥ sa ṛṣiḥ kautukānvitaḥ| āpūritaḥ punaḥ kūpaḥ salilena purā yathā
तब कौतुकयुक्त उस ऋषि ने फिर से हुंकार किया; कूप पूर्ववत् पुनः जल से भर गया।
श्लोक 11 (skanda.7.339.11)
ततः स कृतवान्स्नानं तथा च पितृतर्पणम्। मत्वा तीर्थवरं तत्र ततः प्राप्तः परां गतिम्
tataḥ sa kṛtavānsnānaṁ tathā ca pitṛtarpaṇam| matvā tīrthavaraṁ tatra tataḥ prāptaḥ parāṁ gatim
तब उन्होंने वहाँ स्नान और पितृतर्पण किया; उसे उत्तम तीर्थ मानकर वे फिर परम गति को प्राप्त हुए।
श्लोक 12 (skanda.7.339.12)
अद्यापि हुंकृते तस्मिन्सलिलौघः प्रवर्तते। तत्र गत्वा नरो भक्त्या अपि पापरतोऽपि यः
adyāpi huṁkṛte tasminsalilaughaḥ pravartate| tatra gatvā naro bhaktyā api pāparato'pi yaḥ
आज भी वहाँ हुंकार करने पर जलधारा प्रवाहित होती है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक वहाँ जाता है—चाहे वह पापरत ही क्यों न हो—
श्लोक 13 (skanda.7.339.13)
न मानुष्यं पुनर्जन्म प्राप्नोति जगतीतले। तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा यः श्राद्धं कुरुते नरः
na mānuṣyaṁ punarjanma prāpnoti jagatītale| tatra snātvā śucirbhūtvā yaḥ śrāddhaṁ kurute naraḥ
उसे इस पृथ्वीतल पर पुनः मनुष्य-जन्म नहीं लेना पड़ता। जो मनुष्य वहाँ स्नान कर, शुद्ध होकर श्राद्ध करता है,
श्लोक 14 (skanda.7.339.14)
मुच्यते सर्वपापेभ्यः पितृलोके महीयते। कुलानि तारयेत्सप्त अतीताऽनागतानि च
mucyate sarvapāpebhyaḥ pitṛloke mahīyate| kulāni tārayetsapta atītā'nāgatāni ca
वह सब पापों से मुक्त होकर पितृलोक में पूजित होता है; वह अतीत और भविष्य की सात पीढ़ियों को तार देता है।